कौशांबी सीट बीजेपी के लिए कितनी बड़ी चुनौती, क्या है पल्लवी पटेल और राजा भैया फ़ैक्टर

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इमेज कैप्शन, कौशांबी से बीजेपी और एसपी प्रत्याशी (बाएं से दाएं)
    • Author, गौरव गुलमोहर
    • पदनाम, कौशांबी से बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तर प्रदेश की कौशांबी लोकसभा सीट के लिए 20 मई को मतदान होना है. इस इलाक़े में पिछले कुछ दिनों से चर्चा केवल बीजेपी सांसद के वायरल वीडियो की हो रही है, इसने सुस्त पड़ी कौशांबी की राजनीति की तपिश को भी बढ़ा दिया है.

पिछले एक सप्ताह से ‘सांसद की वेब सीरीज़’ नाम से एक के बाद एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं.

वीडियो में मौजूदा बीजेपी सांसद विनोद सोनकर ब्राह्मण और बनिया जाति पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए देखे जा रहे हैं.

अभी तक उनके कई वीडियो वायरल हो चुके हैं. किसी वीडियो में सांसद विनोद सोनकर कथित तौर पर गाली-गलौज करते हुए नज़र आ रहे हैं तो किसी वीडियो में प्रयागराज में 50 करोड़ की ज़मीन 25 करोड़ में दिलवाने की बात कर रहे हैं.

बैनर

हालांकि, विनोद सोनकर ने इन सभी वीडियोज़ को अपने ख़िलाफ़ साज़िश का हिस्सा बताया और कहा कि ये सभी वीडियो फ़र्ज़ी हैं.

इससे पहले भी एक निजी टीवी चैनल पर विनोद सोनकर ने ‘ब्राह्मण समुदाय को लालची’ बताया था और कुछ दिन बाद ही अपने फ़ेसबुक पोस्ट में ब्राह्मणों को ‘मनुवादी’ भी कहा था.

ब्राह्मण समुदाय नाराज़

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लोकसभा चुनाव के दौरान सोनकर के वायरल वीडियो से ब्राह्मण समुदाय में ख़ासतौर पर नाराज़गी देखी जा रही है.

भारतीय जनता पार्टी लगातार डैमेज कंट्रोल की कोशिश कर रही है लेकिन विनोद सोनकर के ख़िलाफ़ ब्राह्मण समाज की नाराज़गी कम होती नज़र नहीं आ रही है.

कौशांबी में कार्यरत प्रोफे़सर विवेक निराला कहते हैं, “विनोद सोनकर को लेकर स्थानीय लोगों में नाराज़गी है क्योंकि कौशांबी में अपेक्षित विकास नहीं हुआ. उनकी उपलब्धता भी क्षेत्र में कम रही है. वायरल वीडियो से जातिगत नाराज़गी बढ़ी है."

"अमित शाह की रैली में कुंडा विधायक राजा भैया शामिल नहीं हुए इससे पता चलता है कि ब्राह्मण, बनिया ही नहीं ठाकुर मतदाता भी विनोद सोनकर से नाराज़ हैं. जातिगत नाराज़गी का नुक़सान भाजपा और प्रत्याशी दोनों को उठाना पड़ सकता है.”

वायरल वीडियो ने बिगाड़ा बीजेपी का समीकरण?

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विनोद सोनकर बीजेपी के कमल निशान के सहारे तीसरी बार सांसद बनने की दौड़ में शामिल हैं लेकिन वायरल वीडियो ने सांसद समेत भारतीय जनता पार्टी की चिंता को बढ़ा दिया है.

वायरल वीडियो में विनोद सोनकर ब्राह्मण, बनिया और ठाकुर जातियों पर टिप्पणी करते नज़र आ रहे हैं. उत्तर प्रदेश में तीनों जातियां बीजेपी की कोर वोटर मानी जाती हैं.

सराय अकिल निवासी व्यापारी राकेश जैन कहते हैं, “मेरे पास स्क्रीनटच मोबाइल नहीं है. मैंने अपने लड़के के मोबाइल में विनोद सोनकर का वीडियो देखा. जिस तरह उन्होंने बनिया समाज को गाली दी यह किसी सांसद की भाषा नहीं हो सकती. इस बार व्यापारी खुलेगा नहीं लेकिन परिवर्तन के लिए वोट करेगा.”

