नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात को लेकर क्यों हो रही है ममता बनर्जी की आलोचना

इमेज स्रोत, Sanjay Das/BBC
- Author, प्रभाकर एम.
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
कहते हैं कि राजनीति में न तो दोस्ती स्थायी होती है और न ही दुश्मनी.
नेशनल रजिस्टर आफ सिटिज़ंस (एनआरसी) और नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) के ख़िलाफ़ सबसे मुखर रहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शनिवार शाम को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने राजभवन पहुंचीं तो एक बार फिर यही कहावत चरितार्थ होती नजर आई.
हालांकि, ममता ने अपनी इस बैठक को शिष्टाचार मुलाक़ात और संवैधानिक ज़िम्मेदारी बताया लेकिन विपक्ष ने इस बैठक के लिए ममता को निशाने पर ले लिया है.
अब तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में गोपनीय तालमेल के आरोप दोबारा सिर उठाने लगे हैं जबकि बीते साल लोकसभा चुनावों से ही मोदी और ममता के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहा है.
कहां तो पहले ममता के मोदी के साथ मंच साझा करने पर सवालिया निशान था और कहां दो घंटे के भीतर उन्होंने दो बार प्रधानमंत्री के साथ मुलाक़ात की.

इमेज स्रोत, ANI
कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट की 150वीं वर्षगांठ के मौक़े पर भी दोनों नेताओं को मंच साझा करना था मगर ममता इस कार्यक्रम में नहीं आईं. चर्चा है कि एक दिन पहले हुई मुलाक़ात के बाद उठे सवालों के कारण ही ममता ने यह फ़ैसला लिया.
मगर सीएए और एनआरसी के भारी विरोध के बीच प्रधानमंत्री के साथ हुई मुलाक़ात को लेकर सवालों और चर्चाओं का सिलसिला थमा नहीं है.
राजनीतिक हलकों में पूछा जा रहा है कि क्या इस बैठक से इन दोनों नेताओं के आपसी रिश्तों में बदलाव आएगा?
जब एक-दूसरे के कट्टर विरोधी समझे जाने वाले दो कद्दावर नेता एक-दूसरे से अकेले में मिलें तो राजनीति भला दूर कैसे रह सकती है. इसके साथ ही बैठक पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है.

इमेज स्रोत, Sanjay Das/BBC
सोनिया गांधी को इनकार
मोदी से ममता की इस मुलाक़ात पर सवाल उठने की एक ठोस वजह यह है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने दो दिन पहले ही 13 जनवरी को दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से बुलाई गई विपक्षी दलों की बैठक का बहिष्कार कर दिया था.
बीते लोकसभा चुनावों के बाद और ख़ासकर एनआरसी और सीएए पर ममता के लगातार तेज़ होते आंदोलन के बीच दोनों नेताओं की इस मुलाक़ात से क़यासों का दौर तेज़ हो गया है.
विपक्षी दल ममता पर भाजपा और मोदी के आगे घुटने टेकने का आरोप लगा रहे हैं. उनका दावा है कि नारदा और सारदा घोटालों से पार्टी के नेताओं को बचाने के लिए ही ममता मजबूरी में मोदी से मुलाक़ात करने गई थीं.

इमेज स्रोत, Getty Images
मोदी के साथ लगभग 15 मिनट तक चली बैठक के बाद ममता ने पत्रकारों से कहा, "प्रधानमंत्री बंगाल आए हैं. इसलिए मैं उनसे शिष्टाचार भेंट करने आई थी. मैंने उनसे कह दिया कि राज्य के लोग एनआरसी, सीएए और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) के ख़िलाफ़ हैं. साथ ही उनसे इन पर पुनर्विचार करने और वापस लेने का अनुरोध भी किया है."
ममता का कहना था कि प्रधानमंत्री ने उनसे इन मुद्दों पर बातचीत के लिए दिल्ली आने का न्योता दिया. उनके मुताबिक़, मोदी का कहना था कि वे दूसरे कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए कोलकाता आए हैं.
मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र पर राज्य सरकार के लगभग 38 हज़ार करोड़ रुपये बकाया हैं. प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर विचार करने का भरोसा दिया है.
शायद ममता को भी अंदाज़ा था कि इस बैठक पर सवाल उठेंगे और उनको विपक्ष के हमलों को झेलना होगा. इसी वजह से इस बैठक के तुरंत बाद वह धर्मतल्ला इलाके में तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद की ओर से एनआरसी और सीएए के ख़िलाफ़ जारी धरने में हिस्सा लेने पहुंच गईं.
लेकिन वहां से कुछ देर बाद ही ममता हावड़ा ब्रिज के लाइट एंड साउंड शो के उद्घाटन के मौके पर एक बार फिर मोदी की बगल वाली कुर्सी पर नजर आईं.

