सीएए को ग़ैर-बीजेपी शासित राज्य क्या अपने यहाँ लागू होने से रोक सकते हैं?- प्रेस रिव्यू

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नागरिकता संशोधन क़ानून लागू करने को लेकर कुछ ग़ैर-बीजेपी शासित राज्यों की ओर से विरोध किया जा रहा है. इनका कहना है कि ये अपने राज्य में सीएए लागू नहीं करने देंगे.
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, केरल के सीएम पिनराई विजयन के बाद अब तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने भी ऐसी ही प्रतिक्रिया दी है.
लेकिन क्या राज्यों के पास यह अधिकार है कि सीएए को लागू होने से रोक दें. आज प्रेस रिव्यू में इसी मुद्दे पर छपी रिपोर्ट पढ़िए.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक़, वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया है कि नागरिकता केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है, ऐसे में राज्य सरकारों के विरोध का कोई असर नहीं होगा.
गृह मंत्रालय ने सीएए नियमों में नागरिकता के आवेदन की प्रक्रियाओं को संभालने की ज़िम्मेदारी डाक विभाग और जनगणना से जुड़े अधिकारियों को सौंपने का फ़ैसला किया है. ये विभाग केंद्र सरकार के तहत आते हैं.
आवेदकों का बैकग्राउंड चेक इंटेलिजेंस ब्यूरो जैसी केंद्रीय सुरक्षा एजेंसी करेंगी.
द हिंदू से गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ''आवेदकों को ऑनलाइन अप्लाई करना होगा. ऐसे में राज्य सरकार के अधिकारियों, स्थानीय पुलिस के शामिल होने की संभावनाएं कम ही हैं.''

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नागरिकता पर फ़ैसला किसका
आवेदकों के आवेदन पर अंतिम फ़ैसला इम्पावर्ड कमिटी को लेना है. हर राज्य में इस कमिटी का एक निदेशक होगा.
इस कमिटी में इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी, पोस्ट मास्टर जनरल, नेशनल इन्फर्मेशन सेंटर के अधिकारी, राज्य के गृह विभाग से एक प्रतिनिधि और डिविजनल रेलवे मैनेजर होंगे.
ज़िला स्तर की कमिटी का ये काम होगा कि वो आवेदनों को परखे. इस कमिटी के प्रमुख सूपरिटेंडेंट होंगे. कमिटी में नायब तहसीलदार की रैंक के समकक्ष एक अधिकारी होगा.
ये अधिकारी राज्य सरकार की तरफ़ से आमंत्रित सदस्य के तौर पर कमिटी में शामिल होंगे.
द हिंदू की रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकारियों की मानें तो मंगलवार को कई लोगों ने नागरिकता वाले ऑनलाइन पोर्टल में अप्लाई किया.
इस वेबसाइट पर रजिस्टर करने की फ़ीस 50 रुपये होगी.

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अब तक कितने आवेदकों ने अप्लाई किया
एक अधिकारी कहते हैं, ''सीएए के सेक्शन 6बी के तहत कई कैटिगिरी हैं. कई दस्तावेज़ हैं, जिनमें स्थानीय संस्थाओं की ओर से जारी सर्टिफिकेट भी शामिल हैं. एक बार सारे आवेदन पूरी तरह से भर जाएं, तभी संख्या का पता चल पाएगा.''
आवेदकों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के सरकारी विभागों की ओर से जारी हुए दस्तावेजों को जमा करना होगा.
इसके अलावा आवेदकों को ज़िला स्तर की कमिटी के सामने जाकर पेश भी होना होगा.
सीएए नियमों में कहा गया है कि एक बार आवेदक के ऑनलाइन फॉर्म को पूरी तरह से देख, परख लिया जाएगा, इसके बाद आवेदक को ईमेल या एसएमएस के ज़रिए ज़िला स्तर कमिटी (डीएलसी) के सामने सारे ओरिजनल दस्तावेज़ लेकर वेरिफिकेशन के लिए जाना होगा.''
अगर सारे दस्तावेज़ सही पाए गए तो अधिकारी एक तरह का शपथ पत्र आवेदक को जारी करेगा और ज़रूरी काग़ज़ों की डिजिटल कॉपी इम्पावर्ड कमिटी के पास अंतिम फ़ैसले के लिए भेज दी जाएगी.
11 मार्च को मोदी सरकार ने सीएए संबंधी नियमों की अधिसूचना जारी की थी. ये क़ानून संसद में चार साल पहले पास हुआ था.
इस क़ानून के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले आए हिंदुओं, सिख, बुद्ध, पारसी, ईसाई और जैन समुदाय को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है.
सरकार ने नागरिकता देने के नियमों में कई बदलाव किए हैं.

