ओडिशा रेल हादसा: अपनों की तलाश कर रहे लोगों का अंतहीन दर्द

ओडिशा रेल हादसा
    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बालासोर

भारत की सबसे बड़ी रेल दुर्घटनाओं में से एक बालासोर में मरने वालों की तादाद 275 तक पहुँच गई है. आँकड़ों के मुताबिक़ अभी तक 187 शवों की पहचान नही हो पाई है.

दुर्घटना की ख़बर जैसे ही फैली, पीड़ितों के परिवारों का बालासोर आना शुरू हो गया था.

ऐसे ही बहुत से परिवार बालासोर के एक बिज़नेस पार्क में पहुँच रहे हैं, जहाँ के एक बड़े से हॉल में बहुत से शवों को रखा गया था.

पार्क की सीढ़ी पर हमें मालदा की सीमा चौधरी मिलीं, जो अपने पति दीपांकर मंडल को ढूँढ रही थीं.

पीड़ित परिवारों की आँखों में शवों के बीच अपनों को ढूँढने का दर्द साफ़ नज़र आता है.

शवों के बीच एक उम्मीद कि शायद वो अपनों को आख़िरी बार देख पाएँ.

इमारत की बाहरी सीढ़ी पर सीमा फ़ोन पर रोते रोते किसी को बांग्ला में अपना दुख सुना रही थीं.

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शव की तलाश में बिलखते लोग

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वो रोते, रोते हमसे बोलीं, "मैंने सब अस्पताल देख लिया है. अब मैं भुवनेश्वर जाऊँगी. यहाँ कुछ नहीं पता चल रही. मैंने बॉडी चेक किया, कुछ नहीं पता चल रहा."

बिज़नेस पार्क में आए ये परिवार छोटे-छोटे गाँवों, इलाक़ों से आए थे, जहाँ ट्रेन यात्रा के लिए एक आसान साधन रहा है.

बिज़नेस पार्क के बाहर लोगों की मदद के लिए अधिकारी, वॉलिंटियर मौजूद थे. अंदर कॉरिडोर से होते हुए शीशे के दरवाज़े के पार एक बड़ा सा हॉल है.

इसी हॉल के एक हिस्से में फ़र्श पर बिछी काली पॉलिथीन की मोटी चादर पर पिघल चुकी बर्फ़ में भीगा एक मोबाइल, कपड़ों से भरे कई झोले कपड़े, तंबाकू की एक डिब्बी नज़र आई.

जिनका ये सामान था, वो अब वो इस दुनिया में नहीं हैं.

हॉल के दूसरी ओर लगे एक प्रोजेक्टर स्क्रीन पर शवों की तस्वीरें चल रही हैं.

अपनों की पहचान के लिए परिवार उन तस्वीरों को एकटक देख रहे थे.

पहचान में मदद के लिए बगल की मेज़ पर ऐसी कुछ और तस्वीरें रखी थीं. ये उन लोगों की थीं जिनके शव यहाँ लाए गए लेकिन अब उन्हें बाहर के अस्पतालों में भेज दिया गया गया है.

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शवों को सुरक्षित रखना मुश्किल

परिवारों से घिरी बालासोर तहसीलदार निर्लिप्ता मोहंती ने हमें बताया कि लोग ये पता लगाकर कि किस अस्पताल में उनके परिजनों के शव रखे हैं, वहाँ जाकर वो उन शवों को ले सकते है

शवों को बालासोर से बाहर भेजने की वजह पर वो बोलीं, "यहाँ पर इतनी देर शवों को सुरक्षित रखने में थोड़ा मुश्किल हो रही थी. भुवनेश्वर में बड़े-बड़े अस्पताल हैं. इसलिए शवों को वहाँ ले जाया गया है."

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बगले में खड़े सुमित कुमार शवों की तस्वीरों में ही अपने बुआ के लड़के नीरज कुमार की तलाश कर रहे थे. वो शनिवार शाम से एक जगह से दूसरी जगह जाकर जानकारी लेने की कोशिश कर रहे थे.

सुमित ने बताया, "हमने पूरा ढूँढा तो (शवों की) फ़ोटो में वो (नीरज) नज़र आए. फिर मैंने दो, ढाई सौ शव (रखे) थे, जिनको मैंने टच किया."

स्थानीय अधिकारी शवों के बीच अपनों की पहचान करने में परिवारों की मदद कर रहे हैं.

प्रशासन के लिए चुनौती बड़ी है. जो परिवार बाहर के राज्यों से आए हैं, जिनके लिए ये जगह नई है, उनके लिए ये अनुभव और मुश्किलों भरा है.

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अंतहीन दर्द

स्थानीय सोशल वर्कर वी उदय कुमार की शिकायत है कि लोगों को जानकारी देने के लिए बना डेस्क स्थानीय रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन से दूर है और अगर ये सुविधाएँ स्टेशनों के बगल में होती तो लोगों को बहुत आसानी होती.

यहाँ आम आदमी से लेकर एनजीओ, अधिकारी सभी यात्रियों की मदद में जुटे हैं.

हमें सुब्रत मुखी और उनके कई साथी दिखे, जो स्थानीय प्रशासन के लिए काम करते हैं.

वो कई घंटों से लगातार शवों को गाड़ियों, एंबुलेंस में रखने में मदद कर रहे हैं.

उनका एक साथी तो इतना थका था कि वो ज़मीन पर थका-हारा लेटा हुआ था

सुब्रत ने बताया, "हम कल रात आठ बजे से यहाँ आए हैं. हमें दुख हो रहा है. आँखों से आँसू निकलते हैं. कोई (परिवार) उड़िया बोल रहा है. लोगों के रिश्तेदार आ रहे हैं. कोई बंगला में बोल रहा है. कोई तमिल बोल रहा है."

लेकिन जिनके साथ ये हादसा गुज़रा, वो शायद ही अपने दर्द को, इन दिनों को कभी भूल पाएँ.

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