एंगेला मर्केल: 16 साल तक सत्ता में रहने वाली नेता को जर्मनी के लोग कैसे याद करेंगे?

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- Author, जोशुआ नेवेट
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
जर्मनी में रविवार को आम चुनाव के लिए मतदान होने जा रहा है.
इसके साथ ही जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल का अंतिम कार्यकाल ख़त्म हो जाएगा.
16 सालों तक जर्मनी की सत्ता में रहने के बाद एंगेला मर्केल अपना पद छोड़ देंगी.
ऐसे में सवाल ये उठता है कि इतिहास मर्केल को किस रूप में याद रखेगा?
एंगेला मर्केल की नेतृत्व शैली और उनके ट्रैक रिकॉर्ड के आकलन के लिए बीबीसी ने चार विशेषज्ञों से बात की. पेश है इन चारों विशेषज्ञों से हुई बातचीत पर आधारित ये रिपोर्ट:
क्या है चांसलर एंगेला मर्केल की विरासत?

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मैट क्वार्ट्रुप: कोवेंट्री यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर और 'एंगेला मर्केल: यूरोप्स मोस्ट इन्फ्लुएंशियल लीडर' के लेखक
वो कहते हैं कि एंगेला मर्केल ने जर्मनी की राजनीति को 'राजनीति' की बजाय 'नीति की चर्चा' में बदल दिया.
उनसे पहले जर्मनी की राजनीति 'मैनरक्लब' यानी पुरुषों का क्लब हुआ करती थी. लेकिन उनके नेतृत्व में माहौल पॉलिसी की ओर ज्यादा झुक गया.
मुझे लगता है कि ऐसा होने पर समस्या ये होती है कि राजनीति काफी मशीनी और वैज्ञानिक हो जाती है.
एंगेला मर्केल एक भौतिक विज्ञानी रही हैं. उन्होंने क्वांटम केमिस्ट्री में पीएचडी की है. इसलिए, उनके जैसे किसी इंसान के पास तथ्यों पर आधारित नज़रिया होता है.
राजनीति केवल देश घूमने की चीज नहीं है. उन्होंने अपने तरीके से जर्मनी और दुनिया की राजनीति में एक आम बदलाव लाया है.
ऐसे समय जब राजनीति बहुत ज्यादा ध्रुवीकृत हो गई, तब उन्होंने मुद्दों का गैर-राजनीतिकरण करके माहौल को ध्रुवीकरण से दूर रखने की कोशिश की.

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शार्लोट गैलपिन: बर्मिंघम विश्वविद्यालय में जर्मन और यूरोपीय राजनीति के सीनियर लेक्चरर
एंगेला मर्केल को फोर्ब्स पत्रिका ने 10 सालों तक दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिला घोषित किया. जर्मनी में एक पूरी पीढ़ी ऐसी है, जिसने एक महिला नेता के सिवा किसी और को नहीं जाना.
महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिहाज से इस पद पर उनका होना प्रतीकात्मक रूप से काफी अहम रहा. उन्हें महिलाओं को प्रमुख पदों पर बिठाने के लिए जाना जाता है. उदाहरण के लिए, जर्मनी की पहली महिला रक्षा मंत्री और अब यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन को उन्होंने ही आगे बढ़ाया.
फिर भी, इस तरह के प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व का ये मतलब नहीं होता कि इससे भी बड़े परिवर्तन अपने-आप हो जाएंगे. ख़ासकर दूसरे नस्ल की महिलाओं और एलजीबीटीक्यू कम्यूनिटी के लिए होने वाले बदलाव.
मुस्लिम महिलाओं को निशाना बनाने और तथाकथित लैंगिक पागलपन के ख़िलाफ़ रैली करने का चलन जर्मनी में काफी है. अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) पार्टी के साथ दूसरी पार्टियां भी ये काम करती हैं. इस चुनाव में, जेंडर-उपयुक्त भाषा का मसला एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है. हालांकि इस पर एंगेला मर्केल ज्यादातर चुप ही रही हैं.

