अभिषेक बनर्जी: पश्चिम बंगाल में मोदी और शाह के निशाने पर रहने वाले ममता बनर्जी के भतीजे

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
अगस्त, 1990 में कोलकाता के कालीघाट स्थित हरीश चटर्जी स्ट्रीट में दो साल का एक गोरा-चिट्टा बच्चा हाथ में कांग्रेस का झंडा लेकर नारे लगा रहा था. वह राहगीरों से बार-बार सवाल कर रहा था कि मेरी दीदी को क्यों मारा?
दरअसल जो महिला उस दिन सीपीएम के कैडरों के हाथों मार खाकर गंभीर रूप से घायल हो गई थी वह उस बच्चे की दीदी नहीं बल्कि बुआ थीं. लेकिन सबको दीदी कहते सुनकर वह भी तब बुआ को दीदी ही कहता था.
वह महिला थीं ममता बनर्जी और वह बच्चा था उनका भाईपो यानी भतीजा अभिषेक बनर्जी. हाल में खुद ममता बनर्जी ने ही पहली बार पत्रकारों को यह बात बताई थी.
दो साल का वह बच्चा आज पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में सबसे ताक़तवर नेता के तौर पर उभरा है. इसके साथ ही वह पार्टी छोड़ने वाले नेताओं के अलावा बीजेपी के तमाम नेताओं के हमलों के केंद्र में भी है.

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मोदी-शाह के भाषणों में भी ज़िक्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या फिर गृह मंत्री अमित शाह या फिर पार्टी का दूसरा कोई नेता, उनके भाषणों में कई बार इस भाईपो का नाम आता रहा है.
अभिषेक बनर्जी पश्चिम बंगाल में दक्षिण 24-परगना ज़िले की डायमंड हार्बर सीट से टीएमसी सांसद और मौजूदा विधानसभा चुनाव में ममता के बाद पार्टी के दूसरे बड़े स्टार प्रचारक हैं. यह अभिषेक ही थे जो बीते लोकसभा चुनावों में बीजेपी की ओर से लगे झटके के बाद चुनाव रणनीतिकार प्रशांत कुमार उर्फ पीके को टीएमसी के खेमे में ले आए थे.
पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं का आरोप है कि टीएमसी में अभिषेक ही आखिरी बात बन गए हैं.
अभिषेक का बढ़ता कद
वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, "कहा जाता है कि कुछ लोग मुंह में सोने का चम्मच लेकर पैदा होते हैं. कम से कम राजनीतिक कामयाबी के मामले में यह बात अभिषेक बनर्जी पर भी लागू होती है. यह कहना ज़्यादा सही होगा कि राजनीति उनको विरासत में मिली है."

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राजनीति में उतर कर बहुत कम समय में शीर्ष पर पहुंचने की ऐसी मिसाल कम ही देखने को मिलती है. क्या इसकी वजह सिर्फ यही है कि वे राज्य की कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री ममता के भतीजे हैं?
टीएमसी से नाता तोड़ने वाले तमाम नेता तो एक सुर में यही दावा करते हैं. बीते दिसंबर में बीजेपी में शामिल होने वाले शुभेंदु अधिकारी किसी दौर में ममता के सबसे करीबी नेता हुआ करते थे. लेकिन पार्टी में अभिषेक के बढ़ते कद की वजह से वे धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए थे.
शुभेंदु आरोप लगाते हैं, "टीएमसी को अब ममता नहीं बल्कि अभिषेक ही चला रहे हैं. कटमनी का तमाम पैसा उनके पास ही पहुंचता है."
बुआ-भतीजे में क्या है अंतर

