एकनाथ शिंदे की शिवसेना से नाराज़गी के चार कारण क्या हैं?

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महाराष्ट्र में विधान परिषद् चुनाव के नतीजे आने के बाद से राज्य की उद्धव ठाकरे सरकार में शहरी विकास मंत्री एकनाथ शिंदे ग़ायब हैं.
शाम से ही चर्चा थी कि शिवसेना के अहम नेता शिंदे किसी के संपर्क में नहीं हैं.
मंगलवार की सुबर एकनाथ शिंदे के सूरत में होने की ख़बर आई और इसके बाद से ही महाराष्ट्र कि महा विकास अघाड़ी सरकार के भविष्य पर अटकलबाज़ी का दौर भी शुरू हो गया.
हालाँकि, सवाल ये है कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि एकनाथ शिंदे विधायकों के साथ सूरत के होटल में पहुँच गए.
शिवसेना के वरिष्ठ नेताओं में से एक शिंदे और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बीच विधान परिषद् चुनाव को लेकर कथित तौर पर अनबन हो गई. हालाँकि, शिवसेना के स्थापना दिवस पर दोनों के बीच अच्छा तालमेल दिखा था.
ढाई साल पहले मुख्यमंत्री पद की दौड़ में एकनाथ शिंदे का नाम था लेकिन राजनीतिक समीकरण बदले और उद्धव ठाकरे ख़ुद सीएम बन गए.

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1. बीजेपी से अच्छे संबंध
मराठी अख़बार लोकसत्ता के राजनीतिक संपादक संतोष प्रधान ने बीबीसी मराठी से कहा कि बीजेपी और एकनाथ शिंदे के बीच अच्छे रिश्ते हैं.
उन्होंने कहा, "ठाणे ज़िला एकनाथ शिंदे का गढ़ है. एकनाथ शिंदे के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), देवेंद्र फडणवीस के साथ अच्छे संबंध हैं. वो चाहते थे कि शिवसेना बीजेपी के साथ जाए. उनके बेटे श्रीकांत शिंदे एक सांसद हैं. ऐसे में वो अपने बेटे के करियर को भी आगे बढ़ाना चाहते हैं."
संतोष प्रधान ने कहा, "एकनाथ शिंदे के पास शहरी विकास विभाग है. लेकिन इस विभाग ने धन के मामले में ज़्यादा फ़ायदा नहीं कमाया. जब शिवसेना में किसी नेता का कद बढ़ने लगता है तो उसके पर काट दिए जाते हैं. आनंद दीघे के साथ जो हुआ वो एकनाथ शिंदे के साथ भी हुआ. एकनाथ शिंदे के देवेंद्र फडणवीस से अच्छे संबंध हैं. कुछ दिनों पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संरसंघचालक मोहन भागवत एक कार्यक्रम के लिए ठाणे आए थे."

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2. काम करने के बावजूद क्रेडिट न मिलने से हैं नाराज़?
राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई ने कहा, "कुछ दिन पहले, मंत्री आदित्य ठाकरे अयोध्या दौरे पर थे. इस दौरे का प्रबंधन सांसद संजय राउत और शहरी विकास मंत्री एकनाथ शिंदे ने किया था."
देसाई कहते हैं, "पार्टी का महत्वपूर्ण नेता होने के बावजूद एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के स्थापना दिवस पर कार्यकर्ताओं को संबोधित नहीं किया, कुछ कहा नहीं. शिवसेना नेता लगातार बीजेपी की बात कर रहे हैं, केंद्रीय जाँच एजेंसियों के इस्तेमाल की बात कर रहे हैं. संजय राउत ने नाराज़गी भी ज़ाहिर की थी."
3. शंकाओं का समाधान नहीं हुआ
देसाई ने कहा, "मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अपनी बीमारी और कोरोना के समय उपलब्ध नहीं थे. एकनाथ शिंदे को हमेशा संदेह की नज़र से देखा जाता था."
उन्होंने कहा, "संजय राउत हर दिन मीडिया से बात करते हैं लेकिन वो निर्वाचित नेता नहीं हैं. बीमार होने की वजह से मुख्यमंत्री लंबे समय तक घर पर रहे. बीजेपी जैसी विपक्षी पार्टी सामने है. ऐसे में एकनाथ शिंदे को बड़ी ज़िम्मेदारी देनी चाहिए."
देसाई ने कहा, "शिवसेना शुरू में समृद्धि राजमार्ग का विरोध कर रही थी. लेकिन एकनाथ शिंदे ने इस परियोजना पर कभी कोई टिप्पणी नहीं की. सत्ता में आने के बाद शिंदे ने रिकॉर्ड समय में राजमार्ग का काम पूरा किया. इस काम का श्रेय उन्हें नहीं मिला. देसाई ने कहा कि बीजेपी नेताओं के साथ भी शिंदे के सौहार्द्रपूर्ण संबंध हैं.
4. मुख्यमंत्री न बन पाने का दुख
देसाई कहते हैं, "एकनाथ शिंदे का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए था, लेकिन जब उद्धव ठाकरे को सीएम बनाया गया, तो उनका नाम पीछे छूट गया. ये उनके लिए निराशा की बात थी."
"लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया. एकनाथ को उस समय लगा कि नुकसान हुआ है."

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"एकनाथ शिंदे के पास विधायकों का समर्थन है. जो विधायक उनके समर्थन में हैं उनकी शिकायत है कि उन्हें काम के लिए फंड नहीं मिलते और वो अपने काम नहीं करवा पाते. यही वजह है ये नाराज़ विधायक शिंदे का साथ दे रहे हैं."
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