पुलिस का रुख़ चौतरफ़ा सवालों के घेरे में क्यों

इमेज स्रोत, ANI
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
28 मई को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक तरफ़ संसद की नई इमारत का उद्घाटन कर रहे थे, तो दूसरी तरफ़ डेढ़ किलोमीटर दूर जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने वाले जाने-माने पहलवान संसद की नई इमारत की तरफ़ बढ़ने की कोशिश कर रहे थे.
दिल्ली पुलिस की एक बड़ी टीम उन्हें रोकने की कोशिश कर रही थी.
प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बैरिकेड के बावजूद वहाँ से निकलने की कोशिश की.
उसी समय पुलिस और रैपिड एक्शन फ़ोर्स के जवानों ने प्रदर्शनकारियों की धर-पकड़ शुरू कर दी और उन्हें घसीटना शुरू कर दिया.
उनमें से कई को हिरासत में ले लिया गया. चारों तरफ़ अफ़रातफ़री का आलम था. हिरासत में लिए जाने वालों में ओलंपियन विनेश फोगाट और साक्षी मलिक भी शामिल थी.
साक्षी मलिक ने पत्रकारों को बताया कि पुलिस वालों ने प्रदर्शनकारियों को "घसीटा और हिरासत में लिया."
एक प्रदर्शनकारी ने उस समय बीबीसी से बातचीत में कहा था, "आप देख लीजिए. एक लोकतांत्रिक देश में अब हम विरोध प्रदर्शन भी नहीं कर सकते. हम पैदल चल कर नए संसद भवन तक जाना चाहते थे. हमारा विरोध शांतिपूर्ण था. लेकिन यहाँ जो भी हो रहा है, वो लोकतंत्र को ख़त्म कर देने जैसा है."
लोकतंत्र का नया मंदिर और सड़कों पर घसीटी जाती महिला पहलवान, इन तस्वीरों को देश भर ने देखा.
विपक्ष और कई संगठनों ने दिल्ली पुलिस और मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की.

इमेज स्रोत, ANI
पुलिस बातचीत से रास्ता निकाल सकती थी
आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि उन्हें दिल्ली पुलिस की हरक़तों से कोई ताज्जुब नहीं हुआ.
उनका कहना था कि दिल्ली पुलिस सीधे तौर पर गृह मंत्री अमित शाह के अधीन है और ये अपने राजनीतिक आका के इशारे पर काम कर रही है.
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विक्रम सिंह कहते हैं कि स्थिति सामान्य नहीं थी, लेकिन पुलिस को बातचीत की पहल करनी चाहिए थी.
वो कहते हैं, "28 मई के दिन वाले कांड में थोड़ा फ़र्क़ है. इतना बड़ा जलसा, वीआईपी मूवमेंट और वीआईपी की सुरक्षा के मद्देनज़र बाक़ी चीज़ें पीछे चली जाती हैं. पुलिस को भी चाहिए था कि उनसे बातचीत करती, ये मामूली प्रदर्शनकारी नहीं थे, ये देश की आन, बान और शान हैं."
"इनसे अगर बात कर लेते कि आप आठ घंटे के लिए अपना प्रदर्शन स्थगित कर लो, हम बाद में तुम्हें दोबारा लेकर उसी जगह पर बैठा देंगे. हम दोबारा तंबू लगवा देंगे तो बात बन सकती थी."
लेकिन दिल्ली पुलिस की प्रवक्ता सुमन नलवा ने घटना के अगले दिन मीडिया से कहा कि पहलवानों को मोर्चा निकालने की इजाज़त नहीं थी.
उन्होंने कहा था, "जंतर-मंतर पर पिछले 38 दिनों से प्रदर्शन कर रहे पहलवानों को हमने हरसंभव सुविधाएँ मुहैया कराईं. लेकिन उन्होंने सभी अनुरोधों के बावजूद क़ानून का उल्लंघन किया. उन्हें हिरासत में लिया गया और शाम तक रिहा कर दिया गया."
