असदुद्दीन ओवैसी: हैदराबाद की छोटी सी पार्टी को देशभर में कैसे दिलाई पहचान

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- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"हर कोई आज मुझे टारगेट कर रहा है घर में मुर्गी अंडा न दे तो हम ज़िम्मेदार, भैंस दूध न दे तो भी ओवैसी ज़िम्मेदार."
तीखे व्यंग्य भरी यह भाषा है ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की जो इसी तरह के बयानों और तेज़-तर्रार भाषणों के लिए जाने जाते हैं.
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जब नाम लिए बिना उनपर निशाना साधा तो ओवैसी ने इस अंदाज़ में जवाब दिया.
पश्चिम बंगाल के कूचबिहार में अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के कार्यक्रम के दौरान ममता बनर्जी ने कहा कि "एक राजनीतिक पार्टी है जो बीजेपी से पैसे ले रही है. वो पश्चिम बंगाल से नहीं बल्कि हैदराबाद से है."
चूंकि एआईएमआईएम और इसके प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी मूलत: हैदराबाद से हैं तो यह माना गया कि ममता का निशाना उन्हीं पर है. असदुद्दीन ओवैसी ने भी जवाब देने में देरी नहीं की. एआईएमआईएम प्रमुख ने कहा, "ममता बनर्जी की ज़ुबान पर मेरा नाम आया, इसके लिए मैं थैंक्यू कहना चाहूंगा."
ओवैसी ने अल्पसंख्यकों को बांटने के आरोप पर भी पलटवार किया और कहा कि "आजकल हर कोई हमें ही ज़िम्मेदार मान रहा है, लेकिन ये नहीं जानते हैं कि मुसलमान बदल चुका है. बंगाल में ये बीजेपी को नहीं रोक पाए तो हमें ज़िम्मेदार मान रहे हैं."

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ममता बनर्जी का बयान और असदुद्दीन ओवैसी का बयान ऐसे समय में आया है जब एआईएमआईएम पश्चिम बंगाल में 2021 में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उतरने का ऐलान कर चुकी है.
पश्चिम बंगाल की सीएम के निशाने पर अक्सर लेफ़्ट और बीजेपी रहा करते थे मगर यह पहला मौक़ा है जब उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से एआईएमआईएम पर निशाना साधा है.
ममता बनर्जी और असदुद्दीन ओवैसी के बीच हुए शब्दों के इस आदान-प्रदान पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत के तौर पर भी देखा जा रहा है.
दरअसल, पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ने के ओवैसी के बयान से ममता बनर्जी की चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक माना जा रहा है क्योंकि एआईएमआईएम ने पिछले एक दशक में हैदराबाद से निकलकर देश के अन्य हिस्सों में भी पैर पसार लिए हैं.
और प्रभाव बढ़ाने में अहम भूमिका रही है इसके अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की जो तेज़ी से युवा मुसलमानों के बीच लोकप्रिय हुए हैं. शायद यही कारण है कि चुनावों में बेशक समय है मगर ममता बनर्जी ओवैसी और उनकी पार्टी को हल्के में नहीं लेना चाहती.

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क्यों लोकप्रिय हो रहे ओवैसी
असदुद्दीन ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन की रैलियों में ख़ूब भीड़ जुटा करती है. इसके इतर भी उनके प्रशंसकों और आलोचकों, दोनों का ही एक बड़ा वर्ग है.
असदुद्दीन ओवैसी की ओर से संसद के अंदर, समाचार चैनलों की चर्चाओं में और राजनीतिक रैलियों में दिए गए भाषणों के वीडियो सोशल मीडिया पर भी ख़ूब देखे जाते हैं. फ़ेसबुक पर उनके नाम से कई अनाधिकारिक पेज बने हैं जो उनके भाषणों के वीडियो शेयर करते हैं.
ओवैसी बंधुओं और एआईएमआईएम के नेताओं पर भड़काऊ भाषणों से सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं. मगर पार्टी के समर्थक इसे भारतीय जनता पार्टी और अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों का जवाब देने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं.
एक पक्ष का कहना है कि वह लोगों की भावनाओं को भड़काते हैं जबकि उनके समर्थकों का कहना है कि वह तार्किक ढंग से मुसलमानों की समस्याओं पर बात करते हैं.

