लोकसभा चुनाव 2024: मनोहर लाल खट्टर करनाल में कांग्रेस के युवा चेहरे को मात दे पाएँगे?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, करनाल से
गुरुद्वारा नुमा चौकोर इमारत पर हरा गुंबद ये भ्रम पैदा करता है कि ये धार्मिक इमारत गुरुद्वारा है, मस्जिद है या फिर मज़ार है.
भीतर जाकर पता चलता है कि ये बाबा पीर शाह कलंदर की मज़ार है, जहाँ आने वाले अधिकतर लोग हिंदू धर्म को मानते हैं.
अब करनाल शहर में मिल चुके बुद्धाखेड़ा गाँव की इस इमारत पर लाइटें लगी हैं और चारों तरफ़ दुकानें लगी हैं. भीतर भंडारे की तैयारी चल रही है.
दरअसल, बाबा पीर शाह कलंदर के उर्स के लिए आसपास के गाँवों से भी लोग यहाँ जुट रहे हैं.
यहाँ माहौल धार्मिक है और राजनीतिक सवालों पर अधिकतर लोग चुप्पी साध लेते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो खुलकर अपनी राय ज़ाहिर करते हैं.
यहाँ सभी आर्थिक वर्गों, जातियों और धर्मों के लोग हैं.
मोहित पेशे से हेयर ड्रेसर हैं. वो पास के गाँव से यहाँ आए हैं.
मोहित कहते हैं, “करनाल शहर में तो फिर भी माहौल शांत है लेकिन गाँव में सिर्फ़ राजनीति की ही चर्चा है. हमारी दुकान में कई बार पार्टियों के समर्थक आपस में भिड़ जाते हैं. सब ये दावा करते हैं कि उनकी पार्टी का उम्मीदवार जीत रहा है.”
हरियाणा की करनाल लोकसभा सीट पर 2019 में भारतीय जनता पार्टी ने 70 प्रतिशत से अधिक मत हासिल कर भारत में दूसरी सबसे बड़ी जीत दर्ज की थी.
कांग्रेस को यहाँ पिछले चुनाव में सिर्फ़ 19 प्रतिशत वोट मिले थे.
खट्टर के ख़िलाफ़ कितनी नाराज़गी?

इस बार यहाँ बीजेपी ने साढ़े नौ साल तक हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे मनोहर लाल खट्टर को चुनाव में उतारा है, जबकि कांग्रेस ने युवा छात्र नेता दिव्यांशु बुद्धिराजा को टिकट दिया है.
पिछले चुनाव के नतीजों की पृष्ठभूमि में देखा जाए तो इस सीट पर बीजेपी बहुत आगे नज़र आती है लेकिन लोगों से बात करने पर ये सुनाई देता है कि इस बार मुक़ाबला कड़ा है.
जो यहाँ बीजेपी के लिए समर्थन ज़ाहिर करते हैं, वो भी मनोहर लाल खट्टर के प्रति नाराज़गी दिखाते हैं.
मोहित कहते हैं, “जो वोट मिलेगा बीजेपी को, वो मोदी के नाम पर मिलेगा. यहाँ लोग खट्टर को नहीं देख रहे हैं, मोदी को देख रहे हैं.”
मोहित के एक भाई को हरियाणा सरकार में सरकारी नौकरी मिली है.
मोहित कहते हैं, “बिना किसी सिफ़ारिश या रिश्वत के मेरे भाई को नौकरी मिल गई. मुझे लगता है कि हरियाणा सरकार ने सबसे अच्छा काम यही किया है कि नौकरियों में भ्रष्टाचार नहीं हुआ है.”
पास के एक गाँव से आया एक दलित जोड़ा कांग्रेस के वादों से प्रभावित है.
अपने पति की तरफ़ मंज़ूरी लेने के भाव से देखते हुए ये महिला कहती हैं, “मुझे इस बार कांग्रेस ज़्यादा पसंद आ रही है क्योंकि वो महिलाओं के लिए वादे कर रही है.”
महा सिंह भी यहाँ मन्नत मांगने आए हैं.
वो कहते हैं, “मनोहर लाल को लोगों ने 10 साल देख लिया है. कांग्रेस का शासन भी लोग देख ही चुके हैं. लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस बार लोग बदलाव चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि मनोहर लाल ने कुछ भी नहीं किया, लेकिन शायद लोग अब परिवर्तन चाहते हैं.”
करनाल के लोग क्या कह रहे हैं?

