कर्नाटक: 'दलितों के लिए बीजेपी में बढ़ने के मौके नहीं', सांसद ने अपनी पार्टी पर लगाया आरोप

- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरू से, बीबीसी हिंदी के लिए
कर्नाटक में बीजापुर से बीजेपी सांसद और वरिष्ठ दलित नेता रमेश जिगाजिनागी आजकल अपनी ही पार्टी के रुख से मायूस हैं. उनका कहना है बीजेपी में दलित नेताओं के लिए आगे बढ़ने का कोई अवसर नहीं है.
उनका कहना है कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनाने में दलितों का योगदान होता है लेकिन जब दलितों को समर्थन देने की बात होती है तो कोई भी उनका साथ नहीं देता. ये सोचने वाली बात है.
बीबीसी हिंदी से ख़ास बातचीत में जिगाजिनागी ने कहा कि देश को आजाद हुए 75 साल हो गए लेकिन कर्नाटक में एक भी दलित मुख्यमंत्री नहीं बना है. जबकि महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे आस-पास के राज्य में एक-एक दलित मुख्यमंत्री बन चुका है.
उन्होंने कहा, "ये बड़े समाज के लोग दिल क्यों बड़ा नहीं करते ये मैं पूछना चाहता हूं."

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येदियुरप्पा के बेटे को प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर क्या बोले?
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के कद्दावर नेता बी.एस. येदियुरप्पा के बेटे बी.वाई. विजयेंद्र को हाल में राज्य बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया.
इसे लेकर 70 साल के जिगाजिनागी ने कहा था, "दलित प्रभावशाली जाति के लोगों का समर्थन करते आए हैं. ये लिंगायत को गौड़ा, साहूकार पाटिल कहके उनको समर्थन देते आए हैं, हम उनके आगे बढ़ने को समर्थन देते रहे हैं. लेकिन बदले में वे हमारा समर्थन नहीं करते. इस पार्टी (बीजेपी) में दलित नेता आसानी से शीर्ष पर नहीं पहुंच पाते हैं. ये बेहद दुख की बात है. लेकिन हम वास्तविकता को स्वीकार कर आगे बढ़ जाएंगे."
बी.वाई. विजयेंद्र शिकारीपुर से बीजेपी विधायक हैं.
बीबीसी हिंदी ने जिगाजिनागी से पूछा कि क्या वो राज्य में बीजेपी का अध्यक्ष बनना चाहते हैं?
इस सवाल पर उन्होंने कहा, "मैंने नींद में भी बीजेपी अध्यक्ष बनने की बात नहीं सोची. हमें पता है कि अगर कोई दलित अध्यक्ष बन गया तो पार्टी में बहुत सारे लोग उसका समर्थन नहीं करेंगे."
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और जनता पार्टी के दिग्गज नेता रहे रामकृष्ण हेगड़े को याद करते हुए रमेश जिगाजिनागी ने कहा कि वे बड़े कद के नेता थे पार्टी में साथ काम करने वालों से सलाह-मशविरा कर फैसले लेते थे.
जिगाजिनागी ने कहा, "ऐसे नेता अब नहीं हैं. मैं युवा था फिर भी हेगड़े मुझसे सलाह-मशविरा करते थे. हम लोगों के प्रति उनके मन में गहरी इज्जत थी. मैं ब्राह्मणों का समर्थन करता हूं लेकिन ब्राह्मणवाद मुझे ठीक नहीं लगता."
उन्होंने कहा, " कर्नाटक में भले ही बीजेपी को ज्यादा वोट मिल रहे हैं और उनको दलितों का समर्थन जारी है. लेकिन दलितों के साथ भेदभाव कम नहीं हो रहा है."
"जात-पांत के आधार पर भेदभाव जारी है. दलित अपनी निजी तरक्की के लिए किसी न किसी पार्टी से जुड़ कर उन्हें वोट देते हैं. ये पिछड़े, दलितों की मजबूरी हैं. निजी तरक्की के लिए वे इन पार्टियों को वोट देते हैं. विचारधारा के आधार पर वोटिंग नहीं हो रही है."

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जब नहीं मिला मंदिर में प्रवेश
जिनजिनागी ने उस घटना का भी जिक्र किया जब दलित होने की वजह से उन्हें मंदिर में घुसने नहीं दिया गया. उस समय वो मंत्री भी थे.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया, "1983 में मैं कर्नाटक का गृह मंत्री हो गया था. उस दौरान एक मंदिर समारोह में मुझे बुलाया गया था. लेकिन चालीस-पचास हजार लोगों की भीड़ के बीच मैं मंदिर में घुसने ही वाला था कि एक स्वामी जी ने कहा इन्हें क्यों अंदर घुसने दे हो रहो. मेरे कान में जैसे किसी ने शीशा उड़ेल दिया हो."
उन्होंने कहा, "इस घटना के 20-25 साल पहले मेरी मां ने कहा था मंदिर में घुसने से हमें पाप लगेगा. मैंने सोचा मैं पाप से बच गया. इसके बाद मैं कभी मंदिर नहीं गया. जब तक इस देश का हृदय विशाल नहीं होता तब तक रिजर्वेशन की जरूरत है.''
उन्होंने मंदिरों पर सरकार के नियंत्रण के ख़िलाफ़ बीजेपी के रुख के बारे में तो कुछ नहीं कहा लेकिन ये जरूर कहा कि मंदिर सरकारों के नियंत्रण में होने चाहिए.
जिनजिनागी ने 'रिजर्वेशन के अंदर रिजर्वेशन' की सिफारिश की. तेलंगाना में दलित समुदाय मादिगा को रिजर्वेशन देने के पीएम नरेंद्र मोदी के वादे के बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें इस तरह का रिजर्वेशन मिलना चाहिए.
उन्होंने जाति जनगणना का खुल कर समर्थन नहीं किया. उन्होंने कहा कि बिहार में जो जाति सर्वेक्षण हुआ है, उसमें काफी कमियां हैं लेकिन कर्नाटक में इसकी कोई जरूरत नहीं है.
जिगाजिनागी का सियासी सफ़र
जिगाजिनागी ने अविभाजित जनता पार्टी के दिवंगत नेता और तीन बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे रामकृष्ण हेगड़े के मार्गदर्शन में आपातकाल के खिलाफ विद्रोह करते हुए राजनीति में प्रवेश किया था
गन्न हब माने जाने वाले चिक्कोडी से विधायक के रूप में अपने लंबे कार्यकाल के दौरान वह लोकप्रिय दलित नेता बन कर उभरे.
1998 में अपने पहले लोकसभा चुनाव में चिक्कोडी से पूर्व केंद्रीय मंत्री और सात बार के कांग्रेस सांसद बी. शंकरानंद को हराने के बाद वो लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गए.
उन्होंने अगले तीन कार्यकालों के लिए सीट बरकरार रखी, भले ही वह लोक शक्ति पार्टी से जनता दल (यूनाइटेड) में चले गए.
इसके बाद लोकशक्ति का जनता दल (यूनाइटेड ) में विलय हो गया. इसके बाद वो भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए.
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