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एआईएमआईएम और ओवैसी परिवार की राजनीति पर नज़र रखने वाले हैदराबाद में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार उमर फ़ारूक़ कहते हैं, "एक वर्ग का कहना है कि ओवैसी लोकसभा हो या आम मंच, वहां पर वे मुसलमानों की समस्याओं से जुड़े सवाल उठाते हैं. जैसे कि आज़ादी के इतने साल गुज़र जाने के बाद भी मुस्लिम शिक्षा और आर्थिक पहलू पर इतना पिछड़ा क्यों है? मुस्लिम युवाओं को ये बात पसंद आती है कि उनकी भावनाओं को आवाज़ दी जा रही है."
हालांकि, विश्लेषकों का यह भी मानना है कि हाल के दिनों में अल्पसंख्यकों के मामलों पर जिस तरह से ओवैसी खुलकर बात कर रहे हैं, उससे भी उनकी अलग पहचान बनी है.
हाल ही में जब अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फ़ैसला आया तो उससे असंतोष जताने वाले शुरुआती लोगों में असदुद्दीन भी थे. उन्होंने कहा था कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरह वो भी इससे संतुष्ट नहीं हैं.

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उमर फ़ारूक़ के मुताबिक़, "मुसलमान नेता अन्य दलों में भी हैं मगर वे पार्टी की लाइन और अनुशासन में बंधे रहते हैं. नेतृत्व की मर्ज़ी के बिना वे कुछ नहीं कहते. उदाहरण के लिए संसद में तीन तलाक़ पर बहस हुई थी तो मुसलमानों की इस संबंध में क्या चिंताएं हैं, उसे सिर्फ़ असदुद्दीन ओवैसी ने उठाया. मुस्लिम सांसद और भी थे. तो ज़ाहिर है कि जिन मुसलमानों ने उन्हें देखा होगा, वे प्रभावित हुए होंगे."
"ओवैसी की लोकप्रियता बढ़ाने का श्रेय टीवी को भी जाता है, जिसके माध्यम से मुसलमान देखते हैं कि असदुद्दीन क्या सोच रखते हैं और उनके मामलों पर पर क्या बात करते हैं."
'मजलिस' का इतिहास
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन जिसे मजलिस भी कहा जाता है, काफ़ी पुराना संगठन है. लगभग 85 साल पहले हैदराबाद में सामाजिक-धार्मिक संस्था के रूप में इसकी शुरुआत हुई थी.
1928 में नवाब महमूद नवाज़ खान ने मजलिस स्थापना की थी और 1948 तक उनके पास इस संगठन की बागडोर रही. भारत की स्वतंत्रता के बाद यह संगठन हैदराबाद को स्वतंत्र देश के रूप में बनाए रखने की वकालत करता था.
इसीलिए जब 1948 में हैदराबाद का भारत में विलय हुआ था, तब भारत सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था. उस समय इसके अध्यक्ष रहे क़ासिम राजवी को गिरफ़्तार कर लिया गया था. बाद में राजवी पाकिस्तान चले गए मगर संगठन की ज़िम्मेदारी उस समय के मशहूर वकील अब्दुल वहाद ओवैसी को सौंप गए थे.
तबसे, यानी पिछले पांच दशकों से अधिक समय से ओवैसी परिवार ही मजलिस को चला रहा है. 1957 में मजलिस को राजनीतिक पार्टी के तौर पर बहाल किया गया, इसके नाम में 'ऑल इंडिया' जोड़ा गया और इसका संविधान भी बदला गया.
अब्दुल वहाद ओवैसी के बाद 1976 में पार्टी की ज़िम्मेदारी उनकी बेटे सलाहुद्दीन ओवैसी को मिली जो साल 2004 तक लगातार छह बार हैदराबाद के सांसद रहे.
अब सलाहुद्दीन ओवैसी के बेटे असदुद्दीन ओवैसी पार्टी के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद हैं और उनके छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी विधानसभा में पार्टी विधायक दल के नेता हैं. तेलंगाना विधानसभा में उनकी पार्टी के सात विधायक हैं.

