अमेरिका के लिए सेना में नए सैनिकों की भर्ती बड़ी चुनौती क्यों बन गई है? -दुनिया जहान

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27 जनवरी 1973 को अमेरिका के रक्षा मंत्री ने घोषणा की थी कि इसके बाद सैन्यबलों में युवाओं की भर्ती अनिवार्य तौर पर नहीं बल्कि स्वैच्छिक होगी.

आयु के 19वें साल में कदम रखने वाले अमेरिकी युवाओं के लिए ये बहुत बड़ी ख़बर थी.

इस फ़ैसले को अमल में आने में कुछ महीने और लगे. लेकिन जून 1973 में ड्वाइट एलियट स्टोन आख़िरी अमेरिकी थे जिनकी सेना में भर्ती अनिवार्य तौर पर की गई थी.

इस तरह अमेरिका में 25 सालों तक जारी रहा नियम समाप्त हो गया. पिछले 50 सालों से अधिक समय से अमेरिकी थल सेना, वायु सेना और नौ सेना में स्वेच्छा से आए लोगों को भर्ती किया जाता रहा है.

लेकिन पिछले कुछ सालों में अपनी मर्ज़ी से सेना में शामिल होने वालों की संख्या घटती जा रही है. ख़ास तौर पर थल सेना में.

पिछले दो सालों में अमेरिकी थल सेना नए सैनिकों की भर्ती के अपने लक्ष्य से काफ़ी दूर यानी कई हज़ार कम सैनिक भर्ती कर पाई. दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार अमेरिकी थल सेना में सैनिकों की संख्या इतनी कम हुई है.

इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि अमेरिका में सेना के लिए नए सैनिकों को भर्ती करना मुश्किल क्यों हो रहा है?

आबादी का 1 फ़ीसदी हिस्सा सेना में

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अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ और जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर नोरा बेन्साहेल कहती हैं कि एक समय यह आम धारणा थी कि युद्ध के दौरान हर नागरिक को देश की रक्षा के लिए लड़ना चाहिए. मगर पिछले 20-30 सालों में यह धारणा बदल गई है.

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उनके अनुसार, "अब कई युवा सोचते हैं कि युद्ध करना उनका नहीं बल्कि दूसरे लोगों का काम है."

मगर थल सेना की भर्ती में मुश्किल क्यों हो रही है? इस पर नोरा बेन्साहेल कहती हैं, "थल सेना, सैन्यबल का सबसे बड़ा धड़ा है जिसमें सैंकड़ों किस्म की नौकरियां हैं और पूरे देश से लोग इसमें भर्ती किए जाते हैं."

"ज़मीन पर लड़ाई करने के अलावा यह धड़ा दूसरे सैन् बलों की सहायता भी करता है. मगर देश की आबादी का 1 फ़ीसदी हिस्सा ही सेना में शामिल होता है."

ग़ौरतलब है कि अमेरिका में सेना में शामिल होने वाले कई लोगों के परिवार के दूसरे कुछ सदस्य भी सेना में ही थे. अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, सेना में 80 फ़ीसदी लोग ऐसे हैं जिनके परिवार का कोई ना कोई सदस्य पहले भी सेना में काम कर चुका है.

नोरा बेन्साहेल का मानना है कि मुद्दा केवल यह नहीं है कि इतनी कम संख्या में लोग सेना में जाते हैं बल्कि मुद्दा ये है कि पीढ़ी दर पीढ़ी यही लोग सेना में आते रहे हैं.

यानी देश के एक बड़े हिस्से का सेना के साथ कोई संबंध नहीं होता है.

नोरा कहती हैं, "अमेरिकी लोग सेना के बारे में मामूली बातें तक जानते समझते नहीं हैं इसलिए उन्हें सेना से जुड़े मामले समझाना मुश्किल होता है और इसी वजह से उन्हें सेना में भर्ती होने के प्रेरित करना भी मुश्किल होता है."

सेना के सामने समस्या

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अमेरिकी सेना के सामने एक समस्या यह भी है कि देश में जो लोग सेना में भर्ती होना चाहते हैं और जो योग्य हैं, उनमें अंतर बढ़ता जा रहा है.

नोरा ने बताया कि, "सेना में भर्ती होने के लिए कुछ मानदंड निश्चित किए गए हैं. जो युवा भर्ती होना चाहते हैं उनमें कई खरे नहीं उतरते. यह स्तर लगातार गिरता जा रहा है. बीते दो सालों में सेना में भर्ती होने के इच्छुक उम्मीदवारों में से केवल 29 फ़ीसदी ही योग्य पाए गए."

