अभिषेक बनर्जी: ममता बनर्जी की पार्टी में कॉर्पोरेट कल्चर लाने वाले उत्तराधिकारी

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- Author, शुभज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की शीर्ष नेता ममता बनर्जी आज भी कोलकाता के कालीघाट इलाके में स्थित खपरैल वाले पैतृक मकान से ही तमाम राजनीतिक गतिविधियां चलाती हैं.
हरीश चटर्जी रोड नामक जिस सड़क के किनारे ममता बनर्जी का मकान है, वहां मूल रूप से निम्न मध्य वर्ग के लोग ही रहते हैं. उस सड़क के पीछे ही आदिगंगा का गंदा पानी बहता है.
कुछ साल पहले तक बदबू के चलते वहां ठहरना मुश्किल था. लेकिन ममता बनर्जी आज तक उस साधारण मकान को छोड़ कर कहीं और रहने नहीं गईं.
बीते 13 साल से लगातार मुख्यमंत्री रहने के दौरान वो उसी मकान से तमाम प्रशासनिक कामकाज करती रही हैं.
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कालीघाट स्थित इसी मकान में आए थे और ममता बनर्जी की मां का पांव छू कर प्रणाम किया था. उस सड़क से कुछ दूर आगे बढ़ने पर दक्षिण कोलकाता के एक संभ्रांत मोहल्ले में हरीश मुखर्जी स्ट्रीट स्थित 'शांतिनिकेतन' नामक एक आलीशान इमारत में अभिषेक बनर्जी सपिरवार रहते हैं.
अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक ताक़त

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अभिषेक बनर्जी के घर के सामने चौबीसों घंटे पुलिस का पहरा रहता है. उस सड़क से होकर रैली वगैरह निकालने की बात तो दूर, कोई बाहरी व्यक्ति भी उस इमारत में ताकझांक नहीं कर सकता.
रिश्ते में वो ममता बनर्जी के भतीजे हैं और दक्षिण 24-परगना ज़िले की डायमंड हार्बर सीट से लगातार दो बार सांसद रह चुके हैं.
अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक क़द और ताक़त का अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है, पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने अब तक 41 सीटों पर अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी है, जिस एक सीट पर पार्टी अब तक अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं कर सकी है, वो है डायमंड हार्बर की सीट.
इसको लेकर तमाम तरह की राजनीतिक चर्चाओं का दौर तब तक जारी रहेगा जब तक कि भाजपी इस सीट से अपने प्रत्याशी की घोषणा नहीं कर देती है.
वैसे 2019 के चुनाव में अभिषेक बनर्जी ने बीजेपी के उम्मीदवार नीलांजन रॉय को तीन लाख 20 हज़ार से अधिक मतों से हराया था.

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अभिषेक बनर्जी वैसे तो तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में यह बात सबको पता है कि वही ममता बनर्जी के अघोषित राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं. अभिषेक भले ही शांतिनिकेतन में रहते हों, पार्टी और राजनीतिक कामकाज के लिए महानगर में उनका एक निजी दफ्तर भी है.
कोलकाता में साहबपाड़ा (अधिकारियों का मोहल्ला) के नाम से परिचित कैमक स्ट्रीट में स्थित एक चमकदार और सामने शीशा लगी बहुमंजिली इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल पर लिखा है, 'आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस.'
अभिषेक का यह दफ्तर बाहर से देखने पर किसी राजनीतिक पार्टी का नहीं बल्कि किसी कॉर्पोरेट ब्रांड का मुख्यालय नजर आता है. यही दफ्तर कोलकाता में कालीघाट के साथ तृणमूल कांग्रेस का समानांतर नर्व सेंटर है.
सबसे बड़ी बात यह है कि चेहरा और चरित्र में कालीघाट के खपरैल वाले मकान और कैमक स्ट्रीट के कॉर्पोरेट दफ़्तर में ज़मीन-आसमान का जो फर्क है, ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक के राजनीतिक दर्शन और काम करने के तरीक़े में भी उतना ही फर्क है.
अभिषेक बनर्जी की छवि बंगाल की 'अग्नि कन्या' के नाम से मशहूर ममता बनर्जी से एकदम अलग है. राज्य की राजनीति में उन्होंने मजबूती से दस्तक दी है, जिसे अंग्रेजी में 'ही हैज अराइव्ड' कहा जाता है.
अब तक का राजनीतिक सफ़र

