रानी वेलु नाच्चियार: हैदर अली की मदद से जिन्होंने अंग्रेज़ों को दी थी मात

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- Author, वक़ार मुस्तफ़ा
- पदनाम, पत्रकार और शोधकर्ता
हैदर अली से वेलु नाच्चियार की मुलाक़ात 18वीं सदी के डिंडीगुल (दिंडुक्कल) शहर में हुई थी. तालों और बिरयानी के लिए मशहूर तमिलनाडु का यह शहर तब दक्षिण भारतीय राज्य मैसूर का हिस्सा हुआ करता था.
हैदर अली उत्तर में कृष्णा नदी, पूर्व में पूर्वी घाट और पश्चिम में अरब सागर तक फैले, उस मैसूर राज्य के शासक थे जिसका अधिकतर हिस्सा अब तमिलनाडु और केरल के पड़ोसी राज्य कर्नाटक में है.
वेलु नाच्चियार 1773 में ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों अपने पति मुथु वदुग्नाथ पेरियाउदय थेवर और उनकी रियासत शिवगंगा को खोकर अपनी कम उम्र की बेटी वेल्लाची के साथ शरण और सहायता की तलाश में थीं.
हैदर अली और वेलु की मुलाक़ात परस्पर सम्मान के एक ऐसे दौर की शुरुआत थी, जिसे अगली पीढ़ी में टीपू सुल्तान ने भी निभाया.
वेलु को हैदर अली से मदद मिली तो उन्होंने ऐसा सम्मान अर्जित किया, जो हमेशा के लिए यादगार बन गया.
यह सम्मान क्या था, इस सवाल को यहीं छोड़ते हुए क्यों न पहले इस बात की जानकारी ली जाए कि वेलु नाच्चियार कौन थीं और वो किन चुनौतियों से जूझ रही थीं.

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राजकुमारी से महारानी बनने का सफ़र
वेलु के माता-पिता रामनाड या रामनाथपुरम राज्य (अब यह क्षेत्र तमिलनाडु में है) के शासक थे.
सन 1730 में जन्मी अपनी इस इकलौती संतान को उन्होंने घुड़सवारी, तीरंदाज़ी और मार्शल आर्ट जैसे वलारी (दरांती फेंकना) और सिलंबम (बांस की छड़ी से लड़ना) की ट्रेनिंग दी.
वो अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी और उर्दू समेत कई भाषाओं पर पकड़ रखती थीं. 16 साल की उम्र में वेलु की शादी शिवगंगा के राजकुमार से हुई.
इस जोड़े ने 1750 से 1772 यानी दो दशकों से अधिक समय तक शिवगंगा पर राज किया.

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पति की हत्या और हैदर अली से मुलाकात
सन 1772 ही वो साल था जब आरकाट के नवाब ने अंग्रेज़ों के साथ मिलकर शिवगंगा पर हमला किया और वेलु नाच्चियार के पति की 'कलयार कोयिल युद्ध' में हत्या कर दी.
हमले के समय रानी वेलु और उनकी बेटी पास के मंदिर में थीं, इसलिए बच गईं. थेवर के साथ लड़ने वाले वफ़ादार मारुथु (मरुधु) भाइयों, वेल्लई और चित्रा ने वहां से उन्हें निकाला और सुरक्षित जगह ले गए. वेलु को अपने पति की लाश भी नहीं मिल सकी.
अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के सैन्य इतिहास के विशेषज्ञ शुबेंद्र लिखते हैं कि रानी की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने के लिए उनकी भरोसेमंद अंगरक्षक उडयाल और दूसरी महिला सेनानी पीछे रह गईं थीं.
नवाब के आदमियों ने उडयाल को पकड़ लिया था. अपने ऊपर ज़ुल्म के बावजूद उन्होंने रानी का ठिकाना नहीं बताया तो उनका सिर काट दिया गया.
जंगलों और गांव-गांव में बेबस होकर घूमती रानी वेलु ने महसूस किया कि उन्हें शिवगंगा को अंग्रेज़ों से वापस लेने के लिए साथ देने वालों और मदद करने वालों की ज़रूरत है.
मारुथु भाइयों ने वफादारों का एक लश्कर तैयार करना शुरू कर दिया था, लेकिन यह अंग्रेज़ों के मुक़ाबले के लिए काफ़ी नहीं था.
मैसूर के सुल्तान हैदर अली का न तो अंग्रेज़ों से अच्छा संबंध था और न ही आरकाट के नवाब से. इसीलिए रानी वेलु ने उनकी मदद लेने का फ़ैसला किया और मैसूर का ख़तरनाक सफ़र तय किया.
वेलु नाच्चियार की हैदर अली से मुलाक़ात शिवगंगा से लगभग 100 किलोमीटर दूर डिंडीगुल में हुई. उन्होंने हैदर अली से उर्दू भाषा में बात की और उन्हें अपनी हिम्मत और दृढ़ता से भी बहुत प्रभावित किया.
उन्होंने वेलु को डिंडीगुल क़िले में रहने की दावत दी, जहां उनकी इज़्ज़त रानी की तरह की जाती थी. हैदर अली ने दोस्ती के प्रतीक के तौर पर वेलु के लिए अपने महल के अंदर एक मंदिर भी बनवाया.

