असम जाकर अमित शाह ने सीएए-एनआरसी का ज़िक्र क्यों नहीं किया?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"असम को घुसपैठ मुक्त बनाना चाहते हो या नहीं. ये कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल असम को घुसपैठियों से सुरक्षित रख सकते हैं क्या? ये जोड़ी सारे दरवाज़े खोल देगी और घुसपैठ को असम के अंदर सरल कर देगी, क्योंकि ये उनका वोट बैंक है. घुसपैठ को अगर कोई रोक सकता है, तो भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी सरकार रोक सकती है. हमने ये करके दिखाया."
देश के गृहमंत्री अमित शाह रविवार को असम के दौरे पर थे. नलबाड़ी में विजय संकल्प समारोह में असम की जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने घुसपैठियों का ज़िक्र तो किया, लेकिन नागरिकता क़ानून का ज़िक्र नहीं किया.
उन्होंने आगे कहा, "धारा 370, जिसे 70 साल से कोई छूने की हिम्मत नहीं करता था, 5 अगस्त 2019 को हमने इसे ख़त्म कर, कश्मीर को भारत के साथ जोड़ने का काम किया. 550 साल से प्रभु श्रीराम का मंदिर बनाने के लिए देश भर से आवाज़ उठती रही. किसी की हिम्मत नहीं की. आपने दूसरी बार पूर्ण बहुमत से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने का मौक़ा दिया, तो प्रभु श्रीराम के गंगनचुंबी मंदिर बनने की शुरुआत हो चुकी है."
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असम में इस साल मार्च-अप्रैल के महीने में चुनाव होने वाले हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों अपनी अपनी तैयारियों में जुट गई है. अमित शाह का दौरा भी चुनाव के मद्देनज़र ही था.
लेकिन रैली में वो घुसपैठिओं पर बोले, धारा 370 पर बोले, बोडो शांति समझौते पर बोले, राम मंदिर पर बोले. केवल एनआरसी और सीएए पर नहीं बोले.
ये वही अमित शाह हैं, जो पहले ये कहते नहीं थकते थे कि "दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है, जहाँ कोई भी जाकर बस सकता है. देश के नागरिकों का रजिस्टर होना, यह समय की ज़रूरत है. हमने अपने चुनावी घोषणा पत्र मे देश की जनता को वादा किया है. न केवल असम, बल्कि देश भर के अंदर हम एनआरसी लेकर आएँगे. एनआरसी के अलावा देश में जो भी लोग हैं, उन्हें क़ानूनी प्रक्रिया के तहत बाहर किया जाएगा."
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लेकिन चुनाव से पहले असम में जाकर ना तो उन्हें अपना घोषणा पत्र याद रहा और ना ही अपना पुराना बयान.
असम में एनआरसी प्रक्रिया
एनआरसी को मूल रूप से सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से असम के लिए लागू किया गया था.
इसके तहत साल 2019 के अगस्त महीने में असम के नागरिकों का एक रजिस्टर जारी किया गया था. प्रकाशित रजिस्टर में क़रीब 19 लाख लोगों को बाहर रखा गया था. जिन लोगों का नाम आज एनआरसी लिस्ट में नहीं है, उनके मन में आज भी संशय है क्या पता एनआरसी का जिन्न कब निकल जाए और फिर दिक़्क़त खड़ी हो जाए.
फ़िलहाल असम में एनआरसी को लेकर सरकार ने कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की है. हालाँकि चुनाव आयोग ने कहा है कि जिन लोगों का नाम एनआरसी में नहीं है और वोटर लिस्ट में नाम है, वो विधानसभा चुनाव में वोट दे पाएँगे.
वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते हैं कि एनआरसी लिस्ट से जो 19 लाख लोग बाहर हैं, उनमें तकरीबन 12 लाख बंगाली हिंदू वोटर हैं.
एनआरसी की बात छेड़ कर इसलिए बीजेपी कोई ख़तरा मोल नहीं लेना चाहती.

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रवि शंकर रवि, असम के प्रमुख दैनिक पूर्वोदय अख़बार में संपादक हैं.
