यूक्रेन युद्ध में अब तक रूस के 50 हज़ार सैनिकों की मौत, मरने वालों में अधिकतर 'क़ैदी रंगरूट'

- Author, ओल्गा इवशिना और बेकी डेल किर्स्टी ब्र्यूवर
- पदनाम, बीबीसी रशियन सर्विस
यूक्रेन में रूस के मारे गए सैनिकों की तादाद पचास हज़ार की संख्या को पार कर गई है. बीबीसी इस बात की तस्दीक़ कर सकता है.
इस युद्ध के दूसरे साल में जंग के मोर्चे पर रूस ने तबाही मचाने वाली रणनीति पर ज़ोर दिया था.
इस दौरान, हमने पाया कि युद्ध के पहले साल की तुलना में इस बार जान गंवाने वाले रूसी सैनिकों की तादाद लगभग 25 प्रतिशत अधिक थी.
बीबीसी रशियन, स्वतंत्र मीडिया समूह 'मीडियाज़ोना' और स्वयंसेवक, सब मिलकर फरवरी, 2022 से ही मरने वाले रूसी सैनिकों की गिनती कर रहे हैं.
क़ब्रिस्तानों में नई क़ब्रों ने हमें बहुत से सैनिकों के नाम का पता लगाने में मदद की है.

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हमारी टीमों ने रूस के मरने वाले सैनिकों की तादाद जानने के लिए आधिकारिक रिपोर्टों में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध जानकारी, अख़बारों और सोशल मीडिया को भी खंगाला है.
हमारी पड़ताल के मुताबिक़, यूक्रेन में युद्ध के दूसरे साल में 27 हज़ार 300 रूसी सैनिकों ने जान गंवाई है. इससे पता चलता है कि रूस ने यूक्रेन में बढ़त हासिल करने की कितनी बड़ी मानवीय क़ीमत चुकाई है.
रूस ने इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है.
'मीट ग्राइंडर' या फिर तबाही मचाने वाले जुमले का इस्तेमाल ये बताने के लिए किया जाता है कि किस तरह रूस लगातार, अपने सैनिकों को भारी तादाद में अग्रणी मोर्चे पर भेजता रहता है, ताकि वो यूक्रेन के सैन्य बलों को थका दे और उनके ठिकानों की ख़बर रूस के तोपख़ाने को हो जाए.
इस युद्ध में मरने वाले रूसी सैनिकों की कुल संख्या पचास हज़ार से ज़्यादा हो चुकी है. रूस ने आधिकारिक तौर पर अब तक सिर्फ़ एक बार यानी सितंबर 2022 में मारे गए सैनिकों की तादाद बताई थी. ये आंकड़ा उससे आठ गुना ज़्यादा है.
युद्ध में मारे गए रूसियों की तादाद तो इससे भी ज़्यादा हो सकती है.
हमारे विश्लेषण में पूर्वी यूक्रेन में रूस के क़ब्ज़े वाले दोनेत्स्क और लुहांस्क क्षेत्रों में हथियारबंध संगठनों के मारे गए लड़ाकों की तादाद शामिल नहीं है. अगर उनकी संख्या को भी जोड़ लिया जाए, तो युद्ध में रूस के जान गंवाने वाले सैनिकों की तादाद और भी अधिक हो जाएगी.
इस बीच, यूक्रेन भी युद्ध क्षेत्र में होने वाली मौतों के बारे में बहुत कम ही जानकारी देता है. फरवरी में राष्ट्रपति वोलोदोमीर ज़ेलेंस्की ने कहा था कि युद्ध में यूक्रेन के 31 हज़ार सैनिक जान गंवा चुके हैं. हालांकि, अमरीका की ख़ुफ़िया जानकारी के मुताबिक़ यूक्रेन को जान का इससे कहीं ज़्यादा नुक़सान हुआ है.
तबाह करने की रणनीति
बीबीसी और मीडियाज़ोना ने रूस के मारे गए सैनिकों की जो नई फ़ेहरिस्त तैयार की है, इससे जंग के मोर्चे पर रूस के लगातार रणनीति बदलने की भारी क़ीमत चुकाने की गवाही मिलती है.
नीचे के ग्राफ से पता चलता है कि जनवरी 2023 में जब रूस ने यूक्रेन के दोनेत्स्क क्षेत्र में बड़ा सैन्य अभियान छेड़ा था, तब उसके मरने वाले सैनिकों की तादाद में भारी इज़ाफ़ा हुआ था.