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डॉ. रुडिगर श्मिट-बेक: मैनहेम विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान और राजनीतिक समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर
एंगेला मर्केल की नीतिगत विरासत आधुनिकीकरण और पिछड़ेपन का अजीब मिश्रण है.
आधुनिकीकरण की कई विशेषताएं, जैसे कि समलैंगिक विवाह, परमाणु ऊर्जा को चरणबद्ध तरीके से ख़ात्मा और आप्रवासन नीतियों का स्वागत, किसी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक चांसलर से उम्मीद नहीं की जा सकती.
हालांकि, डिजिटलीकरण, जलवायु नीति और जनसांख्यिकीय परिवर्तन जैसे बड़े मुद्दों पर जर्मनी लगभग पिछड़ रहा है.
एंगेला मर्केल के पद छोड़ते समय देश का राजनीतिक परिदृश्य बहुत अस्थिर है. आंशिक रूप से, ये चिंताएं जटिल दलीय प्रणाली और आप्रवासी विरोधी भावना के चलते पनपने वाली एएफडी के चलते पैदा हुई हैं.
ये बात तो साफ है कि एंगेला मर्केल देश की पहली महिला चांसलर रही हैं. मुझे यकीन है कि शासन करने की उनकी व्यावहारिक और राष्ट्रपति जैसी उनकी शैली उनके उत्तराधिकारी, चाहे वो कोई भी क्यों न हो, के लिए एक आदर्श का काम करेगी.

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डॉ. कैटरीन श्राइटर: किंग्स कॉलेज, लंदन में जर्मन और यूरोपीय अध्ययन की लेक्चरर
मर्केल की विरासत दृढ़ और मौन है. उनका नेतृत्व स्थिर आकलन और विश्वसनीयता पर आधारित है. दूरदर्शी न होने के लिए उनकी हमेशा आलोचना की जाती है. लेकिन वोटर हमेशा जानते थे कि उन्हें उनसे क्या मिल रहा है.
वो माहौल पढ़ने और मतदाताओं का मूड भांपने के मामले में प्रतिभा की काफी धनी रही हैं. इसके लिए, उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों से भी काफी सम्मान हासिल किया है.
दूसरी विरासत, जो वो छोड़कर जा रही हैं, वो ये कि उन्होंने अपनी रूढ़िवादी पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेट के एजेंडे को उदार बनाया है. अपनी पार्टी को वो बीच वाली विचारधारा के करीब लेकर आ गई हैं. कुछ मामलों में तो वामपंथी ग्रीन्स के करीब भी पहुंच गई हैं.
चांसलर के रूप में उनके अहम क्षण क्या थे?

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मैट क्वॉर्ट्रुप:
यूरो को बचाना और 2008 के वित्तीय संकट से निपटना, उनकी मुख्य विरासत रही है.
मुझे उनसे ब्रुसेल्स में हुई उस समय की बात याद है. उस संकट के जवाब में उन्होंने कहा था कि वो जितना संभव हो, उतना मार्केट इकोनॉमिक्स को चाहती हैं. साथ ही, जितना आवश्यक हो, उतना राज्य का हस्तक्षेप भी पसंद करती हैं.
1960 के दशक में जर्मन सोशल डेमोक्रेट्स ने उस वाक्य को एक नारे के रूप में इस्तेमाल किया था. जब मैंने उन्हें ये बात बताई तो उन्होंने कहा, "मैं एक इतिहासकार नहीं, एक व्यावहारिक इंसान हूं."
दूसरा क्षण, ट्रंप के कार्यकाल को लेकर उनकी प्रतिक्रिया थी. वो उदार अंतरराष्ट्रीयतावाद को लेकर सतर्क और किसी आपात स्थिति के लिए तैयार रहने वाली राजनेता रही हैं.
वास्तव में, उनके चौथे कार्यकाल के लिए अमेरिका के तब के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मनाया था. ट्रंप के चुनाव जीतने के तुरंत बाद ओबामा उनसे मिलने बर्लिन भी गए. मुलाकात के बाद ओबामा ने बताया था कि मर्केल की आंखों में आंसू थे और वो बिलकुल अकेली हैं.
एंगेला मर्केल ने संकट के समय जहाज को डूबने से बचाए रखा. एक तरह से अब वो अपना कर्तव्य निभा चुकी है. अब वो विदा ले सकती हैं.