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असदुद्दीन ओवैसी के आने के बाद क्या बदला
13 मई 1969 को हैदराबाद में जन्मे असदुद्दीन ओवैसी राजनीति में आने से पहले लंदन से क़ानून की पढ़ाई कर रहे थे. जब वह लौटे तो उनके पिता सलाहुद्दीन ओवैसी पार्टी के अध्यक्ष थे.
असदुद्दीन पहली बार 2004 में हैदराबाद से सांसद चुने गए थे. वह 2019 में चौथी बार यहां से सांसद चुने गए हैं. 1984 से लगातार हैदराबाद लोकसभा सीट ओवैसी परिवार के ही सदस्य जीते हैं.
जब असद के पिता पार्टी के अध्यक्ष थे, उस समय भी मजलिस आंध्र प्रदेश या आज के तेलंगाना से लगते महाराष्ट्र और कर्नाटक के उन इलाक़ों में सक्रिय थी मगर उसने आगे बढ़ने की कोशिश नहीं की थी. मगर पिता के सक्रिय राजनीति से अलग होने के बाद जब असदुद्दीन ने जब ज़िम्मेदारी संभाली तो उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की मौजूदगी का अहसास करवाने की कोशिश की.

वरिष्ठ पत्रकार उमर फ़ारूक़ बताते हैं, "असदुद्दीन ओवैसी जिस तरह से मुस्लिमों की समस्याओं पर राष्ट्रीय स्तर पर संसद के अंदर और बाहर मीडिया में मुखर होकर बोलते रहे हैं, उससे पूरे राज्य और देश में अल्पसंख्यकों को लगा है कि कोई एक ऐसा लीडर है जो हमारी बात कर रहा है."
इसका प्रभाव भी हुआ और हैदराबाद से बाहर मजलिस को सफलता मिली महाराष्ट्र में. अभी महाराष्ट्र से एआईएमआईएम का एक सांसद है और हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में उसे दो सीटें मिली हैं. पिछली बार भी विधानसभा चुनाव में उसने दो सीटें जीती थीं. इस बार वहां से हार मिली है मगर दो नई सीटों पर उसके विधायक जीते हैं.

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महाराष्ट्र में उभार
एक समय हैदराबाद तक ही सीमित रही एक पार्टी के लिए यह बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है मगर इसके लिए ओवैसी कई सालों से काम कर रहे थे.
बीबीसी मराठी सेवा के संपादक आशीष दीक्षित बताते हैं, "लगभग 10 साल पहले असदुद्दीन ओवैसी ने महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में काम करना शुरू किया. एक समय यह निज़ाम के हैदराबाद स्टेट का हिस्सा था. 1948 तक मराठवाड़ा क्षेत्र की राजधानी था हैदराबाद इसलिए दोनों जगहों के बीच अच्छे रिश्ते थे."
"इस इलाक़े में मुसलमान आबादी अपेक्षाकृत अधिक है. उदाहरण के लिए मराठवाड़ा की क्षेत्रीय राजधानी औरंगाबाद की ही बात करें तो यहां लगभग तीस फ़ीसदी मुसलमान हैं. तो एआईएमआईएम ने औरंगाबाद, नांदेड़ और परभणी जैसे शहरों में फ़ोकस किया और स्थानीय निकाय के चुनाव लड़ना शुरू किया. इसमें उसे सफलता भी मिली."
2012 में नांदेड़ नगर निगम चुनाव की 81 सीटों में एआईएमआईएम ने 11 सीटें जीती थीं. 2015 में औरंगाबाद की 113 सीटों वाली म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन में एमआईएम ने 54 प्रत्याशी उतारे थे जिनमें 26 ने जीस हासिल की थी. इस तरह की जीतों से एआईएमआईएम की हिम्मत बढ़ी और उसे लगा कि महाराष्ट्र में उसके लिए संभावनाएं हैं.
आशीष दीक्षित कहते हैं, "2014 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना, बीजेपी, कांग्रेस और एनसीपी अलग-अलग लड़ रही थीं. वोट बंटने का फ़ायदा मजलिस को हुआ और औरंगाबाद सेंट्रल व मुंबई के भाइखला से इसके दो विधायक जीत गए. इसके बाद मजलिस ने महाराष्ट्र पर और ध्यान देना शुरू किया. असदुद्दीन और उनके भाई अकबरुद्दीन अक्सर महाराष्ट्र आते और बैठकें करते. उन्होंने राज्य में अपनी पार्टी विधिवत इकाइयां स्थापित कीं और पदाधिकारी नियुक्त किए."