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बुआ-भतीजा होने के बावजूद ममता और अभिषेक की जीवनशैली में भारी अंतर है. ममता जहां अब भी सूती साड़ी और हवाई चप्पल में नज़र आती हैं. वहीं अभिषेक की जीवन शैली काफी आधुनिक है.
वो दक्षिण कोलकाता के अपने आवास में कड़ी सुरक्षा के बीच रहते हैं. अब टीएमसी के तमाम पोस्टरों में ममता के अलावा अभिषेक की भी तस्वीरें नज़र आती हैं.
अभिषेक के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति जुटाने और तोलाबाज़ी यानी उगाही के आरोप लगते रहे हैं. टीएमसी में अभिषेक का कद बढ़ने के साथ ही पार्टी के खिलाफ उगाही, भ्रष्टाचार और अवैध बिज़नेस के आरोप भी बढ़ते रहे हैं. लेकिन अब तक उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं है.
हाल में राज्य में कोयले के अवैध खनन और बिक्री के मामले की जांच कर रही सीबीआई ने अभिषेक की पत्नी रुजिरा बनर्जी से पूछताछ की थी. अभिषेक की शादी वर्ष 2012 में थाई नागरिक रुजिरा से हुई थी. ममता खुद उस शादी में शामिल नहीं हुई थीं.
लेकिन अभिषेक की पत्नी को नोटिस मिलने के बाद ममता ने इसे केंद्र का सियासी हथकंडा करार दिया था.
भ्रष्टाचार के लगातार लगते आरोप
बीजेपी के तमाम नेता ममता पर वंशवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगाते रहे हैं. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में अपनी एक रैली में कहा था कि बंगाल में सिर्फ भाइपो विंडो चलता है. इसके बिना यहां कोई काम नहीं हो सकता.
बीते दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अभिषेक के संसदीय इलाके में एक रैली में एक बार फिर बुआ-भतीजे की जोड़ी पर करारा हमला करते हुए कहा था, "तृणमूल कांग्रेस का एक ही नारा है- भतीजे का कल्याण. लेकिन मोदी सरकार का नारा है- सबका साथ-सबका विकास."
उनका आरोप था कि विकास के लिए केंद्र की ओर से अब तक भेजा गया धन यहां सिंडिकेट की जेब में चला गया है. बीते पांच वर्षो में मोदी सरकार की ओर से भेजी गई 3.59 लाख करोड़ रुपये की रकम भाइपो यानी भतीजे और टीएमसी के गुंडों की जेब में चली गए है.

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शाह का कहना था, "सत्ता में आने के बाद बीजेपी इन सबकी जांच कराएगी और भ्रष्टाचारियों को जेल भेजेगी."
लेकिन तब ममता ने जवाबी हमला करते हुए कहा था, "शाह बार-बार बुआ-भतीजा करते हैं. अगर उनमें हिम्मत है तो अभिषेक के खिलाफ चुनाव लड़कर दिखाएं.
खुद ममता बनर्जी वंशवाद के बीजेपी के आरोपों को नकारती रही हैं. उनका कहना है कि वे चाहतीं तो अभिषेक को राज्यसभा में भी भेज सकती थीं. लेकिन इसकी बजाय अभिषेक ने लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया.
टीएमसी अध्यक्ष दलील देती हैं, "मैंने अब तक पार्टी में अभिषेक को दूसरों के मुकाबले तवज्जो नहीं दी है. उनको उप-मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री भी नहीं बनाया है. कुछ साल पहले उसे सड़क हादसे में जान से मारने की साज़िश भी हो चुकी है."
बुआ-भतीजे की जोड़ी पर वंशवाद के आरोप सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि कांग्रेस और लेफ्ट के नेता भी लगाते रहे हैं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी का कहना है, इस जोड़ी के भ्रष्टाचार की वजह से ही लोगों ने अब की तीसरे विकल्प यानी कांग्रेस-लेफ्ट गठजोड़ को समर्थन देने पर विचार शुरू कर दिया है.
सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "अभिषेक का कद बढ़ने के साथ टीएमसी पर बढ़ते आरोप महज़ संयोग नहीं हो सकते."
कौन हैं अभिषेक बनर्जी

