बिहार चुनाव: तेज प्रताप यादव आरजेडी में किंगमेकर बनेंगे या 'ट्रबलमेकर'?

तेज प्रताप

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अमूमन पटना की शाम बहुत ही शोर-शराबे वाली होती है. लेकिन जिन इलाक़ों में नेताओं का घर है वहां की शाम बड़ी ख़ूबसूरती से रात में तब्दील होती है. वो चाहे पटना का सर्कुलर रोड हो, एक अणे मार्ग हो या स्टैंड रोड.

लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे और बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव अपने भाई तेजस्वी और माँ राबड़ी देवी से अलग घर में रहते हैं.

दोनों घरों के बीच का फ़ासला मुश्किल से डेढ़ किलोमीटर है. गुरुवार की शाम तेज प्रताप यादव के घर के बाहर कुछ लोगों की भीड़ खड़ी है. भीड़ लोहे के बड़े गेट के खुलने का इंतज़ार करती है और बंद होने पर फिर से खुलने का इंतज़ार करने लगती है.

इसी भीड़ में गया से आए मोहम्मद अंसारी हैं. माथे पर हैट लगाए हुए आँखों में सनग्लास. मोबाइल कान में लगाए स्पीकर ऑन कर एक वीडियो सुन रहे हैं.

मैंने पूछा, "आप क्या सुन रहे हैं?‌"

अंसारी कहते हैं, "मुशायरा सुन रहा हूं."

बस इतना जवाब देने के बाद वे फिर से सुनने लगते हैं.

क्या आप टिकट के लिए आए हैं?

अंसारी कहते हैं, "कुछ काम ऐसे भी होते हैं जिन्हें बताया नहीं जाता."

तेज प्रताप

बात बढ़ी तो वो भी खुल गए और बोले, "जिस नेता को बड़ा बनना होता है वो ऐसे गेट लगाकर नहीं रहता. बल्कि उसे गेट खोलकर देखना होता है कि जो बाहर इंतज़ार में खड़े हैं उनसे हालचाल ले लें. इसलिए हमको केजरीवाल ठीक लगता है."

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गेट के बाहर तेज प्रताप यादव के प्राइवेट बाउंसर खड़े हैं. उनकी नज़रें हर तरफ़ घूर रही हैं. इसी बीच गेट के भीतर का मिनी गेट खुलता है और मैं अंदर पहुंच जाता हूं. तेज प्रताप अपने समर्थकों के साथ बैठक कर रहे हैं. कुछ टिकट मांगने आए हैं तो कुछ उस इलाक़े से हैं जहां से वो इस बार चुनाव लड़ने जा रहे हैं. इस बार तेज प्रताप ने अपना विधानसभा क्षेत्र महुआ से बदलकर हसनपुर कर लिया है.

अंदर खड़े के एक टीवी पत्रकार ने कहा, "आप तो अभी आए हैं, हम यहां चार घंटों से प्रतीक्षा में हैं."

उनके साथ वाले कैमरामैन ख़ुद को कोसते हुए कहते हैं, "उसी वक़्त कर लेना चाहिए था. हमने ग़लती कर दी."

तेज प्रताप

तेज प्रताप में कितना प्रताप?

आख़िरकार तेज प्रताप अपने समर्थकों से घिरे बाहर निकले. चकाचक कुर्ते पायजामे में माथे पर चंदन का तिलक लगाए और चोटी बांधे तेज प्रताप किसी आधुनिक पुजारी की तरह लग रहे हैं.

वह अपने दफ़्तर की ओर बढ़ रहे हैं तभी किसी ने आवाज़ दी- 'सर, ई प्रोफ़ेसर साहब आए हैं. थोड़ा आशीर्वाद दे दीजिए.' तेज प्रताप रुकते हैं और प्रोफ़ेसर साहब दीन-हीन भाव से दंडवत मुद्रा में खड़े हो जाते हैं.

उस दौरान चौबे जी किसी पुराने मुंशी की तरह फाइलें लेकर तेज प्रताप के सामने खड़े हैं. चौबे जी की मुद्रा बिल्कुल स्थायी है. न उनकी पलकें झपकती हैं और न ही होंठ के ऊपर की घनी मूँछ हिलती हैं.

मन किया कि पूछ दूं- 'चौबे जी आपने इतना स्थायी भाव कहां से पाया?'

