कौन थे अलाउद्दीन ख़िलजी से हारने वाले महारावल रतन सिंह?

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- Author, भरत शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
'पद्मावती' फ़िल्म के प्रमोशन के लिए इन दिनों सोशल मीडिया पर बज़ पैदा करने की कोशिश हो रही है. पहले पोस्टर में पद्मावती का किरदार अदा कर रहीं दीपिका पादुकोण नज़र आईं.
इसके बाद शाहिद कपूर का पोस्टर जारी किया गया जिसमें वो महारावल रतन सिंह के रूप में दिख रहे हैं. पोस्टर के साथ लिखा है, ''महारावल रतन सिंह. सामर्थ्य और सम्मान का प्रतीक.''
ज़ाहिर है ट्वीट से साफ़ है कि शाहिद कपूर इस फ़िल्म में रानी पद्मिनी के पति रतनसिम्हा (रतन सिंह) के रोल में हैं. लेकिन हम रतन सिंह के बारे में कितना जानते हैं?
रतन सिंह मेवाड़ के राजा थे जो गुहिल वंश की रावल शाखा से ताल्लुक रखते हैं. अपनी शाखा के अंतिम शासक रहे रतन सिंह को दिल्ली सल्तनत के शासक अलाउद्दीन ख़िलजी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था.
कैसे हुई थी रतन सिंह और पद्मिनी की शादी?

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ऐसा कहा जाता है कि रतन सिंह ने एक स्वयंवर में रानी पद्मिनी से शादी की थी. अलाउद्दीन ख़िलजी और रतन सिंह के बीच टकराव की भी कई कहानियां मिलती हैं. ऐसा कहा जाता है कि सुल्तान ने राजा को बंदी बना लिया था. बाद में राजा के लड़ाकों ने उन्हें आज़ाद कराया.
प्रचलित है कि सुल्तान ने बाद में किले पर हमला किया. वो भीतर तो दाख़िल नहीं हो सका, लेकिन बाहर कब्ज़ा जमाए रखा. बाद में रतन सिंह ने अपनी सेना को अंतिम सांस तक लड़ने को कहा. जब सुल्तान ने राजपूत राजा को हराया तो उनकी पत्नी रानी पद्मिनी ने जौहर (आत्मदाह) किया.
लेकिन इन कहानियों में सच्चाई कितनी है. रतन सिंह कौन थे, रानी पद्मिनी की असल कहानी और मलिक मोहम्मद जायसी की 'पद्मावत' में कही गई कहानी के बीच क्या अंतर है, इस बारे में बीबीसी हिन्दी ने इतिहासकारों से जानने की कोशिश की.
क्यों हुई थी ख़िलजी और रतन सिंह की लड़ाई?

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जयपुर में हिस्ट्री के प्रोफेसर राजेंद्र सिंह खंगरोट बताते हैं कि ' अलाउद्दीन ख़िलजी और रतन सिंह के टकराव को अलग करके नहीं देखा जा सकता. ये सत्ता के लिए संघर्ष था जिसकी शुरुआत मोहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच साल 1191 में होती है.'
जयगढ़, आमेर और सवाई मान सिंह पर किताब लिख चुके खंगरोट ने कहा, ''तुर्कों और राजपूतों के बीच टकराव के बाद दिल्ली सल्तनत और राजपूतों के बीच संघर्ष शुरू होता है. इनके बाद ग़ुलाम से शहंशाह बने लोगों ने राजपुताना में पैर फैलाने की कोशिश की. कुत्तुबुद्दीन ऐबक अजमेर में सक्रिय रहे. इल्तुत्मिश जालौर, रणथंभौर में सक्रिय रहे. बल्बन ने मेवाड़ में कोशिश की, लेकिन कुछ ख़ास नहीं कर सके.''
उन्होंने कहा कि संघर्ष पहले से चल रहा था और फिर ख़िलजी आए जिनका कार्यकाल रहा 1290 से 1320 के बीच. ख़िलजी इन सब में सबसे महत्वाकांक्षी माने जाते हैं. चित्तौड़ के बारे में साल 1310 का ज़िक्र फ़ारसी दस्तावेज़ों में मिलता है जिनमें साफ़ इशारा मिलता है कि ख़िलजी को ताक़त चाहिए थी और चित्तौड़ पर हमला राजनीतिक कारणों की वजह से किया गया.
पहले से जारी था सत्ता का संघर्ष