इस घटना के बाद एक बार फिर से दिल्ली पुलिस की ओर से कथित तौर पर अत्यधिक बल प्रयोग चर्चा का विषय बन चुका है.

इमेज स्रोत, ANI
ज़रूरत से अधिक बल प्रयोग के मामले
दिल्ली पुलिस पर पहले भी ऐसे आरोप लगते आए हैं. ये भी कहना ग़लत नहीं होगा कि पिछले दो दशकों में कई अन्य राज्य की पुलिस पर भी इस तरह के इल्ज़ाम लगाए गए हैं.
आइए इनमें से कुछ घटनाओं पर एक नज़र डालते हैं-
जम्मू और कश्मीर प्रदर्शन (2008-10)
पुलिस फ़ायरिंग में 17 वर्षीय तुफ़ैल मट्टू की मौत के बाद 2010 के विरोध प्रदर्शनों में लगभग 120 लोग मारे गए थे.
इसी तरह 2008 में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को भूमि के हस्तांतरण के ख़िलाफ़ एक पर्यावरण अभियान हिंसा में बदल गया, जिसमें क़रीब 70 लोग मारे गए थे.
निर्भया रेप और मर्डर केस (2012)
दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप मामले में देशभर में विरोध प्रदर्शन हुआ था. लेकिन दिल्ली इन आंदोलनों का केंद्र थी.
16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में 23 वर्षीय एक युवती के साथ चलती बस में गैंगरेप किया गया था. बाद में निर्भया की मौत हो गई थी.
इस घटना के ख़िलाफ़ देश भर में आंदोलन हुआ और प्रदर्शन किए गए. दिल्ली प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच मुड़भेड़ का अखाड़ा सा बन गया.
विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए लाठी, आँसू गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया गया.
प्रदर्शनकारियों ने न्याय के लिए धरना दिया था, जिस पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया. इस मामले में भी दिल्ली पुलिस की ओर से अत्यधिक बल प्रयोग की ख़ूब आलोचना हुई थी.

इमेज स्रोत, Getty Images
तूतीकोरिन स्टरलाइट प्रदर्शन (2018)
2018 मई में, तमिलनाडु के तूतीकोरिन में वेदांता लिमिटेड के स्टरलाइट कॉपर प्लांट के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू हुआ था.
तमिलनाडु पुलिस की ओर से प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ ताक़त के बाद प्रदर्शन हिंसक हो गया. इसमें 13 प्रदर्शनकारी मारे गए.
नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोध (2019-2020)
2019 के अंत से लेकर 2020 की शुरुआत तक नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (सीएए) और प्रस्तावित नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों में 20 से अधिक लोगों की जानें गईं.
उत्तर प्रदेश (यूपी) में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की ओर से कथित रूप से गोली चलाने के बाद सबसे ज़्यादा मौतें हुईं.
हालाँकि लगभग सभी राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन केवल भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में मौतें हुईं.
किसान आंदोलन (2020-21)
पुलिस ने हज़ारों उत्तेजित प्रदर्शनकारियों पर उस समय डंडे बरसाए और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले दागे, जब वो पैदल, ट्रैक्टरों और घोड़ों पर सवार लाल क़िले की तरफ़ बढ़ने लगे.
झड़प में एक प्रदर्शनकारी मारा गया और दर्जनों पुलिस और प्रदर्शनकारी घायल हुए.
एक साल से अधिक समय तक चलने वाला किसान आंदोलन अधिकतर शांतिपूर्ण रहा.

इमेज स्रोत, Getty Images
कठपुतली?
दिसंबर 2019 के आख़िरी दो हफ़्तों में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पर विरोध चरम था.
उत्तर प्रदेश के कई शहरों में आम नागरिक प्रदर्शन कर रहे थे. राज्य सरकार के मुताबिक़ प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा में 21 लोगों की जानें गईं और सैकड़ों गिरफ़्तार कर लिए गए.
मारे जाने वालों में नहटौर (बिजनौर) का युवक सलमान भी शामिल था, जो दिल्ली में सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा था.