मगर इसकी क्या वजह है कि भर्ती होने की इच्छा और योग्यता रखने वालों की संख्या तेज़ी से कम हो रही है?

नोरा के अनुसार, कुछ हद तक इसका एक कारण कोविड महामारी का असर भी है.

वो कहती हैं, "अब कम प्रत्याशी टेस्ट में पास हो रहे हैं. महामारी के बाद से उम्मीदवारों की फ़िज़िकल फ़िटनेस का स्तर भी कम हुआ है."

"दूसरी बात यह है कि मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों को भी सेना में भर्ती नहीं किया जा सकता. मिसाल के तौर पर अवसाद या डिप्रेशन या एन्ज़ाइटी का शिकार लोग सेना में भर्ती नहीं हो सकते. कोविड महामारी के बाद से बड़ी संख्या में लोग ऐसी चीजों से प्रभावित हुए हैं."

नोरा के अनुसार, युवाओं में सेना में शामिल होने के प्रति घटती रुचि का एक कारण अर्थव्यवस्था में आ रहे बदलाव भी हैं. पहले सेना में तनख़्वाह और दूसरे फ़ायदे कहीं अधिक थे.

लेकिन नए सैनिकों की भर्ती में आ रही कमी को पूरा करने के लिए सरकार पहले की तरह युवाओं के लिए सेना में नौकरी अनिवार्य करे दे, इस बात की संभावना बहुत कम है.

संख्या का खेल

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रिटायर्ड मरीन कर्नल और वाशिंग्टन स्थित थिंकटैंक स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनैशनल स्टडीज़ के वरिष्ठ सलाहकार मार्क कैन्सियन के अनुसार, सेना में भर्ती लोगों पर अमेरका प्रतिवर्ष 80 करोड़ डॉलर खर्च करता है.

नए सैनिकों की भर्ती में हमेशा ही मुश्किलें आती रही हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में यह बढ़ गई हैं. हालांकि दुनियाभर में कई जगहों पर सहयोगी देशों की मदद के लिए अमेरिकी सेना तैनात है.

कैन्सियन कहते हैं कि, अमेरिका विश्व की एक महाशक्ति है और अपने सहयोगी देशों को सैनिक सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध है.

इसमें वायुसेना और नौसेना की भी अहम भूमिका है लेकिन ज़मीन पर थल सेना की मौजूदगी अत्यंत महत्वपूर्ण है. अमेरिकी सेना के 76 प्रमुख सैनिक अड्डे हैं जिसमें 58 अमेरिका में हैं, 12 यूरोप में, 6 प्रशांत महासागर क्षेत्र और चार मध्यपूर्व में हैं.

यूरोप में 60,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. मध्य पूर्व में 10,000 और एशिया में, जापान से दक्षिण कोरिया तक 40,000 सैनिक तैनात हैं.

इन सैनिकों को ज़रूरत के हिसाब से एक जगह से दूसरी जगह तैनात किया जाता है. सैनिकों की संख्या में आ रही कमी इस काम को प्रभावित कर सकती है.

सैनिकों की कमी

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मार्क कैन्सियन के अनुसार, अमेरिका को चार लाख 80,000 सैनिकों की ज़रूरत है जबकि उसके पास चार लाख 53,000 सैनिक ही हैं.

लेकिन यह कमी विश्व में अमेरिका की सैन्य भूमिका को किस प्रकार प्रभावित करेगी?

मार्क कैन्सियन ने कहा, "इससे दो बातें होंगी. एक तो यह कि अमेरिकी ज़मीन पर सैनिकों की कमी होगी. दूसरी बात यह कि अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ उतने शांतिपूर्ण सैन्य अभ्यास नहीं कर पाएगा जितना उसका लक्ष्य है. युद्ध की स्थिति में यह अभ्यास काम आते हैं. उसे प्रतिवर्ष इन सैन्य अभ्यासों की संख्या घटानी पड़ेगी."

आधुनिक दौर के युद्ध में तकनीक की भूमिका भी काफ़ी बढ़ गई है. कई गतिविधियां ऐसी होती हैं जिनता सीधा नाता तो युद्ध से होता है, लेकिन वो युद्ध क्षेत्र से बहुत दूर बैठ कर की जाती हैं.

क्या इसका यह मतलब है कि आने वाले समय में कई काम जो सैनिक करते हैं उसे तकनीक की मदद से किया जा सकेगा और सेना को कम सैनिकों की ज़रूरत होगी?

