बीजेपी इन पांच राज्यों की तरह महाराष्ट्र में लॉन्च करेगी 'ऑपरेशन लोटस'?

महाराष्ट्र

इमेज स्रोत, Getty Images

एकनाथ शिंदे के विद्रोह के बाद भाजपा ने महाराष्ट्र में 'ऑपरेशन लोटस' शुरू किया या नहीं, इस पर चर्चा हो रही है.

भाजपा ने पहले कुछ राज्यों में ये प्रयोग किया था.

बीजेपी पर इस तरह के आरोप कर्नाटक में 'ऑपरेशन लोटस' से शुरू हुए थे.

साल 2008 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई.

हालांकि, बहुमत तक पहुंचने के लिए उनके पास तीन सीटें कम थीं.

उन्हें कुछ विधायकों का समर्थन मिला.

लेकिन सरकार स्थिर रहने के लिए एक और विधायक को पार्टी के साथ जोड़ना पड़ा. वो ऑपरेशन लोटस की शुरुआत थी.

कर्नाटक

इमेज स्रोत, Getty Images

1. कर्नाटक

कांग्रेस और धर्मनिरपेक्ष जनता दल (जेडीएस) के विधायकों ने एक के बाद एक इस्तीफा देना शुरू कर दिया.

इस तरह कुल आठ विधायकों ने इस्तीफा दिया और इन विधायकों ने बीजेपी से उपचुनाव लड़ा. इनमें से भाजपा के पांच विधायक चुने गए.

इसके बाद भाजपा को स्थिर सरकार के लिए जरूरी ताकत मिली.

कर्नाटक के वरिष्ठ पत्रकार इमरान कुरैशी कहते हैं, "ऑपरेशन लोटस बीजेपी द्वारा किया गया एक नया प्रयोग था."

ऑपरेशन लोटस दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए एक बचाव का रास्ता है. इस कानून के अनुसार, यदि कोई विधायक निर्वाचित होने के बाद किसी अन्य पार्टी में शामिल हो जाता है, तो उसकी सदस्यता रद्द कर दी जाती है.

शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया

इमेज स्रोत, ANI

इमेज कैप्शन, शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया

3. मध्य प्रदेश

साल 2018 में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए थे. इसमें भाजपा के 109 विधायक चुने गए, जबकि कांग्रेस के 114 विधायक निर्वाचित हुए.

कांग्रेस ने कमलनाथ के नेतृत्व में निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई.

लेकिन डेढ़ साल के भीतर ही कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच सत्ता संघर्ष शुरू हो गया.

आखिरकार मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य 22 विधायकों के साथ बीजेपी में शामिल हो गए.

बागी विधायकों में तत्कालीन कमलनाथ सरकार के 14 मंत्री शामिल थे. उसके बाद भाजपा के शिवराज सिंह चौहान एक बार फिर मुख्यमंत्री बने.

वीडियो कैप्शन, नवाब मलिक: कबाड़ीवाले के मंत्री बनने की कहानी

2. गोवा

कर्नाटक ही नहीं बल्कि कई अन्य राज्यों में भी बीजेपी समय-समय पर विधायकों का इस तरह से इंतज़ाम करती रही है.

गोवा में कांग्रेस के 15 विधायकों में से 10 विधायक बीजेपी में शामिल हो गए.

चूंकि यह संख्या दो तिहाई से अधिक है, भाजपा दल-बदल विरोधी कानून से प्रभावित नहीं हुई.

उत्तराखंड

4. उत्तराखंड

साल 2016 में उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार को नौ विधायकों के विद्रोह में उलझा दिया गया था.

इन विधायकों के ख़िलाफ़ विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्य ठहराए जाने के बाद, कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाया गया.

उस वक्त कांग्रेस ने बगावत के पीछे बीजेपी का हाथ होने का आरोप लगाया था. बागी विधायक बाद में भाजपा में शामिल हो गए.

वीडियो कैप्शन, महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख के इस्तीफ़े पर क्या बोले पार्टी नेता?