लेकिन कुछ दिनों के लिए छुट्टी पर वो नहटौर अपने परिवार वालों से मिलने गया था. उसके बड़े भाई मोहम्मद शोएब का आरोप है कि वो जुमे की नमाज़ के बाद मस्जिद से बाहर निकला, तो कुछ पुलिस वाले उसे कुछ दूर ले गए और उसे गोली मार दी.
इसी तरह मुज़फ़्फ़रनगर के मीनाक्षी चौक के अंदर गलियों में स्थानीय लोगों के मुताबिक़ घरों के अंदर बुरी तरह से तोड़-फोड़ करने वालों में पुलिस वाले भी शामिल थे.
किसान आंदोलन के दौरान 26 जनवरी 2021 को आंदोलन करने वाले किसान ट्रैक्टरों और घोड़ों पर सवार दिल्ली के लाल क़िले की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहे थे कि अचानक 24 वर्ष के सिख किसान नवरीत सिंह का ट्रैक्टर पलटा और उनकी मौत हो गई.
पुलिस ने दावा किया कि युवक की मौत ट्रैक्टर के पलटने से हुई थी, लेकिन वहाँ मौजूद चश्मदीद और परिवार के सदस्यों का आरोप है कि वो पुलिस की गोली से मारे गए.
हालाँकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इसकी पुष्टि नहीं हुई और दिल्ली पुलिस ने भी इससे इनकार किया कि गोली लगने से नवरीत सिंह की मौत हुई.
नवरीत के दादा हरदीप सिंह डिबडिबा, जो रामपुर के किसान हैं, उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में दिल्ली पुलिस के ख़िलाफ़ हत्या का मुक़दमा दायर कर रखा है.
उनके मुताबिक़ पुलिस ताक़त का इस्तेमाल नेताओं के कहने पर करती है.
हरदीप सिंह कहते हैं, "पावर का इस्तेमाल जो पुलिस करती है, वो नेताओं के कहने पर करती है. पुलिस को समझ होती है कि मेरा मालिक क्या चाहता है, इसके बाद होड़ लग जाती है अपने मालिक के सामने किस तरह से चीज़ों को किस तरह से प्रस्तुत करना है ताकि उनके नंबर बढ़ें और उनकी तरक़्क़ी हो."
आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता आशुतोष हरदीप सिंह से सहमत हैं.
वो कहते हैं, "आज, पुलिस को राजनीतिक बॉसेज़ द्वारा सख़्ती से कंट्रोल किया जाता है. पुलिस अपना कर्तव्य भूल गई है कि वो संविधान के अंतर्गत है और इसे राजनीति के किसी भी दबाव से मुक्त होना चाहिए."

इमेज स्रोत, ANI
क़ानून और पुलिस
लेकिन पूर्व पुलिस अधिकारी विक्रम सिंह के मुताबिक़ पुलिस आम तौर से क़ानून का पालन करती है.
वो कहते हैं, "पुलिस क़ानून के हिसाब से काम करती है. अगर ग़ैर क़ानूनी काम किया, तो ह्यूमन राइट्स जैसी इतनी सारी संस्थाएँ हैं, जो पुलिस के ग़ैर क़ानूनी काम पर आवाज़ उठा सकती हैं. मैं आपको बता दूँ कि पुलिस वालों को सज़ा भी मिलती हैं, इमरजेंसी के दौरान मैंने ख़ुद देखा है. उनकी तरफ़ से लापरवाही हो, या उनकी तरफ़ से बल का ग़लत इस्तेमाल हुआ हो, तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई होती है."
दिल्ली पुलिस के एक पूर्व उच्च अधिकारी मैक्सवेल परेरा ने पुलिस के कमज़ोर नेतृत्व को इसका ज़िम्मेदार माना.
सीएए विरोधी प्रदर्शन के बाद एक पत्रिका में उन्होंने लिखा था, "ये स्पष्ट था कि पुलिस निर्दयी थी और कमज़ोर लीडरशिप का शिकार थी. उन्हें सत्तारूढ़ दल के प्रति पक्षपाती और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ क्रूरता और अन्यायपूर्ण व्यवहार करते देखा गया."
