नवीन पटनायक: लगातार छठी बार ओडिशा का मुख्यमंत्री बनने की राह में क्या चुनौतियां हैं

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक

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    • Author, संदीप साहू
    • पदनाम, भुवनेश्वर से बीबीसी हिंदी के लिए

इस समय नवीन पटनायक देश में सबसे लंबे अरसे तक मुख्यमंत्री बने रहने वाले नेताओं की सूची में दूसरे नंबर पर हैं.

अगर इस बार भी उनकी पार्टी बीजू जनता दल (बीजेडी) चुनाव जीत जाती है, तो अगस्त के महीने के अंत तक वे इस सूची में सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग को पछाड़ कर पहले स्थान पर आ जाएंगे.

यही नहीं, लगातार छठी बार विधानसभा चुनाव जीतने का अनोखा रिकॉर्ड भी उनके नाम हो जाएगा.

लेकिन लगातार पांच बार आसानी से चुनाव जीतने वाले नवीन इस बार अपनी लंबे और सफल राजनैतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं.

चौबीस साल में पहली बार ऐसा हो रहा है कि उन्हें और उनकी पार्टी को 'एंटी इनकंबेंसी' का सामना करना पड़ रहा है. पटनायक की लोकप्रियता अभी भी कमोबेश कायम है, लेकिन अधिकांश स्थानों पर लगातार सत्ता में रहने के कारण स्थानीय कार्यकर्ता लोगों का भरोसा और समर्थन खोते दिख रहे हैं.

दलबदलुओं को टिकट

बीजू जनता दल में शामिल हुए दूसरे दलों के नेता

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यही कारण है कि पार्टी द्वारा अब तक जारी की गई 21 लोकसभा और 118 विधानसभा प्रत्याशियों की सूची में आखिरी वक्त पर भाजपा और कांग्रेस से आए नेताओं की भरमार है.

दोनों ही चुनावों में लगभग एक तिहाई सीटें चुनाव से ठीक पहले अन्य पार्टियों से लाए गए नेताओं को मिला है. अनुमान है कि बाकी बची 30 विधानसभा सीटों पर भी यही देखने को मिलेगा, क्योंकि अन्य पार्टियों से नेताओं का बीजेडी में आना अब भी जारी है.

इसका परिणाम यह हो रहा है कि टिकट की आस लगाए बैठे बीजेडी के कई नेता टिकट न मिलने पर भाजपा का रुख कर रहे हैं.

जिन असंतुष्टों को भाजपा से भी टिकट नहीं मिल रहा, वे या तो खुलेआम घोषित प्रत्याशी के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं या निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में जुट गए हैं.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्य के पूर्व वित्त मंत्री पंचानन कानूनगो मानते हैं कि इस बार बीजद की स्थिति उतनी मजबूत नहीं है जितनी पिछले तीन चुनावों में थी.

बीजू जनता दल

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पंचानन कानूनगो कहते हैं, "इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि बीजद के कितने नेता, विधायक और सांसद पार्टी छोड़ रहे हैं. यही कारण है कि पार्टी को प्रत्याशियों की सूची जारी करने में इतनी देर हो रही है."

ऐसा नहीं है कि इससे पहले हुए चुनाव में टिकट को लेकर पार्टी में असंतोष नहीं था.

लेकिन पार्टी नेतृत्व ने बहुत ही सफलता के साथ ऐसे असंतोष को मैनेज किया और इसे पार्टी के चुनावी प्रदर्शन को प्रभावित करने से रोका. लेकिन इस बार स्पष्ट दिख रहा है कि नेतृत्व के लिए स्थिति बेकाबू हो रही है.

इसके दो कारण हो सकते हैं. एक तो यह कि इस बार टिकट के उम्मीदवारों की संख्या पहले के सभी चुनावों के मुकाबले कहीं ज्यादा है.

पार्टी के नंबर तीन माने जाने वाले संगठन सचिव प्रणब प्रकाश दास की मानें तो इस बार राज्य के 21 लोकसभा सीटों और 147 विधानसभा सीटों के टिकट के लिए 10,000 से अधिक लोगों ने आवेदन किया था.

