सुल्तानपुर में मेनका गांधी के सामने क्या हैं चुनौतियां?

- Author, गौरव गुलमोहर
- पदनाम, सुल्तानपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर लोकसभा क्षेत्र इन दिनों राजनीतिक समीकरणों को लेकर ख़ास तौर पर चर्चा में है.
इसकी एक वजह यह है कि भाजपा ने पीलीभीत सांसद वरुण गांधी का टिकट तो काट दिया जबकि उनकी मां मेनका गांधी सुल्तानपुर लोकसभा सीट से लगातार दूसरी बार बीजेपी की उम्मीदवार हैं.
सुल्तानपुर लोकसभा से 2014 से 2019 के बीच मेनका गांधी के बेटे और बीजेपी नेता वरुण गांधी सांसद रहे हैं. 2019 में भाजपा ने मां और बेटे की सीटें आपस में बदल दीं और मेनका गांधी को सुल्तानपुर से चुनाव मैदान में उतारा यानी इस लिहाज़ से देखें तो पिछले दस सालों से इस सीट पर बीजेपी का कब्ज़ा है.
वैसे दिलचस्प ये है कि सुल्तानपुर लोकसभा सीट का अपना इतिहास रहा है. इस सीट पर किसी भी दल का कोई प्रत्याशी दोबारा चुनाव नहीं जीत सका है.
वहीं मेनका गांधी लोकसभा चुनाव 2024 के लिए यहां से दोबारा नामांकन कर चुकी हैं. सवाल यह है कि क्या मेनका गांधी इस बार इतिहास बदल पाएंगी?
सुल्तानपुर में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह कहते हैं, "देखिए, मेनका गांधी और उनको चुनौती दे रहे इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी राम भुआल निषाद दोनों ही बड़े नेता हैं, लेकिन दोनों ही बाहरी हैं."
शीतल सिंह बताते हैं कि लखनऊ के बाद पूर्वांचल में जितनी देरी से चुनाव हो रहे हैं उतना अधिक लोगों के बीच बहस हो रही है. यह बहस जितना लंबा खिंचेगी, भाजपा को उतना ही नुक़सान होगा.
शीतल पी सिंह मेनका गांधी की मुश्किलें गिनवाते हैं. वो कहते हैं, "पिछली बार मेनका गांधी ने लगभग 14 हज़ार मतों से चुनाव जीता था. इस बार भी मुक़ाबला कड़ा है, बाज़ी पलटने की संभावना भी है. महंगाई और बेरोज़गारी को लेकर जो एंटी-इनकम्बेंसी पैदा हुई है उससे मतदान प्रतिशत पर असर पड़ रहा है."
"यह असर किस तबके से आ रहा है यह देखना होगा. अगर यह सवर्ण तबके से आ रहा है, जिसकी ज़्यादा संभावना भी है तब यह मेनका गांधी जी के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है."
सुल्तानपुर सीट का जातीय समीकरण

माना जाता है कि सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर दलित और ब्राह्मण अधिक हैं लेकिन यहां गैर-यादव पिछड़ी जातियां भी परिणाम प्रभावित करने में अहम भूमिका अदा करती हैं.
इस सीट पर गैर-यादव ओबीसी जातियों में निषाद और कुर्मी 2014 से ही भाजपा के साथ रही हैं. जबकि समाजवादी पार्टी ने यहां से निषाद प्रत्याशी के रूप में पूर्व केंद्रीय मंत्री राम भुआल निषाद को मैदान में उतारा है.
वहीं दूसरी ओर बसपा ने कुर्मी समाज से उदराज वर्मा को मैदान में उतार कर भाजपा के समीकरण को बिगाड़ दिया है.
मेनका गांधी के नामांकन से इस बात की पुष्टि होती है कि बिगड़ते समीकरण को भाजपा ने पहले ही पहचान लिया है. मेनका गांधी के नामांकन में योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर संजय निषाद और अपना दल (सोनेलाल पटेल) के अध्यक्ष आशीष पटेल शामिल रहे.
शीतल पी सिंह कहते, "निषाद समुदाय का बड़ा हिस्सा निषाद उम्मीदवार राम भुआल के साथ जाएगा और कुर्मी मतदाताओं का तीन टुकड़ों में बंटवारा होगा, बसपा से कुर्मी प्रत्याशी होने के कारण थोड़े कुर्मी मतदाता उधर जाएंगे, सपा की पीडीए रणनीति के कारण थोड़े सपा में जाएंगे जबकि अधिक संख्या में भाजपा की तरफ जाने की संभावना है, लेकिन कुर्मी मतों में बंटवारे का सीधा असर भाजपा पर पड़ेगा."