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अभिषेक बनर्जी का राजनीतिक सफर युवा नामक एक संगठन के ज़रिए शुरू हुआ था. साल 2011 में तृणमूल कांग्रेस के राज्य की सत्ता में आने के कुछ दिनों बाद ही उन्होंने 'युवा' नामक इस संगठन के अध्यक्ष के तौर पर कार्यभार संभाला था. तब उनकी उम्र महज 23 साल थी.
तब 'तृणमूल युवा कांग्रेस' नामक पार्टी की एक युवा शाखा पहले से ही मौजूद थी. इसके बावजूद ममता बनर्जी की हरी झंडी मिलने के बाद ही एक अलग युवा संगठन बना कर उसके नेतृत्व का जिम्मा अभिषेक बनर्जी को सौंपा गया था.
हालांकि इसके कुछ साल बाद 'युवा' का विलय 'तृणमूल युवा कांग्रेस' में हो गया था. साल 2014 में महज 26 साल की उम्र में पहली बार डायमंड हार्बर सीट से जीत कर अभिषेक बनर्जी सोलहवीं लोकसभा में पहुंचने वाले सबसे कम उम्र के सांसद थे.
इस 'युवा' कार्ड का इस्तेमाल उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा में बहुत सजगता और कुशलता से किया है. हाल में वो पार्टी के भीतर नए और पुराने के द्वंद्व को उकसा कर सार्वजनिक रूप से उम्रदराज नेताओं के राजनीति से हटने की दलील देते रहे हैं.
इसके जवाब में उस समय ममता बनर्जी ने भी दलील दी थी कि पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को भी सम्मान और अहमियत मिलनी चाहिए.

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अभिषेक बीते दस साल से सांसद हैं. लेकिन पहले कार्यकाल के मुकाबले, दूसरे कार्यकाल के दौरान उनको राज्य की राजनीति से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर काफ़ी मुखर और सक्रिय देखा गया है.
साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अप्रत्याशित तौर पर 18 सीटों पर कामयाबी मिलने के बाद अभिषेक ने ही चुनाव रणनीतिकार पीके यानी प्रशांत किशोर और उनकी संस्था आईपैक को यहां तृणमूल कांग्रेस के लिए काम करने के लिए बुलाया था.
तब राजनीतिक हलके में यह चर्चा आम थी कि पीके के साथ समझौता करने का फैसला खुद ममता बनर्जी को भी पसंद नहीं था. लेकिन महज दो साल बाद 2021 में विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की ऐतिहासिक कामयाबी से साबित हो गया कि वह फ़ैसला एकदम सही था.
उसके बाद बीते तीन साल के दौरान तृणमूल कांग्रेस में अभिषेक बनर्जी का नियंत्रण और प्रभुत्व लगातार मजबूत हुआ है. पार्टी में उनके अनुयायियों को अहम ज़िम्मेदारियां मिली हैं. अभिषेक ने किसी दौर में ममता को 'डकैतों की रानी' कहने वाले सजायाफ्ता कुणाल घोष को भी तृणमूल कांग्रेस का प्रवक्ता बना दिया.
इसलिए यह अस्वाभाविक नहीं है कि बीते 10 मार्च को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड की रैली में जब राज्य की 42 लोकसभा सीटों के लिए तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवारों के नाम की सूची जारी की गई तो मंच पर ममता बनर्जी की मौजूदगी के बावजूद वह घोषणा अभिषेक बनर्जी ने ही की.
कॉर्पोरेट संस्कृति कायम करना