हालांकि, कई वीडियो वायरल होने के बाद डैमेज कंट्रोल में जुटे बीजेपी प्रत्याशी विनोद सोनकर ने इस मामले में कौशांबी पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर एफ़आईआर दर्ज करने की अपील की है.

विनोद सोनकर ने पत्र में कहा है, “छवि धूमिल करने एवं राजनैतिक नुक़सान करने के लिए विपक्षियों से मिलकर कुछ षड्यंत्रकारी लोग फ़र्ज़ी वीडियो बनाकर प्रतिदिन नया-नया वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर रहे हैं जिसकी जांच करा कर दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध क़ानूनी कार्रवाई किया जाना नितांत आवश्यक है.”

इस मामले में कौशांबी पुलिस अधीक्षक बृजेश श्रीवास्तव ने बीबीसी से कहा कि “मामले की गहन जांच चल रही है लेकिन 4 जून से पहले हम आधिकारिक रूप से कुछ कह नहीं सकते. मामला चुनाव आयोग के समक्ष विचाराधीन है.”

विरोध में उतरे पार्टी के ही नेता

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इमेज कैप्शन, शशिभूषण उर्फ बालम द्विवेदी

कौशांबी में कुछ समय पहले से बीजेपी के ब्राह्मण नेता शशिभूषण उर्फ बालम द्विवेदी ने बीजेपी सांसद के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है. गांव-गांव जाकर ब्राह्मण मतदाताओं से बीजेपी के ख़िलाफ़ मतदान करने की अपील कर रहे हैं.

शशिभूषण कहते हैं, “ब्राह्मणों पर टिप्पणी करने के कारण ब्राह्मण विनोद सोनकर के ख़िलाफ़ हैं. दस साल से ब्राह्मण विनोद सोनकर को जिता रहे हैं. ब्राह्मण और बनिया भाजपा के मूल वोटर हैं लेकिन यदि दोनों जातियां भाजपा को वोट नहीं करती हैं तो निश्चित तौर पर भाजपा को नुकसान होगा.”

विनोद सोनकर ने मांगी माफ़ी

वहीं दूसरी तरफ़ नुक़सान होता देख कौशांबी के ओसा में प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन में मंच से विनोद सोनकर ने हाथ जोड़कर माफ़ी मांगते हुए कहा, “पिछले दस सालों में मेरे मन, कर्म और वचन से किसी को पीड़ा पहुंची हो तो मैं आज प्रबुद्धजन को साक्षी मान कर, आप सबसे हाथ जोड़कर माफ़ी मांगता हूं, क्षमा चाहता हूं. जिन लोगों ने मुझे नज़दीक से देखा है वे जानते हैं.. न मैं जातिवादी हूँ, न परिवारवादी हूँ, न मैं भ्रष्टाचारी हूँ, मैं सिर्फ़ विकासवादी हूँ.”

कौशांबी जनपद के वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र पांडे मानते हैं कि ब्राह्मण सभा में माफ़ी मांगने से विनोद सोनकर को कुछ ख़ास फ़ायदा नहीं होगा.

रवींद्र पांडे कहते हैं, “यहां पार्टी से नहीं व्यक्ति विशेष से नाराज़गी है. सांसद जी का बीच-बीच में जो वीडियो आ रहा है उससे ब्राह्मण और बनिया समाज के सम्मान पर ठेस पहुंची है. वीडियो वायरल होने के बाद 50 से 60 फ़ीसदी ब्राह्मण और बनिया मतदाता इनसे कट गए हैं. इनसे वही जुड़ा है जो आंख बंद करके पार्टी से जुड़ा है. यही कारण है कि कई जगह सांसद महोदय को विरोध का सामना करना पड़ रहा है.”

क्यों अहम है कौशांबी सीट?

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कौशांबी के लिए यह महज़ चौथा लोकसभा चुनाव है. साल 1997 से पहले कौशांबी इलाहाबाद ज़िले का हिस्सा हुआ करता था. 2009 से पहले इस लोकसभा सीट का नाम चायल था और तब भी सुरक्षित थी सीट.