मार्क कैन्सियन कहते हैं, "लंबे समय से कई लोग ऐसा सोचते रहे कि तकनीक पर आधारित सटीक हथियारों से दुश्मन को निशाना बनाया जा सकेगा, कम सैनिकों की ज़रूरत पड़ेगी और युद्ध जल्दी समाप्त होंगे. कई बार ग़लत साबित होने के बावजूद यह धारणा बार-बार सामने आती रही है. हम यूक्रेन में देख रहे हैं कि वहां केवल तकनीक का इस्तेमाल नहीं हो रहा बल्कि बड़ी संख्या में सैनिक ज़मीन पर भी लड़ रहे हैं."

भरोसे का सवाल

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सेना में भर्ती में मुश्किलों के कुछ कारण कोरोना महामारी से जुड़े हुए थे क्योंकि महामारी के दौरान शिक्षा प्रभावित हुई और युवाओं की शारीरिक क्षमता पर भी महामारी का बुरा असर पड़ा.

लेकिन ड्यूक यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर पीटर फ़ीवर कहते हैं कि एक नया रुझान भी इसका एक कारण है. अमेरिकी जनता की सेना के प्रति राय को भी वो इस समस्या का एक महत्वपूर्ण कारण मानते हैं.

वो कहते हैं, "अगर आप अतीत में देखें तो 70 के दशक में आम लोगों की सेना के प्रति राय अच्छी नहीं थी. 80 के दशक में उसमें काफ़ी सुधार आया और डेज़र्ट स्टॉर्म अभियान के बाद लोगों की राय और अच्छी हो गई. 90 के दशक के आख़िर में इसमें गिरावट आई लेकिन अमेरिका में 9/11 के हमलों के बाद फिर सेना के प्रति जनमत काफ़ी सकारात्मक हो गया था जो पिछले लगभग तीन सालों तक बरकरार रहा."

"इसलिए जब यह रुझान बदल रहा है, तो यह चिंता भी है कि कहीं वह दोबारा 70 के दशक के स्तर पर ना पहुंच जाए. लेकिन परंपरागत तौर पर शांतिकाल के दौरान सेना के प्रति आम लोगों की राय अनिश्चित ही रही है."

हाल के सालों में आम लोगों का सेना के प्रति रुख़ काफ़ी बिगड़ गया है. 2018 में रोनाल्ड रीगन फ़ाउंडेशन की एक रीसर्च के अनुसार, 70 फ़ीसदी अमेरिकी लोगों ने कहा था कि उनका अमेरिकी सेना पर काफ़ी भरोसा है.

अब केवल 46 फ़ीसदी लोग ही सेना पर ऐसा भरोसा करते हैं.

नकारात्मक छवि का असर

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पीटर फ़ीवर कहते हैं, "अपने देश में हम देख रहे हैं कि सेना के प्रति रुख़ बुरा हो रहा है. उसे नकारात्मक दृष्टि से देखा जा रहा है. देश की सांस्कृतिक बहस में यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या देश की सेना में सभी तबकों और समुदायों का समावेश होता है? वहीं कुछ लोग यह सवाल भी कर रहे हैं कि क्या हमारी सेना बहुत ‘वोक’ यानि राजनीतिक दृष्टि से सही रहने की परवाह के कारण सभी तबकों के समान समावेश पर अधिक ध्यान दे रही है?"

सेना से जुड़ी सांस्कृतिक बहस का एक पहलू यह भी है कि सेना में भर्ती होने को लेकर महिलाओं और पुरुषों की राय और उनके लिए चुनौतियां भी अलग हैं.

पीटर फ़ीवर की राय है कि महिलाएं सैन्यबलों में व्यापक और विशेष योगदान देती हैं. लेकिन महिलाएं सेना में यौन उत्पीड़न की संभावना को लेकर चिंतित हैं.

पीटर फ़ीवर ने कहा, "जब सेना में शामिल होने के लिए संभावित प्रत्याशियों को सर्वेक्षण के सवाल दिए गए तो कई महिलाओं नें यौन उत्पीड़न को लेकर चिंता व्यक्त की. सेना इस समस्या से निपटने के लिए व्यापक कदम उठा रहे हैं. लेकिन महिलाओं के साथ यौन दुराचार या यौन उत्पीड़न की समस्या पूरे अमेरिकी समाज में है. तो ज़ाहिर है कि वह सेना में भी दिखाई देगी."

उनका कहना है कि यौन उत्पीड़न अपने आप में सेना में भर्ती में मुश्किलों का सबसे बड़ा कारण नहीं है. लेकिन भविष्य में यह सैनिकों की भर्ती को लेकर आ रही मुश्किल को और बढ़ा सकता है.

इस प्रकार की समस्याओं से लोगों का सेना प्रति रुख़ भी प्रभावित होता है.

