सीएए लागू होने से क्या बीजेपी को फ़ायदा और उसके सहयोगियों को नुक़सान हो सकता है?

मोदी और अमित शाह

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए को लागू कर दिया है. इसके लिए सरकार ने सोमवार 11 मार्च को अधिसूचना भी जारी कर दी है.

इस क़ानून के तहत 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी.

यह क़ानून ऐसे समय लागू किया गया है जब भारत में इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव के तारीखों की घोषणा किसी भी दिन हो सकती है. इसलिए इस कदम के बाद विरोधी दल केंद्र सरकार पर हमलावर हैं.

दरअसल संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद 12 दिसंबर 2019 को ही नागरिकता संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति की मुहर लग गई थी और यह क़ानून बन गया था.

लेकिन उसके बाद भी यह क़ानून लागू नहीं किया गया था, क्योंकि इसके लागू करने के लिए नियमों को अधिसूचित करना बाक़ी था.

साल 2019 के अंत में इस क़ानून के बनने के साथ ही देश के कई हिस्सों में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने इसका विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था. ऐसे ही प्रदर्शन के दौरान दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भी हुए थे.

पश्चिम बंगाल को साधने कोशिश

सीएए का पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कड़ा विरोध किया है.

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वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी के मुताबिक़, "सीएए की वजह से वोटों का ध्रुवीकरण होगा और बीजेपी को उम्मीद है कि उसे ख़ासकर पश्चिम बंगाल में हिन्दू बंगाली और हिन्दू बांग्लादेशी प्रवासियों का वोट मिलेगा. यहां बीजेपी 2019 से भी ज़्यादा लोकसभा सीटें जीतना चाहती है."

साल 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को पश्चिम बंगाल की 42 में से 18 सीटों पर जीत मिली थी. पश्चिम बंगाल में बीजेपी की इस जीत में तीन से चार सीटों पर मतुआ समुदाय का बड़ा योगदान माना जाता है.

मतुआ मूल रूप से बांग्लादेश से आए दलित हिन्दू हैं. राज्य में बड़ी संख्या में मतुआ समुदाय में वोटर हैं.

माना जाता है कि पश्चिम बंगाल के क़रीब 15 विधानसभा सीटों का फ़ैसला मतुआ वोटरों पर निर्भर करता है.

मतुआ समुदाय पहले टीएमसी और वाम दलों के समर्थन में था. बाद में मतुआ बिरादरी बीजेपी के साथ आ गई. लेकिन माना जाता है कि साल 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद मतुआ समुदाय लगातार बीजेपी से दूरी बना रहा है.

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सीएए पर वरिष्ठ पत्रकार

मतुआ समुदाय

मतुआ साल 1947 में भारत विभाजन और साल 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी के समय बड़ी संख्या में भारत के अलग-अलग इलाक़ों में आकर बसे थे. बीजेपी सांसद और केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर मतुआ समुदाय के ही नेता हैं.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में बीजेपी को 40 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे. उसके बाद साल 2021 में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 38 फ़ीसदी वोट मिले.

लेकिन साल 2022 में हुए नगरपालिका और साल 2023 में हुए पंचायत चुनावों में बीजेपी का वोट प्रतिशत घटकर क़रीब 15 फ़ीसदी हो गया.

माना जाता है कि इसमें बड़ी भूमिका मतुआ समुदाय की बीजेपी से दूर जाने की भी है.

असम में कई संगठनों ने सीएए का विरोध किया है.

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नागरिकता संशोधन क़ानून का सबसे ज़्यादा विरोध पूर्वोत्तर के राज्यों- असम, मेघालय, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में ही हुआ है क्योंकि ये राज्य बांग्लादेश की सीमा के बेहद क़रीब हैं.

माना जाता है कि इसी विरोध की वजह से सीएए को लागू करने में केंद्र सरकार ने इतना लंबा वक़्त लगाया.

इन राज्यों में इसका विरोध इस बात को लेकर हो रहा है कि यहाँ कथित तौर पर पड़ोसी देश बांग्लादेश से मुसलमान और हिंदू दोनों ही बड़ी संख्या में अवैध तरीक़े से आकर बस रहे हैं. नागरिकता मिल जाने के बाद राज्य के संसाधनों पर इनका भी अधिकार हो जाएगा.

‘सीएए से वोटों का ध्रुवीकरण’

इस बीच सीएए लागू करने का सबसे ज़्यादा विरोध पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने किया है.

ममता बनर्जी ने कहा है कि अगर देश में समुदायों के बीच भेदभाव हुआ तो वो चुप नहीं रहेंगी. उनके मुताबिक़ सीएए और एनआरसी पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी भारत के लिए संवेदनशील मसला है और वो नहीं चाहतीं कि लोकसभा चुनाव से पहले देश में किसी कारण अशांति फैले.