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जय भीम, जय मीम का नारा
ख़ास बात यह है कि ओवैसी महाराष्ट्र में सिर्फ मुसलमानों तक सीमित नहीं रहे हैं. उन्होंने मुस्लिम-दलित गठजोड़ पर फ़ोकस किया है ताकि उनकी पार्टी का प्रभाव बढ़ सके.
बीबीसी मराठी सेवा के संपादक आशीष दीक्षित बताते हैं कि ओवैसी ने नारा दिया है- "जय भीम, जय मीम." विधानसभा चुनाव के प्रचार दौरान ओवैसी अपनी रैलियों में डॉक्टर आंबेडकर की तस्वीरें रखते थे और उन्होंने अपनी पार्टी से कई जगहों पर दलितों को भी टिकट दिए.
2019 लोकसभा चुनाव के दौरान अहम मोड़ तब आया जब मजलिस ने प्रकाश आंबेडर की पार्टी बीबीए के साथ गठजोड़ किया और औरंगाबाद सीट पर जीत हासिल की. इस तरह इस बार लोकसभा में एमआईएम के दो सांसद हैं. एक औरंगाबाद से इम्तियाज़ जलील और दूसरे ओवैसी ख़ुद.
हालांकि हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव से पहले एआईएमआईएम और बीबीए का गठबंधन सीटों के विवाद के कारण टूट गया, बावजूद उसके मजलिस को दो सीटें मिली हैं- धुले और मालेगांव. फिर भी औरंगाबाद, मराठवाड़ा और मुंबई के कुछ इलाक़ों से मजलिस को काफ़ी वोट मिले हैं.

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किशनगंजहै ममता की चिंता?
मजलिस ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी उम्मीदवार उतारे थे मगर उसे वहां सफलता नहीं मिली थी. मगर बिहार के किशनगंज में हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान मजलिस के प्रत्याशी कमरुल होदा ने बीजेपी प्रत्याशी स्वीटी सिंह को 10 हज़ार से अधिक वोटों से हरा दिया. यह कांग्रेस की पारंपरिक सीट थी मगर यहां कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही थी.
ख़ास बात यह है कि किशनगंज बिहार का वह इलाक़ा है जो पश्चिम बंगाल से जुड़ा हुआ है. ओवैसी और एआईएमआईएम की राजनीति पर वरिष्ठ पत्रकार उमर फ़ारूक़ कहते हैं एआईएमआईएम का इस क्षेत्र में बढ़ता प्रभाव भी ममता बनर्जी की चिंता का कारण हो सकता है.
वह कहते हैं, "पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की जीत में मुसलमानों के वोटों की अहम भूमिका रहती है. ओवैसी की लोकप्रियता अन्य राज्यों के मुसलमानों के बीच बढ़ रही है. ऐसे में स्वाभाविक है कि ममता बनर्जी को भी चिंता सता रही होगी कि पश्चिम बंगाल के मुसलमान भी ओवैसी की पार्टी की तरफ़ आकर्षित न हो जाएं. फिर किशनगंज का इलाक़ा पश्चिम बंगाल के नज़दीक है. तो वहां का कुछ न कुछ प्रभाव तो पश्चिम बंगाल पर पड़ेगा कूचबिहार, जहां ममता बनर्जी ने अप्रत्यक्ष तौर पर ओवैसी पर निशाना साधा, वहां मुसलमानों की आबादी अधिक है."
सवाल यह है कि ऐसे क्या कारण हो सकते हैं कि तृणमूल को डर है कि अब तक जो मतदाता उसके साथ थे, वे कल को छिटक सकते हैं?
इस पर उमर फ़ारूक़ कहते हैं, "ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल के मुसलमानों में निराशा बढ़ रही है. उन्हें लगता है कि शिक्षा और नौकरियों को लेकर उनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. अन्य राज्यों की तुलना में पिछड़ापन शायद वहां ज़्यादा है. उन्हें उम्मीद थी कि आकर्षक बातों और वादों से इतर तृणमूल सरकार उनकी समस्याओं को हल करने की कोशिश करेगी. मगर लगता है ऐसा हुआ नहीं है."