इमेज स्रोत, Sanjay Das/BBC
विपक्ष ने लगाए ममता पर आरोप
मोदी और ममता की इस मुलाकात पर सियासत तेज़ हो गई है. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "अपनी लाज बचाने के लिए ममता मोदी की शरण में आई हैं."
वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सोमेन मित्र कहते हैं, "ममता ने सोनिया गांधी की ओर से नागरिकता क़ानून पर 13 जनवरी को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक का तो बायकॉट किया. लेकिन मोदी से 11 जनवरी को ही मुलाक़ात का समय तय कर लिया. इससे उनकी असली मंशा साफ़ हो गई है."
सीपीएम ने भी ममता पर हमला बोला है. पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम कहते हैं, "मुख्यमंत्री नाटक कर रही हैं. अगर उनको सीएए का विरोध करना है तो यहीं कर सकती थीं. दिल्ली में बात करने की क्या ज़रूरत है ? तृणमूल और भाजपा में नूरा कुश्ती हो रही है."
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने विपक्ष को आरोपों को निराधार करार दिया है.

इमेज स्रोत, Getty Images
राज्य के संसदीय कार्य मंत्री और तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, "सीपीएम और कांग्रेस के नेता सर्कस के जोकर की तरह काम कर रहे हैं. सीएए के विरोध के नाम पर यह दोनों छात्रों के कंधे पर बंदूक रख कर चला रहे हैं. ममता मुख्यमंत्री के तौर पर शिष्टाचारवश प्रधानमंत्री से मिलने गई थीं. उनका मक़सद बंगाल के विकास के हित में बकाया रकम की मांग करना और अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाना था."
चटर्जी कहते हैं कि मोदी से मुलाकात के बावजूद ममता अपने आंदोलन से पीछे नहीं हटी हैं. यह आंदोलन आख़िर तक जारी रहेगा. ऐसे में ममता का विरोध करने वाले और उन पर आरोप लगाने वाले खुद को जोकर ही साबित कर रहे हैं.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इस बैठक को काफी अहम क़रार दिया है. इसकी वजह यह है कि मोदी के बंगाल दौरे से चौबीस घंटे पहले तक ममता के उनके साथ कार्यक्रम में हिस्सा लेना तय नहीं था. लेकिन शनिवार को मोदी के राजभवन पहुंचने से पहले ही ममता उनकी अगुवाई के लिए न सिर्फ़ वहां पहुंच गईं बल्कि उनसे अकेले में बैठक भी की.

इमेज स्रोत, Sanja Das/BBC
राजनीतिक पर्यवेक्षक सुनील दासगुप्ता कहते हैं, "सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ आंदोलन से उपजे हालात के बीच दोनों नेताओं की यह बैठक काफ़ी अहम है. अब मोदी ने ममता को बातचीत के लिए दिल्ली बुलाया है तो जाहिर है जल्दी ही दोनों में एक बार फिर बैठक होगी. शायद ममता भी अब आंदोलन से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रही हैं."
एक कॉलेज में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर शुभोजित सेन कहते हैं, "ऐसी बैठकें कभी बेमतलब या महज शिष्टाचारमूलक नहीं होतीं. ममता भले इसे शिष्टाचार की श्रेणी में रखें, इसके दूरगामी संकेत हैं."
तो क्या इस बैठक के बाद एनआरसी और सीएए के प्रति ममता के बाग़ी तेवरों में नरमी आएगी? लाख टके के इस सवाल का जवाब तो भविष्य के गर्भ छिपा है. लेकिन इस बैठक पर सियासी हलचल तो लगातार तेज़ होने ही लगी है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