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खंगरोट ने कहा, ''साल 1301 में रणथंभौर के बाद साल 1303 में चित्तौड़ पर हमला हुआ.''
उनके मुताबिक अमीर ख़ुसरो चित्तौड़ में हुए इस युद्ध के चश्मदीद माने जाते हैं और उन्होंने रानी पद्मिनी का ज़िक्र नहीं किया गया तो ऐसा माना जाता है कि पद्मिनी रानी थी ही नहीं जो कि ग़लत है, जबकि जायसी ने साल 1540 में 'पद्मावत' लिखा था.
प्रोफ़ेसर खंगरोट ने कहा कि रतन सिंह की कहानी भी अलग करके नहीं देखी जा सकती है. राणा रतन सिंह 1302 में राजा बने थे, लेकिन उनसे पहले के राजा भी सल्तनत से लगातार जूझ रहे थे.
दिल्ली सल्तनत की दिलचस्पी राजपुताना में इतनी क्यों थी, इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि 'उस दौर में दिल्ली सल्तनत को कोई चैलेंज करने की क्षमता रखता था तो वो राजपुताना ही था. चितौड़ की अपनी अहमियत रही है. चितौड़ के किले की ख़ासियत है.'
जौहर और साका साथ-साथ?

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साथ ही गुजरात जाने के लिए यही रास्ता था जो दिल्ली के गुजरात के बीच ट्रेड रूट पर पड़ता था.
जंग में जीतने के बाद अलाउद्दीन ख़िलजी ने राजा रतन सिंह को बंदी बनाया या मारा, इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ''ये कहना मुश्किल है. लेकिन हम इतना जानते हैं कि 26 अगस्त 1303 को उन्होंने आत्मसमर्पण किया था. एक तरफ़ ये हुआ और दूसरी तरफ़ (रानी पद्मिनी का) जौहर. साका और जौहर एकसाथ चलता है. साका का मतलब है आख़िरी धावा.''
कई लोग कहते हैं कि ये सब काल्पनिक है. इस पर प्रोफ़ेसर खंगरोट ने कहा, ''रानी पद्मिनी नहीं थी तो जौहर किसने किया. पुरातात्विक सबूत देखिए. पद्मिनी का महल है, जौहर कुंड है. ए एन श्रीवास्तव जाने माने इतिहासकार रहे हैं. उन्होंने भी ज़िक्र किया है. राजा रतन सिंह की कहानी 'ख़ज़ाएन-उल-फ़ुतुह' में मिलती है जिसे 'तारीख़ ए इलाही' से लिया गया है. और रोमांटिक कहानी जायसी से ली गई है. दोनों कहानियां मिली हुई हैं.''
चित्तौड़ बना था ख़िज़्राबाद?

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जंग के बारे में तफ़्सील से बताने पर उन्होंने कहा, ''सात महीने तक जंग चली. रतन सिंह आख़िर तक लड़े और और उनके चीफ़ थे सिसोदिया लक्ष्मण सिंह. उनके बच्चे मारे गए.''
राजा रतन सिंह ने साल 1302 में पद संभाला था और उसके तुरंत बाद उन्हें सल्तनत की चुनौती का सामना करना पड़ा. खंगरोट बताते हैं, ''किले को मैंने ख़ुद देखा है. इतनी ऊंची पहाड़ी पर है. ख़िलजी की सेना सात महीने तक बाहर रही तो कुछ ना कुछ लगातार करती रही लोगी क्योंकि पैठ बनाना आसान नहीं था.''
ऐसा भी कहा जाता है कि चित्तौड़ में 30 हज़ार हिंदू मारे गए. मंदिर बर्बाद किए गए और इसका नाम बदलकर ख़िज़्राबाद किया गया. उन्होंने कहा, ''साल 1325 में तुग़लक आए. फिर इसे सल्तनत से वापस लिया गया. इतिहास बताता है कि गयासुद्दीन तुग़लक और मोहम्मद बिन तुग़लक ने मेवाड़ में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं ली.''
रानी पद्मिनी का महल