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पार्टी कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि प्रत्याशियों की इतनी भारी संख्या की बावजूद अन्य दलों से लोगों को बुलाकर टिकटें दिया जा रहा है.

जितनी बड़ी संख्या में इस बार दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकट दिया जा रहा है, वह पहले कभी नहीं देखा गया. क्या ये पार्टी नेतृत्व का अपने दल के नेताओं से भरोसा उठने का संकेत है?

लेकिन बीजद के प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद सस्मित पात्रा इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि बीजद पहले जैसे मजबूत नहीं रही.

बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, "इस तरह की भविष्यवाणी साल 2014 और 2019 के चुनाव से पहले भी की गई थी. लेकिन अंत में नतीजा क्या हुआ, वह सभी के सामने है. इस बार भी मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हम तीन चौथाई बहुमत से चुनाव जीतेंगे और सरकार बनाएंगे."

पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं के बारे में सस्मित पात्रा ने कहा, "वही लोग पार्टी छोड़कर जा रहे हैं, जिन्हे अंदेशा हो गया था कि इस बार उन्हें टिकट नहीं मिलेगा. ऐसे लोगों के जाने से पार्टी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है."

बीजेपी और बीजेडी के गठबंधन का क्या हुआ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नवीन पटनायक

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सस्मित पात्रा का कहना था की दूसरी पार्टियों से आए लोगों को टिकट दिया जाना कोई नई बात नहीं है; पहले भी ऐसा होता रहा है.

दूसरी बात ये है कि टिकट मांगने वालों में से ज्यादातर लोग यह मानकर चल रहे हैं कि उनके लिए विधायक या सांसद बनने का यह आखिरी मौका है.

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि बीजेडी के प्रत्याशियों को वोट नवीन के नाम पर मिलते हैं और बहुत कम लोगों को यह विश्वास है कि वे अपने दमखम पर चुनाव जीत सकते हैं.

अधिकांश बीजेडी नेता ये मानकर चल रहे हैं कि पार्टी के सुप्रीमो, जो अब 77 साल के हो चुके हैं, अगले चुनाव (2029) में पार्टी का नेतृत्व करने की शारीरिक और मानसिक स्थिति में नहीं होंगे.

बीजेडी और भाजपा के बीच आखिरकार गठबंधन भले ही न हो पाया हो. लेकिन लगभग तीन हफ्तों तक चली दोनों पक्षों के बीच कशमकश से बीजेडी की साख और विश्वसनीयता को गहरा धक्का पहुंचा है.

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आम जनता के साथ पार्टी के आम कार्यकर्ताओं को भी यह समझ नहीं आ रहा था कि अकेले 125 सीटें जीतने का दावा करने वाली बीजेडी आखिर भाजपा से हाथ क्यों मिलाना चाहती है?

गठबंधन के लिए बातचीत की पहल चाहे जिस किसी ने भी की हो, लेकिन लोगों में बात यही गई कि बीजेडी ही इसके लिए अधिक उतावली थीं क्योंकि उसे शायद डर था कि भाजपा के साथ हाथ न मिलाने पर कहीं तमिलनाडु, झारखंड और दिल्ली जैसे राज्यों की तरह प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और दूसरी केंद्रीय जांच एजेंसियां ओड़िशा में भी न आ धमकें.

वैसे भी ओडिशा सरकार की अलमारी में खनिज स्कैम, चिट फंड घोटाला जैसे कई कंकाल भरे पड़े हैं. लेकिन सच्चाई यह थी कि गठबंधन के लिए बीजद के आग्रह के पीछे जांच एजेंसियों के डर से ज़्यादा कुछ और ही कारण था.

इस कारण के बारे में बीजद के नेता दबी छिपी जुबान में बीजद में नवीन के सबसे करीबी माने जानेवाले मुख्यमंत्री के पूर्व व्यक्तिगत सचिव और अब पार्टी के नंबर दो वीके पांडियन की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बताते हैं.

अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि बीजद की ओर से वे ही भाजपा के साथ गठबंधन के लिए पूरा ज़ोर लगा रहे थे, क्योंकि वे अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करना चाहते थे.

