महुआ मोइत्रा कृष्णनगर सीट पर कितनी हैं मज़बूत, बीजेपी की अमृता राय कैसे दे रही हैं टक्कर?

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कृष्णनगर, पश्चिम बंगाल से, बीबीसी हिन्दी के लिए
पश्चिम बंगाल में चौथे चरण में, 13 मई को जिन आठ सीटों पर मतदान होना है उनमें से नदिया ज़िले की कृष्णनगर सीट काफ़ी अहम है.
यहां से तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा मैदान में हैं. वो तृणमूल कांग्रेस की तेज़ तर्रार नेताओं में से एक हैं.
महुआ संसद में अपनी बात रखने और सत्ता पक्ष से सवाल पूछने के लिए अक्सर सुर्ख़ियों में रहती हैं. उन्हें बीते साल के आख़िर में नक़दी के बदले सवाल पूछने के आरोप में संसद की सदस्यता गंवानी पड़ी थी. ये मामला अब भी अदालत में है.
अब कृष्णनगर से महुआ चुनाव लड़ रही हैं, जहां असली लड़ाई तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा और बीजेपी उम्मीदवार अमृता राय के बीच है. अमृता राय, 16वीं शताब्दी के राजा कृष्णदेव राय के ख़ानदान से हैं.
हालांकि, सीपीएम का दावा है कि लोग इन दोनों राजनीतिक दलों की असलियत समझ गए हैं. इसलिए इस बार विकल्प के तौर पर वाम-कांग्रेस के साझा उम्मीदवार को ही चुनेंगे.
तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार महुआ मोइत्रा सांसद के तौर पर अपने कामकाज और ममता बनर्जी सरकार की कल्याण योजनाओं के सहारे जीत की उम्मीद कर रही हैं. लेकिन बीजेपी का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस के सांसद के पास गिनाने लायक कोई काम ही नहीं है. इसी वजह से वह पलासी जैसे तीन सौ साल पुराने मुद्दे को उखाड़ रही है.
पार्टी इस बार 25 साल पुराने इतिहास को दोहराने का दावा कर रही है. साल 1999 में बीजेपी के सत्यब्रत मुखर्जी यहां से चुनाव जीत चुके हैं.
लेकिन साल 2009 से यहां तृणमूल कांग्रेस ही जीतती रही है.
तीनों उम्मीदवार कर रहे हैं जीत का दावा

कृष्णनगर में मैदान में उतरे तीनों प्रमुख उम्मीदवार अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं. इसके लिए उन्होंने आख़िरी चरण में अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है. लेकिन बांग्लादेश की सीमा से सटे नदिया के इस ज़िला मुख्यालय में जीवन सामान्य नज़र आता है.
राज्य के दूसरे इलाक़ों की तरह यहां ज़्यादा चुनावी गहमागहमी नहीं नज़र आती.
शहर में रोज़मर्रा का जीवन और ट्रैफ़िक जाम की समस्या जस की तस है.
पोस्टर, बैनर और झंडे भी बंगाल के दूसरे इलाक़ों के मुक़ाबले कम ही दिखते हैं.
कुछ जगहों पर दीवारों पर उम्मीदवारों के समर्थन में वोट मांगे गए हैं. इन तीनों पार्टियों यानी तृणमूल कांग्रेस, बीजेपी और सीपीएम के ज़िला कार्यालय में भी वैसा कुछ नज़र नहीं आता जिससे लगे कि महज़ चंद दिनों बाद ही यहां मतदान होना है.
शहर में चुनाव के प्रति एक अजीब सी उदासीनता नज़र आती है. इससे लगता है कि चुनावी नतीजे या अपनी जीत को लेकर तीनों उम्मीदवार शायद अति आत्मविश्वास के शिकार हैं.
तीनों पार्टियों से जुड़े स्थानीय नेताओं से बातचीत में भी यही बात झलकती है.
कैसा है दोनों ख़ेमों का हाल?

महुआ मोइत्रा के चुनावी कार्यालय में प्रवेश करते ही कुछ लोग झंडों और बैनरों के पैकेट बनाते नज़र आते हैं. अभी इनको दूसरे इलाक़ों में भेजा जाना है.
महुआ के चुनाव एजेंट सोहम चक्रवर्ती कहते हैं, "महुआ की जीत तय है. भाजपा को पहले तो कोई उम्मीदवार ही नहीं मिल रहा था. उसने राजमाता कहलाने वाली एक महिला को खड़ा किया है. लेकिन उनका राजनीति से कोई संबंध नहीं है. इस बार हमारी जीत का अंतर एक लाख से भी ज़्यादा होगा."
बीजेपी के दफ़्तर में पहुंचने पर पता चलता है कि ज़्यादातर लोग उम्मीदवार अमृता राय के समर्थन में अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती के रोड शो में शामिल होने के लिए पलासी के पास देवग्राम गए हैं.
पार्टी के पूर्व ज़िला अध्यक्ष कल्याण नंदी दावा करते हैं, "हम इस बार यहां जीतेंगे. बीते कई चुनावों में हमारा वोट प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है. पिछली बार हम दूसरे स्थान पर थे. लेकिन तृणमूल कांग्रेस सरकार के कामकाज और घपलों-घोटालों ने उस अंतर को पाट दिया है. इस बार जीत तय है."
इस चुनाव में स्थानीय समस्याओं के अलावा वर्ष 1657 में हुई पलासी की लड़ाई भी एक मुद्दा है. पलासी कृष्णनगर से क़रीब 54 किलोमीटर दूर है. जहां यह लड़ाई हुई थी वहां अब एक युद्ध स्मारक खड़ा है.
अमृता राय के बीजेपी उम्मीदवार बनते ही तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया था ब्रिटिश सेना के ख़िलाफ़ बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की लड़ाई के दौरान राजा कृष्णचंद्र ने ब्रिटिश सैनिकों की सहायता की थी.
हालांकि, अमृता ने उसी समय यह कहते हुए इसका जवाब दिया था कि महाराजा ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए ऐसा किया था.