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केंद्र सरकार के अधिकारियों का बोलबाला
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि सीएए के तहत केंद्र सरकार ही नागरिकता देने के मामले में इंचार्ज है.
क़ानून में जिन अधिकारियों को नागरिकता देने वाली कमिटी में जगह दी गई है, वो सब केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाले विभागों के अधिकारी हैं.
राज्य स्तर की बात करें तो सिर्फ़ एक आमंत्रित सदस्य को ही कमिटी में जगह दी गई है.
कमिटी को इस तरह से बनाया गया है कि बिना राज्य सरकार के नामित सदस्य के भी नागरिकता देने या नहीं देने पर फ़ैसला किया जा सकता है.
जिन अधिकारियों को कमिटी में जगह देने की बात कही गई है, वो सब केंद्र सरकार के ही अधिकारी होंगे.
इम्पावर्ड कमिटी में इंटेलिजेंस ब्यूरो, फॉरेन रिजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (एफआरआरओ), इंफॉर्मेटिक्स ऑफिसर, पोस्टमास्टर जनरल... ये सब केंद्र सरकार के अधिकारी होते हैं.
इसी तरह डीएलसी या ज़िला स्तर की कमिटी में भी सभी केंद्रीय अधिकारी होंगे.

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भारतीय मुसलमानों को डरने की ज़रूरत नहीं- मोदी सरकार
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक़, केंद्र सरकार ने गुरुवार को कहा है कि सीएए से भारतीय मुसलमानों की नागरिकता पर कोई असर नहीं होगा और उन्हें चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है.
सीएए को मंज़ूरी मिलने के बाद भारत में काफ़ी विरोध प्रदर्शन देखने को मिले थे.
केंद्र सरकार ने इस पर कहा कि क़ानून के तहत किसी भारतीय मुसलमान को नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ नहीं दिखाने होंगे.
गृह मंत्रालय के जारी बयान में कहा गया, ''सीएए में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे भारत के उन 18 करोड़ मुसलमानों की नागरिकता प्रभावित हो, जिनको हिंदुओं जितने ही अधिकार हासिल हैं.''
बयान के मुताबिक़, तीन मुस्लिम देशों में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की वजह से दुनियाभर में इस्लाम का नाम बुरी तरह से ख़राब हुआ. हालांकि, इस्लाम एक शांतिपूर्ण धर्म है, जो कभी भी धार्मिक आधार पर कोई उत्पीड़न, नफरत या हिंसा का प्रचार नहीं करता है.

नागरिकता लेने लिए कौन से दस्तावेज़ चाहिए होंगे?
सीएए में नागरिकता दिए जाने के लिए ज़रूरी सालों की अवधि को 11 से घटाकर पांच कर दिया गया है.
नागरिकता दिए जाने के लिए पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफ़ग़ानिस्तान पासपोर्ट और भारत की ओर से जारी रिहाइशी परमिट की आवश्यकता को बदला गया है. इसके बजाय जन्म या शैक्षणिक संस्थानों के सर्टिफिकेट, लाइसेंस, सर्टिफिकेट, मकान होने या किराएदार होने के दस्तावेज़ पर्याप्त होंगे. ऐसे किसी दस्तावेज़ को सबूत माना जाएगा.
वैध वीज़ा
एफआरआरओ यानी फॉरनर रजिस्ट्रेशन ऑफिस की ओर से जारी रिहाइशी परमिट
जनगणना करने वालों की ओर से जारी पर्ची
ड्राइविंग लाइसेंस
आधार कार्ड
राशन कार्ड
भारत सरकार या अदालत की ओर से जारी कोई पत्र
भारत का जन्म प्रमाण पत्र
ज़मीन या किराएदार से जुड़े दस्तावेज़
रजिस्टर्ड रेंट एग्रीमेंट
पैन कार्ड इश्योरेंस डॉक्यूमेंट
केंद्र, राज्य, बैंक या पीएसयू की ओर से जारी दस्तावेज
रेवन्यू ऑफिसर की ओर से जारी कागज
किसी ग्रामीण या शहरी निकाय के चुने सदस्य की ओर से जारी दस्तावेज
पोस्ट ऑफिस अकाउंट
इंश्योरेंस पॉलिसी
बिजली, पानी बिल
ईपीएफ डॉक्यूमेंट
स्कूल सर्टिफिकेट
अकादमिक सर्टिफिकेट
म्युन्सिपेलिटी व्यापार लाइसेंस
मैरिज सर्टिफिकेट
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