वो आगे कहते हैं, "पुलिस की विफलता अकेले दिल्ली तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में सीएए के समर्थन और विरोध दोनों में हुए आंदोलन से निपटने में भी उनकी नाकामी साफ़ दिख रही थी. साफ़ नज़र आ रहा था कि दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाक़ों में दंगे हो सकते थे. लेकिन दिल्ली में पुलिस की विफलता विशेष रूप से दुखद थी क्योंकि दिल्ली (भारत की) राजधानी है और इसकी पुलिस फ़ोर्स बड़ी है और बेहतर तरीक़े से लैस है."
जो पुलिस वाले सियासी लीडरों के दबाव में आ जाते हैं, उनके लिए 36 सालों तक पुलिस फ़ोर्स में रहे विक्रम सिंह का ये पैग़ाम है, "लानत है ऐसे पुलिस वालों पर जो ग़ैर क़ानूनी हुक्म मानते हैं. ऐसा नहीं है कि हमारे दौर में ग़ैर क़ानूनी हुक्म नहीं मिलते थे, मैं तो कह देता था आप करा लीजिए, मैं तो नहीं करूँगा. अगर आप तबादले से डरेंगे तो ख़ौफ़ज़दा होकर ग़लत काम करेंगे."

इमेज स्रोत, ANI
हाईटेक का भरपूर इस्तेमाल
आमतौर पर भारत में पुलिस चार तरह की तकनीक का इस्तेमाल करती है, सीसीटीवी, ड्रोन, चेहरे की पहचान करने वाली टेक्नोलॉजी (एफ़आरटी) और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस.
विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक तकनीक की उपलब्धता और इसके अधिक इस्तेमाल के कारण भारत में पुलिसिंग और भी पेचीदा होती जा रही है.
प्रदर्शनकारियों को निगरानी और गोपनीयता के मुद्दों का सामना करना पड़ता है.
विपुल मुदगल 'कॉमन कॉज़' के निदेशक हैं, जो पुलिस सुधारों और जनहित याचिकाओं पर काम करने के लिए जानी जाने वाली एक नॉन-प्रॉफ़िट संस्था है.
वो कहते हैं, "आंदोलन करने वालों की हिम्मत को पस्त करने के लिए पुलिस के पास पूरी टेक्नोलॉजी मौजूद है. सीसीटीवी वहाँ लगा दिए जाते हैं और जब उन्हें छिपाना होता है तो उस पर कपड़ा डाल देते हैं. जैसे जामिया मिल्लिया में पुलिस ने किया था. कपड़े डाल कर मार पिटाई की जाती है. सीसीटीवी का इस्तेमाल पुलिस भी सीख रही है अलग तरीक़े से, जैसे इसका ग़ैर क़ानूनी इस्तेमाल कैसे करना है."
वो आगे कहते हैं, "लोगों पर निगरानी हर समय हो गई है. ये पिछले प्रशासन (यूपीए सरकार) में ही शुरू हो गया था, लेकिन इसका विस्तार अभी हुआ है."
विपुल मुदगल कहते हैं कि भारत में सीसीटीवी का इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों की पहचान करने के लिए बहुत अच्छी तरह से किया जाता है.
वे कहते हैं- एक दूसरी तकनीक है, फ़ेशियल रेकग्निशन. लेकिन इसका खुलेआम और ग़ैर क़ानूनी इस्तेमाल हो रहा है. इसके अलावा ड्रोन का निरंकुश इस्तेमाल होने लगा है, ख़ास तौर से ग़रीब इलाक़ों में.
विपुल मुदगल के मुताबिक़ इन सारी टेक्नोलॉजीज़ का सकारात्मक इस्तेमाल भी होता है, अगर इनका इस्तेमाल क़ानूनी तरीक़े से हो.
उनका तर्क है कि नई तकनीक के इस्तेमाल के लिए एक क़ानूनी प्रावधान होना चाहिए, क्योंकि उनके मुताबिक़ आने वाले समय में इनका इस्तेमाल और बढ़ेगा.