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अंग्रेज़ों पर जीत
इतिहासकार आर. मणिकंदन के अनुसार हैदर अली के साथ वेलु नाच्चियार की एकता आपसी ज़रूरत से पैदा हुई थी.
वेलु को अपना राज दोबारा प्राप्त करने के लिए सैनिक सहायता की ज़रूरत थी, जबकि हैदर अली ने उस क्षेत्र में ब्रिटेन उपनिवेशवादी शक्ति को चुनौती देने का अवसर समझा.
हैदर अली ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ वेलु की लड़ाई में साझेदार बनने का संकल्प किया. उन्होंने वेलु को मासिक 400 पाउंड और हथियारों के साथ साथ सैयद करकी के नेतृत्व में 5,000 पैदल सैनिकों और घुड़सवार दस्तों की मदद भी दी.
शुबेंद्र लिखते हैं, "इस फ़ौज के साथ रानी वेलु ने शिवगंगा के विभिन्न क्षेत्रों को जीतना शुरू कर दिया. यहां तक कि वह 1781 में तिरुचिरापल्ली क़िले तक पहुंच गईं जो अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े में था."
"हैदर अली की वजह से अंग्रेज़ों तक और सैन्य सहायता नहीं पहुंच सकती थी लेकिन रानी वेलु के पास क़िले में प्रवेश का साधन नहीं था."
"उडयाल के बलिदान की याद में रानी वेलु ने उनके नाम पर महिलाओं की एक सेना बनाई थी. इस सेना की कमांडर इन चीफ़ कोयिली ने क़िले के दरवाज़े खोलने की एक योजना पेश की."
"विजयादशमी का त्योहार बस कुछ दिन दूर है. पास के देहात की सभी महिलाएं मंदिर जाएंगी. हम उन में घुल मिलकर अंदर जा सकते हैं. मैं अपनी उडयाल सेना की लड़कियों के एक छोटे से समूह का नेतृत्व करूंगी और छिपे हुए हथियारों के साथ क़िले में घुस जाऊंगी. हम आपके लिए अंदर से दरवाज़ा खोल देंगे, मेरी रानी."
रानी वेलु के चेहरे पर मुस्कुराहट फैल गई.
"आप हमेशा कोई न कोई रास्ता निकाल लेती हैं कोयिली. आपने उडयाल का नाम हमेशा बुलंद किया है."
विजयादशमी का दिन आया तो आसपास के देहातों से महिलाओं के साथ कोयिली और उनकी साथी भी अंदर जाकर मुख्य मंदिर में जमा हो गईं.
विधि विधान शुरू हुआ और नियत समय पर कोयिली ने आवाज़ दी, उठो मेरी बहनो!
'उडयाल' की महिलाएं तुरंत उठीं और अपनी तलवारें निकाल कर पहरे पर खड़े अंग्रेज़ सिपाहियों पर नियंत्रण पाते हुए दरवाज़े की ओर बढ़ीं.
दरवाज़े पर रखी मशाल उठाकर खुद आग लगाई और सिपाहियों को पकड़ते हुए गोला-बारूद के भंडार में घुस गईं.
अचानक क़िले से एक ज़बरदस्त धमाके की आवाज़ सुनाई दी. कुछ ही मिनटों में क़िले के दरवाज़े खुल गए और दो 'उडयाल' महिलाएं घोड़े पर सवार होकर वहां पहुंच गईं, जहां रानी वेलु की सेना छिपी हुई थी.
"रानी! दरवाज़े खुले हैं. अंग्रेज़ों के गोला बारूद के भंडार को उड़ा दिया गया है. यह हमला करने का सही समय है." एक महिला ने वेलु को बताया.
"अच्छा, मेरी बेटी कोयिली कहां है?"
'उडयाल' महिलाओं ने आंखें नीची कर लीं.
"हमारी कमांडर ने अंग्रेज़ों के गोला बारूद को बर्बाद करने के लिए ख़ुद को क़ुर्बान कर दिया."
यह ख़बर सुनकर रानी वेलु अपने घोड़े पर बैठी की बैठी रह गईं. मगर फिर सैयद करकी ने उनसे कहा, "हम उनकी क़ुर्बानी को बर्बाद नहीं जाने दे सकते. अब हमला करने का वक़्त है. हम आपके हुक्म के इंतज़ार में हैं."
रानी वेलु ने हिम्मत जुटाई और हमले का आदेश दे दिया. क़िले के अंदर कर्नल विलियम्स फ़्लार्टन के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना के पास रसद और गोला-बारूद की कमी हो चुकी थी.
लेखक सुरेश कुमार लिखते हैं कि अगस्त 1781 में वेलु नाच्चियार और हैदर अली की संयुक्त सेना ने अंततः क़िले की रक्षा को ध्वस्त किया और उस पर क़ब्ज़ा कर लिया.
इस तरह आज़ादी की पहली लड़ाई से 77 साल पहले वेलु नाच्चियार, ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्ति के ख़िलाफ़ जंग जीतने वाली भारत की पहली रानी बन गईं.
उन्होंने अपनी बेटी वेल्लाची को राज सौंपने से पहले अगले 10 वर्षों तक शिवगंगा पर शासन किया.
इतिहासकार आर मणिकंदन का कहना है कि वेलु नाच्चियार एक ऐसी योग्य सैन्य नेतृत्वकर्ता थीं जो अपने दुश्मनों की कमज़ोरियों से फ़ायदा उठाने में माहिर थीं. क्षेत्र में ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्ति को चुनौती देने के लिए हैदर अली और टीपू सुल्तान के साथ उनकी एकजुटता उनकी रणनीति का एक उदाहरण है.
एक ज़बरदस्त योद्धा के तौर पर अपनी शोहरत के बावजूद वेलु नाच्चियार अपनी प्रजा के लिए हमदर्दी रखती थीं. इतिहासकार वी पद्मावती के अनुसार वह एक न्यायप्रिय और हमदर्द शासक थीं जो अपने लोगों से प्यार करती थीं.
उनकी हमदर्दी की एक मिसाल उन दलितों को शरण देने के फ़ैसले में नज़र आती है जिन्हें शासक वर्ग के लोगों ने सताया था.
आर मणिकंदन के अनुसार, "वह एक स्वाभाविक नायक थीं."