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ममता को 'वोट कटने' का डर है?
पूरे पश्चिम बंगाल में मुसलमान वोटरों की संख्या लगभग 30 प्रतिशत है और कई सीटों पर वे निर्णायक भूमिका निभाते हैं. ऐसे में ममता को डर यह भी है कि एआईएमआईएम अगर चुनाव में उम्मीदवार उतारती है तो वोट कटने से बीजेपी को फ़ायदा न मिल जाए जो तेज़ी से राज्य में अपना प्रभाव बढ़ा रही है.
कोलकाता में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर एम. कहते हैं, "ओवैसी कह चुके हैं कि अगले चुनाव में वह पश्चिम बंगाल में उम्मीदवार उतार सकते हैं. यहां अल्पसंख्यक मतदाता लगभग 150 सीटों पर निर्णायक भूमिका में होते हैं. पहले ये लेफ़्ट के साथ थे, फिर ममता ने उन्हें अपने साथ किया. 2011 में ममता बनर्जी इसी तबके के समर्थन और वोटों के दम पर सत्ता में आई थीं."
इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अगर उसकी उम्मीदों के मुताबिक़ सीटें नहीं मिली तो इसका कारण भी यही माना गया कि अल्पसंख्यक तबके ने तृणमूल कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा था. लेकिन अब ममता बनर्जी को डर है कि ओवैसी का बढ़ता प्रभाव तृणमूल कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब न बन जाए.
प्रभाकर एम. कहते हैं, "ममता की चिंता इसलिए बढ़ी है कि ओवैसी यहां एक-बार हाल ही में आ चुके हैं. उन्हें डर यह है कि एक-डेढ़ साल बाद होने वाले चुनावों में अगर ओवैसी ने अपनी पार्टी से उम्मीदवार खड़े किए तो वोटों का विभाजन होगा जिसका सीधा नुक़सान तृणमूल कांग्रेस को होगा और यह बीजेपी के लिए फ़ायदे की स्थिति है."
माना जा रहा है कि इसी कारण इशारों-इशारों में ममता बनर्जी ने नाम लिए बिना ओवैसी की पार्टी पर 'बीजेपी के साथ मिले होने' का आरोप लगाया. हालांकि इस पर ओवैसी ने पलटवार करते हुए कहा है कि "अपनी अक्षमताओं के लिए हर कोई मुझे टारगेट कर रहा है."

