जर्मनी कैसे बन गया कारों का देश

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- Author, सारा स्टेपल्स
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
1888 में बर्था बेंज़ ने साबित किया था कि उनके पति कार्ल की मोटरवैगन सुरक्षित और बिकने के लिए तैयार है. तब से लेकर आज तक जर्मनी प्रीमियम कारों और कार संस्कृति वाला देश है.
दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी के ब्लैक फॉरेस्ट के आख़िर में एडगर मेयेर ने एक पुरानी पतली सड़क की ओर गाड़ी घुमा दी.
सड़क के दोनों ओर पेड़ थे और अंगूर की बेलें ऊपर तक फैली हुई थीं. चिड़ियों की चहचहाहट और मेयेर की विंटेज बीएमडब्ल्यू कार की आवाज़ के सिवा वहां दूसरा कोई शोर नहीं था.
हम व्यस्त शहर डोसेनहेम से गुजर रहे थे, लेकिन इस शांत पतली सड़क पर हम बिल्कुल अकेले थे.
तकनीकी रूप से यह रास्ता बर्था बेंज़ मेमोरियल रूट से थोड़ा हटकर है. लेकिन रिटायर्ड सेल्स एक्जीक्यूटिव मेयेर का कहना है कि 1888 में पेट्रोल से चलने वाली पहली मोटरकार लेकर दुनिया की पहली रोड ट्रिप पर निकली बर्था और उनके किशोर बेटों के अनुभव को समझने के लिए यह सही जगह है.

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सड़क पर कार की पहली सवारी
बर्था ने मैनहेम में अपने घर से फ़ौर्ज़ाइम में अपनी मां के घर के बीच 194 किलोमीटर का सफर तय किया था, जिससे उनकी निडरता का पता चलता है.
इस सफ़र की जानकारी बर्था के पति कार्ल बेंज़ को भी नहीं थी. बर्था की कार- बेंज़ मोटरवैगन नंबर 3 उनके पति की बनाई मोटरवैगन से थोड़ी अलग थी.
कार्ल ने अपनी मोटरवैगन को 1886 में पेटेंट कराया था. उसी साल से ऑटोमोबाइल की शुरुआत माना जाता है.
बर्था ने पति के काम में मदद करने के लिए शादी में मिले दहेज का निवेश किया था. लेकिन कार्ल के मोटरवैगन को सड़क पर चलाने की इजाज़त नहीं थी.
सरकारी अधिकारी मोटरवैगन को शंका की नज़र से देखते थे. एक टेस्ट ड्राइव के दौरान मोटर की आवाज़ से घोड़े और कुत्ते बिदककर भीड़ के अंदर घुस गए थे.
ऐसे में प्रोटोटाइप मॉडल को लेकर ग़ैर-क़ानूनी यात्रा पर निकलना एक क्रांतिकारी क़दम था और यह घोषणा भी थी कि यह सुरक्षित है और इसे बेचा जा सकता है.
इसमें कार्ल के लिए भी एक संदेश था कि हिम्मत रखो और आगे बढ़ते रहो.

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पति-पत्नी का टीम वर्क
मेयेर कहते हैं, "ऑटोमोबाइल का आविष्कार अकेले कार्ल ने नहीं किया था. इसमें कार्ल और बर्था दोनों थे. दोनों को मोटरवैगन पर यकीन था और वे साथ काम कर रहे थे."
मेयेरे ने 2008 में बर्था बेंज़ मेमोरियल रूट का नक्शा तैयार किया जो कई शहरों, कस्बों और गांवों से होकर गुजरता है. वह कहते हैं, "मैं बर्था को इतिहास में वह जगह देना चाहता था जिसकी वह हकदार हैं."
सड़क के नक्शे और जीपीएस से पहले के युग में बर्था नदियों और रेल की पटरियों के सहारे रास्ता खोजते हुए अपनी मां के घर तक पहुंची थीं.
वह लकड़ी के पहियों और 2-हॉर्सपावर, 4-स्ट्रोक इंजन वाली छोटी गाड़ी में बैठकर पथरीली सड़क पर सफर के लिए निकली थीं.
इससे पता चलता है कि वह कितनी बहादुर थीं और शायद थोड़ी सनकी भी. हो सकता है कि यही उनकी कामयाबी का राज़ भी हो.
ऑटोमोटिव इंडस्ट्री के इतिहास में जर्मनी की जगह तलाशने के लिए मैं दक्षिणी जर्मनी के इस औद्योगिक केंद्र तक पहुंची थी.
हम सड़क के रास्ते बाडेन-वुर्टेमबर्ग और बावरिया से होकर गुजर रहे थे. इन दोनों राज्यों में जर्मनी की लग्ज़री कार कंपनियां स्थित हैं. ये कार-संस्कृति और संग्रहालयों के भी केंद्र हैं.