सीएए पर वरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "मतुआ समुदाय को अपनी ओर खींचने की इस कोशिश में असम में बीजेपी को नुक़सान हो सकता है. भारत विभाजन के बाद असम एक ‘लैंड लॉक्ड’ स्टेट हो गया और असम अच्छी अर्थव्यवस्था तबाह हो गई."

उनके मुताबिक़ चाय बागान, लकड़ी और बाक़ी जंगलजात उत्पादों की वजह से असम में लोगों को काम मिल जाता था. काम-धंधे के लिए आज भी बहुत कम असमिया लोग राज्य के बाहर का रुख़ करते हैं. वहाँ की नौकरियों पर बंगाल से आए लोगों का, मज़दूरी पर बिहार से आए लोगों और व्यापार पर दूसरे राज्यों से आए लोगों का कब्ज़ा है.

असम के स्थानीय लोग न केवल बांग्लादेशी मुसलमानों के बसने का विरोध करते हैं बल्कि प्रवासी हिन्दुओं को भी नागरिकता देने के ख़िलाफ़ हैं.

राज्य में सीएए के विरोध पर मुख्यमंत्री हेमंता बिस्व सरमा ने पत्रकारों से बातचीत में कहा है कि असम में सीएए का समर्थन और विरोध करने वाले दोनों ही लोग मौजूद हैं. जिन्हें यह क़ानून नामंज़ूर है वो अदालत जा सकते हैं.

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दरअसल सीएए और एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) को लेकर आरोप लगाया जा रहा है कि इस क़ानून की मदद से बीजेपी अपने हिन्दू वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है.

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पत्रकारों के बातचीत में आरोप लगाया है कि 2024 के चुनाव की घोषणा से ठीक पहले सीएए को लागू करना बताता है कि शायद बीजेपी चुनाव से पहले धर्म का इस्तेमाल करना चाहती है. उन्होंने कहा कि "यह बीजेपी की पुरानी सियासत है."

उमर अब्दुल्ला का कहना है, "बीजेपी के लोग 400 सीटों का दावा कर रहे थे और कह रहे हैं कि राम मंदिर बनने के बाद वो हार ही नहीं सकते. लेकिन उन्हें लग रहा है कि उनकी हालत कमज़ोर है इसलिए चुनाव से पहले ऐसे हथकंडे इस्तेमाल कर रहे हैं."

जानकारों के मुताबिक़ हर दल सीएए के नफ़ा नुक़सान का गणित पता है.

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क्या बीजेपी के सहयोगियों को होगा नुक़सान?

बीजेपी पर भले ही वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश करने का आरोप लग रहा हो, लेकिन एनडीए में उसके कई सहयोगी दल हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्हें मुस्लिम समुदाय का समर्थन मिलता रहा है.

इनमें बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड, आँध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी, महाराष्ट्र में एनसीपी का अजित पवार गुट और अन्य कई छोटे दल भी शामिल हैं.

तो क्या इस क़ानून के लागू होने से ऐसे दलों को नुक़सान हो सकता है?

जेडीयू इस मामले में फिलहाल सावधानी के साथ प्रतिक्रिया देती दिख रही है. पार्टी नेता केसी त्यागी ने कहा है कि केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया है कि इस क़ानून के तहत किसी की नागरिकता नहीं जाएगी.

हालांकि बिहार में एनडीए में शामिल एलजेपी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने सीएए लागू करने का स्वागत किया है.

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ऐसे राजनीतिक दलों में ओडिशा के बीजू जनता दल का नाम भी गिनाया जा सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, "नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू या नवीन पटनायक जैसे नेताओं की छवि ऐसी रही है कि उन्हें मुसलमानों का वोट भी मिलता रहा है. लेकिन राजनीतिक दल के नेता चतुर होते हैं वो सारा गणित समझकर ही फ़ैसला करते हैं."

उनके मुताबिक़, जो भी दल एनडीए के साथ जा रहें हैं उनकी अपनी मजबूरी है. नीतीश राजनीतिक साख को बचाने और अपनी राजनीति को कुछ और समय तक खींचने के लिए बीजेपी के साथ जुड़े हैं. उन्हें मुसलमानों का वोट भले न मिले लेकिन बीजेपी की वजह से हिन्दू वोट का एक बड़ा हिस्सा मिलने की उम्मीद दिखती होगी.

माना जाता है कि चंद्रबाबू नायडू आँध्र प्रदेश में अपने विरोधी जगन मोहन रेड्डी के सामने कमज़ोर पड़ते दिख रहे थे, इसलिए उन्होंने एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बीजेपी के साथ समझौता किया है ताकि उन्हें राज्य में ताक़त मिल सके.