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लेकिन यह पहला मौक़ा नहीं है जब कोई मजलिस को 'वोट काटने वाली पार्टी' कह रहा है. ऐसा ही आरोप समाजवादी पार्टी ने तब लगाया था जब ओवैसी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान अपनी पार्टी से उम्मीदवार उतारे थे. महाराष्ट्र में भी कांग्रेस और एनसीपी ऐसा आरोप लगाती रही हैं.
बीबीसी मराठी सेवा के संपादक आशीष दीक्षित कहते हैं कि एआईएमआईएम को अगर आगे बढ़ना है तो उसके लिए लिए वोट काटने के इस 'टैग' से पार पाना ज़रूरी है.
वह कहते हैं, "मुसलमानों के बीच 2014 के बाद यह फ़ीलिंग आई थी और कांग्रेस ने इस तरह का प्रचार भी किया था कि एमआईएम को वोट देने का मतलब है- बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाना क्योंकि मुसलमान वोटरों के कांग्रेस से अलग होने का फ़ायदा बीजेपी को मिलता है. हर रैली में कांग्रेस ने यह बात कही."

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क्या तोड़ निकालेंगे ओवैसी?
असदुद्दीन ओवैसी वोट काटने के इस 'टैग' को हटाने की कोशिश भी कर रहे हैं. वह कई बार कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव और अन्य राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी के उम्मीदवार नहीं थे, फिर भी बीजेपी विरोधी पार्टियों की हार हुई. इसलिए यह कहना ग़लत है कि एआईएमआईएम के कारण बीजेपी को फ़ायदा पहुंचता है.
ममता बनर्जी पर भी उन्होंने इसी लाइन पर निशाना साधते हुए सवाल पूछा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में मैंने पश्चिम बंगाल में उम्मीदवार नहीं उतारे थे, फिर बीजेपी को 18 सीटें कैसे मिल गईं?
वरिष्ठ पत्रकार उमर फ़ारूक़ कहते हैं, "वोट काटने के सवालों पर ओवैसी खुलकर कहते हैं कि सेक्युलर पार्टियां, जिनमें कांग्रेस भी शामिल है, वे अपने हिंदू सेक्युलर वोट बैंक को भी अपने साथ नहीं रख पाईं. वह कहते हैं कि इन पार्टियों को सिर्फ़ इस बात की चिंता है कि मुसलमान उन्हें वोट देते रहें. ओवैसी का सवाल है कि जब आप उन्हें अपने साथ नहीं रख पा रहे तो क्या मुसलमानों ने आपको लिखकर दे रखा है कि वो हमेशा आपको वोट देंगे?"

अब तक पश्चिम बंगाल में मजलिस ख़ास सक्रिय नहीं थी मगर धीरे-धीरे उसकी सक्रियता बढ़ रही है. ओवैसी ने भी राज्य के दौरे शुरू किए हैं. ओवैसी को यहां अपनी पार्टी की सफलता की उम्मीद तो होगी मगर सिर्फ़ मुसलमान वोटों के आधार पर सफलता पाना आसान नहीं होगा.
बीबीसी मराठी सेवा के संपादक आशीष दीक्षित इसके लिए महाराष्ट्र का उदाहरण देते हैं, "एमआईएम को सोचना होगा कि अगर मुसलमानों के मन में यह बात बैठ जाती है कि ओवैसी की पार्टी को वोट देने से बीजेपी को फ़ायदा होता है तो फिर मुश्किल होगी. वे एक ही हाल में एमआईएम को वोट दे सकते हैं जब वह पार्टी कमज़ोर हो जाए जिसे वे वोट देते रहे हैं. उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में अब कांग्रेस और एनसीपी की स्थिति 2014 से मुक़ाबले बेहतर हुई है. तो मुसलमानों को अगर लगता है कि वे जीतने की बेहतर स्थिति में हैं तो आगे मजलिस के लिए महाराष्ट्र में चुनौती बढ़ जाएगी."
जिस शैली में ममता बनर्जी ने एआईएमआईएम पर निशाना साधा है, उसके आधार पर अगर वह यही बात पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के मन में बिठाने में सफल हो जाती हैं तो ओवैसी को मुश्किल हो सकती है.
मगर अभी चुनावों में डेढ़ साल का समय है. सबकी निगाहें इस पर होंगी कि ओवैसी इस चुनौती पार करके तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के लिए चैलेंज बन पाते हैं या नहीं.
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