इंस्टीट्यूट फॉर दि स्टडी ऑफ वॉर (आईएसडब्ल्यू) के मुताबिक़, जब रूसी सेनाक वुहलेदार शहर पर क़ब्ज़े की लड़ाई लड़ रही थी, तो उसने "सामने से मानवीय लहर वाले बेअसर आक्रमण" का तरीक़ा अपनाया था.
इंस्टीट्यूट ने रूस की रणनीति के बारे में कहा था, "चुनौती भरे इलाक़े, मुक़ाबले की क्षमता के अभाव और यूक्रेन की सेना को चौंकाने में नाकामी" जैसी मुश्किलों से जूझ रही थी और उसे भारी नुक़सान गंवाकर भी कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ था.
मरने वाले सैनिकों की तादाद में 2023 के बसंत में भी काफ़ी बढ़ोत्तरी देखी गई थी. तब रूस और यूक्रेन बख़मुत पर क़ब्ज़े के लिए लड़ रहे थे. उस वक़्त भाड़े के हथियारबंद लड़ाकों के समूह वैगनर ने रूस को इस शहर पर क़ब्ज़ा करने में मदद की थी.
रूस ने जब पिछले पतझड़ के दौरान पूर्वी यूक्रेन के शहर अवदिवका पर क़ब्ज़ा किया था, तब भी उसके सैनिकों की मौत के आंकड़े में बहुत अधिक उछाल देखा गया था.
क़ब्रों की गिनती

जब से युद्ध शुरू हुआ है, तब से ही बीबीसी और मीडियाज़ोना के लिए काम करने वाले स्वयंसेवक, पूरे रूस में फैले 70 क़ब्रिस्तानों में खोदी जाने वाली नई क़ब्रों की गिनती कर रहे हैं.
हवाई तस्वीरें बताती हैं कि क़ब्रिस्तानों की तादाद में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है.
मिसाल के तौर पर ये तस्वीरें मॉस्को के दक्षिण पूर्व में स्थित रियाज़ान इलाक़े के बोगोरोडस्कोये क़ब्रिस्तान की हैं. तस्वीरों से पता चलता है कि इस क़ब्रिस्तान में एक नया हिस्सा बनाया गया है.
ज़मीन पर ली गई तस्वीरें और वीडियो से पता चलता है कि यहां खोदी गई ज़्यादातर नई क़ब्रें उन सैनिकों और फ़ौजी अधिकारियों की हैं, जिन्होंने यूक्रेन के युद्ध में जान गंवाई थी.