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युद्ध के बाद क्या हुआ
विजय के बाद वेलु नाच्चियार ने एक दशक तक शासन किया. मुश्किल घड़ी के साथियों को राज्य में प्रमुख पद दिए. हैदर अली की असीमित सहायता के लिए उनके सम्मान में वेलु नचियार ने सारगानी में एक मस्जिद बनवाई.
जेएच राइस ने 'द मैसूर स्टेट गज़ेटियर' में लिखा है कि अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ मैसूर के दूसरे युद्ध में वेलु नाच्चियार ने हैदर अली का समर्थन किया और उनकी मदद के लिए अपनी सेना भेजी.
हैदर अली की मौत के बाद वेलु ने उनके बेटे टीपू सुल्तान के साथ भी दोस्ताना संबंध रखे और उनसे भाई की तरह प्यार किया. वेलु ने टीपू सुल्तान को तोहफ़े के तौर पर एक शेर भी भेजा.
मुहिब्बुल हसन ने हैदर अली और टीपू सुल्तान पर अपनी किताब में लिखा है कि टीपू सुल्तान ने वेलु नाच्चियार को सेना को मज़बूत करने के लिए हथियार और गोला-बारूद भी दिया.
टीपू सुल्तान ने वेलु नाच्चियार को एक तलवार भी भेजी, जिसे उन्होंने अपनी बहुत सी लड़ाइयों में इस्तेमाल किया.
वेलु नाच्चियार की बेटी वेल्लाची ने 1790 से 1793 तक शासन किया. वेलु नाच्चियार का देहांत 1796 में शिवगंगा में हुआ.
हमसाधवानी अलगारसामी लिखती हैं कि वेलू को तमिल संस्कृति में वीरा मंगाई (वीर मंगलई) यानी बहादुर महिला के नाम से जाना जाता है.
सन 2008 में उनकी याद में भारत में एक डाक टिकट जारी किया गया. तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने सन 2014 में शिवगंगा में वीरा मंगाई वेलु नाच्चियार मेमोरियल का उद्घाटन किया. रानी की 6 फ़ुट की कांसे की प्रतिमा भी लगाई गई.
जयललिता ही के दौर में हैदर अली और टीपू सुल्तान की बहादुरी के सम्मान में एक मिनी मंडपम के निर्माण की शुरुआत हुई.
यह स्मारक पिछले 5 साल से डिंडीगुल में पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है. वही डिंडीगुल जहां हैदर अली और वेलु नाच्चियार ने अपनी लंबी एकजुटता की शुरुआत की थी.
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