मज़ार की नई बनी बड़ी इमारत की पिछली दीवार से सटी एक छोटी और सदियों पुरानी मस्जिद है.
हरियाणा के मेवात में हुए सांप्रदायिक हिंसा के बाद यहाँ नमाज़ बंद कर दी गई थी, लेकिन स्थानीय प्रशासन और लोगों के दख़ल के बाद आसपास रहने वाले गिने-चुने मुसलमान यहाँ फिर से नमाज़ पढ़ने लगे हैं.
बाहर चादरों की अस्थायी दुकान लगाने वाले महिपाल कहते हैं, “यहाँ नीचे डिमांड कांग्रेस की हो रही है लेकिन ऊपर लोगों को मोदी दिखाई दे रहा है. कौन कहाँ वोट करेगा अभी कुछ नहीं सकते हैं.”
मज़ार के बाहर बैठे एक मुसलमान बुज़ुर्ग कहते हैं, “हमारे लिए चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है, ना ही हमसे कोई वोट मांगने यहाँ आ रहा है.”
बाहर एक बरगद के पेड़ के नीचे बनी चौपाल के पास जूते सिल रहे एक व्यक्ति ने अपना नाम नहीं बताया लेकिन कहा, “हम वोट कहीं भी दें, माना तो यही जाता है कि हमने हाथी पर दिया है.”
उनकी बात को काटते हुए एक अन्य दलित व्यक्ति कहते हैं, “हमारे नेता चन्नी हैं.”
वे दरअसल पंजाब में कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे चरणजीत सिंह चन्नी की बात कर रहे थे.
मतदाता राजनीतिक पसंद नापसंद ही नहीं बल्कि जातियों के आधार पर भी बँटे नज़र आते हैं.
यहाँ बैठे एक सैनी बुज़ुर्ग कहते हैं, “मनोहर लाल खट्टर से भले ही हम नाराज़ हों लेकिन नायब सिंह सैनी अब मुख्यमंत्री हैं और हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि उन्हें और भी मज़बूत करें.”
कभी कांग्रेस का गढ़ रही करनाल लोकसभा सीट पर इस बार दिव्यांशु बुद्धिराजा की उम्मीदवारी ने मुक़ाबले को दिलचस्प बना दिया है.
कौन हैं बुद्धिराजा?

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दिव्यांशु बुद्धिराजा के साथ चुनाव प्रचार में हरियाणा के अलग-अलग ज़िलों से आए छात्र नेता भी जुड़े हैं.
छात्र नेता दिव्यांशु बुद्धिराजा का राजनीतिक क़द करनाल से उम्मीदवारी के बाद और भी बढ़ गया है.
बुद्धिराजा रात में क़रीब 12 बजे जब होटल लौटते हैं, तो युवाओं की भीड़ उन्हें घेर लेती है.
उनकी उम्मीदवारी ने युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं में एक जोश-सा भर दिया है.
क़ानून की पढ़ाई करने वाले बुद्धिराजा कई मुक़दमों का सामना भी कर रहे हैं.
उनके समर्थक कहते हैं कि सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों की वजह से ये मुक़दमे हुए हैं.
कई साल से बुद्धिराजा के साथ रह रहे हार्दिक नयन कहते हैं, “बुद्धिराजा बीजेपी सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ एक सशक्त आवाज़ के रूप में उभरे हैं और जितने भी मुक़दमे उन पर लगे हैं वो सब प्रदर्शनों से ही जुड़े हैं.”
ग्रामीण क्षेत्र में किसान आंदोलन का असर साफ़ नज़र आता है.
बुद्धिराजा का काफ़िला जैसे ही गाँव में दाख़िल होता है, ये नारा सुनाई देने लगता है, “राजा-राजा-बुद्धिराजा.”