2009 में पुनर्गठन हुआ तो कुछ विधानसभा बदली और नाम कौशांबी कर दिया गया था. चायल से धर्मबीर सांसद रहे थे जो इंदिरा गांधी की सरकार में उप मंत्री थे. शैलेंद्र उनके बेटे हैं जो ख़ुद चायल से सांसद रहे थे.

यह सीट कई मायनों में राजनीतिक रूप से अहम है. उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का गृह जनपद है. इस समय यहां से देश के युवा उम्मीदवारों में एक समाजवादी पार्टी के 25 वर्षीय पुष्पेंद्र सरोज दो बार के बीजेपी सांसद 54 वर्षीय विनोद सोनकर के सामने मैदान में हैं.

दूसरी ओर इस क्षेत्र को सदियों से बौद्ध, जैन, हिंदू और मुस्लिम धर्म के उपासना स्थल के रूप में भी जाना जाता रहा है. कौशांबी के गढ़वा में बौद्ध विहार, पभोसा में जैन मंदिर, कड़ा में शीतला माता मंदिर और कड़ा में मध्य युग के कवि मलूक दास का आश्रम स्थल है.

इतने तीर्थ स्थलों के साझा संगम होने के बावजूद उतर प्रदेश में कौशांबी को पिछड़े और उपेक्षित ज़िलों की श्रेणी में गिना जाता रहा है.

कौशांबी बेरोज़गारी, पलायन, पेयजल के संकट और बालू खनन में वर्चस्व की लड़ाई को लेकर आए दिन चर्चा में बना रहता है. कौशांबी की अधिकांश भूमि कृषि योग्य है. धान-गेहूं जैसी प्रमुख फसलें किसान पैदा करते हैं.

पूर्वांचल की राजनीति पर नज़र रखने वाले बाबा अवस्थी कहते हैं, “पहली बात यह कि विनोद सोनकर दो बार के सांसद हैं और अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष हैं. दूसरी बात भौगोलिक रूप से देखेंगे तो कौशांबी लोकसभा में तीन विधानसभा कौशांबी और दो विधानसभा प्रतापगढ़ की आती हैं. दूसरी तरफ़ इंडिया गठबंधन की ओर से मायावती की सरकार में दूसरे नंबर के नेता रहे इन्द्रजीत सरोज का बेटा समाजवादी पार्टी से लड़ रहा है. इसलिए कौशांबी की सीट दलित राजनीति के लिए एक बहुत बड़ा आकर्षण हो गई है.”

उप-मुख्यमंत्री का गृह जनपद

केशव प्रसाद मौर्य

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कौशांबी लोकसभा सीट (सुरक्षित) दलित और ओबीसी बाहुल्य है. इस लोकसभा के अंतर्गत आने वाली कुल पांच विधानसभा सीटों में तीन सामान्य और दो सुरक्षित हैं.

विधानसभा चुनाव 2022 में कौशांबी की तीनों सीटों सिराथू, मंझनपुर और चायल पर एसपी ने जीत दर्ज की थी, वहीं प्रतापगढ़ जनपद की दो सीटों कुंडा और बाबागंज पर बाहुबली नेता रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक का कब्ज़ा है. हालांकि कौशांबी की सिराथू सीट से एसपी विधायक पल्लवी पटेल और चायल सीट से एसपी विधायक पूजा पाल इस समय एसपी छोड़ चुकी हैं.

दिलचस्प है कि पिछले विधानसभा चुनाव में कौशांबी की सिराथू विधानसभा सीट से एसपी प्रत्याशी पल्लवी पटेल से हारने के बाद भी केशव प्रसाद मौर्य को बीजेपी ने उप-मुख्यमंत्री बनाया.

राजनीतिक जानकारों की मानें तो बीजेपी ने प्रदेश में ग़ैर-यादव ओबीसी जातियों में अहम भूमिका अदा करने वाली मौर्य जाति को साधने के लिए केशव प्रसाद मौर्य को उप-मुख्यमंत्री बनाया था.