गर्दिश में गए पांडियन के सितारे

नवीन पटनायक के साथ वीके पांडियन

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उन्हें पता था कि फ़िलहाल नवीन के डर से चुप बैठे बीजद के नेता नवीन के न रहने पर उनके ख़िलाफ़ बग़ावत पर उतर आएंगे और उस समय भाजपा का साथ उन्हें सत्ता का बागडोर अपने हाथ लेने में मदद करेगा.

पांडियन की मंशा आख़िरकार पूरी नहीं हो पाई. लेकिन गठबंधन न होने से सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें ही हुआ है. कुछ हफ्ते पहले तक बीजद के हर पोस्टर और बैनर से पांडियन का मुस्कराता हुआ चेहरा नजर आ रहा था.

खुद बीजू पटनायक, जिनके नाम पर पार्टी बनी है, पोस्टरों से नदारद हो गए थे. कुछ पोस्टरों में तो पांडियन की फोटो का आकार नवीन के फोटो से भी बड़ा हो गया था. हर मंच पर वे नजर आ रहे थे और वह भी अकेले; चाहे वह कोई स्कूल या कॉलेज का उत्सव हो, खेल का मैदान, पूंजीपतियों का जमघट या प्रथम विश्व ओड़िया भाषा सम्मेलन.

लेकिन भाजपा के साथ बातचीत विफल होने के बाद अचानक पांडियन कहीं नजर नहीं आ रहे. न किसी सार्वजनिक स्थल पर और न ही पार्टी के पोस्टरों में. अब हर पोस्टर में पांडियन के बदले एक बार फिर बीजू पटनायक की तस्वीर देखने को मिल रही है.

वीके पांडियन

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जानकारों का मानना है कि नवीन पटनायक को अब यह बात समझ में आ गई है कि पांडियन को उनके उत्तराधिकारी के रूप में पेश किया जाना पार्टी के लिए घातक सिद्ध हो रहा है. लोगों में नवीन की लोकप्रियता अब भी बनी हुई है.

लेकिन वे पांडियन को उनके उत्तराधिकारी मानने के लिए कतई तैयार नहीं हैं. यह बात समझने के बाद नवीन ने पांडियन के पर काट कर पार्टी का बागडोर अपने हाथों में लेने का निर्णय लिया है.

मशहूर पत्रकार कुमी कपूर ने 'इंडियन एक्सप्रेस' के अपने साप्ताहिक कॉलम में यहां तक लिखा है कि हाल ही में एक बैठक में नवीन पांडियन के ऊपर भड़क उठे और कहा कि कोई भी अपरिहार्य नहीं है.

हो सकता है यह बात अक्षरश: सच ना भी हो लेकिन इस बात में अब कोई संदेह नहीं है कि पांडियन के सितारे अब गर्दिश में चले गए हैं. उनके कारण पार्टी को हुए घाटे की भरपाई करने का पूरा दारोमदार अब नवीन पर आ गया है.

वहीं, वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार रवि दास का कहना है कि कूमी कपूर की कहानी में सच्चाई है.

भाजपा के बढ़ते कदम

चुनाव प्रचार करते केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता धर्मेंद्र प्रधान

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पत्रकार रवि दास का कहना है, "आप ने गौर किया होगा कि पांडियन अब नवीन निवास (मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का निवास) से अपना काम नहीं कर रहे. वे अब अपने घर से ही काम कर रहे हैं और तभी नवीन निवास जाते हैं जब उन्हें बुलावा आता है. और हमने पहले भी देखा है कि अपनी कुर्सी बचाने के लिए नवीन किसी को भी ताक पर रख सकते हैं."

अब देखना है कि इस ढलती उम्र में अप्रैल और मई की चिलचिलाती धूप और गर्मी में नवीन पूरे राज्य में चुनाव प्रचार कर पाते हैं या नहीं. पार्टी कार्यकर्ताओं के गिरते मनोबल को फिर से उठा पाते हैं या नहीं और पार्टी की बिगड़ी स्थिति को संभाल सकते हैं या नहीं.

पार्टी कार्यकर्ताओं के घटते आत्मविश्वास का एक प्रमुख कारण राज्य में भाजपा के बढ़ते हुए कदम है. लगातार 9 साल तक भाजपा के साथ गठबंधन सरकार चलाने के बाद 2009 के चुनाव से ठीक पहले जब नवीन ने भाजपा का हाथ छोड़ दिया तो भगवा पार्टी को अपनी जमीनी शक्ति का सही प्रमाण मिल गया.