बीबीसी का आकलन है कि यूक्रेन में मारे गए हर पांच सैनिकों में से कम से कम दो वो होते हैं, जिनका इस आक्रमण से पहले सेना से कोई वास्ता नहीं था.
रॉयल यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूट (रूसी) के सैम्युअल क्रैनी-एवांस समझाते हैं कि 2022 में यूक्रेन पर हमला करने के बाद, रूस इस बेहद जटिल सैन्य अभियान के लिए अपने पेशेवर सैनिकों को इस्तेमाल कर रहा था.
लेकिन रक्षा विश्लेषक सैम्युअल कहते हैं कि, रूस के ज़्यादातर तजुर्बेकार सैनिक या तो मारे जा चुके हैं या फिर वो घायल हैं. अब रूसी सेना में उनकी जगह ऐसे लोगों ने ले ली है, जिनको बहुत कम ट्रेनिंग मिली है या उनके पास सैन्य अभियानों का बहुत कम तजुर्बा है. इनमें स्वयंसेवक, आम नागरिक और क़ैदी शामिल हैं.
सैम्युअल कहते हैं, "ये लोग वो काम तो नहीं कर सकते, जो कोई नियमित पेशेवर सैनिक करत सकता है. इसका मतलब ये है कि उन्हें रणनीतिक तौर पर आसान काम दिया जाता है. आम तौर पर इसका मतलब तोपख़ाने की मदद से यूक्रेन की मोर्चेबंदी पर सीधा हमला करना होता है."
वैगनर बनाम रक्षा मंत्रालय
रूस की 'मीट ग्राइंडर' रणनीति की कामयाबी के लिए क़ैदी रंगरूट सबसे अहम हैं. और, हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि अब जंग के मोर्चे पर वो बहुत जल्दी जल्दी मारे जा रहे हैं.
रूस ने वैगनर के प्रमुख येगवेनी प्रिगोज़िन को जून 2022 से जेल के क़ैदियों को भर्ती करने की इजाज़त दे दी थी. क़ैदी से लड़ाके बने इन सैनिकों ने रूस की सरकार की तरफ़ से भाड़े की सेना के तौर पर जंग लड़ी.
वैगनर को निरंतर जंग लड़ने की डरावनी रणनीति और कठोर अंदरूनी अनुशासन के लिए जाना जाता है. पीछे हटने पर इसके फ़ौजियों को बिना हुक्म के ही गोली मारी जा सकती है.
वैगनर ग्रुप ने फरवरी 2023 तक जेलों से क़ैदियों को भर्ती करना जारी रखा था. उसके बाद, रूस की सरकार के साथ उसके रिश्ते ख़राब होने लगे. हालांकि, उसके बाद से रूस के रक्षा मंत्रालय ने भी उसी रणनीति पर अमल करना जारी रखा है.
येवगेनी प्रिग़ोज़िन ने पिछले साल जून में रूस के सैन्य बलों के ख़िलाफ़ एक नाकाम बग़ावत का बिगुल फूंका था. उन्होंने राजधानी मॉस्को की तरफ़ कूच कर दिया था, पर बाद में वो पीछे हट गए. इसके बाद अगस्त महीने में प्रिगोज़िन एक विमान हादसे में मारे गए थे.
हमने अपने हालिया विश्लेषण में उन नौ हज़ार रूसी क़ैदियों के नाम पर ध्यान केंद्रित किया है, जिनके बारे में हमें पता है कि वो जंग के अग्रिम मोर्चे पर मारे जा चुके हैं.
इनमें से एक हज़ार से ज़्यादा के बारे में हमारे पास पक्की ख़बर है कि उनका सैनिक का ठेका उस दिन से शुरू होता था, जिस रोज़ वो मारे गए थे.
हमने विश्लेषण में पाया कि वैगनर के अधीन लड़ने वाले क़ैदी रंगरूट औसतन तीन महीने तक जंग के मैदान में ज़िंदा रहे थे.
हालांकि, जैसा कि ऊपर के ग्राफ से स्पष्ट है कि जिन क़ैदियों को रूस के रक्षा मंत्रालय ने भर्ती किया था, वो जंग के मैदान में औसतन दो महीने तक ही टिक पाए.
रूस के रक्षा मंत्रालय ने सैनिकों की ऐसी टुकड़ियां तैयार की हैं, जिन्हें आम तौर पर 'तूफ़ानी पलटन' के नाम से जाना जाता है. इन टुकड़ियों में लगभग सारे ही लड़ाके सज़ायाफ़्ता क़ैदी होते हैं.
वैगनर की क़ैदी रंगरूटों वाली टुकड़ियों की तरह, इन लड़ाकों को भी जंग के मैदान पर अक्सर क़ुर्बानी देने वाले बकरों की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और उन्हें बस मोर्चे पर झोंक दिया जाता है.
पिछले साल इस तूफानी पलटन के साथ लड़ने वाले एक रूसी सैनिक ने रायटर को बताया था कि ये क़ैदी लड़ाके तो हमारे लिए बस मांस का टुकड़ा हैं.
हाल ही में अवदिवका शहर पर क़ब्ज़े की लड़ाई में इस तूफ़ानी पलटन के लड़ाके बहुत उपयोगी साबित हुए थे.
आठ हफ़्ते पहले रूस ने इस शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया था. बख़मुत के बाद अवदिवका शहर पर क़ब्ज़ा, इस युद्ध में पुतिन के लिए सबसे बड़ी प्रतीकात्मक जीत था.
सीधे युद्ध के अग्रणी मोर्चे पर भेजे जाने वाले क़ैदी
वैगनर के लिए लड़ने वाले नए क़ैदी लड़ाकों को जंग के मैदान में भेजने से पहले पंद्रह दिन की ट्रेनिंग दी जाती थी.
इसकी तुलना में हमने पाया कि रक्षा मंत्रालय के कुछ क़ैदी रंगरूट तो भर्ती किए जाने के पहले दो हफ़्तों के भीतर ही मारे गए.
बीबीसी ने मारे गए और अभी ज़िंदा क़ैदी रंगरूटों में से कुछ के परिवारों से बात की. उन्होंने हमें बताया कि क़ैदियों को रक्षा मंत्रालय से जो ट्रेनिंग दी जाती है, वो पर्याप्त नहीं होती.
एक विधवा ने हमें बताया कि उसके पति ने पिछले साल 8 अप्रैल को जेल में ही सेना में भर्ती होने के कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तख़त किए थे और तीन दिन बाद ही वो मोर्चे पर युद्ध लड़ रहे थे.
उन्होंने बताया कि, "मुझे यक़ीन था कि उन्हें कुछ हफ्तों की ट्रेनिंग दी जाएगी. जिसकी बातें वो करते रहते थे. इसलिए, कम से कम अप्रैल के अंत तक तो डरने वाली कोई बात ही नहीं थी."
उन्होंने बताया कि वो लंबे वक़्त तक अपने पति की कोई ख़बर मिलने का इंतज़ार करती रहीं. लेकिन, 21 अप्रैल को पता चला कि वो युद्ध में मारे जा चुके हैं.