कई गाड़ियों के काफ़िले के साथ ग्रामीण क्षेत्र में प्रचार में निकले बुद्धिराजा एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहते हैं, “मैं हाजिरी लगाने आपके बीच आया हूँ, हर गाँव, हर गली हर क़स्बे में पहुँचना है. दिन प्रतिदिन कांग्रेस का ग्राफ़ बढ़ रहा है. हम मनोहर लाल खट्टर को हराने के साथ ही केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं.”
अपने मुक़ाबले में पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की उम्मीदवारी के सवाल पर बुद्धिराजा कहते हैं, “वो पूर्व सीएम नहीं रिजेक्टेड सीएम हैं. एक ऐसे राजनेता हैं, जिन्हें उनकी ख़ुद की पार्टी ने ही रिजेक्ट कर दिया है. लोगों में मनोहर लाल के प्रति जो ग़ुस्सा है, वो दिखाई दे रहा है. उनके ख़िलाफ़ चुनाव मैं नहीं लड़ रहा, बल्कि लोग लड़ रहे हैं. उन्होंने जिस घमंड के साथ शासन चलाया है, वो इस बार टूट जाएगा. हरियाणा के लोग ऐसे लोगों को स्वीकार करते हैं जो उनके हाथ जोड़ता है, अकड़ता नहीं है. ये यहाँ के लोगों का स्वभाव है और यही मतदान में नज़र आएगा.”
बुद्धिराजा बेरोज़गारी और स्थानीय युवाओं के विदेश पलायन के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं.
बुद्धिराजा कहते हैं, “करनाल और पानीपत राजधानी दिल्ली के बिल्कुल पास हैं. यहाँ बड़ी से बड़ी कंपनियों को लाया जा सकता है. अगर मैं चुना गया, तो यहाँ निवेश लाने का प्रयास करूँगा. मैं यक़ीन करता हूँ कि प्रयास करने से ज़मीनी हालात बदले जा सकते हैं.”
मोदी के चेहरे पर वोट माँग रहे हैं मनोहर लाल खट्टर

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भारतीय जनता पार्टी और मनोहर लाल खट्टर इस सीट पर पूरा दम लगा रहे हैं.
यहाँ चुनाव में सिर्फ़ मनोहर लाल खट्टर की प्रतिष्ठा ही नहीं बल्कि पार्टी का रसूख भी दाव पर है.
पिछले चुनावों के नतीजों को अगर देखा जाए तो ये सीट बीजेपी के लिए सुरक्षित और आसान नज़र आती है.
लेकिन इस बार समीकरण और राजनीतिक हालात कुछ ऐसे बन गए हैं कि पूर्व सीएम मनोहर लाल खट्टर भी गली-चौराहों पर नुक्कड़ सभाएँ कर रहे हैं.
यह लोकसभा चुनाव लड़ने का उनके राजनीतिक करियर का पहला अनुभव है.
करनाल की रामलीला समिति के हॉल में पाल समाज की बैठक में शामिल हो रहे मनोहर लाल खट्टर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही वोट मांगते दिखे.
बीबीसी से बात करते हुए मनोहरल लाल खट्टर दिव्यांशु बुद्धिराजा से मिल रही चुनौती को खारिज करते हुए कहते हैं, “एक भगोड़ा आदमी अगर चुनाव लड़ेगा उसे कौन वोट देगा, मैं उस उम्मीदवार को बिल्कुल गंभीरता से नहीं ले रहा हूँ.”
खट्टर कहते हैं “मुझे जनता का प्यार मिल रहा है, जगह-जगह हमारा स्वागत हो रहा है, रोड शो हो रहे हैं, बूथ लेवल तक के कार्यकर्ता चुनाव में लगे हैं. जहाँ तक बीजेपी के पिछले रिकॉर्ड का सवाल है, लोग फिर से उसे दोहराएँगे.”

