अमेरिका के हिंदू मंदिर में अनुसूचित जाति के मजदूरों के शोषण का क्या है मामला

स्वामीनारायण मंदिर

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    • Author, सलीम रिज़वी
    • पदनाम, न्यूयॉर्क से, बीबीसी हिंदी के लिए

अमेरिका में कई भव्य मंदिरों का निर्माण करने वाली संस्था बोचासंवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था या बैप्स के ख़िलाफ़ न्यूजर्सी के मंदिर में काम करने वाले मज़दूरों ने मुक़दमा किया है.

उनका आरोप है कि उनसे बंधुआ मज़दूरों की तरह काम कराया गया और उनको सही मेहनताना भी नहीं दिया गया.

मई की 11 तारीख को जिस दिन मुक़दमा किया गया उसी दिन अमेरिकी जांच संस्था एफ़बीआई ने रॉबिन्सवील इलाके में 159 एकड़ भूखंड पर स्थित बैप्स मंदिर पर छापा भी मारा.

छापे में अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी और श्रम विभाग के एजेंट भी शामिल थे. खबरों के अनुसार, एफ़बीआई छापे के बाद करीब 90 कामगारों को मंदिर परिसर से बसों में बिठाकर ले गई. अब वे मज़दूर पुलिस के संरक्षण में हैं.

न्यूजर्सी में अमेरिका की संघीय अदालत में बैप्स ट्रस्ट के ख़िलाफ़ 200 से अधिक मज़दूरों की तरफ़ से दायर मुकदमे में अमेरिकी श्रम कानून के घोर उल्लंघन का आरोप लगाया गया है.

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मज़दूरों के पासपोर्ट ले लिए गए थे

मज़दूरों की तरफ़ से दायर मुकदमे के दस्तावेज़ों में कहा गया है कि स्वामी नारायण संस्था या बैप्स के अधिकारियों ने मज़दूरों को भारत से अमेरिका लाने के लिए वीज़ा अधिकारियों से भी सच छिपाया और मज़दूरों को वॉलंटियर्स की तरह पेश किया.

जब वे अमेरिका पहुंचे तो उन मज़दूरों के पासपोर्ट भी उनसे ले लिए गए थे.

मज़दूरों का कहना है कि उनको ठीक से खाना भी नहीं दिया जाता था, और सिर्फ़ दाल और आलू खाने को दिया जाता था. उनको ट्रेलर में रहने की जगह दी गई थी जहां बकौल मज़दूरों के उनको कई मुश्किलों का सामना करना होता था.

और उनको मंदिर परिसर से बाहर जाने या किसी बाहरी व्यक्ति से बात करने की भी अनुमति नहीं थी. मज़दूरों को डराया धमकाया जाता था कि उनको गिरफ़्तार करवा कर भारत भेज दिया जाएगा.

अदालती दस्तावेज़ों में दावा किया गया है कि सन 2018 से सन 2020 के दौरान मज़दूरों से रोज़ाना 12 घंटे से अधिक काम करवाया जाता था जिसमें पत्थर तोड़ना, भारी मशीनें चलाना, सड़क बनाना, सीवर लाईन बनाना आदि शामिल था.

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बीमारी के बाद एक मज़दूर की मौत

मज़दूरों का कहना है कि इतनी कड़ी मेहनत के बाद उन्हे महीने में सिर्फ़ 450 डॉलर या 35 हज़ार रुपये दिए जाते थे. इस तरह उन्हें क़रीब एक डॉलर प्रति घंटा की दर से मेहनताना दिया जाता था जो न्यूजर्सी के सरकारी क़ानून के मुताबिक़ कम से कम 12 डॉलर प्रति घंटा होना चाहिए.

अदालती दस्तावेज़ों में मज़दूरों ने आरोप लगाया है कि उन्हें अच्छी नौकरी का लालच देकर भारत से अमेरिका लाया गया था, मगर अमेरिका में उनको बंधुआ मज़दूर की तरह रखा गया. इन हालात में कम से कम एक मज़दूर की बीमारी के बाद मौत भी हो गई थी.

मज़दूरों के अनुसार इस घटना के बाद मुकेश कुमार नामक एक मज़दूर ने मदद के लिए एक वकील से संपर्क किया और अदालत जाने का फ़ैसला किया. 37 वर्षीय मुकेश कुमार अब भारत लौट गए हैं.

इन मज़दूरों की मदद करने वाली न्यूजर्सी की भारतीय मूल की एक वकील स्वाति सावंत ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि मज़दूरों के साथ बुरा बर्ताव किया जा रहा था.

स्वाति सावंत ने कहा, "मज़दूर समझते थे कि अमेरिका में उन्हें अच्छी नौकरी मिलेगी और घूम-फिर सकेंगे. लेकिन उनको ये नहीं मालूम था कि उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जाएगा और उनको मशीन समझा जाएगा कि जिनको कभी छुट्टी की ज़रूरत नहीं होगी."

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इमेज कैप्शन, मज़दूरों द्वारा किए गए मुकदमे से जुड़े दस्तावेज़ की तस्वीर

स्वामीनारायण संस्था ने किया आरोपों से इनकार

इन मज़दूरों में से अधिकतर का संबंध भारत की अनुसूचित जाति से बताया जाता है.

अदालती दस्तावेज़ों में कहा गया है कि बैप्स के अधिकारियों ने मज़दूरों से अंग्रेज़ी में लिखे कई कागज़ात पर हस्ताक्षर कराए थे और इन मज़दूरों को नहीं मालूम था कि उनमें क्या लिखा है.

