क्या रूस के साथ यूक्रेन का युद्ध गतिरोध में फँस गया है?- दुनिया जहान

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इस साल नवंबर में यूक्रेन के सेना प्रमुख जनरल ज़ालूंजी ने एक चौंकाने वाले बयान में साफ़ कहा कि रूस के साथ युद्ध गतिरोध में फँस गया है.
उन्होंने कहा कि युद्ध टेक्नॉलॉजी की दृष्टि से देखा जाए तो यह पहले महायुद्ध की तरह का यह गतिरोध है.
उन्होंने कहा कि दोनो सेनाएं जंग के मैदान में ड्रोन और निगरानी या सर्विलांस के लिए एक जैसी टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल कर रही हैं, इसलिए दोनों को पता है कि दूसरी सेना क्या कर रही है.
इस वजह से सेनाएं आगे नहीं बढ़ पा रही हैं और गतिरोध पैदा हो गया है.
एक दूसरे बयान में उन्होंने कहा कि इस गतिरोध को तोड़ने और आगे बढ़ने के लिए नई टेक्नॉलॉजी की ज़रूरत पड़ेगी. वरना स्थिति जस की तस बनी रहेगी.
राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के कार्यालय ने इसे ख़ारिज करते हुए किसी गतिरोध से इंकार किया और सेना प्रमुख पर आरोप लगाया कि वो रूस का काम आसान कर रहे हैं.
इसलिए इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्या यूक्रेन में चल रहा युद्ध गतिरोध में फंस गया है?
जंग का मैदान
कीएव स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के प्रमुख और यूक्रेन की सरकार में मंत्री रह चुके टिमोफ़ी मिलोवनोफ़ कहते हैं, “ज़्यादातर लोग नहीं समझ पाते कि इस युद्ध का स्तर कितना बड़ा है. वो नहीं जानते यूक्रेन कितना विशाल देश है और अग्रिम मोर्चा कितने बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है.”
“सभी मोर्चों पर गतिरोध नहीं है. मिसाल के तौर पर अगर आप खारकीएव को देखें जो देश के पूर्वोत्तर में है तो वहां दोनों सेनाओं की ओर से एक दूसरे पर गोलाबारी हो रही है. कोई भी आगे नहीं बढ़ पा रहा है.”
“लेकिन अगर पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्र को देखें तो वहां लगातार लड़ाई चल रही है. तो ऐसा नहीं है कि गतिरोध आ गया है. उत्तर से दक्षिण तक हर जगह लड़ाई जारी है. दूसरी रणभूमि है क्राइमिया .”
क्राइमिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूक्रेन का हिस्सा माना जाता है जिस पर रूस ने 2014 में कब्ज़ा कर लिया था. क्राइमिया प्रायद्वीप में रूसी सेना के ब्लैक सी फ्लीट समुद्री बेड़े का मुख्यालय भी है. यह सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है.
टिमोफ़ी मिलोवनोफ़ कहते हैं, “यहां असल लक्ष्य क्राइमिया है. यूक्रेन के पास ऐसी क्षमता है कि अगर वो चाहे तो वहां रूस का बने रहना मुश्किल कर सकता है. वहां रूस की ताकत को कमज़ोर कर सकता है. क्राइमिया को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला एक पुल है जिस पर कब्ज़ा किया जा सकता है.”
“लेकिन यूक्रेन को इसमें सफलता नहीं मिली है. साथ ही वहां एक दूसरा पुल है जो क्राइमिया को रूस से जोड़ता है जिस पर कब्ज़ा करने से रूस के लिए सामरिक मुश्किल बढ़ सकती है.”
लेकिन क्या युद्ध में किसी मोर्चे पर कोई बदलाव दिखाई दे रहा है?