चौबे जी की शर्ट की जेब में चार-पाँच कलम हैं और दोनों हाथों में फाइलें. तेज प्रताप को कोई कुछ भी देता है तो वो अगले ही क्षण चौबे जी के हाथों में आ जाता है.

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मेरे साथ खड़े एक दोस्त ने चौबे जी को देखकर कहा, "चौबे जी ने अपने जीवन का मक़सद तय कर लिया है. तरक़्क़ी कैसे मिलती है इस कठिन और जटिल सवाल का जवाब चौबे जी ने खोज लिया है."

तेज प्रताप चौबे जी का परिचय देते हैं- "यही हमारा खाता-बही देखते हैं. का चौबे जी?"

चौबे जी पूरे शरीर से सहमति जताते हैं और फिर उसी भाव में खड़े हो जाते हैं. इसी बीच कोई मोबाइल निकाल वीडियो बनाने की कोशिश करता है तो तेज प्रताप भड़क जाते हैं और अपने साथ खड़े एक व्यक्ति से मोबाइल छीनकर चेक करने के लिए कहते हैं.

बिहार की राजनीति और लालू परिवार पर नज़र रखने वाले लोग इस बात से सहमत दिखते हैं कि लालू यादव अपने अंदाज़ और राजनीतिक सूझ-बूझ के संपूर्ण पैकेज रहे हैं लेकिन दोनों बेटों में लालू का ये गुण बँट गया. मतलब अंदाज़ तेज प्रताप में चला गया और समझदारी तेजस्वी में.

यही सवाल तेज प्रताप से पूछा कि लोग कहते हैं कि लालू जी का अंदाज़ आप में है और समझदारी तेजस्वी में.

तेज प्रताप तेजस्वी यादव

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तेज प्रताप लालू के अंदाज़ ख़ुद में होने की बात से ख़ुश हुए लेकिन समझदारी नहीं होने वाली बात पर असहमत होते हुए कहा, "ये कुछ बिकाऊ मीडिया के लोग हैं, वही ऐसा कहते हैं."

हालांकि टाइम्स ऑफ इंडिया और टेलीग्राफ़ में दो दशक तक पत्रकार रहे फ़ैज़ान अहमद कहते हैं कि लालू वाली कोई भी बात दोनों बेटों में नहीं है.

वह कहते हैं, "लालू जिस तरीक़े से अपने नेताओं और समर्थकों से मिलते थे, वो बात इनमें बिल्कुल नहीं है. न तो इनमें वो वाकपटुता है और न ही सियासी सूझबूझ. तेजस्वी यादव अपनी पार्टी के जिन नेताओं से सीख सकते थे, उन्हें किनारे कर रखा है. रघुवंश बाबू का तो अब निधन हो गया लेकिन उनकी भी भरपूर उपेक्षा की गई. अब्दुल बारी सिद्दीक़ी और रामचंद्र पूर्वे की भी वैसी ही उपेक्षा हो रही है. भले जगदानंद सिंह प्रदेश अध्यक्ष हैं लेकिन उनकी सुनता कौन है?"

तेज प्रताप का घर बाहर से देखने में कहीं से भी लग्ज़री नहीं लगता है. किसी सरकारी मुलाज़िम के घर जैसा साधारण घर है. उस घर के कैंपस में एक दफ़्तर बनवाया है. इस दफ़्तर में एक गैलरी है, जहां उनके परिवार और पिता के राजनीतिक जीवन की तस्वीरें टँगी हैं.

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किंगमेकर या ट्रबलमेकर?

तेजस्वी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार होने पर तेज प्रताप को कोई दिक़्क़त नहीं है, लेकिन वो कहते हैं कि किंगमेकर की भूमिका में रहेंगे. क्या तेज प्रताप के मन में मुख्यमंत्री बनने की तमन्ना नहीं है? इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं, "हम किंगमेकर बनेंगे. जैसे लालू जी थे."

अगर तेज प्रताप तेजस्वी को किंग बनाएंगे तो किंग और किंगमेकर में कितना सामंजस्य रहेगा इसका जवाब आरजेडी के लिए बहुत सकारात्मक नहीं हो सकता क्योंकि कभी किंग ख़ुद को बड़ा समझने लगता है तो कभी किंगमेकर.

फ़ैज़ान अहमद कहते हैं कि आरजेडी में तेज प्रताप यादव के किंगमेकर होने का तो पता नहीं लेकिन वो 'ट्रबलमेकर' ज़रूर बनेंगे.

