जर्मनी के युवा भविष्य को लेकर निराश क्यों हैं?

जर्मनी के युवा

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    • Author, एमिली शुलदाइस
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल के लिए

उनकी माली हालत अच्छी है, लेकिन देश के भविष्य की चिंता करके वे चिंतिंत हो रहे हैं. दक्षिणपंथ के उभार ने जर्मनी के नौजवानों का चैन छीन लिया है.

जर्मनी की अर्थव्यवस्था तरक्की पर है. बेरोजगारी रिकॉर्ड निचले स्तर पर है. यूरोप सहित पूरी दुनिया में जर्मनी को संपन्नता और निपुणता के पर्याय के तौर पर देखा जाता है. यह देश यूरोपीय संघ का ग्रोथ इंजन कहलाता है.

तो फिर जर्मनी के संपन्न युवा अपने भविष्य को लेकर निराश क्यों हैं? उनकी नौकरी की संभावनाएं अच्छी हैं. पर्यावरण साफ है. अपराध की दरें कम हैं. छुट्टी के समय भी भरपूर हैं. उनको संस्कृति से लगाव है. आने-जाने की सुविधाएं भी बेहतरीन हैं.

जर्मनी में सब कुछ है. फिर भी कुछ छिपी हुई समस्याएं हैं, जो जर्मनी के नौजवानों को प्रभावित कर रही हैं.

जनमत सर्वेक्षण संस्थान फोरसा के मुख्य राजनीतिक विश्लेषक पीटर मचुशेक कहते हैं कि वैसे तो जर्मनी के लोग अपने जीवन से संतुष्ट हैं, लेकिन देश जिस दिशा में जा रहा है उससे वे खिन्न हैं.

फोरसा ने जर्मन ब्रॉडकास्टर आरटीएल (RTL) के लिए सर्वे किया तो 81 फीसदी लोगों ने बताया कि वे अपनी निजी माली हालत से या तो खुश हैं या बहुत खुश हैं. लेकिन जब उनसे देश के बारे में पूछा गया तो यह आंकड़ा 10 फीसदी ही रह गया.

71 फीसदी लोगों ने कहा कि जर्मनी का राजनीतिक तंत्र जिस तरह से चलना चाहिए उससे वे सहमत हैं, लेकिन यह तंत्र असल में जैसा काम कर रहा है, उससे सिर्फ 14 फीसदी लोग खुश हैं.

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बात जब अर्थव्यवस्था की आती है तो पिछले साल के मुक़ाबले इस साल लोगों की धारणा बहुत बदली है.

जनवरी 2018 में जब जर्मनी के लोगों से पूछा गया था कि अर्थव्यवस्था सुधरेगी या बिगड़ेगी तब इस सवाल पर जर्मनी के लोग आधे-आधे बंटे हुए थे. गर्मियां बीतने के बाद यही सवाल दुहराया गया तो करीब 20 फीसदी लोग उम्मीद छोड़कर निराशावादी हो गए.

कुछ लोग मानते हैं कि सिर्फ बूढ़े लोगों के साथ ऐसा है, लेकिन युवा भी इसी तरह सोच रहे हैं.

ब्रिटेन में ब्रेक्जिट के बाद जर्मनी के युवाओं को भी लगता है कि वे अपने बाप-दादा की समस्याओं से जूझ रहे हैं और उनका राजनीतिक भविष्य पिछली पीढ़ी तय कर रही है.

जर्मनी के लिए इस साल की गर्मियां उथल-पुथल भरी रही. आप्रवासियों के मुद्दे पर हुई सियासी लड़ाई ने सरकार को करीब-करीब गिरा ही दिया था.

राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के सदस्य मेसुत ओजिल ने साथी खिलाड़ियों और फैन्स पर नस्लभेद का आरोप लगाकर टीम छोड़ दी.

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टर्की मूल के ओजिल के फ़ैसले पर व्यापक चर्चा हुई और जर्मनी के रोजमर्रा के जीवन में नस्लभेद राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया.

अगस्त के आखिर में पूर्वी जर्मनी के सैक्सोनी राज्य में दक्षिणपंथी पार्टी के समर्थकों के दंगे और चेमनिट्ज़ शहर की गलियों में विदेशियों को दौड़ाने के वीडियो फुटेज सामने आए.

चेमनिट्ज़ की तस्वीरों ने जर्मनी को हिला दिया. यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ कि अतीत से जर्मनी ने आखिर क्या सीखा है. जर्मन मीडिया ने इसे संकट के तौर पर दिखाया.

जून में जब जर्मनी की फुटबॉल टीम वर्ल्ड कप के दूसरे दौर में पहुंचने में नाकाम रही, तब जर्मन मैगज़ीन 'डेर स्पीगल' ने जो कवर स्टोरी छापी, उसका शीर्षक था- 'एक समय था जब देश मज़बूत था'.

'डेर स्पीगल' ने लिखा, "राजनीति, अर्थव्यवस्था और खेल का संकट संतोष होकर बैठ जाने का परिणाम है. हम यहां तक कैसे पहुंच गए?"

गर्मी के मौसम में जब गर्म हवा के थपेड़े चले तब भी निराशावादी माहौल बना और चर्चा होने लगी कि जलवायु परिवर्तन देश का कितना नुकसान कर रहा है.