हालांकि भाजपा के सुल्तानपुर जिलाध्यक्ष डॉक्टर आर. ए. वर्मा इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी की चुनौती के सवाल पर कहते हैं, "देखिए, कोई भी प्रत्याशी हो चुनौती देता ही है. हमारी प्रत्याशी मेनका गांधी पांच वर्ष तक लगातार सक्रिय रही हैं और हमारा संगठन ग्रास रुट लेवल बेहद मज़बूत है. हमारी स्थिति यहां बहुत मजबूत है."
"जहां तक रही बात कुर्मी और निषाद मतदाताओं के भाजपा से दूर जाने की तो हमें नुकसान होगा लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं है. जो नॉन भाजपाई मतदाताओं का वर्ग है वही जातिगत आधार पर अपना पाला बदल सकता है."
समाजवादी पार्टी जिलाध्यक्ष रघुवीर यादव कहते हैं, "देश में इंडिया गठबंधन की सरकार बनने जा रही है. इसे समझते हुए लोग इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी को वोट कर रहे हैं. यादव और मुस्लिम मतदाता हमारे साथ थे ही अब निषाद भी हमारे साथ हैं."
"दूसरा हमारी पार्टी ने कुर्मी समाज को इतना टिकट दिया है कि यहां कुर्मी मतदाता पचास फ़ीसदी अपनी जाति के बसपा प्रत्याशी के साथ जाएंगे बाक़ी 50 फ़ीसदी में हमारे साथ लोग होंगे, इसलिए कह रहा हूं कि जातीय समीकरण हमारे पक्ष में है."

वैसे समाजवादी पार्टी ने दूसरी जातियों के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है. पूर्व सपा विधायक और परशुराम की मूर्ति स्थापित कर ब्राह्मण नेता के रूप में उभरे संतोष पांडेय के साथ पिछले लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा प्रत्याशी चन्द्र भद्र सिंह 'सोनू' इसी मंगलवार को सपा में शामिल हो गए हैं.
पिछले चुनाव में कि चन्द्र भद्र सिंह मेनका गांधी को कड़ी टक्कर देते हुए लगभग पंद्रह हजार मतों से चुनाव हार गए थे. ऐसे में अब यह संकेत मिल रहे हैं कि इसौली विधानसभा समेत अन्य विधानसभाओं में भी ठाकुर और ब्राह्मण मतदाताओं का झुकाव इंडिया गठबंधन की ओर हो सकता है.
जातिगत आकलन के आधार पर दावा किया जाता है कि सुल्तानपुर लोकसभा में दलित एवं ब्राह्मण मतदाता सर्वाधिक हैं.
दलित मतदाता लगभग तीन लाख और ब्राह्मण मतदाता लगभग 2 लाख 75 हजार हैं. मुस्लिम मतदाता लगभग 2 लाख 50 हजार, यादव मतदाता 2 लाख, ठाकुर मतदाता 1 लाख 75 हजार, वैश्य मतदाता लगभग 1 लाख 50 हजार, कुर्मी मतदाता लगभग 1 लाख 75 हजार और निषाद मतदाता लगभग दो लाख के क़रीब हैं.
मेनका गांधी और राम भुआल निषाद, किसका पलड़ा भारी ?

जातीय समीकरण पर मेनका गांधी का अपना क़द भारी पड़ सकता है.
मेनका संजय गांधी की पहचान राष्ट्रीय कद की वरिष्ठ नेता के रूप में है. वे गांधी परिवार की सदस्य हैं और आठ बार सांसद रह चुकी हैं. इतना ही नहीं भाजपा की फायर ब्रांड नेताओं में भी उनकी गिनती होती है.
सुल्तानपुर लोकसभा में मेनका गांधी की एक सक्रिय, सुलभ और सशक्त महिला नेता की छवि है.
यही कारण है कि विपक्षी दल मेनका गांधी की बाहरी नेता के रूप में छवि गढ़ने में नाकाम रहे हैं.
सुल्तानपुर के निवासी प्रेमनाथ तिवारी कहते हैं, "मेनका गांधी में स्पष्टवादिता है, वे जो भी काम करा सकती हैं तुरंत करवाती हैं, यदि उन्हें लगता है कि कोइ काम उनके द्वारा संभव नहीं है तो वे मना कर देती हैं."
"मेनका गांधी ने जिले का शहरीकरण और सौंदर्यीकरण कराया, ट्रैफिक जाम से निजात दिलाई, वेंडिंग ज़ोन का निर्माण कराया, जवाहर नवोदय विद्यालय और कृषि उद्यान केंद्र बनवाया."
सुल्तानपुर में वरिष्ठ पत्रकार राज खन्ना कहते हैं, "मेनका गांधी का राजनीतिक कद बहुत बड़ा है, सक्रिय नेता हैं, देश की राजनीति में महत्वपूर्ण एवं केंद्रीय भूमिका निभाने वाले गांधी परिवार की सदस्य हैं. उनके व्यक्तित्व के साथ यह एक अतिरिक्त विशेषता है. इन चीज़ों का लाभ भी उन्हें मिल रहा है."

