मौत के 50 बरस बाद क्यों याद आए हैदराबाद के निज़ाम?

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव इन दिनों 'हज़ूर निज़ाम' को याद करते नहीं थक रहे, निज़ाम को अपना राजा बता रहे हैं; और निज़ाम शाही को लेकर 'फैली भ्रांतियां' को दूर करने के लिए इतिहास दोबारा लिखने तक की बात कह रहे हैं.
ब्रितानी राज के ख़ात्मे के बाद हैदराबाद के भारत में विलय से इनकार, नवनिर्मित भारत से संघर्ष और रज़ाकारों द्वारा मचाई गई हिंसा के मद्देनज़र निज़ाम भारतीय इतिहास में एक विवादित शख़्सियत के तौर पर देखे जाते हैं.
इंजीनियर आर्थर कॉटन का हवाला देते हुए केसीआर ने विधानसभा में कहा, "कॉटन एक ब्रितानी थे, ब्रितानी जिन्होंने हिंदुस्तान को ग़ुलाम बनाया था, फिर भी आंध्र प्रदेश में आज भी कॉटन पूजे जाते हैं."

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निज़ाम का योगदान
ब्रितानी इंजीनियर आर्थन कॉटन ने गोदावरी पर बांध बनवाया जो आज भी मौजूद है और कहा जाता है कि इससे सिंचाई में मदद मिली जो अकाल और भुखमरी पर क़ाबू पाने में बहुत मददगार साबित हुआ.
मुख्यमंत्री ने आगे कहा, "लेकिन यहां निज़ाम हमारे राजा हैं. वो हमारे इतिहास का हिस्सा हैं. आप निज़ाम सागर बांध के बारे में क्या कहेंगे जिसका निर्माण निज़ाम ने करवाया था. हमें ये बात क़बूल करनी चाहिए."
निज़ाम के ज़रिये बनवाये गए एक अस्पताल का ज़िक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा "ज़्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते हैं. हम इतिहास फिर से लिखेंगे और इसे तेलंगाना के लोगों को मुहैया कराएंगे."

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1923 में गोदावरी की सहायक नदी मंजीरा पर निज़ाम मीर उसमान अली ने एक विशाल बांध बनवाया था जिससे हज़ारों एकड़ खेती की ज़मीन की सिंचाई होती है.
निज़ाम की तारीफ़ के मामले में केसीआर महज़ विधानसभा तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि बाद में होने वाले जलसे-जलूसों में भी निज़ाम की प्रशंसा वो बार-बार करते रहे हैं.
एक फंक्शन में उन्होंने ये ज़िक्र किया कि वो आख़िरी निज़ाम - मीर उसमान अली ख़ान, के उर्स पर उनकी मज़ार पर गए थे तो "लोगों ने मेरे ख़िलाफ़ बोला, तेलंगाना का कोई इतिहास ही नहीं है, और कोई है तो रज़ाकार है, निज़ाम मेरा बादशाह है, मेरा इतिहास है."

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राजशाही व्यवस्था थी...
तेलंगाना कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष भट्टी विक्रमारका निज़ाम पर दिए गए केसीआर के बयानों को मज़हब की राजनीति क़रार देते हैं.
भट्टी विक्रमारका कहते हैं, "वर्तमान मुख्यमंत्री को लगता है कि निज़ाम को मुस्लिमों के आइकन के तौर पर पेश किया जा सकता है. लेकिन वो ये भूल रहे हैं कि वो राजशाही व्यवस्था थी जिसमें आम लोगों की किसी भी तरह की भागीदारी नहीं थी."
कांग्रेस का ये भी कहना है कि केसीआर मुस्लिमों के हितों में कुछ न करने की नाकामी को निज़ाम की तारीफ़ों की तह में छुपा देना चाहते हैं.
कांग्रेस ये भी कह रही है कि केसीआर का निज़ाम-प्रेम सांप्रदायिक ताक़तों को शक्ति प्रदान करेगी.

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सत्ता में बने रहने की उम्मीद
इधर भाजपा नेता वी सुधाकर शर्मा कहते हैं, "निज़ाम के तारीफ़ करते वक़्त केसीआर ये भूल जाते हैं कि रज़ाकार के हाथों सैकड़ों लोगों का क़त्ल हुआ था. निज़ाम मीर उस्मान अली भारत से नहीं मिलना चाहते थे और तत्कालीन गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल को पुलिस एक्शन के लिए मजबूर होना पड़ा और तब जाकर हैदराबाद का विलय भारत में हो पाया था."
सुधाकर शर्मा कहते हैं, "भारतीय जनता पार्टी मुख्यमंत्री के इस कृत्य की कड़ी निंदा करती है".
कुछ जानकारों का कहना है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री अपनी इस रणनीति से मुख्य विरोधी राजनीतिक दल कांग्रेस से मुस्लिम वोट हड़प लेना चाहते हैं.
साथ ही इसकी प्रतिक्रिया में भाजपा को थोड़ा बल मिलेगा, लेकिन चुंकि वो सूबे में इतनी मज़बूत नहीं तो अंत में बड़ा फ़ायदा तेलंगाना राष्ट्र समीति यानी चंद्रशेखर राव की पार्टी की ही होगी और वो आगे भी सत्ता में बने रहने की उम्मीद कर सकते हैं.

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कौन थे हैदराबाद के आख़िरी निज़ाम
जिस समय ब्रिटिश भारत छोड़ रहे थे, उस समय यहाँ के 562 रजवाड़ों में से सिर्फ़ तीन को छोड़कर सभी ने भारत में विलय का फ़ैसला किया. ये तीन रजवाड़े थे कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद. मीर उस्मान अली ख़ान बहादुर हैदराबाद के आख़िरी निज़ाम थे.
अंग्रेज़ों के दिनों में भी हैदराबाद की अपनी सेना, रेल सेवा और डाक तार विभाग हुआ करता था. उस समय आबादी और कुल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से हैदराबाद भारत का सबसे बड़ा राजघराना था. उसका क्षेत्रफल 82698 वर्ग मील था जो कि इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक था.
निज़ाम, हैदराबाद के भारत में विलय के किस क़दर ख़िलाफ थे, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने जिन्ना को संदेश भेजकर ये जानने की कोशिश की थी कि क्या वह भारत के ख़िलाफ़ लड़ाई में हैदराबाद का समर्थन करेंगे?
आख़िरकार हैदराबाद को भारत संघ में शामिल कराने के लिए भारतीय सेना को कार्रवाई करनी पड़ी. इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज़्यादा 17 पोलो के मैदान थे. पांच दिनों तक चली इस कार्रवाई में 1373 रज़ाकार मारे गए. हैदराबाद स्टेट के 807 जवान भी खेत रहे.
भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 97 जवान घायल हुए. भारतीय सेना की कार्रवाई शुरू होने से दो दिन पहले ही 11 सितंबर को पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का निधन हो गया था.
6 अप्रैल 1886 को पैदा हुए मीर उस्मान अली ख़ान ने हैदराबाद पर 1911 से 1948 तक राज किया. उनका निधन 24 फरवरी 1967 को हुआ था.
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