तो असल में चल क्या रहा है? क्या निराशावादी माहौल दिखाकर मीडिया ने प्याली में तूफान उठाया? आंकड़े और युवाओं से बातचीत से हालात की दूसरी तस्वीर बनती है.

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युवा सबसे ज्यादा अगर किसी चीज़ से निराश हो रहे हैं तो वह है धुर-दक्षिणपंथी पार्टी 'अल्टरनेटिव फ़ॉर जर्मनी' (एएफ़डी) का उभार. युवाओं को लगता है कि जर्मनी में राजनीति और नीतियों पर जिस तरह चर्चा होती थी, वह खत्म हो चुकी है.

28 साल के टिल बाकेन बर्लिन के एक एनजीओ में काम करते हैं. वे कहते हैं कि एएफ़डी के बढ़ते प्रभाव का असर यह हुआ है कि राजनीति और मीडिया की बहसों में नफरत से भरे विषयों की प्रमुखता होने लगी है.

"जब से एएफ़डी का प्रभाव बढ़ा है, ऐसा लगता है कि पूरी राजनीतिक चर्चा प्रवासन, नफरत और अपराध तक सिमट गई हो. वर्तमान और भविष्य की असल समस्याओं से इसका ध्यान हट गया है."

बाकेन का कहना है कि प्रवासन की जगह सरकार को स्वास्थ्य सेवाएं सुधारने पर ध्यान देना चाहिए. शिक्षा पर ज्यादा निवेश होना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि युवा पीढ़ी को सुरक्षित रिटायरमेंट के लिए कैसे तैयार किया जाए.

बर्लिन की 24 साल की छात्रा जूल लोव कहती हैं कि चेमनिट्ज़ की घटना यह याद दिलाती है कि जर्मनी ने अपने इतिहास के सबक सही से याद नहीं किए.

"अब तक मैं सोचती थी कि जर्मन राष्ट्रवाद, नस्लभेद और पिछली सदी के इतिहास को हम पीछे छोड़ आए हैं. लेकिन हकीकत अलग है."

लोव को लगता है कि चेमनिट्ज़ में जो हुआ वह इस बात का सबूत है कि अगर राजनीतिक चर्चा के विषय नहीं बदले तो ऐसी घटनाएं देश में कहीं भी हो सकती है.

"हमारे आस-पड़ोस में अब तक वैसा नहीं हुआ है, लेकिन हम जहां खड़े हैं वहां से चेमनिट्ज़ ज्यादा दूर नहीं है."

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ऐसी आशंका भी है कि जर्मनी एक बड़े वित्तीय और सामाजिक संकट के मुहाने पर खड़ा है. दूसरे शब्दों में, कई युवा मानते हैं कि अभी तो वे बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन भविष्य में हालात खराब हो सकते हैं.

बाकेन कहते हैं, "हम अच्छा कर रहे हैं, लेकिन अगर आप यहां से 5 या 10 साल आगे की सोचें तो हम एक दोराहे पर खड़े मिलेंगे. हमारा देश विकास कैसे करेगा."

बाकन कहते हैं, "दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद बढ़ने और शिक्षा व बुनियादी ढांचे पर निवेश कम करने से हमारा भविष्य कैसा होगा, इसे लेकर लोग सशंकित हैं."

यूरोप के दूसरे देशों से तुलना करने पर जर्मनी के हालात बड़े अच्छे दिखते हैं. 2017 में यहां बेरोजगारी 6.4 फीसदी थी, जो इटली और ग्रीस जैसे देशों से बहुत कम है. फिर भी युवाओं को लगता है कि पिछली पीढ़ी उन क्षेत्रों पर ध्यान नहीं दे रही है, जो उनको प्रभावित करती हैं.

ड्यूश बैंक की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक 2009 से अब तक प्रमुख शहरों में मकान के दाम 80 फीसदी तक बढ़ चुके हैं. किराया भी बढ़ रहा है. पूरे देश भर में करीब 10 लाख नये घरों की जरूरत है.

ओईसीडी (OECD) रिपोर्ट के मुताबिक बूढ़ों की बढ़ती तादाद पेंशन योजनाएं पर वित्तीय बोझ बढ़ा रही है.

बर्लिन में हेल्थ केयर में काम करने वाले 24 साल के एरॉन हिंज़ कहते हैं, "जर्मनी की राजनीति प्रौढ़ लोगों के लिए है, युवाओं के लिए नहीं."

"जब आप भविष्य में देखते हैं और पूछते हैं कि मेरे रिटायरमेंट के समय पैसे कौन देगा तो कोई नहीं दिखता."

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जर्मनी के लोग अगर अपने भविष्य के प्रति निराश हो रहे हैं तो इसका यह मतलब कतई नहीं है कि बाहर के लोग भी जर्मनी के प्रति इतने ही निराश हों.

यूरोप ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में जर्मनी को युवाओं के लिए एक बेहतरीन अवसर के रूप में देखा जाता है.

सराजेवो में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे डिनो श्विको बीबीसी कैपिटल को बताते हैं कि वे अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जर्मनी जाना चाहते हैं, भले ही उन्हें पत्रकार बनने का मोह छोड़ना पड़े.

"असल में हममें से ज्यादातर लोग बोस्निया के बाहर जाना चाहते हैं, खास तौर पर जर्मनी जो हमारे लिए देवभूमि है."

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैप्टिल पर उपलब्ध है.)

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