दूसरी तरफ इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी राम भुआल निषाद गोरखपुर की कौड़ीराम विधानसभा से दो बार के विधायक रहे हैं. साल 2007 में राम भुआल निषाद बसपा सरकार में राज्यमंत्री रहे हैं.
लोकसभा चुनाव -2014 में गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के खिलाफ बसपा के टिकट पर चुनाव लड़कर राम भुआल निषाद तीसरे स्थान पर रहे.
इस सीट पर सपा ने राम भुआल को निषाद मतदाताओं को साधने के लिए प्रत्याशी बनाया था. पिछले लोकसभा चुनाव में राम भुआल निषाद ने सपा के टिकट पर गोरखपुर से चुनाव लड़ा और दूसरे स्थान पर रहे.
समाजवादी पार्टी के पिछड़ा वर्ग प्रदेश उपाध्यक्ष जेपी निषाद कहते हैं, "राम भुआल निषाद योगी आदित्यनाथ के सामने गोरखपुर से मजबूती से चुनाव लड़े थे. कौन कितनी बार का सांसद है यह मायने नहीं रखता है. पांच साल में मेनका गांधी सिर्फ समाज के उच्च वर्ग का ध्यान देती रहीं लेकिन समाज के दबे कुचले लोगों का ध्यान नहीं दिया."
क्या कह रहे हैं विश्लेषक?

सुल्तानपुर लोकसभा से मेनका गांधी को भाजपा से उम्मीदवार बनाये जाने के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज़ थी कि भाजपा यह सीट बड़े अंतर से जीतने जा रही है.
लेकिन सपा से राम भुआल निषाद और बसपा से उदराज वर्मा को टिकट मिलने के बाद बदलते जातीय समीकरण ने एक बार फिर सुल्तानपुर लोकसभा में सपा और भाजपा दोनों के क़रीबी मुक़ाबले में पहुंच गई है.
पत्रकार राज खन्ना कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि पिछले चुनाव जितनी कठिन चुनौती का सामना मेनका गांधी को करना पड़ेगा. पिछले दस साल में नरेंद्र मोदी के शासनकाल में एक नया वोट बैंक सामने आया है, जो आवश्यकताओं और हितों की पूर्ति से जुड़ा हुआ है, जिसे लाभार्थी वोट बैंक भी कहते हैं."
"इसके अलावा राज्यों और केंद्र के माध्यम से विभिन्न योजनाओं के ज़रिये, बड़े संगठनात्मक ढांचे के ज़रिये ज़मीन स्तर पर बेहद मज़बूत है."
हालांकि वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी मानते हैं कि इस बार चुनाव में अप्रत्याशित परिणाम आ सकते हैं.
अरुण कुमार त्रिपाठी कहते हैं, "लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि बहुत कुछ निश्चित मानकर नहीं चला जा सकता."
वो कहते हैं, "सीएसडीएस का सर्वेक्षण बताता है कि अयोध्या के राममंदिर या धार्मिकता का नरेटिव लोगों के मानस में बहुत अधिक उपस्थित नहीं है. राम मंदिर मुद्दा 21-22 जनवरी को जितना हाइप पर था उतना इस समय नहीं है."
उनके मुताबिक़, "अवध को भाजपा ने साम्प्रदायिक या धार्मिक ध्रुवीकरण का केंद्र ज़रूर बनाया है लेकिन अवध में वे सूत्र भी हैं जो एकता कायम करते हैं. अवध किसान आंदोलन, समाजवादी आंदोलन और 1857 के आंदोलन का गढ़ रहा है."
"इस चुनाव में विपक्ष सांगठनिक रूप से बहुत सशक्त नहीं है और संसाधन के स्तर पर बहुत समर्थ भी नहीं है लेकिन जब जनता ही चुनाव लड़ती है तो चीजें दूसरी दिशा में जाती हैं. ऐसा ही साल 1977 के चुनाव में भी हुआ था."
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डॉ. घनश्याम तिवारी हत्याकांड से किसे नुक़सान?
इस चुनाव में एक स्थानीय मुद्दे की भी बहुत चर्चा है. पिछले साल सुल्तानपुर राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर तब चर्चा में आया जब 23 सितंबर को भूमि विवाद में डॉक्टर घनश्याम तिवारी की निर्मम हत्या कर दी गई.
इस हत्याकांड से जनपद में ब्राह्मण और ठाकुर आमने-सामने आ गए थे क्योंकि इस मामले के मुख्य अभियुक्त स्थानीय राजनीति में दखल रखने वाले अजय नारायण सिंह थे.
इस हत्याकांड के ख़िलाफ़ भाजपा, सपा, शिवसेना और कांग्रेस जैसे दलों के ब्राह्मण नेता योगी आदित्यनाथ सरकार पर ठाकुरों का पक्ष लेने का आरोप लगाते हुए सड़क पर उतर आए थे.
राजनीतिक डैमेज कंट्रोल के लिए जिला प्रशासन ने आरोपी अजय नारायण सिंह के घर पर बुल्डोज़र तो चलवाया लेकिन इससे ब्राह्मणों में पूरी तरह नाराज़गी कम नहीं हुई, क्योंकि पहले गिरफ्तारी में देरी और उनका फौरन ज़मानत पर छूट जाना ब्राह्मणों की नाराज़गी की वजह बनी.
यह हत्याकांड भले ही चुनाव से कई महीने पहले हुआ हो लेकिन इसका प्रभाव आम चुनाव में भी देखने को मिल रहा है.
लंभुआ निवासी चिरंजीव लाल मिश्रा कहते हैं, "पिछले चुनाव में हम सब खुलकर मेनका गांधी जी के साथ थे लेकिन घनश्याम तिवारी हत्याकांड के बाद लगा कि ब्राह्मणों का अस्तित्व संकट में है."
"पूरे मामले में मेनका जी की भूमिका नगण्य रही. हमारे जनपद में लगभग अहम पदों पर एक जाति के लोग बैठाए गए हैं. इन सबका यहां भाजपा पर बुरा प्रभाव पड़ना तय है."