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राजा रतन सिंह से पहले उनके पिता समर सिंह यहां की सत्ता संभालते थे. उनसे पहले राणा तेज़ सिंह और उनसे पहले राणा जयत्र सिंह.
ये पूछने पर कि इतिहास में रानी पद्मिनी के बारे में क्या कुछ लिखा गया है, इस पर प्रोफ़ेसर ने कहा, ''उनके बारे में लिखा हुआ ख़ास नहीं मिलता. उनका महल है. क्या जायसी के लिखने के बाद उसे पद्मिनी का महल कहा गया होगा.?''
उन्होंने कहा, ''अगर हम कहते हैं कि ख़ुसरो ने रानी पद्मिनी का ज़िक्र नहीं किया तो उन्होंने ये भी उल्लेख नहीं किया कि किस तरह ख़िलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन को मारा था. ऐसी गलतियां ख़ूब हुई हैं. मंगोलों का आक्रमण नहीं संभाल सका ख़िलजी, वो भी तो नहीं लिखा.''
पद्मिनी चरित्रम चौपाइयों का क्या?

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खंगरोट कहते हैं, ''राजस्तान की बही, दस्तूर, चौपाइयों में उल्लेख मिलता है. पद्मिनी चरित्रम चौपाइयां हैं. गोरा बादल की चौपाइयां हैं. कुछ ना होता तो ये सब कहां से आता?''
दूसरी ओर, दूसरे जानकार इस थ्योरी में कई ख़ामियां पाते हैं. जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में मुगलकालीन इतिहास के प्रोफ़ेसर नजफ़ हैदर का कहना है कि फ़ारसी के स्रोत में रतन सिंह का ज़िक्र तो है, लेकिन ज़्यादा नहीं.
उन्होंने कहा, ''अमीर ख़ुसरो ने जो ज़िक्र किया है, वो सरसरी-सा है. ख़ुसरो ने रतन सिंह को बड़े दुश्मन के रूप में देखा है. लेकिन उससे कुछ ज़्यादा पता नहीं चलता. क्षेत्रीय स्रोत अगर होते तो गौरीशंकर हीराचंद ओझा जैसे जानकारों ने राजपूतों पर काफ़ी काम किया है, लेकिन वहां भी कोई ऐसा ज़िक्र नहीं मिलता.''
फ़ारसी में क्या ज़िक्र?

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क्या रतन सिंह की तुलना में इतिहास में महाराणा प्रताप का ज़्यादा उल्लेख मिलता है, इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''क्षेत्रीय इतिहास में महाराणा का ज़िक्र है और उससे ज़्यादा फ़ारसी में उनकी कहानी मिलती है.''
इतिहास के दस्तावेज़ों में ख़िलजी-रतन सिंह के बारे में क्या कुछ उपलब्ध है, इस पर प्रोफ़ेसर नजफ़ ने कहा, ''अलाउद्दीन ख़िलजी किला जीत गए, जंग जीत गए, बस यही.''
उन्होंने कहा, ''ख़ज़ायन-उल-फ़ुतुह में ना रतन सिंह के मरने का ज़िक्र है, ना ही पद्मिनी के सती होने का उल्लेख है. ख़ुसरो का अकाउंट अगर गौर से पढ़ते हैं तो पता चलता है कि वो हर उस बात का ज़िक्र करते हैं जिसे ज़रूरी समझा जाता है.''
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