पीएम मोदी की इतनी आलोचना क्यों कर रहे हैं के चंद्रशेखर राव- पाँच वजहें

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- Author, जीएस राम मोहन
- पदनाम, बीबीसी तेलुगू
मुंबई के तमाम अख़बारों में इन दिनों के चंद्रशेखर राव की तस्वीरें दिख रही हैं. अख़बारों में केसीआर के विज्ञापन और तस्वीरें मौजूद हैं, वो भी मराठी भाषा में.
केसीआर रविवार को मुंबई में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से मुलाक़ात करेंगे. इसके बाद उनकी मुलाक़ात एनसीपी प्रमुख शरद पवार से होनी है.
लेकिन केसीआर से जुड़ी ख़बरें और विश्लेषण केवल महाराष्ट्र के अख़बारों में ही नहीं दिख रहे हैं, बल्कि देश के दूसरे शहरों में भी केसीआर के भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने से संबंधित ख़बरें पहुंच रही हैं.
बहुत संभव है कि आने वाले दिनों में केसीआर कहीं ज़्यादा आक्रमक होते हुए मोदी की आलोचना करते नज़र आएं.
लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में केसीआर की अचानक सक्रियता की वजह क्या है?
केसीआर भारतीय प्रधानमंत्री की आलोचना करते हुए राज्य सरकार के अधिकारों में दख़ल, जीएसटी, प्रशासनिक सेवाओं में नियुक्ति जैसे मुद्दे उठा रहे हैं. लेकिन संभव है कि केसीआर की आलोचना की प्राथमिक वजह ये सब नहीं हों. प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना के पीछे वास्तविक कारणों का अंदाज़ा इन पांच बातों से लगाया जा सकता है.
1. तीसरी पारी
आपने पहली पारी और दूसरी पारी के बारे में तो सुना होगा, ये तीसरी पारी क्या है? राजनीति में कुछ भी संभव है. केसीआर ने भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें तीसरी पारी खेलने का मौक़ा मिल सकता है. हाल फ़िलहाल की प्रेस बैठकों में वे कहते हैं, "जब मेरा जन्म हुआ होगा तब क्या मेरे पिता ने सोचा होगा कि एक दिन मैं मुख्यमंत्री बनूंगा. राजनीति में कुछ भी संभव है."
केसीआर स्वर्गीय एनटी रामाराव के इतने बड़े प्रशंसक हैं कि उन्होंने अपने बेटे का नाम उन पर ही रखा है.
उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन तेलुगू देशम पार्टी के साथ शुरू किया था. वे पार्टी में मिडिल लेवल के नेता थे और कुछ वक्त तक उन्होंने इसी स्थिति में काम किया. यह उनके राजनीतिक जीवन की पहली पारी थी.
राजनीतिक जीवन की दूसरी पारी में उन्होंने अपनी पार्टी का गठन किया और बीते दो दशकों के दौरान उन्होंने तमाम बाधाओं को पार करते हुए अपनी पार्टी को स्थापित किया. तेलंगाना के गठन के साथ न केवल वे तेलंगाना के मुख्यमंत्री बने बल्कि निर्विवादित रूप में राज्य के सबसे बड़े नेता बन गए.
मौजूदा समय में उन्होंने अपने लिए बड़ा लक्ष्य रखा है. उनका ध्यान दिल्ली की ओर है. कहा जा सकता है कि यह उनकी तीसरी पारी है.

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2. मोदी नया दुश्मन
कहते हैं कि राजनीति में केवल विरोधी होते हैं, कोई दुश्मन नहीं होता. लेकिन केसीआर की राजनीति में हमेशा एक दुश्मन रहा है. बीजेपी की राजनीति की तरह ही तेलंगाना राष्ट्र समिति की राजनीति में ध्रुवीकरण का पहलू रहा है.
केसीआर की रणनीति खुद को तेलंगाना के हिमायती और अपने विरोधियों को तेलंगाना के दुश्मन के तौर पर पेश करने की रही है.
'आंध्र प्रदेश के विभाजन के दौरान संसदीय प्रक्रिया का सही से पालन नहीं हुआ' और 'तेलंगाना के गठन का प्रस्ताव संसद में बंद दरवाजे में अंधेरे में लिया गया' जैसे मोदी के बयान का इस्तेमाल करते हुए केसीआर उन्हें राज्य के दुश्मन के तौर पर पेश करते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार जिनका नागाराजू कहते हैं, "2009 में वाय. एस. राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व वाली कांग्रेस दुश्मन थी. 2014 में आंध्र प्रदेश के नेता दुश्मन थे. 2019 में चंद्रबाबू नायडू दुश्मन थे. हर चुनाव में मतदाताओं को भावनात्मक रूप से जोड़ने के लिए वे किसी ना किसी को दुश्मन बनाते रहे हैं. आज की तारीख में मोदी उनके नए दुश्मन हैं."