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शार्लोट गैलपिन:
मर्केल के कार्यकाल को आमतौर पर संकटों के जरिए बताया जाता है.
ऐसा ही एक अहम क्षण शरणार्थी संकट का था. बाल्कन में मानवीय संकट का सामना करते हुए एंगेला मर्केल ने जर्मनी की सीमाओं को खोल दिया था.
2015 में जर्मनी ने करीब 10 लाख शरणार्थियों को अपने यहां बुलाया. तब वो कही रही थीं, "विर स्काफेन दास" यानी हम इससे निपट सकते हैं.
जर्मनी उन कुछ यूरोपीय देशों में से एक था, जिन्होंने सीरिया के गृहयुद्ध से भाग रहे लोगों को अपने यहां शरण दी. इस दौरान एएफडी को आर्थिक रूप से उदार और यूरो विरोधी एजेंडे से धुर दक्षिणपंथी और इस्लामोफोबिक एजेंडे की ओर बढ़ते देखा.
बुंडेस्टैग के पिछले चुनाव में एएफडी की सफलता की वजह से 1960 के दशक के बाद, देश ने पहली बार धुर दक्षिणपंथी सांसदों को देखा.

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डॉ. रुडिगर श्मिट-बेक:
तीन ऐसे पल विशेष रूप से याद आते हैं.
सबसे पहला पल तब का है, जब एंगेला मर्केल और उनकी वित्त मंत्री ने 2008 में अपने नागरिकों को ये भरोसा देने के लिए संबोधित किया कि सरकार बैंकों में जमा उनकी बचत की गारंटी देगी.
दूसरा पल, यूरो संकट के दौरान ग्रीस को ऋण में राहत देने के लिए यूरोपीय संघ की वार्ता के दौरान का है.
और तीसरा मौका तब आया जब 2015 में हंगरी में फंसे शरणार्थियों के लिए जर्मनी ने अपनी सीमा बंद न करने का निर्णय लिया.
किसी को इस बात की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि एंगेला मर्केल ने अपनी सीमा खोलने का नहीं, बल्कि उसे बंद न करने का निर्णय लिया था.

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डॉ. कैटरीन श्राइटर:
ऐसा क्षण 2017 में तब आया, जब उन्होंने संसद से समलैंगिक विवाह को मंजूरी देने का रास्ता प्रशस्त किया.
चुनाव से कुछ समय पहले उन्होंने एक महिला पत्रिका को इंटरव्यू दिया था. इसमें उन्होंने कहा था कि इन मुद्दों पर मतदान निजी विवेक का मामला है.
ऐसा करके उन्होंने मूल रूप से पार्टी लाइन को तोड़ा था और आख़िरकार सालों बाद उस कानून को पारित किया जा सका. वो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी.
उनकी कही कई बातों में से मेरी सबसे पसंदीदा बात ये है.
एक बार जब उनसे पूछा गया कि वो जर्मनी के बारे में क्या सोचती हैं, तो उन्होंने कहा, "मैं अच्छी तरह से सीलबंद खिड़कियों के बारे में सोचती हूं. कोई भी देश ऐसी सीलबंद और सुंदर खिड़कियां नहीं बना सकता."
यह उनकी विनम्रता और व्यावहारिकता को दर्शाता है. उन्होंने इसे बहुत व्यावहारिक तरीके से तोड़ दिया है.
(इन सवालों के जवाब संक्षिप्त और स्पष्ट रखते हुए संपादित किए गए हैं.)
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