अमित शाह के भाषण से सीएए-एनआरसी के मुद्दे के ग़ायब होने को वो बीजेपी की रणनीति का हिस्सा बताते हैं. उनके मुताबिक़ दोनों मुद्दों को अलग-अलग देखने की ज़रूरत है. एनआरसी का प्रभाव असम की सभी विधानसभा सीटों पर भले ना पड़े, लेकिन कुछ सीटों पर अवश्य पड़ेगा.
रवि शंकर रवि कहते हैं, "कम से कम 20 विधानसभा सीटों पर एनआरसी लिस्ट से बाहर लोगों का प्रभाव बहुत पड़ेगा और बीजेपी को नुक़सान हो सकता है. इनमें से 2-3 सीटें लोअर असम की, 2-3 सीटें अपर असम की, और बराक वैली की 15 सीटों पर बीजेपी को नुक़सान झेलना पड़ सकता है. इनमें से ज़्यादातर सीटों पर पिछले चुनाव में बीजेपी का क़ब्ज़ा था. इसलिए अमित शाह जानबूझ कर एनआरसी का ज़िक्र असम की रैलियों में नहीं कर रहे हैं."
हालांकि ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) की माँग है कि एनआरसी को असम में लागू किया जाए. सरकार ने इतनी बड़ी क़वायद शुरू की, तो उसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए. वो साथ ही ये भी कहते हैं कि इसे दोबारा से चेक किए जाने की ज़रूरत है, कुछ ग़लत नाम भी इसमें शामिल हो गए हैं. आसू के समर्थन से ही असम जातीय परिषद (एजेपी) नाम से पार्टी बनी है, जो इस बार चुनावी मैदान में है.
बावजूद इसके एनआरसी इस बार के असम चुनाव में बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया है. लेकिन रवि शंकर रवि कहते हैं कि पिछले एक साल से एनआरसी का मुद्दा लगभग राज्य की राजनीति से ग़ायब ही रहा है.

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असम में सीएए का मुद्दा
एनआरसी के बाद दिसंबर 2019 में संसद में नागरिकता संशोधन क़ानून पास हुआ था.
देश भर में एनआरसी और नागरिकता संशोधन क़ानून को एक साथ जोड़ कर देखा गया.
इसके पीछे गृह मंत्री का बयान ही ज़िम्मेदार बताया जाता है. उस बयान में अमित शाह ने कहा था, "आप क्रोनोलॉजी समझ लीजिए. पहले सीएबी (सीएए) आने जा रहा है. सीएबी आने के बाद एनआरसी आएगा और एनआरसी केवल बंगाल के लिए नहीं आएगा. पूरे देश के लिए आएगा. घुसपैठिए पूरे देश की समस्या हैं. बंगाल चूंकि बॉडर स्टेट है, तो वहाँ की गंभीर समस्या है लेकिन पूरे देश की समस्या है. पहले सीएबी आएगा. सारे शरणार्थियों को नागरिकता दी जाएगी."
हालाँकि सरकार ने सीएए को लेकर एक विज्ञापन जारी किया और कहा किसी राष्ट्रव्यापी एनआरसी की घोषणा नहीं की गई है. अगर कभी इसकी घोषणा की जाती है, तो ऐसी स्थिति में नियम और निर्देश ऐसे बनाए जाएँगे, ताकि किसी भी भारतीय नागरिक को परेशानी न हो.
बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते हैं, "असम में आंदोलन कर रहे लोगों का कहना है कि सीएए क़ानून के लागू होने से सैकड़ों की तादाद में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को यहाँ की नागरिकता मिल जाएगी और इससे उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक और भाषाई पहचान ख़तरे में पड़ जाएगी."
2011 के आँकड़ो के आधार पर बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते हैं, "असम में असमिया भाषा बोलने वाले 48 फ़ीसदी है और बांग्ला भाषा बोलने वाले तकरीबन 28 फ़ीसदी हैं, बोडो बोलने वाले 4.5 फ़ीसदी हैं, हिंदी बोलने वाले तकरीबन 6.7 फ़ीसदी हैं. बाक़ी भाषा बोलने वालों की तादाद इनसे कम है. असम के लोगों को लगता है कि नागरिकता क़ानून आने के बाद असम में बांग्ला बोलने वालों का वर्चस्व बढ़ जाएगा. असम में सीएए के विरोध की बड़ी वजह ये डर है.