नई रणनीति

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पिछले अक्तूबर में अमेरिकी रक्षा सचिव क्रिस्टीन वॉरमथ ने कहा कि प्रतिभाशाली अमेरिकी युवों को नौकरियों के लिए आकर्षित करने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा है.

इसलिए उन्हें उन्हें सेना में भर्ती करने के लिए एक नई टीम या विशेष टास्क फ़ोर्स का गठन किया जाएगा और भर्ती की प्रक्रिया में बदलाव लाए जाएंगे.

रैंड कार्पोरेशन की वरिष्ठ अर्थशास्त्री और रक्षा कर्मचारियों के मामलों की विशेषज्ञ बेथ ऐश का कहना है कि सेना में भर्ती से जुड़ी समस्या के हल के लिए अमेरिकी सेना को अपने प्रबंधन में व्यापक बदलाव लाने की आवश्यकता है जिसके लिए वो कदम उठा रही है. इसके लिए उसे अल्पकालिक और दीर्घकालिक योजनाएं बनानी पड़ेंगी.

वो कहती हैं, "अल्पकालिक योजना के तहत सेना को कोशिश करनी चाहिए कि जो लोग सेना में काम कर रहे हैं वो सेना में बने रहें. वो ऐसा कर भी रही है क्योंकि यह रणनीति पहले भी सफल रही है."

सेना के सामने नए सैनिकों को भर्ती करने की समस्या जितनी मुश्किल है वैसी समस्या पहले से काम कर रहे सैनिकों को सेना में बनाए रखने में नहीं आ रही.

यानी कांट्रेक्ट के मुताबिक, अनिवार्य अवधि के बाद भी कई सैनिक सेना की नौकरी करते रहते हैं. बेथ ऐश का कहना है, "जब तक नए सैनिकों की भर्ती की समस्या सुलझ नहीं जाती तब तक पुराने सैनिकों को सेना में बनाए रखने की रणनीति पर ज़ोर दिया जाना चाहिए."

दीर्घकालिक योजना के तहत भर्ती की प्रक्रिया और योग्यता के मानदंडों में बदलाव लाने पर भी विचार किया जा सकता है.

बेथ ऐश ने बताया कि सेना ने एक नया कार्यक्रम शुरू किया है जिसके तहत ऐसे लोग जो परीक्षा के दौरान शारिरिक या कौशल के मानदंडों में कुछ कम अंक पाते हैं उन्हें भी शामिल करके ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वो सेना के लिए आवश्यक योग्यता का स्तर प्राप्त कर सकें.

सेना में भर्ती के लिए कई शारिरिक और मानसिक योग्यताओं के मानदंड होते हैं.

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वे सुधार जो सेना कर रही है...

बेथ ऐश कहती हैं कि, "कुछ ऐसी स्थितियां होती हैं जिसके चलते कोई व्यक्ति सेना में भर्ती नहीं हो सकता. लेकिन अगर वो पहले से सेना में नौकरी कर रहा है तो इन स्थितियों के बावजूद नौकरी पर बना रह सकता है. मिसाल के तौर पर कुछ मानसिक बीमारियों के चलते उसे सेना में भर्ती नहीं किया जा सकता. लेकिन भर्ती होने के बाद उसे यह बीमारी हो जाती है तो वह नौकरी पर बना रह सकता है."

हो सकता है भविष्य में अमेरिकी सेना को इस मानदंड के बारे में दोबारा सोचना पड़े.

बेथ ऐश ने कहा कि अमेरीकी सेना प्रयोग के तौर पर एक पायलट प्रोग्राम चला रही है जिसमें इस बात का अध्ययन किया जा रहा है कि मानसिक स्वास्थ्य किसी सैनिक के काम और व्यवहार पर कितना असर डालता है.

इसके बाद यह तय किया जा सकता है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ें मानदंड की नीति में बदलाव की ज़रूरत है या नहीं.

अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर कि अमेरिकी सेना के लिए नए सैनिकों को भर्ती करना मुश्किल क्यों हो रहा है? विशेषज्ञ इसके कई कारण बताते हैं. अर्थव्यवस्था बदल रही है जिसके चलते अब युवाओं के पास नौकरियों के कई बेहतर विकल्प मौजूद हैं.

ऐसे में युवाओं को सेना की ओर आकर्षित करने के लिए सेना को अपनी रणनीति में कई बदलाव लाने होंगे.

हर समाज और उसकी अर्थव्यवस्था में बदलाव आते हैं. हर पीढ़ी की धारणाएं अलग होती हैं. और सभी संस्थाओं की तरह सेना को भी अपने आपको उन बदलावों के अनुसार ढालना होगा.

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