यूक्रेन युद्धः आवदीव्का पर कब्ज़ा क्या रूस के हावी होने का संकेत है?

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- Author, जारोस्लाव लुकीव
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
"लोगों की ज़िंदगियां बचाने और घेरेबंदी से बचने के लिए मैंने आवदीव्का से अपनी सैन्य टुकड़ियों को पीछे हटा लिया है."
इसी महीने यूक्रेन के सेनाध्यक्ष बनाए गए जनरल ओलेक्सांद्र सिरस्की ने कहा था कि वो “ज़िंदगियां गंवाने की बजाय पीछे हट जाएंगे” और इस पूर्वी शहर में आख़िरकार उन्होंने यही किया.
रूस को यहां भारी नुकसान हुआ लेकिन चार महीने तक लगातार मुक़ाबला करने के कारण यूक्रेन के सैनिकों की संख्या, हथियार और गोला बारूद कम हो गए हैं.
पिछले साल यूक्रेन के जवाबी आक्रमण के विफल होने के बाद से यह रूस की यूक्रेन पर सबसे बड़ी जीत है.
आवदीव्का पर रूस ने 2014 में थोड़े समय के लिए कब्ज़ा किया था जिसे बाद में यूक्रेन ने फिर से अपने कब्ज़े में ले लिया.
तो, आवदीव्का के पतन का इस व्यापक संघर्ष के लिए क्या मायने है?
एक विशाल देश की बेशुमार ताक़त से मुकाबला

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चूंकि यह जंग अब लंबी खिंच रही है, इसलिए यूक्रेन और रूस के आकार का अंतर अब साफ़ दिखने लगा है.
रूस की 14.4 करोड़ से अधिक आबादी यूक्रेन के मुकाबले चार गुना है.
इस जंग में हज़ारों सैनिकों को खोने के बावजूद रूस ने नए सैनिकों की तैनाती कर अपने आकार के अंतर को दिखा दिया है.
यूक्रेन की सेना को भी नुकसान हुआ है हालांकि उतना नहीं जितना रूस को हुआ.
अग्रिम मोर्चे पर स्थित यूक्रेन के शहरों की तरह रूस ने लगभग पूरी तरह नष्ट हो चुके इस शहर पर कब्ज़ा कर लिया है.
वहां तैनात यूक्रेन की तीसरी असॉल्ट ब्रिगेड ने कहा कि उन पर पैदल सेना की ओर से चारों ओर से हमले हो रहे थे.
रूस ने अपने सबसे बेहतरीन प्रशिक्षित सैनिकों को इस इलाक़े में तैनात किया और माना जाता है कि वो यूक्रेन सेना के ठिकानों पर हर दिन 60 बम गिरा रहा था.
जब पिछली बार यूक्रेन के शहर बखमूत पर रूस ने कब्ज़ा किया तो जनरल सिरस्की की इसलिए आलोचना हुई कि उन्होंने वहां अधिक समय तक मोर्चा लिया. उन पर ये भी आरोप लगा कि वो ग़ैरज़रूरी नुकसान की क़ीमत पर एक सांकेतिक जीत पाने की कोशिश कर रहे थे.
लगता है कि वो अनुभव उनके रवैये में बदलाव ले आया.
फिलहाल जंग रूस के पक्ष में?