फ़ैज़ान अहमद कहते हैं, "ऐसा लोकसभा चुनाव के दौरान तेज प्रताप ने किया भी था. वो अपना उम्मीदवार उतारने लगे थे."

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नीतीश से नाराज़गी कम

नीतीश कुमार 2015 में आरजेडी के साथ आए थे लेकिन फिर 16 महीने के भीतर ही फिर से बीजेपी के साथ चले गए थे. 16 महीने तक तेजस्वी बिहार के उपमुख्यमंत्री रहे और तेज प्रताप स्वास्थ्य मंत्री. लेकिन तेज प्रताप के मन में नीतीश कुमार को लेकर उस हद तक कड़वाहट नहीं दिखी जैसी पीएम मोदी और बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी को लेकर है.

तेज प्रताप जब अकेले में बैठते हैं तो सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा किस पर आता है?

जवाब में वह कहते हैं, "दोनों मोदी पर. इन दोनों पर बहुत ग़ुस्सा आता है. हम ख़राब व्यक्तियों की पहचान कर लेते हैं. पिताजी से इतना तो सीख ही लिए हैं."

आपमें नीतीश कुमार से नाराज़गी नहीं है? वो कहते हैं, "नीतीश कुमार को लेकर क्या रहेगी. वो तो चुप्पा मारे रहते हैं. उन पर भी आता है लेकिन ज़्यादा दोनों मोदी पर आता है."

आरजेडी की पहचान यादवों की पार्टी की रूप में रही है. 2005 में आरजेडी की हार हुई और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो बिहार के मीडिया में यादव राज का अंत तक कहा गया. आरजेडी के वोट बैंक भी यादवों और मुसलमानों को ही माना जाता है. लेकिन तेज प्रताप कहते हैं कि उनके लिए जाति और मज़हब कोई मायने नहीं रखता है.

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वो कहते हैं, "जाति शब्द ही ख़त्म कर देना चाहिए. मेरे लिए जाति कोई मायने नहीं रखती है. मेरे लिए धर्म से बड़ा इंसान है."

हालांकि तेज प्रताप जहां से विधायक हैं और जिस हसनपुर से इस बार चुनाव लड़ने जा रहे हैं वहां यादव मतदाताओं की संख्या अच्छी-ख़ासी है.

तेज प्रताप के आवास पर कई किस्म के लोग आपको दिख जाएंगे. उनके दोस्तों का एक समूह हमेशा रहता है और उनकी राजनीति को वे ही हैंडल करते हैं. कुछ लोग साधु की भंगिमा और पोशाक में भी दिखे.

तेज प्रताप को राजनीति के अलावा और क्या पंसद है?

वह कहते हैं, "मेरा मन अध्यात्म में बहुत लगता है. हम वृंदावन, मथुरा और ऐतिहासिक जगहों पर जाते रहते हैं."

तेज प्रताप की पसंदीदा फ़िल्म प्रकाश झा की राजनीति है. हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि वह खुद राजनीति फ़िल्म का कौन सा किरदार हैं.

लोगों के बीच तेज प्रताप की एक छवि यह भी है कि वह कुछ ऐसा बोल देते हैं जिससे पार्टी को नुक़सान होने की आशंका रहती है. रघुवंश प्रसाद सिंह की नाराज़गी को लेकर तेज प्रताप ने एक बार कह दिया था कि समंदर से एक लोटा पानी निकल जाने से कोई असर नहीं पड़ता. तेज प्रताप के बयान का आशय निकाला गया कि उन्होंने अपनी पार्टी और परिवार को समंदर कहा जबकि रघुवंश सिंह को एक लोटा पानी.

मैं जिस होटल में ठहरा हूं, वहां के किचन स्टाफ के कुछ लोगों ने कहा, ''सर, तेज प्रताप को ऐसा नहीं कहना चाहिए था. रघुवंश बाबू तो मरते दम तक लालू जी के वफ़ादार बने रहे. उनके बारे में ऐसा कहेंगे तो किसको अपनाएंगे?''

तेज प्रताप को महाभारत पसंद है और वह ख़ुद को कृष्ण का किरदार मानते हैं. तेजस्वी को अर्जुन बताते हैं. लेकिन दिक़्क़त यह है कि स्वघोषित कृष्ण और अर्जुन एक भुलावे से ज़्यादा कुछ होता नहीं.

तेज प्रताप ने इंटरव्यू के बाद हंसते हुए कहा- 'ई सोच रहे थे कि हमें फँसा देंगे. हम ही फँसा दिए.'

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