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3. बदलते समीकरण और बीजेपी का नया लक्ष्य
हाल फ़िलहाल तक तेलंगाना में बीजेपी विपक्ष में थी लेकिन टीआरएस के साथ उसके रिश्ते मधुर थे. बीजेपी संसद में जो प्रस्ताव रखती थी, टीआरएस उसका समर्थन करती थी. जब तक तेलंगाना बीजेपी की कमान किशन रेड्डी के हाथों में थी, तब तक दोनों पार्टी एक सीमा तक ही एक दूसरे की आलोचना करती थीं.
लेकिन अब स्थिति बदल गई है. उत्तर भारत में अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए बीजेपी के पास अब अधिक जगह नहीं है, ऐसे में पार्टी उन राज्यों की तरफ़ ध्यान दे रही है जहां वह अपनी ताक़त बढ़ा सकती है. पार्टी दक्षिण भारत में अपना विस्तार चाहती है और तेलंगाना उसी रणनीति का हिस्सा है. पश्चिम बंगाल के बाद बीजेपी ने तेलंगाना को अपना लक्ष्य बनाया है.
तेलंगाना में बीजेपी का युवा नेतृत्व अब केसीआर पर रोज़ाना हमले कर रहा है. हैदराबाद नगर निगम में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन और दो विधानसभा सीटों के उपचुनाव में जीत ने बीजेपी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा दिया है.
जातिगत समीकरणों में भी बदलाव हुआ है. राजनीतिक विज्ञान के सेवानिवृत प्रोफेसर के. श्रीनिवासुलू कहते हैं, "अतीत में राज्य बीजेपी की कमान वेलम्मा और रेड्डी जाति के नेताओं के पास थी. अब टीआरएस की कमान भी वेलम्मा नेतृत्व के हाथों में है, ऐसे में बीजेपी पिछड़ी जातियों पर भरोसा कर रहा है. पिछड़ी जातियां बीजेपी की मज़बूती की सबसे बड़ी वजह है और यह टीआरएस के लिए ख़तरा हो सकता है."
अब यह सवाल नहीं रहा कि तेलंगाना में बीजेपी और कांग्रेस में कौन मुख्य विपक्षी दल है. मोदी की लगातार आलोचना से संकेत मिलता है कि टीआरएस के लिए मुख्य विपक्षी दल अब बीजेपी है और आने वाले दिनों में दोनों राजनीतिक दलों में टकराहट बढ़ सकती है.