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ऑटोमोबाइल युग की शुरुआत
बर्था की सड़क यात्रा ने ऑटोमोबाइल युग की शुरुआत की थी. वह यात्रा इतिहास के कूड़ेदान में नहीं गई.
1888 के अंत तक मोटरवैगन 3 का उत्पादन शुरू हो गया और 1900 ईस्वी आते-आते बेंज़ एंड सी दुनिया की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी बन गई.
तब से लेकर आज तक जर्मनी प्रीमियम कारों और कार संस्कृति वाला देश है. जर्मन थिंक टैंक फ्रेडरिक-एबर्ट-स्टिफ्टंग की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक आधी गाड़ियां यूरोप के बाजारों में बिकती हैं और 2016 में दुनिया भर में बिकने वाली दो-तिहाई लग्ज़री गाड़ियों को जर्मनी में डिजाइन किया गया था.
19वीं सदी में ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी में होने वाले मशीनीकरण का जिक्र करते हुए मर्सिडीज-बेंज़ कॉरपोरेट आर्काइव्स के गेरार्ड हेडब्रिंक कहते हैं, "यह कहा जा सकता है कि यूरोप की हवा में कुछ बात थी."
बाडेन-वुर्टेमबर्ग और बावरिया में जटिल उत्तराधिकार कानूनों के कारण परिवार में खेतों का बंटवारा होते-होते वे बहुत छोटे रह गए थे, जिससे खेती करना फायदेमंद नहीं रह गया था. नई पीढ़ी को रोजी-रोटी के लिए कुछ नया सोचना था.
कार्ल बेंज़ जब ग्रैजुएट हुए और मैकेनिकल इंजीनियर का काम करना शुरू किया तो उन्होंने अपने आस-पास कई आविष्कारक देखे. वे जिस इलाके से आते थे वह उद्यमिता और भारी उद्योग का केंद्र बन गया था.

