क्या आरएसएस के निर्देश पर चल रहे हैं पश्चिम बंगाल के राज्यपाल?

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिन्दी के लिए
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ और राज्य सरकार के बीच यूँ तो पहले दिन से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है, लेकिन अब अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले दोनों के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है. ख़ासकर विभिन्न मुद्दों पर इनके बीच ट्विटर पर जंग लगातार तेज़ हो रही है.
राज्यपाल रोज़ाना एक से ज़्यादा ट्वीट्स के ज़रिए सरकार को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं, लेकिन गुरुवार को राज्यपाल के एक ट्वीट पर विवाद बढ़ गया है. इसके आधार पर तृणमूल कांग्रेस ने उन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के निर्देश पर काम करने का आरोप लगाया है.
वैसे, पार्टी पहले भी ऐसे आरोप लगाती रही है, लेकिन राज्यपाल के ट्वीट की एक चूक ने उसे मज़बूत हथियार दे दिया है.
दरअसल, राज्यपाल ने गुरुवार को अपने एक ट्वीट में राज्य में क़ानून और व्यवस्था की स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए दो सुरक्षा सलाहकारों- पूर्व आईपीएस अधिकारियों सुरजीत कर पुरकायस्थ और रीना मित्र की नियुक्ति और कामकाज पर सवाल उठाया था.

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ट्विटर वॉर
उस ट्वीट में धनखड़ ने कहा था कि पश्चिम बंगाल अल-कायदा के आतंकियों और अवैध बम बनाने वालों की सुरक्षित शरणगाह बनता जा रहा है. उस ट्वीट में रीना मित्र की नियुक्ति के सरकारी आदेश की कॉपी भी थी.
लेकिन उनके इस ट्वीट में ऊपर आरएसएस सुधीर का नाम था. यानी रीना मित्र की नियुक्ति के आदेश की प्रति को आरएसएस सुधीर हैंडल से भेजा गया था.
उससे राजनीतिक हलकों में आरएसएस सुधीर पर कयास का दौर शुरू हो गया. हालांकि उसके ठीक 12 मिनट बाद राजभवन से वही ट्वीट एडिट कर दोबारा जारी किया गया. उसमें आरएसएस सुधीर नाम नहीं था. लेकिन तब तक पहला ट्वीट वायरल हो चुका था.
उसके बाद राज्य के संसदीय कार्य मंत्री और तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी ने धनखड़ के पहले ट्वीट के साथ उनपर हमला करते हुए जवाबी ट्वीट किया.

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उन्होंने इसमें आरोप लगाया कि धनखड़ आरएसएस के निर्देश पर काम कर रहे हैं. पार्थ ने कहा, "किसी भी राज्यपाल से स्थानीय राजनीति का हिस्सा नहीं बनने और तटस्थ होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन यहाँ धनखड़ महज भाजपा के इशारों पर ही नहीं चलते बल्कि आरएसएस से भी निर्देश ले रहे हैं."
तृणमूल कांग्रेस सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने अपने एक ट्वीट में कहा, "एक राज्यपाल के तौर पर आपसे राज्य की राजनीति के प्रति तटस्थ रहने की उम्मीद की जाती है, लेकिन आपको अपने संवैधानिक पद का ज़रा भी ख्याल नहीं है. अब आपका पूर्वाग्रह सबके सामने आ गया है."
राज्यपाल ने अब तक इस विवाद पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
राजभवन और सरकार के बीच विवादों की सूची काफ़ी लंबी है. इसमें सरकार की ओर से तृणमूल कांग्रेस और राज्यपाल के पक्ष में भाजपा भी अक्सर तलवारें भांजती रही है.

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कई सवाल उठा चुके हैं राज्यपाल
धनखड़ इस महीने की शुरुआत से ही आक्रामक तेवर दिखा रहे हैं. उन्होंने इससे पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक लंबा पत्र लिखा और उसे ट्विटर के ज़रिए सार्वजनिक कर दिया.
इसके अलावा माओवादी गतिविधियों, भाजपा के सचिवालय अभियान के दौरान हुए हंगामे और एक सिख व्यक्ति की पगड़ी खोले जाने को मानवाधिकार उल्लंघन बताते हुए राज्यपाल सरकार पर कड़े शब्दों में हमला कर चुके हैं.
इस महीने की शुरुआत में बैरकपुर के भाजपा सांसद मनीष शुक्ला की हत्या के मुद्दे पर भी वे क़ानून व्यवस्था पर अंगुली उठा चुके हैं.
भाजपा उनसे इस मामले की सीबीआई से जाँच कराने की माँग कर चुकी है. राज्यपाल बार-बार क़ानून और व्यवस्था की स्थिति पर ममता बनर्जी से सफाई माँगते रहे हैं.