दोनों सेनाएं नहीं बढ़ पा रहीं
टिमोफ़ी मिलोवनोफ़ के अनुसार, “यूक्रेनी सेना को बाख़मुत और ज़ोपराजिया में सफलता मिली है. हाल में खेरसोन क्षेत्र में भी यूक्रेन की सेना आगे बढ़ी है. खेरसोन क्राइमिया के नज़दीक है."
"यहां से वो क्राइमिया को रूस से जोड़ने वाले पुल पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. रूस की सेना उत्तर में अवडिवका क्षेत्र में थोड़ा बहुत आगे बढ़ी है. लेकिन दोनों ही सेनाएं युद्ध की शुरुआत के बाद से कुछ ख़ास आगे नहीं बढ़ पाई हैं.”
रूसी सेना ने फ़रवरी 2022 में यूक्रेन पर चढ़ाई कर दी थी. रूस की योजना और उम्मीद थी कि वो चंद दिनों में यूक्रेनी सरकार को गिरा देगी.
टिमोफ़ी मिलोवनोफ़ ने कहा, “यहां सबसे महत्वपूर्ण बात थी, यूक्रेनी जनता की इच्छा शक्ति और प्रतिरोध. जब रूसी सेना ने कीएव की घेराबंदी की तब यूक्रेनी सरकार ने लोगों से नागरिक सुरक्षाबल में शामिल होने की अपील की."
"और पहले ही दिन लोगों में 18 हज़ार ऑटोमैटिक कलाशनिकोव रायफ़ल बांट दी. बड़ी संख्या में लोग सुरक्षाबल में शामिल हो गए. मेरे ख़्याल से रूस को ही नहीं बल्कि दुनिया को भी ऐसी उम्मीद नहीं थी.”
रूसी हमले के 21 महीने बाद क्या बदला?
टिमोफ़ी मिलोवनोफ़ का कहना है कि यूक्रेन ने दिखा दिया कि रूसी सेना पर अंकुश लगाया जा सकता है.
यूक्रेन रूस को काफ़ी पीछे धकेलने में कामयाब हो गया. इस लिहाज़ से यूक्रेन और दुनिया के लिए यह एक सामरिक जीत है.
रूसी सेना की ताक़त के बारे में युद्ध से पहले जो सोच थी वो भी बदल गई. यूक्रेन लड़ता रहेगा क्योंकि यूक्रेन के लोगों के लिए यह निजी लड़ाई बन गई है.
यह अब देश के अस्तित्व और जनता की सुरक्षा का मुद्दा है.
पुतिन और लंबी लड़ाई
इस दौरान रूस भी अपनी स्थित मज़बूत करने के लिए कई देशों से समर्थन जुटाने में लगा हुआ है.
हमारी चौथी एक्सपर्ट हैं, डॉक्टर हना नॉटे जो वाशिंगटन में जेम्स मार्टिन सेंटर फ़ॉर नॉन प्रोलिफ़रेशन में यूरेशियन प्रोग्राम की निदेशक हैं.
वो कहती हैं कि रूस भी दिखाना चाहता है कि वो दुनिया में अलग थलग नहीं हुआ है.
“हाल ही में पुतिन ने बीजिंग का दौरा किया. मेरे ख़्याल से पिछले साल वो तेहरान भी गए थे. उनके विदेश मंत्री सर्गेई लावारोव ने उत्तर कोरिया का दौरा किया. रूसी रक्षा मंत्री ने हाल में तेहरान का दौरा किया. विदेश मंत्री ने अफ़्रीकी देशों का दौरा किया. पिछली फ़रवरी में वो लातिन अमेरिकी देशों में गए थे.”
कुछ ऐसे देश भी हैं जो यूक्रेन युद्ध में रूस के साथ खड़े हो गए हैं.
डॉक्टर हना नॉटे का कहना है कि ये वो देश हैं जो कई किस्म के प्रतिबंध का सामना कर रहे हैं. इस गुट में उत्तर कोरिया, ईरान, म्यांमार और माली भी शामिल हैं. रूस को इन देशों से सैनिक सहायता मिल रही है.