एक और सैनिक की मां ने कहा कि उन्हें सिर्फ़ यही पता चला कि उनके पति को जेल से युद्ध के मैदान में ले जाया गया है. तब उन्होंने अपने पति से अपने बेटे की मौत के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए संपर्क किया. उनका बेटा भी युद्ध लड़ रहा था.
ख़ुद को अल्फिया बताने वाली इस महिला ने कहा कि उनका 25 साल का बेटा वादिम, दो जुड़वां बच्चों का बाप है और उसने सेना में भर्ती किए जाने से पहले कभी कोई हथियार नहीं थामा था.
अल्फिया कहती हैं कि वो अपने पति को अपने बेटे की मौत के बारे में नहीं बता सकीं. क्योंकि इसस पहले ही उन्हें युद्ध लड़ने के लिए 'ज़बरस्ती' ले जाया जा चुका था. उन्हें तो इसकी ख़बर एक और क़ैदी ने फ़ोन करके दी थी.
अल्फिया अपने बेटे के बारे में बताती हैं कि अलेक्ज़ेंडर यूक्रेन में पले बढ़े थे और उनका वहां एक परिवार भी था. और, उनको ये पता था कि रूस ने यूक्रेन पर हमला करने के लिए फासीवाद से मुक़ाबले का जो बहाना बताया था, वो झूठा था. अल्फिया कहती हैं कि, जब सेना के भर्ती अधिकारी जेल पहुंचे तो उसने उन्हें 'जहन्नुम में भेज दिया.'

'मरने के लिए तैयार रहो'

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जब क़ैदी रंगरूट वैगनर के लिए काम करहे थे, तो उन्हें आम तौर पर छह महीने तक लड़ने के लिए भर्ती किया जाता था. अगर वो ह महीने तक लड़ने के बाद बच जाते, तो उन्हें बाद में आज़ाद कर दिया जाता था.
लेकिन, पिछले साल सितंबर से रक्षा मंत्रालय द्वारा जिन क़ैदियों को भर्ती किया जा रहा है, उन्हें तो या तो मरने या फिर जंग ख़त्म होने तक लड़ना पड़ेगा. अब इसमें से जो पहले हो जाए, वो उनकी क़िस्मत.
हाल ही में बीबीसी ने ऐसे क़ैदियों की दास्तानें भी सुनी हैं, जिन्होंने अपने रिश्तेदारों से सेना की वर्दी और बूट ख़रीदने के लिए मदद मांगी है. क़ैदी सैनिकों को लेकर ऐसी ख़बरें भी सामने आई हैं कि उन्हें बिना पर्याप्त सामना के ही लड़ने भेजा जा रहा है. उनको न तो मेडिकल किट दी जा रही है और न ही कलाश्निकोव राइफलें.
रूस के समर्थक और ब्लॉगर व्लादिमीर ग्रुबनिक ने अपने टेलीग्राम चैनल पर लिखा था कि, "जंग लड़ रहे बहुत से सैनिकों को ऐसी राइफलें दी गई थीं, जो लड़ाई लड़ने लायक़ ही नहीं थीं."
ग्रुबनिक ने लिखा कि, "ये एक बड़ा रहस्य है कि आख़िर बिना मेडिकल किट, खुदाई के लिए फावड़े और टूटी फूटी राइफल लेकर कोई पैदल सैनिक जंग के मैदान में आख़िर करेगा क्या?"

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व्लादिमीर ग्रुबनिक, रूस के क़ब्ज़े वाले पूर्वी यूक्रेन में रहते हैं. उनका दावा है कि जब कमांडरों को ये पता चला कि कुछ राइफलें 'पूरी तरह टूटी' हुई हैं, तो उन्होंने कहा कि इनकी जगह नई राइफल देना उनके लिए 'नामुमकिन' है.
ग्रुबनिक ने लिखा कि, "ये राइफल जब किसी को दी गईं, तब से ही वो टूटी हुई थीं और ये निर्मम अफ़सर इसको सुधारने के लिए कुछ नहीं कर सके."
पूर्व क़ैदियों ने भी ये बताया है कि उनके साथियों को इस जंग की कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी है.
तूफ़ानी पलटन और उनके रिश्तेदारों के बीच जानकारी साझा करने के एक ऑनलाइन फोरम पर सर्गेई ने लिखा कि "अगर तुम अभी भर्ती हो जाते हैं, तो मरने के लिए तैयार रहो साथी."
सर्गेई ख़ुद को एक पूर्व क़ैदी बताते हैं, जो पिछले साल अक्टूबर से ही तूफ़ानी पलटन की तरफ़ से जंग लड़ रहे हैं.
इस फोरम के एक और सदस्य ने बताया कि वो 100 लोगों की तूफ़ानी पलटन में पांच महीने पहले भर्ती हुए थे. और अब उनमें से केवल 38 ही ज़िंदा बचे हैं.
वो कहते हैं कि, "जंग का हर अभियान हमारे लिए दोबारा जन्म लेने जैसा है."
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