बाबा अवस्थी कहते हैं, “केशव प्रसाद मौर्य बजरंग दल के बुनियादी प्लेयर हैं और अशोक सिंहल के शिष्य हैं. केशव प्रसाद गैर-यादव ओबीसी राजनीति में एक बड़ा नाम हैं. यह अलग बात है कि विरोधी लहर की वजह से वे विधानसभा चुनाव हार गए थे. वे सनातन धर्मावलम्बी हैं, साधू महात्माओं की सेवा में रहते हैं, साधु समाज में उनकी स्वीकार्यता भी ठीक-ठाक है. जो भाजपा को चाहिए उस सेंटीमेंट को भी पूरा करते हैं. इसलिए उन्हें एमएलसी बनाकर उप मुख्यमंत्री बनाया गया.”

पाल और कुर्मी मतदाताओं के हाथ में कौशांबी की चाबी?

पल्लवी पटेल एसपी छोड़कर पीडीएम का चुनाव प्रचार कर रही हैं

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कौशांबी लोकसभा में दो ओबीसी जातियां कुर्मी और पाल निर्णायक भूमिका अदा करती हैं.

एसपी ने विधानसभा चुनाव में इन दोनों जातियों से आने वाले मतदाताओं को साधने के लिए सिराथू से पल्लवी पटेल और चायल से पूजा पाल को प्रत्याशी बनाया था.

दोनों सीटों पर एसपी ने जीत दर्ज की थी लेकिन हाल ही में पल्लवी पटेल ने एसपी छोड़ दी. वो कौशांबी से अपना दल (कमेरावादी) और एआईएमआईएम के गठबंधन पीडीएम के लिए चुनाव प्रचार कर रही हैं.

वहीं चायल सीट से एसपी विधायक पूजा पाल ने राज्यसभा में बीजेपी उम्मीदवार को वोट कर बीजेपी में जाने का संकेत दे दिया था.

समाजवादी पार्टी की चिंता

पल्लवी पटेल के एसपी में न होने से एसपी को कुर्मी मतों में बिखराव की चिंता सता रही है.

बीजेपी ज़िला प्रभारी यशपाल सिंह पटेल मानते हैं कि पल्लवी पटेल के एसपी से दूर जाने से बीजेपी को फ़ायदा हो रहा है.

वो कहते हैं, “पल्लवी पटेल के सपा में न होने से सपा को नुक़सान उठाना पड़ेगा. जो वोट सपा को जाता है वो सपा से कटेगा. यदि अपना दल (कमेरावादी) का प्रत्याशी दो हज़ार वोट भी पाता है तो वह सपा का ही वोट होगा.”

क्या है कौशांबी सीट पर राजा भैया फैक्टर?

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इमेज कैप्शन, रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले में सीमित बाहुबली विधायक कुंवर रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया कुंडा सीट से साल 1993 से लगातार विधायक हैं और बगल की सुरक्षित बाबागंज सीट पर उनके क़रीबी विनोद कुमार कई बार के विधायक हैं.

राजा भैया की गिनती पूर्वांचल में ठाकुरों के नेता के रूप में होती है. प्रतापगढ़ के बाहर कौशांबी में राजा भैया का हस्तक्षेप तब बढ़ा जब 2008 में कौशांबी लोकसभा का गठन हुआ और उसमें प्रतापगढ़ की कुंडा और बाबागंज विधानसभाओं को शामिल किया गया.

पिछले लोकसभा चुनाव में राजा भैया ने जनसत्ता दल लोकतांत्रिक से अपने क़रीबी शैलेन्द्र कुमार पासी को चुनाव मैदान में उतारा था. जिस चुनाव में शैलेन्द्र कुमार एक लाख 56 हज़ार 406 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे थे.

चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही यह चर्चा तेज़ थी कि राजा भैया कौशांबी लोकसभा से अपने क़रीबी शैलेन्द्र कुमार पासी को बीजेपी का टिकट दिलवाना चाहते हैं लेकिन अंत में बीजेपी ने दो बार के सांसद विनोद सोनकर पर विश्वास जताते हुए उन्हें अपना प्रत्याशी बना दिया.