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मैनेजमेंट के छात्र रहे अभिषेक बनर्जी तृणमूल कांग्रेस के ढीले-ढाले और भावनात्मक चालचलन में एक कॉर्पोरेट अनुशासन कायम करने का प्रयास भी कर रहे हैं.
मुझे याद है कि छह-सात साल पहले बीबीसी के दिल्ली ब्यूरो की ओर से पश्चिम बंगाल की राजनीति पर एक रिपोर्ट के लिए तृणमूल कांग्रेस की प्रतिक्रिया जानने की खातिर मैंने अभिषेक बनर्जी को फोन किया था.
पूरी बात सुनने के बाद अभिषेक ने बेहद शांत और संयत स्वर में कहा था, "दिक़्क़त यह है कि पार्टी ने मुझे प्रवक्ता की जिम्मेदारी नहीं सौंपी है. विभिन्न राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों पर पार्टी का पक्ष रखने के लिए दिल्ली और कोलकाता में हमारे प्रवक्ताओं का पैनल है. कृपया आप उनमें से ही किसी को फ़ोन करें. मैं अगर उनको बाईपास कर इस बारे में कोई टिप्पणी करूं तो एक ग़लत संदेश जाएगा और मैं कभी ऐसा नहीं चाहता."
अभिषेक ने उस दिन कहा था, "मान लें कि बाहर की मीडिया का कोई प्रतिनिधि बीबीसी की प्रतिक्रिया लेने के लिए आपको फोन करता है. इसके लिए निश्चित तौर पर आपका प्रेस ऑफ़िस है. आप तो अचानक बीबीसी की ओर से कोई टिप्पणी नहीं कर सकते. आपकी संस्था में जैसा अनुशासन है, तृणमूल में भी एक सिस्टम है...मुझे माफ़ करें."
मैंने अपने पत्रकारीय करियर में सैकड़ों राजनेताओं के साथ बात की है, लेकिन सवाल से बचने के लिए ऐसा स्मार्ट जवाब या कौशल बहुत कम ही देखा है.
ममता बनर्जी से दूरी

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वो अपने करीबियों से कई बार कह चुके हैं कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी कांग्रेस से टूट कर ही बनी थी. लेकिन कांग्रेस जैसी ढिलाई से संचालन की स्थिति में आगे चलकर पश्चिम बंगाल में तृणमूल की हालत भी कांग्रेस जैसी ही हो जाएगी.
अभिषेक को इस लक्ष्य में काफ़ी हद तक कामयाब कहा जा सकता है. कई बाधाओं के बावजूद पश्चिम बंगाल में आज भी तृणमूल कांग्रेस की मजबूत नींव ममता बनर्जी की निजी लोकप्रियता और पार्टी के मजबूत संगठन पर खड़ी है. इसकी बागडोर पूरी तरह से अभिषेक के हाथों में है.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में हाल के दिनों में सबसे चर्चित सवाल यह रहा है कि क्या ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के बीच सचमुच एक दूरी बन गई है? और अगर हां तो कितनी? इस संदर्भ में एक पुरानी घटना को याद करना शायद प्रासंगिक होगा.
साल 1999 में रेल मंत्री रहने के दौरान ममता बनर्जी एक दिन दिल्ली के एसएस फ्लैट में शाम को चाय-मूढ़ी पर गप मारते हुए अचानक अपने परिवार का जिक्र कर बैठी थीं.
उन्होंने उस दिन कहा था, "मेरा एक भतीजा है. वह इतना बुद्धिमान और मेधावी है कि आपको क्या बताऊं. इस समय वह स्कूल में है. मुझे भरोसा है कि वह माध्यमिक ( पश्चिम बंगाल बोर्ड की दसवीं की परीक्षा) में प्रथम श्रेणी से पास होने की प्रतिभा रखता है. लेकिन सीपीएम को अगर पता चला कि वह मेरा रिश्तेदार है तो कभी ऐसा नहीं होने देगी."

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उस समय तृणमूल कांग्रेस की कट्टर प्रतिद्वंद्वी सीपीएम सत्ता में थी. ममता जिस भतीजे का जिक्र कर रही थी वही अभिषेक बनर्जी थे. इसके करीब 17 साल बाद 2016 में मैं बीबीसी बांग्ला की ओर से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इंटरव्यू के लिए राज्य सचिवालय 'नवान्न' गया था.
उस दिन बातचीत के दौरान राजनीति में भाई-भतीजावाद और परिवारवाद की बात चलते ही ममता की आवाज़ में चिढ़ नजर आई. उन्होंने मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद के पुत्र-पुत्रियों समेत तमाम परिवारजनों को सांसद और विधायक बनाने की ओर इशारा करते हुए कहा था, "बिहार और यूपी में तो कई लोगों को राजनीति में लाने में कोई दोष नहीं है और मैं अगर महज एक व्यक्ति के लिए कुछ करती हूं तो शोर मचने लगता है!"
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री उस दिन जिस 'एक व्यक्ति' का जिक्र कर रही थी, वह कोई और नहीं बल्कि अभिषेक बनर्जी ही थे. ममता के करीबियों को यह बात अच्छी तरह पता है कि संयुक्त परिवार में पले-बढ़े अपने भाई की इस औलाद के प्रति ममता के मन में भारी कमजोरी है.
तृणमूल कांग्रेस के संचालन के दौरान विभिन्न मुद्दों पर बुआ और भतीजे में मतभेद ज़रूर हुए हैं. लेकिन साल बाद भी दोनों के निजी संबंधों में कोई दरार नहीं आई है.
इन दोनों को नजदीक रहे तृणमूल कांग्रेस के कई नेता निजी बातचीत में मानते हैं कि दोनों के बीच मतभेद मूल रूप से नीतिगत हैं. निजी स्तर पर इस मतभेद की कोई छाया नहीं पड़ी है. इसी वजह से इस बात में संदेश की कोई गुंजाइश नहीं है कि आज की तारीख में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी ही हैं.
भ्रष्टाचार के संगीन आरोप