5. अरुणाचल प्रदेश

अरुणाचल प्रदेश में भी 2016 में बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन में कांग्रेस विधायक चले गए थे जिसके बाद वहां सत्ता में बदलाव आ गया था.

इस में कांग्रेस के 42 विधायक भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन 'पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल' में शामिल हो गए थे.

देवेंद्र फडणवीस

इमेज स्रोत, Twitter

दल-बदल विरोधी क़ानून क्या है?

साल 1985 में संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई. ये संविधान में 52वां संशोधन था.

इसमें विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर लगाम लगाई गई.

इसमें ये भी बताया गया कि दल-बदल के कारण इनकी सदस्यता भी ख़त्म हो सकती है.

वीडियो कैप्शन, राज ठाकरे की राजनीति अब कैसी होगी?

कब-कब लागू होगा दल-बदल क़ानून

1. अगर कोई विधायक या सांसद ख़ुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है.

2. अगर कोई निर्वाचित विधायक या सांसद पार्टी लाइन के ख़िलाफ़ जाता है.

3. अगर कोई सदस्य पार्टी ह्विप के बावजूद वोट नहीं करता.

4. अगर कोई सदस्य सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है.

विधायक या सांसद बनने के बाद ख़ुद से पार्टी सदस्यता छोड़ने, पार्टी व्हिप या पार्टी निर्देश का उल्लंघन दल-बदल क़ानून में आता है.

वीडियो कैप्शन, महाराष्ट्र में अब महाअघाड़ी?

लेकिन इसमें अपवाद भी है......

अगर किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें, तो उनकी सदस्यता ख़त्म नहीं होगी.

वर्ष 2003 में इस क़ानून में संशोधन भी किया गया. जब ये क़ानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी भूल पार्टी में बँटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया ग्रुप बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी.

लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फ़ायदा उठाया जा रहा है. इसलिए ये प्रावधान ख़त्म कर दिया गया.

इसके बाद संविधान में 91वाँ संशोधन जोड़ा गया. जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक दल बदल को असंवैधानिक करार दिया गया.

विधायक कुछ परिस्थितियों में सदस्यता गँवाने से बच सकते हैं. अगर एक पार्टी के दो तिहाई सदस्य मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी पार्टी में मिल जाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी.

ऐसी स्थिति में न तो दूसरी पार्टी में विलय करने वाले सदस्य और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं.

वीडियो कैप्शन, अर्नब गोस्वामी महाराष्ट्र की राजनीति में मोहरा या खिलाड़ी?

तो इन परिस्थितियों में नहीं लागू होगा दल बदल क़ानून:

1. जब पूरी की पूरी राजनीतिक पार्टी अन्य राजनीति पार्टी के साथ मिल जाती है.

2. अगर किसी पार्टी के निर्वाचित सदस्य एक नई पार्टी बना लेते हैं.

3. अगर किसी पार्टी के सदस्य दो पार्टियों का विलय स्वीकार नहीं करते और विलय के समय अलग ग्रुप में रहना स्वीकार करते है.

4. जब किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य अलग होकर नई पार्टी में शामिल हो जाते हैं.

वीडियो कैप्शन, आखिर क्या वजह है कि महाराष्ट्र में सरकार नहीं बन पाई?

स्पीकर के फ़ैसले की हो सकती है समीक्षा

10वीं अनुसूची के पैराग्राफ़ 6 के मुताबिक़ स्पीकर या चेयरपर्सन का दल-बदल को लेकर फ़ैसला आख़िरी होगा.

पैराग्राफ़ 7 में कहा गया है कि कोई कोर्ट इसमें दखल नहीं दे सकता.

लेकिन 1991 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 10वीं अनुसूची को वैध तो ठहराया लेकिन पैराग्राफ़ 7 को असंवेधानिक क़रार दे दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर के फ़ैसले की क़ानूनी समीक्षा हो सकती है.

वीडियो कैप्शन, महाराष्ट्र में कैसे बदल गए राजनीतिक समीकरण?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)