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ममता के भाई अमित बनर्जी और भाभी लता बनर्जी के पुत्र अभिषेक का जन्म सात नवंबर, 1987 को हुआ था. कोलकाता में स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने दिल्ली के एक निजी संस्थान से बीबीए और एमबीए की डिग्री हासिल की.
उनका राजनीतिक सफर वर्ष 2011-12 में शुरू हुआ. टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "उस समय टीएमसी युवा मोर्चा अध्यक्ष के तौर पर शुभेंदु अधिकारी काफी ताकतवर हो रहे थे. उनके पर कतरने के लिए ममता ने तृणमूल युवा नामक एक संगठन बना कर उसकी कमान अभिषेक को सौंप दी."
"उसके बाद बुआ के वरदहस्त की वजह से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. टीएमसी ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में उनको डायमंड हार्बर सीट से उतारा था. टीएमसी की लहर में वे भारी वोटों से जीतकर महज़ 26 साल की उम्र में संसद तक पहुंच गए. वर्ष 2019 में बीजेपी की कड़ी चुनौती के बीच भी उन्होंने अपनी सीट बचाने में कामयाबी हासिल की."
वह बताते हैं कि अभिषेक ने टीएमसी युवा के संचालन में अपने एमबीए के ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए उसे कॉरपोरेट तरीके से चलाया. नतीजतन जल्दी ही भारी तादाद में युवाओं ने पार्टी ज्वाइन कर ली. इसे देखते हुए अक्तूबर, 2014 में शुभेंदु की जगह अभिषेक को पार्टी के युवा मोर्चे की कमान सौंप दी गई. दरअसल, शुभेंदु और ममता के बीच मतभेद वहीं से उभरे.
टीएमसी के उस नेता का कहना था, "अभिषेक को राजनीति में उतरने की सलाह पार्टी के वास्तुकार रहे मुकुल रॉय ने दी थी जो अब बीजेपी का हिस्सा हैं. लेकिन बाद में अभिषेक की वजह से ही कभी ममता का दाहिना हाथ रहे मुकुल उपेक्षित महसूस करने लगे और आखिरकार उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया."
वरिष्ठ नेताओं की नाराज़गी

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वर्ष 2019 में चुनावी रणनीति की कमान पीके को सौंपने के बाद अभिषेक की सलाह पर पार्टी के कई बुज़ुर्ग नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. इसके पीछे उनके निष्क्रिय होने और छवि खराब होने की दलील दी गई. इससे पुराने नेताओं में नाराज़गी बढ़ी और कइयों ने टीएमसी से नाता तोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया.
कोलकाता के जिस नव नालंदा स्कूल में अभिषेक ने स्कूली पढ़ाई की थी वहां के एक सेवानिवृत्त शिक्षक बताते हैं, "अभिषेक कोई मेधावी छात्र नहीं थे. लेकिन क्रिकेट और फुटबॉल में उनकी काफी दिलचस्पी थी."
टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि अभिषेक पार्टी को कॉर्पोरेट तरीके से चलाने का प्रयास कर रहे हैं. इससे लोगों की नाराज़गी स्वाभाविक है. खासकर उनके मजबूत होने से मुकुल रॉय, शुभेंदु अधिकारी और सौमित्र खान जैसे नेताओं की अहमियत पार्टी में कम होने लगी. अपनी महत्वाकांक्षाओं को ठेस पहुंचते देख ही उन लोगों ने पार्टी से नाता तोड़ लिया था.
अब मौजूदा विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी की लोकप्रियता के साथ ही अभिषेक की कॉर्पोरेट दक्षता और संचालन क्षमता के लिए भी अग्निपरीक्षा साबित हो सकता है. लाख टके का सवाल यह है कि वे इसमें कितना कामयाब हो सकेंगे? इसका जवाब तो दो मई को ही मिलेगा.
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