कौशांबी लोकसभा की चर्चा तब और तेज़ हुई जब बेंगलुरु में गृह मंत्री अमित शाह और राजा भैया के बीच एक घंटे तक बातचीत होने की ख़बर मीडिया में आई. वहीं दूसरी तरफ़ कुछ दिन बाद ही कुंडा में अमित शाह की रैली में मंच पर राजा भैया नज़र नहीं आए. जबकि अमित शाह की मुलाक़ात के बाद माना जाता रहा कि अमित शाह की रैली में शामिल होकर राजा भैया बीजेपी प्रत्याशी के लिए वोट की अपील करेंगे.

कौशांबी चौराहे पर रैली से एक दिन पूर्व आत्मविश्वास से भरे विश्व हिंदू परिषद के एक पदाधिकारी ने कहा था, “देखिएगा, कल अमित शाह जी की कुंडा में रैली है, मंच पर अमित शाह के बगल दोनों हाथ बांधे राजा भैया खड़े मिलेंगे.”

इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कौशांबी में बीजेपी की जीत के लिए राजा भैया का समर्थन कितना ज़रूरी है.

वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा कहते हैं, “राजा भैया का कौशांबी लोकसभा में आने वाली कुंडा और बाबागंज विधानसभा क्षेत्रों में अच्छा प्रभाव है. इन क्षेत्रों में उनके एक इशारे पर वोटिंग होती है. सपा या भाजपा दोनों चुनावी वैतरणी पार करने के लिए उनके दरवाज़े पर जाते रहते हैं लेकिन इस बार उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को संदेश दिया है कि वो जहां चाहें वोट करें.”

वे आगे कहते हैं, “इस संदेश का अर्थ यही है कि वे खुलकर न सपा के साथ हैं और न ही भाजपा के साथ हैं. हो सकता है कि भविष्य के किसी चुनाव को लेकर कोई रणनीति हो. यदि राजा भैया का समर्थन सपा को मिल जाता है तो निश्चित रूप से भाजपा के लिए कौशांबी का चुनाव कठिन हो जाएगा.”

जातिगत समीकरण

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इमेज कैप्शन, समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी पुष्पेंद्र सरोज

राजनीतिक दलों के अनुमानित आंकड़ों की मानें तो कौशांबी लोकसभा में कुल सात लाख दलित मतदाता हैं, जिसमें पासी मतदाता लगभग डेढ़ लाख और खटीक मतदाता लगभग एक लाख हैं.

समाजवादी पार्टी ने यहां से पासी मतदाताओं को साधने के लिए पूर्व मंत्री और कौशांबी विधायक इन्द्रजीत सरोज के बेटे पुष्पेंद्र सरोज को मैदान में उतारा है. वहीं बीजेपी ने खटीक मतदाताओं को साधने के लिए दो बार के सांसद विनोद सोनकर को मैदान में उतारा है.

जबकि बहुजन समाज पार्टी ने 2019 में रिटायर्ड अफ़सर शुभ नारायण गौतम को प्रत्याशी बनाया है.

लेकिन राजनीतिक लोग मानते हैं कि शुभ नारायण कौशांबी सीट पर बीजेपी को टक्कर नहीं दे रहे हैं.

अपनी उम्मीदवारी और चुनाव की तैयारियों को लेकर इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी पुष्पेंद्र सरोज बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "हर चुनाव एक मुश्किल चुनाव होता है, हर चुनाव एक चुनौती होती है. हमारी तैयारी पूरी है. हम जहां से चुनाव लड़ रहे हैं वहां अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र हैं, इसलिए हम सोशल मीडिया कैंपेन तो कर ही रहे हैं साथ ही डोर टू डोर कैंपेन भी कर रहे हैं. हमारा विश्वास कैडर बेस राजनीति में ज़्यादा है."

कौशांबी लोकसभा में ब्राह्मण मतदाता लगभग 1 लाख 40 हज़ार, वैश्य मतदाता लगभग 1 लाख 20 हज़ार, ठाकुर मतदाता लगभग एक लाख, पाल मतदाता लगभग एक लाख, मुस्लिम मतदाता लगभग 2 लाख 50 हज़ार, पटेल मतदाता लगभग 1 लाख 30 हज़ार, मौर्य मतदाता लगभग 1 लाख 15 हज़ार, लोधी मतदाता लगभग 60 हज़ार और यादव मतदाता लगभग 1 लाख 40 हज़ार हैं.

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