इमेज स्रोत, Getty Images
तकनीक के सकारात्मक पहलुओं पर नज़र डालते हुए विक्रम सिंह की राय में फ़ेशियल रिकग्निशन सॉफ़्टवेयर का सबसे अधिक इस्तेमाल वहाँ किया जाता है, जो भीड़-भाड़ वाला इलाक़ा है और जहाँ वीआईपी मूवमेंट हो.
वे कहते हैं, "वहाँ ये मुफ़ीद होगा. कुंभ मेले में ये बहुत काम आता है. इसकी कामयाबी का रेश्यो केवल 50 प्रतिशत ही है. ड्रोन पर आएँ, तो भीड़ को नियंत्रण में लाने के लिए या ट्रैफ़िक कंट्रोल करने के लिए ड्रोन काफ़ी काम की टेक्नोलॉजी है. क्रिमिनल का डेटा उनके पास है, अब इन टेक्नोलॉजीज का इस्तेमाल करके क़ानून का उलंघन करने वाली की शिनाख़्त की जाती है."
उनके मुताबिक़ इन टेक्नोलॉजीज़ का नकारात्मक इस्तेमाल भी होता है, जैसा चीन और इसराइल में होता है.
इसराइल ने स्टिंक बम का इस्तेमाल भी शुरू कर दिया है. उसका इस्तेमाल आंदोलनकारियों पर किया जाता है, जिससे कोई मरता नहीं है लेकिन उसे इतनी बदबू आती है कि उसे ख़ूब उल्टी आती है. फिर उसे गिरफ़्तार कर लिया जाता है.
नई तकनीक और पुलिस के इस्तेमाल पर जनता का समर्थन
विशेषज्ञों के अनुसार चिंता की बात ये है कि सरकार और पुलिस की ओर से इन टेक्नोलॉजीज के इस्तेमाल का समर्थन है.
हाल में "निगरानी और गोपनीयता का प्रश्न" के नाम से एक रिपोर्ट आई है, जिसे 'कॉमन कॉज़' ने सीएसडीएस संस्था के सहयोग से प्रकाशित किया है.

इमेज स्रोत, ANI
रिपोर्ट के कुछ चौंकाने वाले निष्कर्ष
- आधे से अधिक लोग सशस्त्र बलों, सरकार और पुलिस की ओर से ड्रोन के इस्तेमाल का पुरज़ोर समर्थन करते हैं. हालाँकि इसकी सबसे अधिक संभावना है कि किसान और सबसे ग़रीब लोग सरकारी एजेंसियों की ओर से ड्रोन के उपयोग का विरोध करते हैं.
- आधे से अधिक लोग विरोध प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल करने को दृढ़ता से उचित ठहराते हैं. राजनीतिक आंदोलनों या विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए छोटे शहरों और ग़रीब पृष्ठभूमि के लोगों द्वारा सीसीटीवी के उपयोग का समर्थन करने की बहुत कम संभावना है.
- सर्वे में शामिल एक बड़े वर्ग को लगता है कि विरोध और राजनीतिक आंदोलनों को दबाने के लिए सीसीटीवी (52%), ड्रोन (30%), एफआरटी (25%) के माध्यम से सरकारी निगरानी काफ़ी हद तक उचित है. विरोध प्रदर्शनों के दौरान पंजाब के लोगों की ओर से सरकारी निगरानी का समर्थन करने की संभावना सबसे कम है, जबकि गुजरात के लोगों की ओर से इसका समर्थन करने की सबसे अधिक संभावना है.
- तीन में से लगभग दो लोग क़ानूनी कार्रवाई के डर से अपनी राजनीतिक या सामाजिक राय ऑनलाइन पोस्ट करने से डरते हैं.
- तीन में से लगभग एक राजनीतिक विरोधों को रोकने के लिए सरकार की ओर से ड्रोन के उपयोग का समर्थन करता है.
- 60 प्रतिशत से अधिक जनता प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए एफ़आरटी के इस्तेमाल का समर्थन करती है, जबकि पाँच में से दो का कहना है कि आम नागरिकों की पहचान के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.