सीएए पर वरिष्ठ पत्रकार

इसके अलावा नवीन पटनायक चौबीस साल से ओडिशा के मुख्यमंत्री हैं और माना जाता है कि राज्य में उनके ख़िलाफ़ जो भी एंटी इनकंबेंसी होगी, वो बीजेपी और कांग्रेस के पास चला जाता. नवीन पटनायक बीजेपी के साथ आकर इससे निपटना चाहते हैं.

रशीद किदवई का मानना है कि वाजपेयी सरकार के दौरान एनडीए में रहकर ममता बनर्जी, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे नेताओं ने राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डलवा दिया था, अब नीति बनाने में कोई नेता मोदी या अमित शाह को बाध्य नहीं कर सकता है.

ओडिशा में मुस्लिमों की आबादी कम है, इसलिए सीएए का बहुत असर वहाँ के चुनावों पर पड़ने की संभावना कम है.

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नागरिकता अधिनियम, 1955 भारतीय नागरिकता से जुड़ा एक क़ानून है जिसमें बताया गया है कि किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता कैसे दी जा सकती है.

मुसलमान समुदाय में एक डर यह है कि सीएए को लागू करने के बाद राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) लाया जाएगा जिससे उनकी नागरिकता को ख़तरा पैदा होगा.

नागरिकता खोने का डर

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बिहार में पिछले साल जारी किए गए जातिगत सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक़ राज्य में क़रीब 17 फ़ीसदी मुसलमान आबादी है. जानकारों के मुताबिक़ नीतीश कुमार के एनडीए में वापसी के समय ही यह तय हो गया था कि उनकी पार्टी से मुस्लिम और सेक्युलर वोट दूर जा रहे हैं.

इसके अलावा आँध्र प्रदेश में क़रीब 7 फ़ीसदी, ओडिशा में 6 फ़ीसदी और महाराष्ट्र में क़रीब 12 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी मानी जाती है. इसलिए बीजेपी के सहयोगी दलों को मुस्लिम वोट न मिलने से बहुत बड़ा नुक़सान नहीं दिखता है.

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "कश्मीर से 370 ख़त्म होने के बाद कोई कश्मीरी पंडित कश्मीर नहीं लौटा है, लेकिन 370 को ख़त्म करने का राजनीतिक लाभ बीजेपी को मिला है. यही सीएए के मामले में होगा."

सुरूर अहमद के मुताबिक़ भारत सरकार विदेशियों को नागरिकता पहले भी देती रही है और नागरिकता क़ानून में पहले भी संशोधन हुए हैं, इसलिए मामला सीएए का नहीं है बल्कि एनआरसी है. बहुत से लोगों को लगता है कि इससे उनकी नागरिता चली जाएगी और यही विवाद का विषय है.

दरअसल एनआरसी यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स के तहत लोगों को भारत में अपनी नागरिकता के लिए वैध दस्तावेज़ दिखाने होंगे. इसी के आधार पर देश में जनसंख्या का एक रजिस्टर तैयार होगा.

रशीद किदवई के मुताबिक़ सीएए से लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी, वहीं दूसरी तरफ एनआरसी के तहत पहले से ही भारत में रह रहे लोगों को अपनी नागरिकता साबित करनी होगी.

सीएए पर फ़िलहाल एनडीए के घटक दल सावधानी के साथ प्रतिक्रिया देते दिख रहे हैं.

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रशीद किदवई का कहना है, "जब आधार कार्ड बना था तब किसी ने इसका विरोध नहीं किया था. राजनीतिक स्तर पर यह नहीं कहा जा रहा है कि हम नागरिकों को ठोस दस्तावेज़ देंगे बल्कि उन्हें नागरिकता साबित करनी होगी. यह भी एक अजीब बात है कि भारत में बीजेपी बहुसंख्यवाद की राजनीति करती है और विदेशों के लिए अल्पसंख्यवाद की."

दरअसल माना जाता है कि देश के कई इलाक़ों में ग़रीबों, पिछड़ों या अशिक्षित परिवारों के पास अपनी नागरिकता साबित करने के ज़रूरी दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं होंगे.

केंद्र सरकार पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि वो चुनावी बॉण्ड्स के मुद्दे से जनता का ध्यान भटकाना चाहती है, इसलिए ऐसे वक़्त में सीएए को लागू करने का फ़ैसला किया गया है.

सोमवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने सख़्त आदेश के साथ स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को चुनावी बॉण्ड ख़रीदने वालों की जानकारी मंगलवार यानी 12 मार्च की शाम तक चुनाव आयोग को सौंपने का आदेश दिया था. चुनाव आयोग को यह जानकारी इसी महीने 15 मार्च तक अपने वेबसाइट पर डालने का आदेश भी दिया गया है.

कोर्ट के इस आदेश के कुछ घंटों के भीतर ही केंद्र सरकार ने सीएए को लागू करने की अधिसूचना जारी की थी.

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