पश्चिम बंगाल में चुनावों से पहले आख़िर बार-बार क्यों होती है हिंसा?
प्रभाकर मणि तिवारी
कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

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पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के ऐलान के साथ ही एक बार फिर राज्य के विभिन्न इलाकों से हिंसा की खबरें सामने आने लगी हैं.
शुक्रवार को नामांकन पत्र दाखिल करने के दिन ही मुर्शिदाबाद जिले में कांग्रेस की एक कार्यकर्ता की गोली मारकर हत्या कर दी गई. इसके बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि आख़िर यहां चुनावों के दौरान हिंसा क्यों भड़क उठती है.
अगर पिछले सालों के आंकड़ों और चुनावी हिंसा के लंबे इतिहास को ध्यान में रखें तो काफी हद तक इस सवाल का जवाब भी स्पष्ट हो जाता है.
यह कहना ज़्यादा सही होगा कि बंगाल में हिंसा अब चुनावी संस्कृति का हिस्सा बन गई है.
यहां साल 2018 के पंचायत चुनावों के बाद, उसके अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनावों को दैरान यहां भी काफी हिंसा देखने को मिली थी.
ख़ासकर विधानसभा चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर होने वाली हिंसा और कथित राजनीतिक हत्याओं की घटनाओं ने तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थी.
ऐसा नहीं है कि बंगाल ऐसा अकेला राज्य है जहां चुनावों से पहले और इसके दौरान हिंसा की घटनाएं होती हैं. उत्तर प्रदेश और बिहार में जहां चुनावों से पहले बाहुबली गतिविधियां बढ़ जाती हैं वहीं इन राज्यों के साथ साथ महाराष्ट्र, राजस्थान, त्रिपुरा और असम जैसे पूर्वोत्तर राज्य से चुनावी हिंसा की खबरें आती रही हैं.
यहां तक कि गुजरात और केरल जैसे आमतौर पर शांत राज्यों से भी बीते वर्षों में चुनावी हिंसा की ख़बरें आती रही हैं.

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राजनीतिक हत्याओं के आंकड़े
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2018 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पूरे साल के दौरान देश में होने वाली 54 राजनीतिक हत्याओं के मामलों में से 12 बंगाल से जुड़े थे.
लेकिन उसी साल केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार को जो एडवाइज़री भेजी थी उसमें कहा गया था कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा में 96 हत्याएं हुई हैं और लगातार होने वाली हिंसा गंभीर चिंता का विषय है.
उसके बाद एनसीआरबी ने सफाई दी थी कि उसे पश्चिम बंगाल समेत कुछ राज्यों से आंकड़ों पर स्पष्टीकरण नहीं मिला है. इसलिए उसके आंकड़ों को फ़ाइनल नहीं माना जाना चाहिए.
उस रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्ष 1999 से 2016 के बीच पश्चिम बंगाल में हर साल औसतन 20 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं.
इनमें सबसे ज्यादा 50 हत्याएं 2009 में हुईं. उस साल अगस्त में मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (माकपा) ने एक पर्चा जारी कर दावा किया था कि दो मार्च से 21 जुलाई के बीच तृणमूल कांग्रेस ने 62 काडरों की हत्या कर दी है.
कोई चार दशक तक बंगाल की राजनीति को क़रीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार तापस घोष बताते हैं कि 1980 और 1990 के दशक में जब बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को कोई वजूद नहीं था, वाममोर्चा और कांग्रेस के बीच अक्सर हिंसा होती रहती थी.
1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु की ओर विधानसभा में पेश आंकड़ों में कहा गया था कि 1988-89 के दौरान राजनीतिक हिंसा में 86 राजनीतिक कार्यकर्ताओं की मौत हो गई है.
इनमें से 34 सीपीएम के थे और 19 कांग्रेस के. बाकियों में वाममोर्चा के घटक दलों के कार्यकर्ता शामिल थे.
उस समय सीपीएम के संरक्षण में कांग्रेसियों की कथित हत्याओं के विरोध में कांग्रेस ने राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की थी.
पार्टी ने ज्ञापन में दावा किया था कि 1989 के पहले 50 दिनों के दौरान उसके 26 कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है.
केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़, वर्ष 2018 के पंचायत चुनाव के दौरान 23 राजनीतिक हत्याएं हुई थी.
एनसीआरबी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि वर्ष 2010 से 2019 के बीच राज्य में 161 राजनीतिक हत्याएं हुई और बंगाल इस मामले में देश भर में पहले स्थान पर रहा.
लेकिन सवाल ये उठता है कि राजनीतिक रूप से स्थिर इस राज्य में हिंसा की संस्कृति कैसे लगातार बरकरार है?