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सिर्फ़ अच्छा होना काफ़ी नहीं
कार निर्माताओं की कामयाबी के पीछे जर्मनी के लोगों के कई स्वाभाविक लक्षणों का भी योगदान था, जैसे- काम का जुनून और छोटी-छोटी बातों पर ध्यान.
डेमलर-मोटर्स-गसेल्स्काफ्ट (DMG) के संस्थापक गोटलिब डेमलर और उनके व्यापारिक सहयोगी विल्हेम मेबैक ने अपना कॉरपोरेट मोटो रखा था- "सबसे अच्छा या कुछ नहीं." आज डेमलर एजी मर्सिडीज-बेंज़ ब्रांड की निर्माता कंपनी है.
बावरिया के शहर इंगोलस्टेड में ऑडी हेरिटेज म्यूजियम के एक टूर गाइड कहते हैं, "सिर्फ़ अच्छा होना पर्याप्त नहीं है."
इसी तरह स्टटगार्ट के पोर्शे म्यूजियम के टूर गाइड कहते हैं, "भले ही हम 8.2 करोड़ लोगों में से सभी ऐसे न हों, लेकिन मेहनती होना जर्मनी के लोगों का गुण है."
जर्मनी की ऑटो इंडस्ट्री कंपनियों के उतार-चढ़ाव, गठन और विघटन, विलय और अलगाव के रास्ते आगे बढ़ती रही, मगर उनमें सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरिंग टैलेंट के लिए हमेशा होड़ रही.
कॉरपोरेट प्रतिद्वंद्विता बदलती रही और भुलाई जाती रही. 1926 में दो प्रतिद्वंद्वी कंपनियां मैनहेम की बेंज़ और स्टटगार्ट की डेमलर एक हो गईं. फिर भी निष्ठा में कोई कमी नहीं आई.
मैनहेम में एक टूर गाइड ने चुटकी लेते हुए कहा, "यदि आप यहां कोई बखेड़ा नहीं चाहती हैं तो कृपया यह मत कहें कि ऑटोमोबाइल का आविष्कार डेमलर ने किया था."
प्रतिद्वंद्विता अक्सर नये आविष्कारों को प्रेरित करती है. पोर्शे एजी के मुख्य अभिलेखक फ्रैंक जंग का कहना है कि दक्षिणी जर्मनी में ऑटोमोटिव इंडस्ट्री के एक अगुआ असल में मिस्त्री थे जो ट्रायल और गलतियों से सुधार कर रहे थे.
"अगर आप पूर्णता के लिए प्रयास नहीं कर रहे हैं तो आपके मिस्त्री होने की कोई ज़रूरत नहीं है."
जर्मनी के ऑटोमोटिव हेरिटेज संग्रहालयों में पता चलता है कि इन आविष्कारकों ने किस तरह मोटरवैगन को फॉलो किया और नई-नई चीज़ें कीं.
सुधार की कोशिशें जारी हैं
डेमलर और मेबैच के कार्बोरेटर ने पेट्रोल को इंधन के रूप में इस्तेमाल करना संभव बना दिया.
डेमलर कंपनी ने 1900 में पहली मर्सिडीज 35 पीएस कार बनाई जिसने पहली बार आधुनिक कार को आकार दिया.
1948 में पोर्शे एजी ने पोर्शे 356 कार बनाई जो जर्मन बॉहॉस डिजाइन की सादगी से प्रेरित थीं.
बीएमडब्लू की पहली इलेक्ट्रिक कॉन्सेप्ट कार बीएमडब्लू 1602-ई 1972 में बनी और 2019 में ऑडी ने मशीनी अक़्ल से चलने वाली कार ए8 बनाई.
1890 के दशक के फ्रांसीसी आविष्कारों को छोड़ दें तो जर्मनी के कार निर्माता हमेशा इंडस्ट्री में सबसे आगे रहे. हेडब्रिंक कहते हैं, "नई खोज और लग्ज़री हमेशा साथ-साथ चले."
मिसाल के लिए, ऑडी एजी के मजदूर हर साल सुधार के हजारों सुझाव देते हैं. उनके कई सुझाव इंगोलस्टेड में ऑडी के मुख्यालय तक पहुंचते हैं और उन पर अमल भी होता है.
जर्मनी के लोग कार के दीवाने हैं. वे न सिर्फ़ उनको बनाते हैं, सुधारते हैं बल्कि उनका लुत्फ भी उठाते हैं.
लेखक मार्क ट्वेन ने दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी की अपनी यात्राओं के बारे में लिखा है कि गर्मियों में जर्मनी की ख़ूबसूरती चरम पर होती है.
कार की खिड़कियों से ख़ूबसूरत खेत दिखते हैं, रेपसीड (सफेद सरसों) के पीले फूलों से भरे खेत नज़र आते हैं, कम ऊंचाई वाले पहाड़, कहीं-कहीं घने जंगल, बीच में बने महल और लकड़ी के घरों वाले गांव दिखते हैं.
इन दृश्यों को देखने के लिए जर्मनी के लोग ख़ूब यात्राएं करते हैं और गाड़ियों का लुत्फ भी उठाते हैं. जर्मनी में कार सिर्फ़ परिवहन का साधन नहीं है. यह जर्मनी की संस्कृति में गहराई से बसा हुआ है.
विनफ्रेड ए सिडल ने ऑटो-पार्ट्स बाजार वेटेरामा से हुई आमदनी का उपयोग लैडेनबर्ग गांव् में डॉ. कार्ल बेंज़ ऑटोम्यूजियम खोलने में किया है. बेंज़ परिवार इसी गांव में बसा था.
सिडल कहते हैं, "हमारा देश संग्राहकों का देश है. मैं देखता हूं कि सड़क पर बहुत बेशकीमती गाड़ियां दौड़ रही हैं."

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रफ़्तार का रोमांच
लैडेनबर्ग से म्यूनिख में बीएमडब्लू के मुख्यालय तक के सफर में मैं रोमांटिक रोड के एक हिस्से पर भी चली.
350 किलोमीटर लंबी यह सड़क बाडेन-वुर्टेमबर्ग और बावरिया से गुजरती है. यह सड़क के दोनों ओर ख़ूबसूरत दृश्यों के लिए मशहूर है.
म्यूनिख में बीएमडब्लू वेल्ट और उसके साथ लगे बीएमडब्लू म्यूजियम की यात्रा के बाद ऑटोबन हाईवे पर किराये की अपनी फॉक्सवैगन टिगुआन की रफ़्तार बढ़ाने का रोमांच ही अलग था.
कार चलाते हुए वर्षों में पहली बार मुझे इतना आनंद आया. मैं कई बार गति सीमा को छू गई और हर बार टिगुआन के डैशबोर्ड पर उस जगह की कानूनी गति सीमा का संदेश आ गया. कनाडा में मेरे घर की कारों के मुक़ाबले यह तकनीक वर्षों आगे है.
बर्था बेंज़ की पहली सड़क यात्रा के बाद एक सदी से ज़्यादा समय गुजर चुका है, लेकिन लगता है कि जर्मनी के लोग अब भी ड्राइव को परफेक्ट बनाने के तरीके ढूंढ़ रहे हैं.
(यह लेख बीबीसी ट्रैवल की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी ट्रैवलके दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)
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