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जाहिर है सीएए का चुनाव में ज़िक्र कर बीजेपी इस डर को और हवा नहीं देना चाहती है. वैसे भी हाल ही में बोडोलैंड स्वायत्तशासी परिषद् और तिवा स्वायत्तशासी परिषद् के चुनाव में बीजेपी ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है, इसलिए उन्हें लगता है कि सीएए और एनआरसी का मुद्दा बिना उठाए उनका प्रदर्शन बेहतर रहा है.
सीएए के विरोध में असम में अलग-अलग जगह हुई हिंसा में पाँच लोग मारे गए थे.
असम में विरोध प्रदर्शन इतना व्यापक था कि प्रधानमंत्री को अपना कार्यक्रम तक रद्द करना पड़ा था.
एक साल बाद अब एक बार फिर राज्य में आसू समेत असम के 18 प्रमुख संगठनों ने विवादास्पद इस क़ानून को निरस्त करने की मांग करते हुए राज्य भर में नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों को शुरू किया है.
हालांकि संसद से सीएए क़ानून पारित होने के बाद अभी तक उसके नियम नोटिफाई नहीं किए गए हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल के दौरे में कहा था कि कोविड-19 की वजह से नागरिकता संशोधन क़ानून के नियमों को तैयार करने में देरी हो रही है. लेकिन जैसे ही देश में वैक्सीन का काम शुरू होगा, उसके बाद सीएए के नियमों को लागू करने को लेकर निर्णय लिया जाएगा.

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कांग्रेस के नए गठबंधन से बीजेपी की बढ़ी मुसीबत
कुछ जानकार केंद्र सरकार की इस देरी को जानबूझ कर की जाने वाली देरी मानते हैं ताकि पश्चिम बंगाल और असम का विधानसभा चुनाव निपट जाए.
लेकिन कुछ जानकार इसके पीछे असम में कांग्रेस गठबंधन को भी वजह मान रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं की बीजेपी असम में कांग्रेस, लेफ्ट और AIDUF गठबंधन से परेशान हो गई है और इसलिए एनआरसी-सीएए जैसे मुद्दे को उठा कर अपना और नुक़सान नहीं करना चाहती?
इस सवाल के जवाब में रवि शंकर रवि कहते हैं बीजेपी के लिए लिए ये गठबंधन एक लिहाज से फ़ायदेमंद है और एक लिहाज से नुक़सानदायक भी.
"कांग्रेस के गठबंधन से हिंदू-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण होगा. बदरुद्दीन अजमल के भाषणों से भी ये स्पष्ट हो रहा है. वो अपनी रैलियों में मुसलमानों से कहते फिर रहे हैं कि बीजेपी आ गई तो असम में मस्जिदें तोड़ दी जाएँगी."
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लेकिन रवि शंकर रवि साथ ही ये भी कहते हैं कि कई विधानसभाएं ऐसी हैं, जहाँ मुसलमान वोटरों की अच्छी तादाद है और बदरुद्दीन अजमल की वहाँ अच्छी पैठ है. ऐसी सीटों की संख्या लगभग 40 है. पाँच से सात सीटों पर लेफ़्ट की भी अच्छी पकड़ है.
रवि शंकर रवि के मुताबिक़, "अपर असम में कांग्रेस के नए गठबंधन से बीजेपी को फ़ायदा होगा. इसलिए बीजेपी चाहती है कि ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के समर्थन से बने असम जातीय परिषद (एजेपी) जैसी नई क्षेत्रीय पार्टी चुनाव मैदान में रहें और कांग्रेस गठबंधन का वोट बँटे. लोअर असम में मुसलमान वोटर लगभग हर सीट पर असर रखते हैं, वहाँ कांग्रेस गठबंधन को फ़ायदा होगा और बीजेपी को नुक़सान."
2011 की जनगणना के मुताबिक़ असम में लगभग 34 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी है.
असम विधानसभा में कुल 126 सीटें हैं. 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 60 सीटें, असम गण परिषद को 14 सीटें, कांग्रेस को 26 और AIDUF को 13 सीटों पर जीत मिली थी.
ऐसे में देखना ये है कि इस बार के चुनाव में इस गठबंधन को कौन सी पार्टी अपने फ़ायदे में इस्तेमाल कर पाती है.
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