लेकिन क्या इस मुद्दे का कोई चुनावी असर पड़ेगा? बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष कल्याण नंदी कहते हैं, "15 साल से यहां से टीएमसी का सांसद रहा है. लेकिन उसके पास अपने सांसद का कोई काम गिनाने के लिए नहीं है. इसलिए पार्टी चुनाव में पलासी की लड़ाई को ले आई है. बाद में शायद पानीपत की पहली लड़ाई को भी ला सकती है. तीन सौ साल पहले हुई उस लड़ाई के समय का कोई वोटर यहां नहीं है. नई पीढ़ी उससे काफ़ी आगे निकल चुकी है."
इस संसदीय क्षेत्र में मतुआ वोटरों की भी ख़ासी तादाद है. बीजेपी को उनका पूरा समर्थन मिलने की उम्मीद है.
महुआ की संसद सदस्यता का मुद्दा
यह चुनाव महुआ और अमृता के साथ संबंधित दलों के लिए भी नाक और साख़ का सवाल बन गया है. पैसे लेकर सवाल पूछने के आरोप में महुआ की संसद सदस्यता रद्द कर दी गई थी वो जीतकर इसका जवाब देना चाहती हैं.
दूसरी ओर, अमृता राय के साथ उनकी विरासत और बीजेपी की साख़ जुड़ी है. उनकी विरासत के ज़रिए बीजेपी यहां 25 साल पुराना इतिहास दोहराना चाहती है. साल 1999 में यहां पार्टी के सत्यब्रत मुखर्जी जीते थे. पिछली बार पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी.
लेकिन सीपीएम के ज़िला सचिव सुमित दे कहते हैं, "राज्य के लोग भाजपा और टीएमसी की ध्रुवीकरण की राजनीति समझ गए हैं. उनको समझ में आ गया है कि यह दोनों पार्टियां एक जैसी हैं और इनकी कोई नीति या सिद्धांत नहीं है. इनमें से एक अगर चोर है तो दूसरी डकैत. वाम-कांग्रेस गठबंधन से लोगों को तीसरा विकल्प मिल गया है. ज़िले में हमारे दोनों उम्मीदवारों (कृष्णनगर और रानाघाट) की जीत तय है. इस बार मुक़ाबला तिकोना है, दो-दलीय नहीं."
वह कहते हैं कि दोनों दलों में इतना घालमेल है कि यह समझ में नहीं आता कि कौन नेता कब किस पार्टी में शामिल हो जाएगा. दोनों दलों ने दल-बदलुओं को टिकट दिए हैं.
क्या कह रहे हैं आम लोग?
आम लोग इसे किस रूप में देख रहे हैं? पलासी युद्ध स्मारक के सामने एक चाय दुकान पर बैठे मस्तम शेख़ बताते हैं, "जीतेगी तो महुआ ही. उन्होंने इलाके़ में बढ़िया काम किया है और लोगों का ध्यान रखा है."
एक सवाल पर उनका कहना था कि 'मैं राजमाता (भाजपा उम्मीदवार अमृता राय) को नहीं जानता.'
कृष्णनगर में बुद्धिजीवी लेखक सुबीर सिंह राय कहते हैं, "मेरा महुआ से कोई ख़ास परिचय नहीं है. रानी मां अमृता राय से मेरे पारिवारिक संबंध हैं. लेकिन उनका चुनाव मैदान में नहीं उतरना ही बेहतर होता. कृष्णनगर में सिर्फ़ राजबाड़ी या राजपरिवार की विरासत के नाम पर जीतना मुश्किल है. महुआ में सही तरीके़ से विरोध करने का साहस है. इसलिए मैं निजी तौर पर उनका समर्थन करता हूं."
शिक्षक अरूप सरकार कहते हैं, "कौन जीतेगा, यह तो कहना मुश्किल है. यहां टीएमसी और बीजेपी का चुनाव प्रचार ही ज़्यादा देखने को मिल रहा है. यहां इन दोनों दलों में ही मुख्य मुक़ाबला है."

नौकरीपेशा महिला तनुश्री सेन कहती हैं, "मुझे लगता है कि इस बार भी महुआ मोइत्रा ही जीतेंगी. उन्होंने लोगों की समस्याओं को सुलझाने की दिशा में पहल की है. मेरी राय में इस बार चुनावी मुक़ाबले में महुआ आगे हैं. हालांकि अब भी शहर में कई समस्याएं हैं. लेकिन महुआ ने उनके समाधान का वादा किया है."
कृष्णनगर के वरिष्ठ पत्रकार अमित घोष कहते हैं, "वर्ष 2019 में तृणमूल कांग्रेस यहां 63 हज़ार से ज़्यादा वोटों के अंतर से जीती थीं. लेकिन वर्ष 2021 के विधानसभा नतीजों को ध्यान में रखे तो यहां उसे 1.03 लाख वोटों की बढ़त मिली थी. इस लिहाज़ से टीएमसी बढ़त की स्थिति में है. इस संसदीय क्षेत्र में विधानसभा की सात सीटें हैं. उनमें से कृष्णनगर समेत दो सीटों पर भाजपा मज़बूत नजर आती है. लेकिन बाक़ी पांच पर तृणमूल कांग्रेस मज़बूत है. अब कौन जीतेगा, इसका पता तो चार जून को ही चलेगा."
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