वहीं यहां युवाओं के लिए रोज़गार का मुद्दा भी है. सुल्तानपुर में रह कर सरकारी नौकरी के लिए तैयारी करने वाली अंजली मिश्रा शिक्षक भर्ती न आने से काफी नाराज़ हैं.
अंजली कहती हैं, "बेरोज़गारी बहुत ज़्यादा है. शिक्षक भर्ती 2019 के बाद से नहीं आई है. यूपी पुलिस का पेपर लीक हो गया. एडेड जूनियर की परीक्षा मैंने 2021 में दी लेकिन अभी तक उसका रिज़ल्ट नहीं आया है. लोग जाति के नाम पर भाजपा को वोट करते हैं मुझे भाजपा बिल्कुल पसंद नहीं है. मुझे वोट देना होगा तो मैं नोटा पर वोट दूंगी."
धम्मौर निवासी चौधरी मान सिंह यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं. वो सुल्तानपुर लोकसभा में इंडिया गठबंधन को मज़बूत मानते हैं.
मान सिंह कहते हैं, "यहां इंडिया गठबंधन का प्रत्याशी अच्छी टक्कर दे रहा है क्योंकि लोग बदलाव चाहते हैं. युवा किसी भी जाति-धर्म का हो उसे नौकरी चाहिए लेकिन कोई भर्ती नहीं निकल रही है. कांग्रेस अपने घोषणा पत्र में 30 लाख नौकरी और मनरेगा मज़दूरी 400 करने का वादा कर रही है."
पिछले चुनाव पर एक नज़र

इमेज स्रोत, Nasir Kachroo/NurPhoto via Getty Images
उत्तर प्रदेश में पिछले चुनाव में भाजपा, कांग्रेस एवं बसपा-सपा के 'महागठबंधन' के बीच मुक़ाबला था, इसके बावजूद महागठबंधन यह सीट जीतने में सफल नहीं हो सका.
पिछली बार सुल्तानपुर लोकसभा से भाजपा की ओर से राष्ट्रीय कद की नेता मेनका गांधी चुनाव मैदान में थीं, वहीं दूसरी ओर महागठबंधन ने बसपा के सिंबल पर सुल्तानपुर जनपद के बाहुबली नेता चंद्र भद्र सिंह 'सोनू' को चुनाव मैदान में उतारा था.
इस चुनाव में मेनका गांधी को कुल 4,59,196 वोट मिले और महागठबंधन की ओर से बसपा प्रत्याशी चंद्र भद्र सिंह 'सोनू' को कुल 4,44,670 वोट मिले. कुल 14, 526 वोटों के मामूली अंतर से मेनका गांधी चुनाव जीत सकीं.
उस चुनाव के दौरान मेनका गांधी के लिए सपा-बसपा गठबंधन ने मुश्किलें बढ़ा दी थीं लेकिन शिवपाल यादव की तत्कालीन पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के यादव उम्मीदवार के चलते मेनका गांधी को जीत हासिल हुई थी.
इस बार सपा और बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं और शिवपाल यादव अपनी पार्टी का विलय समाजवादी पार्टी में कर चुके हैं. जबकि चंद्र भद्र सिंह भी समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए.
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