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4. एक रणनीति से दो निशाने
केसीआर के लिए चुनावी राजनीति में मोदी को चुनौती देने का फ़ैसला बेहद अहम है. वे एक रणनीति से दो निशाने साधना चाहते हैं.
जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार से सर्जिकल स्ट्राइक संबंधी सबूत मांगा तो असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने राहुल गांधी पर हमला किया और आपत्तिज़नक भाषा का इस्तेमाल किया. असम के मुख्यमंत्री के बयान को आधार बना कर केसीआर ने मोदी पर निशाना साधा और कहा , "ऐसी अपमानजनक भाषा से मेरी आंखों में आंसू आ गए. आप ऐसी भाषा इस्तेमाल करते हैं? ये आपकी संस्कृति है? क्या आप उन्हें पार्टी से हटाएंगे?"
केसीआर की यही रणनीति रही है कि वे जिसे अपना दुश्मन घोषित कर देते हैं, उस पर हमला शुरू कर देते हैं.
राज्य में कांग्रेस उनकी विपक्षी पार्टी है लेकिन कांग्रेस नेता के प्रति सहानुभूति दिखाकर उन्होंने ये संकेत दिया कि राज्य में उनको कांग्रेस से कोई ख़तरा नहीं. अहम बात यह है कि उन्होंने चुनाव के बाद गठबंधन की दिशा में भी पहल की.
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़ कांग्रेस पार्टी के बिना किसी तीसरे मोर्चे का आगे बढ़ पाना संभव नहीं होगा. जिनका नागाराजू कहते हैं, "वास्तव में, इस पहल के साथ केसीआर ने आने वाले दिनों में ज़रूरत होने पर कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावनाओं का रास्ता खोल दिया है."
कांग्रेस के साथ गठबंधन टीआरएस के लिए नई बात नहीं है. दोनों पार्टियां पहले भी साथ आ चुकी हैं. केसीआर, कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद के साथ प्रचार कर चुके हैं.
अतीत में देखें तो केसीआर ने यहां तक घोषणा की थी कि अगर तेलंगाना को राज्य का दर्जा मिल जाता है तो वे टीआरएस का विलय कांग्रेस में कर देंगे. तेलंगाना के गठन के बाद सोनिया गांधी के प्रति कृतज्ञता ज़ाहिर करने के लिए वे अपने पूरे परिवार के साथ उनके घर गए थे.
जिनका नागाराजू उस दिन के गवाह हैं जिस दिन केसीआर की मुलाक़ात सोनिया गांधी से हुई थी.
नागाराजू कहते हैं, "केसीआर उस दिन काफ़ी उत्साहित थे. उन्होंने कुछ कांग्रेसी नेताओं को फ़ोन करके भी कहा कि वे सोनिया गांधी के सलाहकार बनने जा रहे हैं और सोनिया गांधी उन्हें उत्तर प्रदेश भेज रहे हैं. यह सब उन्होंने मीडिया के सामने किया था."
5. गति बदली है, लक्ष्य नहीं
राष्ट्रीय मीडिया में केसीआर को लेकर ख़बरें और विश्लेषण लिखे जा रहे हैं और आने वाले दिनों में ये बढ़ेगा. केसीआर का केंद्र में दिखना नया भले है लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा पुरानी है. तेलंगाना में दूसरी बार सरकार बनाने के बाद और 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले, उन्होंने एक मोर्चा बनाने की पूरी कोशिश की थी.
जब राजनीतिक पार्टियां अपने राज्यों में व्यस्त थी और कांग्रेस मुश्किल में थी, तब उन्होंने मौक़े को लपकने की कोशिश की थी. वे ममता बनर्जी से मिलने बंगाल गए. उन्होंने पिनरई विजयन, एमके स्टालिन, नवीन पटनायक से भी बातचीत की.
वे देवगौड़ा से भी मिले, जो ऐसी महत्वाकांक्षा वाले किसी नेता के लिए भी उम्मीद की रोशनी हैं. जैसे भौतिक विज्ञान में लोग रमन प्रभाव की चर्चा करते हैं, वैसे ही भारतीय राजनीति में देवगौड़ा प्रभाव की चर्चा की जाती है. सबको चौंकाते हुए संयुक्त मोर्चा की सरकार में वे प्रधानमंत्री बन चुके हैं.

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छोटी राजनीतिक पार्टी के नेताओं पर इस प्रभाव का असर रहता है. लेकिन अतीत में केसीआर के लिए यह कारगर नहीं रहा. ऐसा लगा कि ग़लत समय में उन्होंने उम्मीदें लगा ली थी.
बीजेपी 2019 में बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रही. अब दो साल बाद लोकसभा चुनाव होने हैं लेकिन केसीआर एक बार फिर अपनी कोशिशें शुरू कर चुके हैं. तीसरा मोर्चा बनाने के लिए वे क्षेत्रीय दलों के नेताओं से मिल रहे हैं. उन्होंने चुनावी जंग का बिगुल फूंक दिया है और संकेत दे रहे हैं कि मोदी को चुनौती देने वाले संभावित नेताओं में वे सबसे आगे हैं. वे राज्य की राजनीति की कमान अपने बेटे को थमाने के लिए उचित समय का इंतज़ार कर रहे हैं और नई दिल्ली को अपना ठिकाना बनाना चाहते हैं.
मौजूदा समय में तेलुगू भाषी क्षेत्र में केसीआर जैसी वाकपटुता किसी दूसरे नेता में नहीं है. राष्ट्रीय स्तर पर भी वे दूसरों से थोड़े आगे दिख रहे हैं. धाराप्रवाह हिंदी बोलना उनकी ख़ासियत है. केसीआर को राजनीतिक तौर पर ऐसा लग रहा होगा कि जिस दौर में अभी भारतीय राजनीति है, उस स्थिति में आने वाले दो साल में कुछ भी संभव है. उन्होंने यह भी अंदाज़ा लगाया होगा कि तेलंगाना से लोकसभा की सीटें कम हैं, ऐसे में मोदी को चुनौती देने वाले नेताओं में सबसे आगे रहना है तो उन्हें मोदी पर हमला करते रहना होगा और लगातार ख़बरों में बने रहना होगा.
बहरहाल अभी तेलंगाना के केसीआर ने यह सुनिश्चित कर लिया है कि लोग उनकी आक्रामकता पर ध्यान दे रहे हैं और वे चर्चा में बने हुए हैं, यानी रेस अभी जारी है.

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