बीजद के साथ गठबंधन में लड़े गए 2004 के चुनाव में सात लोकसभा और 32 विधानसभा सीटें हासिल करने वाली भाजपा 2009 के चुनाव में एक भी लोकसभा सीट जीत नहीं पाई जबकि विधानसभा में उसकी संख्या 32 से गिरकर छह पर आ गई.

ओडिशा बीजेपी

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इसके साथ ही पार्टी का वोट शेयर केवल 15.05 फीसदी रह गया.

लेकिन उसके बाद से पार्टी का वोट प्रतिशत हर चुनाव में बढ़ता रहा है. 2019 के विधानसभा चुनाव में यह प्रतिशत 32.49 तक जा पहुंचा, हालांकि सीटें उसे केवल 23 ही मिलीं. बीजद का वोट प्रतिशत 44.71 फीसदी रहा और सीटों की संख्या 112.

लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा. पार्टी ने राज्य के 21 में से आठ सीटों पर जीत हासिल की. 2014 के आंकड़े से 13.4 फीसदी की लंबी छलांग लगाते हुए पार्टी का वोट प्रतिशत 38.4 फीसदी पर जा पहुंचा, जो बीजद के वोट प्रतिशत से केवल 4.4 फीसदी पीछे था. पहली बार पार्टी कांग्रेस को पछाड़ कर मुख्य विरोधी दल के रूप में उभरी.

महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों के मिशाल के आधार पर राजनैतिक प्रेक्षकों के साथ बीजद कार्यकर्ता भी मानते हैं भाजपा अगर इस बार विधानसभा में 50 सीटें जीत जाती है, तो बीजद की सरकार के लिए 2029 तक टिकना मुश्किल होगा .

ओड़िया अस्मिता

बीजेपी समर्थक महिलाएं

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बीजद के साथ गठबंधन का शुरू से विरोध कर रही भाजपा की राज्य इकाई अब पूरे जोश के साथ प्रचार में जुट गई है. उल्लेखनीय है कि पार्टी ने इस बार 'ओड़िया अस्मिता' को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया है.

बीजेपी पहली बार नवीन की टूटी-फूटी ओड़िया पर लगातार प्रहार कर रही है. उनके द्वारा रोमन लिपि में लिखे गए ओड़िया भाषण पढ़े जाने की खिल्ली उड़ा रही है.

भाजपा के राज्य अध्यक्ष मनमोहन सामल ने स्पष्ट किया है कि इस बार उनकी पार्टी ओड़िया अस्मिता को मुख्य मुद्दा बनाकर चुनाव में उतरेगी.

उन्होंने कहा, "नवीन सरकार में गैर ओड़िया अफ़सरों और व्यापारियों का बोलबाला रहा है और यह बात लोगों से छुपी नहीं है. हमें पूरा विश्वास है कि इस मुद्दे पर हमें जनता का पूरा समर्थन मिलेगा और यहां डबल इंजन की सरकार बनेगी."

नवीन पटनायक

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इसे विडंबना ही कहा जाना चाहिए कि एक देश, एक भाषा और एक संस्कृति में विश्वास रखने वाली भाजपा जैसी एक राष्ट्रीय दल प्रादेशिक अस्मिता को मुद्दा बना रही है.

लेकिन 24 साल मुख्यमंत्री रहने की बाद भी नवीन का ओड़िया बोल नहीं पाना और उनकी सरकार में गैर ओड़िया अफसरों और व्यापारियों का बोलबाला और पांडियन को लोगों पर थोपे जाने की कोशिश की पृष्ठभूमि में यह मुद्दा आम लोगों को छू रहा है.

इन सारी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद नवीन अगर अपनी पार्टी को एक बार फिर चुनाव जीता सकते हैं, तो न केवल वे लगातार चुनाव जीतने में पूरे देश में एक नया कीर्तिमान बना लेंगे, बल्कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बाद देश की राजनैतिक इतिहास में पहले ऐसे नेता बन जाएंगे, जो एक लंबे करियर में कभी विपक्ष में नहीं रहे .

(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)

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