अदालत में इन मज़दूरों का मुकदमा लड़ने वाले एक वकील डैनियल वर्नर ने कहा, "ये मज़दूरों की प्रताड़ना का एक भयानक मामला है. और यह अधिक चिंताजनक इसलिए भी है क्यूंकि ये प्रताड़ना एक मंदिर के परिसर में कई वर्षों से जारी थी. इन मज़दूरों को झूठ बोलकर भारत से अमेरिका लाया गया और उनको बंधुआ मज़दूर की तरह रखा गया."

उधर, स्वामीनारायण संस्था या बैप्स ने इन आरोपों को नकारा है.

संस्था के एक प्रवक्ता लेलिन जोशी ने अमेरिकी समाचार पत्रों से बात करते कहा कि मंदिर में पत्थरों को खास तरह से तराशने के लिए इन मज़दूरों की विशेष महारत के तौर पर स्पेशलाइज़्ड आर्टीज़न्स की श्रेणी का वीज़ा लिया गया था.

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इमेज कैप्शन, भारतीय मूल के देव भावेश का कहना है कि इस घटना से न तो मंदिर की पर और न ही हमारी आस्था पर कोई फ़र्क पड़ेगा

श्रद्धालुओं का क्या कहना है?

न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी के इलाक़े में कई ऐसे लोग रहते हैं जो नियमित तौर पर बैप्स के मंदिरों में पूजा-पाठ करने जाते हैं. इमें से कई श्रद्धालुओं को मंदिर के ख़िलाफ़ लगे आरोपों पर हैरत हुई है.

न्यूजर्सी के एडिसन में रहने वाले भारतीय मूल के देव भावेश बीस सालों से अधिक समय से बैप्स के मंदिरों में पूजा और अन्य कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं.

वह कहते हैं, "जब मैंने इन आरोपों के बारे में सुना तो मुझे बहुत झटका लगा. क्योंकि मेरा नाता इस संस्था से बहुत वर्षों से है और मैंने कभी कोई गलत काम होता नहीं देखा. मुझे नहीं पता कि आरोप क्यों लगाए गए लेकिन मैं कह सकत हूं कि इससे न तो मंदिर की गरिमा में और न ही हमारी आस्था पर कोई फ़र्क पड़ेगा."

न्यूजर्सी में भारतीय मूल के पूर्व असेंबली सदस्य उपेंद्र चिवुकुला भी इसी तरह के विचार रखते हैं. उन्होंने बैप्स के बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर पर सवाल खड़े किए.

उपेंद्र चिवुकुला ने कहा, "मुझे नहीं मालूम कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है लेकिन जो मज़दूरों ने खाने की बात की है तो दाल तो हम भी खाते हैं. अब क्या मंदिर में चिकन दिया जाएगा खाने के लिए. और ट्रेलर में रहने की बात भी अजीब है. बैप्स के सीईओ हमारे मित्र हैं, वे भी कभी-कभार ट्रेलर में ही रहते हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स ने तो ऐसी ख़बर को छाप कर सारे हिंदू मंदिरों को ही बदनाम किया है."

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मज़दूरों ने की हर्जाने की मांग

चिवुकुला बताते हैं कि बैप्स ट्रस्ट और उसके संतों और अधिकारियों से उनका कई दशक पुराना नाता है. वह कई वर्षों पहले उस समय को याद करते हुए बताते हैं कि जब बैप्स मंदिर में ही उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से भी उनकी मुलाकात हुई थी. चिवुकुला का मानना है कि इस मामले में कुछ होने वाला नहीं है.

उधर, कई और संस्थाएं भी इस तरह बैप्स पर छापा मारे जाने से विचलित लग रही हैं. न्यूजर्सी में ही बैप्स समेत कई अन्य संस्थाओं ने कई जगहों पर मंदिर निर्माण का काम करवाया है और कुछ में अभी भी निर्माण जारी है. लेकिन उन मंदिरों के ख़िलाफ़ मज़दूरों की प्रताड़ना और कम वेतन के आरोप सामने नहीं आए हैं.

न्यूजर्सी में एडिसन इलाक़े में साई दत्ता पीठम मंदिर में निर्माण का काम जारी है.

साई दत्ता पीठम मंदिर के चेयरमैन और पुजारी रघु शर्मा संक्रमांची बताते हैं, "हम मंदिर के लिए कुछ सामान भारत से ले आए, और अमेरिका में ही मौजूद कई भारतीय मूल के इंजीनियर और आर्किटेक्ट मंदिर के निर्माण में मदद करते रहे, और यह सिलसिला 2 वर्षों से जारी है. अब तो निर्माण काम तक़रीबन पूरा होने वाला है."

इस मंदिर के अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा कि उनके मंदिर में सारा काम क़ानूनी तौर पर किया जा रहा है.

अदालत में मामला ले जाने वाले बैप्स मंदिर के मज़दूरों ने मांग की है कि उनको हर्जाना दिया जाए और उनके काम की पूरी तनख्वाह भी दी जाए. बैप्स मंदिर के वकीलों की टीम भी अदालत में अपने पक्ष का बचाव करने के लिए तैयारी में लगी है.

जानकारों का मानना है कि मज़दूरों द्वारा दायर किया गया यह मामला अदालत में लंबे समय तक चल सकता है.

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