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खट्टर भी ये मानते हैं कि जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा देख रही है.
वो कहते हैं, “वास्तव में चुनाव इस बार मोदी जी के चेहरे पर ही हो रहा है. लोग मोदी जी की 10 साल की शानदार परफार्मेंस को देख रहे हैं. लोकसभा चुनाव में लोग राष्ट्रीय मुद्दों को महत्व देते हैं.”
अपने प्रति नाराज़गी को लेकर खट्टर कहते हैं कि विरोध करने वालों को कोई तो बहाना चाहिए ही.
वहीं खट्टर के समर्थक ये दावा करते हैं कि पिछले 10 साल में खट्टर ने बिना किसी दबाव में आए काम किया है.
बीजेपी कार्यकर्ता नवीन कहते हैं, “हरियाणा सरकार ने बड़ी तादाद में नौकरियाँ दी हैं. जनता में कोई आक्रोश नहीं है, राजनीतिक विरोधी तो विरोध ही करेंगे.”
नवीन कहते हैं, “ये लोकसभा का चुनाव है और इसलिए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर वोट मांगा जा रहा है. ये चुनाव उन्हें फिर से पीएम बनाने का है.”
क्या हैं लोगों के मुद्दे?

बेरोज़गारी और महंगाई से लोग प्रभावित तो हैं, लेकिन बहुत से लोगों के लिए ये चुनाव में बड़ा मुद्दा नहीं हैं.
पानीपत कोर्ट में अधिवक्ता अंजू सिंह कहती हैं, “लोग टीवी से, सोशल मीडिया के ज़रिए बहुत कुछ जानते हैं. स्थानीय मुद्दों पर उतना काम नहीं हुआ है कि लोग संतुष्ट हों, लेकिन मुझे लगता है कि लोग राष्ट्रीय मुद्दों से प्रभावित हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर बीजेपी सरकार ने काम किया है. मेरे जैसे बहुत से वोटर इस सीट पर राष्ट्रीय मुद्दों को ही देख रहे हैं.”
लेकिन सभी की राय एक जैसी नहीं है.
एक युवा वकील अंजू के तर्क को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, “ये करनाल का चुनाव है और यहाँ इस बार हवा अलग है, आप 10 लोगों से बात करिए, तो छह लोग ये कहेंगे कि वो सरकार से नाराज़ हैं.”
इसी अदालत में एक और युवा महिला वकील कहती हैं, “युवा आज कितनी भी शिक्षा ले ले, बेरोज़गार है, ना सरकारी नौकरी है ना प्राइवेट. युवाओं के सपने है जो पूरे नहीं हो रहे हैं उसकी वजह से समाज में हताशा है. ये हताशा मतदान पर भी दिख सकती है.”

युवा वकील देवांशी को लगता है कि इस राष्ट्रीय चुनाव में युवाओं से जुड़े मुद्दों पर कोई बात नहीं हो रही है.
देवांशी कहती हैं, “सरकार की ये ज़िम्मेदारी है कि वो छात्राओं को, युवाओं को सुरक्षित माहौल दे. तमाम दावों के बाद आज भी ना रैगिंग बंद हुई है और ना ही वर्कप्लेस पर हरैसमेंट. हम विकसित समाज की और बढ़ने का दावा तो कर रहे हैं लेकिन इस दिशा में कोई मज़बूत क़दम नहीं उठाया जा रहा है.”
देवांशी कहती हैं, “एक अच्छी सरकार युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक रास्ता देती है, जो अभी फ़िलहाल होता हुआ नज़र नहीं आ रहा है.”
ग्रामीण क्षेत्र में अलग है माहौल