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तृणमूल का क्या है आरोप
धनखड़ राज्य में अगस्त के दौरान दो सौ से ज़्यादा रेप और छह सौ से ज़्यादा अपहरण के मुद्दे पर भी सरकार के साथ दो-दो हाथ कर चुके हैं. उससे पहले कोरोना संक्रमितों के आंकड़ों पर भी राजभवन और सरकार के बीच लंबा वाक-युद्ध हो चुका है.
राज्यपाल के हर दावों को भाजपा का समर्थन मिलता रहा है. इसी वजह से उन पर भाजपा के सियासी हित में काम करने के आरोप भी लगते रहे हैं. ममता और उनकी पार्टी ने तो हाल में राज्यपाल पर भाजपा के प्रवक्ता के तौर पर काम करने और राजभवन को पार्टी का अघोषित दफ्तर बनाने का भी आरोप लगाया था.
भाजपा ने सरकार पर राज्यपाल के अपमान का आरोप लगाया है. दिलीप घोष कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस सरकार और उसके मंत्री जिस तरह लगातार राज्यपाल का अपमान कर रहे हैं उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलेगी."
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता सौगत राय कहते हैं, "राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख की बजाय एक ख़ास पार्टी के हितों की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं. राज्य सरकार के ख़िलाफ़ लगातार ट्वीट और राजनीतिक टिप्पणियां कर उन्होंने अपना असली चेहरा दिखा दिया है."

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अब तक शायद ही कोई दिन ऐसा गुज़रा है जब राज्यपाल ने अपने ट्वीट के जरिए सरकार, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को कठघरे में नहीं खड़ा किया हो. वह चाहे कोरोना का मुद्दा हो, राशन वितरण का या फिर अंफान तूफान के बाद राहत और बचाव कार्यों का राज्यपाल लगातार सरकार पर हमले करते रहे हैं.
शुक्रवार की सुबह अपने दो ट्वीट में मुख्यमंत्री पर हमला करते हुए उन्होंने पुलिस को राजनीतिक रूप से तटस्थ बनाने की वकालत की. वह पहले से पुलिस पर तृणमूल कांग्रेस और सरकार के हित में काम करने के आरोप लगाते रहे हैं.
धनखड़ ने राज्यपाल बनने के बाद अब तक जितनी सुर्खियाँ बटोरी हैं उतनी शायद उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक करियर में नहीं बटोरी हों.
वैसे पिछले राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी के कार्यकाल के आखिरी दिनों में भी सरकार के साथ उनके रिश्ते काफ़ी तल्ख हो गए थे, लेकिन नए राज्यपाल के साथ तो उनके शपथ लेने के महीने भर बाद से ही टकराव शुरू हो गया था.

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विवादों का सिलसिला कब शुरू हुआ
धनखड़ ने बीते साल 30 जुलाई को राज्यपाल के तौर पर शपथ ली थी. उस शपथ ग्रहण समारोह में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्यपाल के बीच काफ़ी सद्भाव नज़र आया था. लेकिन वह पहला मौका था. उसके बाद यह दोनों लोग और दो बार साथ नज़र आए थे. वह मौका था बीते साल ममता के घर आयोजित कालीपूजा का.
तब राज्यपाल अपनी पत्नी के साथ उनके घर गए थे. उसके बाद ममता ने एक बार राजभवन जाकर उसे मुलाक़ात की थी, लेकिन उसके बाद इन दोनों के बीच विवादों का सिलसिला लगातार तेज़ हुआ है.
तृणमूल कांग्रेस नेताओं के अलावा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक राज्यपाल पर संवैधानिक दायरे का अतिक्रमण करने के आरोप लगा चुके हैं, लेकिन राज्यपाल कई बार दोहरा चुके हैं कि वे अपने संवैधानिक दायरे में ही रह कर ही काम कर रहे हैं.
राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "लगभग हर मुद्दे पर सरकार के प्रति राज्यपाल के आक्रामक रुख से तृणमूल के इस आरोप को बल मिलता है कि वे एक खास पार्टी के राजनीतिक हित में काम कर रहे हैं. लोकतंत्र में ऐसा टकराव किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता. इस टकराव पर अंकुश लगाना ही राज्य और इसके लोगों के हित में होगा."
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