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सिद्धार्थ शंकर रे से शुरू हुआ हिंसक दौर
वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, “बांग्ला समाज की छवि भले भद्रलोक वाली रही हो, चुनावों के समय यह गड्ड-मड्ड हो जाती है. यह राज्य देश विभाजन के बाद से ही हिंसा के लंबे दौर का गवाह रहा है. 1979 में सुंदरबन इलाक़े में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के नरसंहार को आज भी राज्य के इतिहास के सबसे काले अध्याय के तौर पर याद किया जाता है.”
उनके मुताबिक़, साठ के दशक में उत्तर बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुए नक्सल आंदोलन ने राजनीतिक हिंसा को एक नया आयाम दिया था. किसानों के शोषण के विरोध नक्सलबाड़ी से उठने वाली आवाजों ने उस दौरान पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं.
राजनीतिक पर्यवेक्षक प्रोफ़ेसर समीरन पाल बताते हैं, “वर्ष 1971 में सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद तो राजनीतिक हत्याओं का जो दौर शुरू हुआ उसने पहले की तमाम हिंसा को पीछे छोड़ दिया.”
”1977 के विधानसभा चुनावों में यही उसके पतन की भी वजह बनी. सत्तर के दशक में भी वोटरों को आतंकित कर अपने पाले में करने और सीपीएम की पकड़ मजबूत करने के लिए बंगाल में हिंसा होती रही है.”
वह बताते हैं कि वर्ष 1998 में ममता बनर्जी की ओर से टीएमसी के गठन के बाद वर्चस्व की लड़ाई ने हिंसा का नया दौर शुरू किया. उसी साल हुए पंचायत चुनावों के दौरान कई इलाक़ों में भारी हिंसा हुई.

माना जाता है कि बंगाल में सत्ता की राह ग्रामीण इलाकों से ही निकलती है. यही वजह है कि देश के कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के मुकाबले पश्चिम बंगाल में होने वाले पंचायत चुनावों को ज्यादा सुर्खियां और अहमियत मिलती रही है.
बंगाल में ग्रामीण इलाक़े शुरू से ही सत्ता की चाबी रहे हैं. वाममोर्चा ने भूमि सुधारों और पंचायत व्यवस्था की सहायता से सत्ता के विकेंद्रीकरण के जरिए ग्रामीण इलाक़ों में अपनी जो पकड़ बनाई थी उसी ने उसे यहां कोई 34 साल तक सत्ता में बनाए रखा था.
2008 के पंचायत चुनावों में ग्रामीण इलाक़ों में पैरों तले की ज़मीन खिसकते ही वर्ष 2011 में यहां वाममोर्चा का लाल किला ढह गया था. तृणमूल कांग्रेस ने उन चुनावों में तमाम राजनीतिक पंडतों के आकलन को ग़लत साबित करते हुए बेहतरीन प्रदर्शन किया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य के विभिन्न इलाक़ों में बालू, पत्थर और कोयले के अवैध खनन और कारोबार पर वर्चस्व भी पंचायत चुनाव में होने वाली हिंसा की एक प्रमुख वजह है. यह तमाम कारोबार पंचायतों के ज़रिए ही नियंत्रित होते हैं. ऐसे में जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर पंचायतों पर काबू पाने के लिए तमाम राजनीतिक पार्टियां अपनी पूरी ताकत झोंक देती हैं.

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निष्पक्ष चुनाव के लिए केंद्रीय बलों की मांग
इस बार भी पंचायत चुनाव अलग नहीं हैं. नामांकन पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही राज्य के विभिन्न इलाक़ों से हिंसा की खबरें आने लगी हैं.
यही वजह है कि कांग्रेस और भाजपा जैसी विपक्षी पार्टियों ने केंद्रीय बलों की निगरानी में चुनाव कराने की मांग की है. इसके लिए उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिकाएं भी दायर की हैं.
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार कहते हैं, “हम निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव चाहते हैं. केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती के बिना ऐसा संभव नहीं है. वर्ष 2018 की मिसाल सबके सामने हैं. इसके साथ ही नामांकन पत्र दाखिल करने की समय सीमा भी बढ़ाई जानी चाहिए.”
कांग्रेस ने तो हाईकोर्ट में अपनी याचिका में चुनाव की अधिसूचना को ही खारिज करने की मांग उठाई है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने भी केंद्रीय बलों की निगरानी में चुनाव कराने की मांग की है.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता जय प्रकाश मजूमदार कहते हैं, “पंचायत चुनाव में केंद्रीय बलों की कोई जरूरत नहीं है.” राज्य सरकार के एक प्रवक्ता बताते हैं, “मुक्त और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए सरकार केंद्रीय बलों की बजाय दूसरे राज्यों की पुलिस को तैनात करने पर विचार कर रही है.”
वहीं राजनीतिक विश्लेषक मईदुल इस्लाम कहते हैं, “अगले साल लोकसभा चुनावों से पहले आख़िरी चुनाव होने की वजह से तमाम दलों के लिए यह पंचायत चुनाव ग्रामीण इलाक़ों में उनको अपनी ताकत आंकने का पैमाना साबित होंगे."
"इन नतीजों का असर अगले साल के अहम लोकसभा चुनाव पर होना तय है. यही वजह है कि चुनाव की तारी़ख का एलान होते ही तमाम दलों के योद्धा कमर कस कर मैदान में कूद पड़े हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में हिंसा और तेज़ होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता.”
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