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फिलहाल अभिषेक बनर्जी अपने राजनीतिक करियर के सबसे जटिल दौर से गुजर रहे हैं. विपक्षी दलों का आरोप है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के ख़िलाफ़ एक के बाद एक भ्रष्टाचार के आरोप सामने आ रहे हैं वो दरअसल तृणमूल के सेनापति अभिषेक बनर्जी की ओर ही अंगुली उठा रहे हैं.
राज्य के चुनाव में विपक्षी पार्टियां लगातार इस बात का प्रचार करती रही हैं कि पार्थ चटर्जी, अणुब्रत मंडल और ज्योतिप्रिय मल्लिक जैसे पार्टी के जो ताक़तवर नेता फ़िलहाल जेल में हैं उनकी ओर से की गई 'लूट का हिस्सा' असल में 'शांतिनिकेतन' तक ही पहुंचता था.
इसके अलावा कोयला और पशुओं की तस्करी के विभिन्न मामले में ईडी और सीबीआई उनसे कई बार पूछताछ कर चुकी है. भाजपा नेता यह आरोप भी लगा चुके हैं कि अभिषेक बनर्जी की पत्नी (जो थाई नागरिक हैं) के बैंकॉक से लौटते समय कोलकाता एयरपोर्ट पर सोने की तस्करी के मामले में पकड़ी गईं थीं. अभिषेक की पत्नी से भी केंद्रीय एजेंसियों ने कई बार पूछताछ की है.
अभिषेक बनर्जी की स्वामित्व वाली रहस्यमय कंपनी 'लिप्स एंड बाउंड्स' पर सैकड़ों करोड़ के कारोबार का अरोप है, ये कारोबार कैसे हुआ, इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. इस कंपनी से जुड़े अभिषेक बनर्जी के करीबी सुजय कृष्ण भद्र उर्फ कालीघाट काकू के ख़िलाफ़ ईडी ने आरोप पत्र दायर कर दिया है.

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यह सही है कि अब तक कोई केंद्रीय एजेंसी किसी मामले में सीधे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ ठोस आरोप नहीं लगा सकी है. लेकिन राजनीतिक रूप से उनको भ्रष्टाचार के कई आरोपों का सामना करना पड़ रहा है.
अभिषेक ने बीते कुछ महीनों से केंद्र सरकार पर पलटवार का रास्ता चुन लिया है. केंद्र सरकार सौ दिनों के काम योजना (मनरेगा) के तहत काम कराने के बावजूद राज्य के लोगों का पैसा नहीं दे रही है, यह आरोप लगाते हुए अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस दिल्ली में धरना भी दे चुकी है.
इसी मुद्दे पर राज्य में लगातार विरोध-प्रदर्शन किया जा रहा है. इस अभियान का नेतृत्व अभिषेक के पास ही है. वैसे अभिषेक अपने राजनीतिक करियर के अहम दौर से गुजर रहे हैं.
अगर अभिषेक के ख़िलाफ़ लगे भ्रष्टाचार के आरोप आने वाले दिनों में अदालत उनको दोषी क़रार दे या सजा दे दे तो वो जिस तरह बंगाल की राजनीति में धूमकेतु की तरह उदित हुए थे उसी तरह अस्त भी हो सकते हैं.
दूसरी ओर, अगर इन तमाम आरोपों को साबित नहीं किया जा सका और आगामी लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहे तो 36 साल के इस युवक को रोकना लगभग असंभव होगा.
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)
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