हल्दाना गाँव में एक चौपाल पर बैठे लोगों में सरकार के प्रति आक्रोश साफ़ नज़र आता है.
बीजेपी के एक समर्थक रहे एक व्यक्ति कहते हैं, “मनोहर लाल खट्टर को लोग यहाँ बहुत नापसंद कर रहे हैं. किसानों के मुद्दों को भी लोगों ने बहुत प्रभावित किया है. ग्रामीण क्षेत्र में सरकार के प्रति एक आक्रोश है.”
वहीं एक बुज़ुर्ग अख़बार की ख़बर पढ़ते हुए कहते हैं, “मोदी जी बयान देते हैं कि मैं कभी हिंदू मुसलमान नहीं करूँगा, ये मेरा संकल्प है. लेकिन चुनाव में हिंदू मुसलमान के अलावा वो क्या कर रहे हैं.”
ये बुज़ुर्ग कहते हैं, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाषा में एक अहंकार नज़र आ रहा है. वो अपने मुँह से अपना ही नाम लेते रहते हैं. मोदी जी 10 साल से प्रधानमंत्री हैं, अपने भाषणों में बताएँ कि उन्होंने क्या काम किया है. लेकिन आप उनके भाषण सुनिए. इस सरकार ने किसानों को आतंकवादी तक बता दिया. अगर हम ग़ुस्सा ना करें तो क्या करें.”
इस चौपाल पर मौजूद एक युवा कहता है, “कोई सरकार आए, हमारे लिए क्या ही बदलेगा, मेहनत करके ही खाना होगा. मेरी उम्र निकल गई, कोई नौकरी ही नहीं निकली, अब तो मज़दूरी ही करनी पड़ेगी. बीजेपी ने सेना की नौकरी को अग्निवीर में बदल दिया.”
हालाँकि, यहाँ गाँव में कई लोग ऐसे हैं, जो कई मुद्दों पर सरकार के प्रति आक्रोश होने के बावजूद राम मंदिर और कश्मीर से धारा 370 हटाने जैसे मुद्दों से प्रभावित हैं. लेकिन इनकी तादाद बहुत ज़्यादा नहीं है.
कितना दिलचस्प है मुक़ाबला

स्थानीय पत्रकार मानते हैं कि इस बार चुनाव पहले जैसा नहीं है. ना ही किसी की कोई लहर है और ना ही कोई बाहरी मुद्दा.
हालाँकि यूट्यूब चैनलों के लिए करनाल लोकसभा चुनाव को कवर कर रहे कई पत्रकार ये ज़रूर स्वीकार करते हैं कि मनोहर लाल खट्टर के प्रति एक नाराज़गी है, जिसे दूर करने की बीजेपी पुरज़ोर कोशिश कर रही है.
वहीं वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र गांधी कहते हैं, “हालात पिछली बार जैसे बिल्कुल नहीं है. बीजेपी के लिए इस बार ये सीट बिल्कुल आसान नहीं है. मतदाता असमंजस में हैं. पिछली बार बीजेपी ने यहाँ साढ़े छह लाख वोटों से सीट जीती थी, इस बार ऐसा बिल्कुल भी नहीं है.”
गांधी कहते हैं, “पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से स्थानीय लोगों की नाराज़गी इस चुनाव में सबसे बड़ा फ़ैक्टर है. मोदी का कुछ मैजिक तो है लेकिन वो भी पिछले जैसा नहीं है.”

नेताओं की रैलियों को कवर कर रहे स्थानीय पत्रकार अजय भारद्वाज कहते हैं, “बीजेपी के नेता ये समझ रहे हैं कि वो मनोहर लाल के चेहरे पर यहाँ वोट नहीं मांग सकते. गृह मंत्री अमित शाह ने भी अपनी रैली में धार्मिक बयान दिए. इससे साफ़ है कि बीजेपी भी समझ रही है कि इस बार ये सीट पहले जैसी आसान नहीं है.”
कांग्रेस को विश्वास है कि वह जनता के आक्रोश को भुनाने में कामयाब रहेगी.
बुद्धिराजा के सहयोगी हार्दिक नयन कहते हैं, “करनाल के नतीजे इस बार चौंका देंगे. ये सीट हरियाणा को एक नया राजनीतिक चेहरा देगी.”
दूसरी तरफ़, बीजेपी को उम्मीद है कि केंद्र सरकार के कामकाज और मोदी के चेहरे की बदौलत वे करनाल की सीट पर अपना कब्ज़ा बनाए रख पाएँगे.
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