कॉमन कॉज़ ने भारत और विदेश में इस क्षेत्र के कुछ चर्चित विशेषज्ञों के साथ एक चर्चा भी आयोजित की.
सर्वेक्षण के निष्कर्षों के उलट इस चर्चा में शामिल सभी एकमत थे कि स्पष्ट क़ानूनी निरीक्षण के अभाव में निगरानी का इस्तेमाल असंतोष को दबाने और विरोध को ख़ामोश करने के बहाने के रूप में किया जाता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
पुलिस सुधार की ज़रूरत
विक्रम सिंह का कहना है कि पुलिस की ट्रेनिंग के दौरान ही बता दिया जाता है कि भीड़ और उत्तेजित प्रदर्शन को नियंत्रित करने के दो पहलू हैं. पहला, बल का कम से कम इस्तेमाल और दूसरा बल का ग़ैर-घातक इस्तेमाल.
वे कहते हैं, "चरणबद्ध तरीक़े से पुलिस पहले आंसू गैस का इस्तेमाल करेगी, फिर वाटर कैनन, इसके बाद लाठी चार्ज, रबर बुलेट कमर के नीचे. और आख़िर में रेगुलर फायरिंग लेकिन वो भी कमर के नीचे. हर स्टेज से पहले भीड़ को वार्निंग दी जाती है. इसके आलावा अस्पताल में इमरजेंसी को अलर्ट करना पड़ता है."
लेकिन सवाल ये है कि क्या 28 मई को दिल्ली पुलिस ने पहलवानों के प्रदर्शन से जूझने के लिए प्रक्रिया का पालन किया?
क्या 2008, 2010, 2016 और 2019 में कश्मीर में उत्तेजित प्रदर्शनकारियों से निपटने में गोली और पैलेट बुलेट चलाने से पहले चरणबद्ध तरीक़े का इस्तेमाल किया गया?
क्या सीएए के विरोध में उत्तर प्रदेश पुलिस ने प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए फ़ायरिंग से पहले प्रक्रिया का पालन किया?
क्या किसानों के आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई में सारी प्रक्रिया को लागू किया गया?
रामपुर के किसान हरदीप सिंह डिबडिबा कहते हैं कि जब उनके पोते पर पुलिस ने फायरिंग की, तो उसके पहले कोई वार्निंग नहीं दी गई.
पुलिस फ़ायरिंग के इस दावे को ख़ारिज करती है.

इमेज स्रोत, ANI
विपुल मुदगल कहते हैं कि पुलिस राज्य सरकार के अंतर्गत आती है और हर राज्य सरकार के पास एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) होना चाहिए.
वो इस बात पर हैरान थे कि ऐसा नहीं है.
उन्होंने कहा, "भीड़ को नियंत्रित करने पर ज़्यादातर राज्यों में कोई एसओपी नहीं है, जो बहुत ही चिंता का विषय है. भीड़ को नियंत्रित करने के नाम पर पुलिस वाले चढ़ाई कर देते हैं लाठी लेकर. उनके मन में ये साफ़ होना चाहिए, ऐसी ट्रेनिंग होनी चाहिए कि आप का उद्देश्य सिर्फ़ भीड़ को तितर-बितर करने का है, आपका उद्देश्य उनसे बदला लेने का नहीं है."
पहली बार 2016 में केंद्र सरकार के अंतर्गत ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट विभाग ने एक एसओपी जारी किया.
ये और बात है कि इसका पालन पुलिस कभी करती है, कभी नहीं.
विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर एसओपी होगा, तो वो उस समय स्थल पर मौजूद सबसे सीनियर पुलिस अधिकारी पर ज़िम्मेदारी डालेगा. प्रदर्शन को नियंत्रण में करना उसकी ज़िम्मेदारी होगी.
गृह मंत्रालय ने भी पुलिस विभाग में सुधार को प्राथमिकता दी है और कई तरीक़े के सुधारों पर विचार हो रहा है.
ये भी पढ़ेंः-
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