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रूस की यह ताज़ा बढ़त रातों रात नहीं हुई है. पिछले साल अक्टूबर से ही रूस ने आवदीव्का पर एक के बाद एक हमलों की झड़ी लगा दी थी.
इस औद्योगिक शहर में अपने मज़बूत ठिकानों और सुरक्षा के चलते यूक्रेनी सैनिक चुनिंदा हमलों के मार्फ़त यहां रुके हुए थे और डोनबास इलाक़े में रूस को नुकसान पहुंचा रहे थे जिससे यह इलाक़ा रूसी शवों और नष्ट हुई बख़्तरबंद गाड़ियों का मैदान बन गया था.
अब ऐसा लगता है कि रूसी सैनिक उस रक्षा पंक्ति में घुस गए हैं जिसे रूसी सेना के पहली बार आक्रमण के बाद पिछले 10 सालों से मजबूत किया जा रहा था.
लेकिन यह कीएव के लिए झटका ही है कि वो रूस की किसी भी किलेबंदी को भेद नहीं पाया, जिसे कुछ महीनों में ही बनाया गया था.
यूक्रेनी सेना की तीसरी असॉल्ट ब्रिगेड के डिप्टी कमांडर मेजर रोडियोन कुद्रियाशोव कहते हैं, “रूस सामरिक लक्ष्य ही हासिल कर सकता है, रणनीतिक लक्ष्य नहीं.”
वो कहते हैं कि उनके सैनिकों की संख्या सात के मुकाबले एक है. फ़ोन पर उन्होंने मुझे बताया, “ये ऐसा है जैसे हम दो दुश्मनों से लड़ रहे हों”
उन्हें भरोसा है कि रूसी अब पोक्रोव्स्क और कोस्टीयांटिनिव्का जैसे शहरों की ओर नहीं बढ़ेंगे, हालांकि इसकी कोई गारंटी नहीं है.
आवदीव्का पर कब्ज़े से उनके लिए पूरब की ओर 15 किलोमीटर दूर स्थित दोनेत्स्क शहर पर दबाव कम हो जाएगा, जिसे रूस ने 2014 में कब्ज़ा कर लिया था.
अभी लड़ाई बाकी है

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले भी यूक्रेन को पीछे हटना पड़ा है, ख़ासकर 2022 की गर्मियों में.
बड़ी संख्या में अत्याधुनिक हथियारों से लैस रूसी टुकड़ियों ने लिसिचांस्क और सेवेरोदोनेत्स्क जैसे शहरों को घेर लिया. यूक्रेन उनको रोकने में कुछ नहीं कर पाए.
हालांकि इसके बाद पश्चिमी हथियारों के मिलने और उत्साहित सेना ने उस साल बाद में हालात को पलट दिया और यूक्रेनी सैनिकों ने खेरसोन और खारकीएव के इलाक़ों को आज़ाद कराया.
लेकिन अब यह युद्ध अलग मोड़ ले चुका है.
वैश्विक राजनीतिक का जंग के मैदान में अधिक असर पड़ रहा है.
लड़खड़ाती पश्चिमी मदद ने आवदीव्का में यूक्रेन के पीछे हटने में सीधा योगदान दिया है.
यूक्रेन को हथियार मुहैया कराने में अमेरिका सबसे आगे है क्योंकि वह बड़े पैमाने पर और तेज़ी के साथ उपलब्ध करा सकता है. यूक्रेन के लिए सहायता समेत 95 अरब डॉलर का पैकेज अमेरिका में अभी भी पास नहीं हो पाया है और अन्य सहयोगी इस गैप को भरने में संघर्ष कर रहे हैं.
इसका अर्थ यह है कि यूक्रेनियों को संभल कर गोला बारूद खर्च करना पड़ राह है और उनका आत्मविश्वास भी कम हुआ है.
लेकिन कीएव जैसी उम्मीद लगाए हुए है, आवदीव्का पीछे हटने का एकमात्र मोर्चा नहीं हो सकता है.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अभी भी पूरा यूक्रेन चाहते हैं और ये संभव है कि वो इसे हासिल कर ले जाएं.
यह संभावना या तो इसे रोकने की कोशिश में पश्चिमी एकता को बहाल कर सकती है या इस संदेह को बढ़ा सकती है कि यूक्रेन कभी भी इस जंग को जीतने के काबिल नहीं था, बावजूद इसके कि इसने आवदीव्का और अन्य जगहों की रक्षा में असाधारण कौशल का परिचय दिया.
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