पिछले साल से उसे ईरान से ड्रोन मिल रहे थे. अब चिंता व्यक्त की जा रही है कि रूस को उत्तर कोरिया से तोपों में इस्तेमाल होने वाले बम मिल रहे हैं और म्यांमार से हथियारों के कलपुर्जे मिल रहे हैं.
अपने आप में तो यह देश बहुत ताकतवर नहीं है लेकिन इन सबसे मिलने वाली सैनिक सहायता यूक्रेन युद्ध में रूस के बहुत काम आ सकती है.
लेकिन सवाल है कि बदले में इन देशों को रूस से क्या मिल रहा है?
रूस की ताक़त
डॉक्टर हना नॉटे ने कहा, “अभी तक यह तो दिखाई नहीं दिया है कि रूस इन देशों को हथियार दे रहा है. लेकिन अमेरिका में यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि रूस ईरान को लड़ाकू विमान और मिसाइल सुरक्षा कवच सिस्टम दे सकता है."
"साथ ही वो ईरान को मिसाइल प्रोग्राम और अंतरिक्ष प्रोग्राम विकसित करने में सहायता कर सकता है. यह चिंता भी व्यक्त की जा रही है कि रूस, उत्तर कोरिया के अंतरिक्ष प्रोग्राम के लिए तकनीकी सहायता दे सकता है.”
डॉक्टर हना नॉटे कहती हैं कि रूस के लिए यह संघर्ष केवल यूक्रेन तक सीमित नहीं है बल्कि वो प्रतिबंध झेल रहे अन्य देशों के साथ मिल कर पश्चिमी देशों के वर्चस्व को समाप्त करना चाहता है. इस मुद्दे पर यह सभी देश रूस के साथ सहयोग करने को तैयार हैं.
पश्चिमी देशों की ओर से सबसे अधिक प्रतिबंध रूस पर लगाए गए हैं. उसके साथ व्यापार रोक दिया गया है. विदेशी बैंकों में उसकी संपत्ति फ़्रीज़ कर दी गई है.
डॉक्टर हना नॉटे ने कहा, “मगर कई देश रूस के साथ व्यापार बंद करने से हिचकिचा रहे हैं क्योंकि इससे उनके आर्थिक और सामरिक हितों को नुकसान पहुंचता है. इस वजह से रूस, भारत और चीन को बड़ी मात्रा में तेल बेच पा रहा है."
"एशिया के दूसरे कई देश भी घुमा फिरा कर रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं जिस वजह से रूस प्रतिबंधों से होने वाले नुकसान की कुछ हद तक भरपाई करने में कामयाब रहा है. मेरे ख़्याल से रूस इसे एक लंबी लड़ाई की तरह देख रहा है और उम्मीद कर रहा है कि जल्द ही पश्चिमी देश थक कर यूक्रेन को सहायता करना कम कर देंगे."
मगर क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इसे लंबी लड़ाई की तरह देख कर यूक्रेन का समर्थन जारी रखेगा?
यूक्रेन के सहयोगियों का रुख़
नताशा लिंडस्टेड इंग्लैंड की एसेक्स यूनिवर्सिटी में सरकारी प्रशासन की प्रोफ़ेसर हैं.
वो कहती हैं कि फ़िलहाल यूक्रेन को सबसे अधिक सहायता अमेरिका से मिल रही है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, “अमेरिका यूक्रेन को 75 अरब डॉलर की आर्थिक और सैन्य सहायता दे चुका है. इसमें से 46 अरब डॉलर सैनिक सहायता पर खर्च किए गए हैं."
"इसकी एक वजह यह है कि अमेरिका का रक्षा बजट लगभग 800 अरब डॉलर है. दूसरी वजह यह है कि अमेरिका अपने आप को लोकतंत्र की सुरक्षा और यूक्रेन के सुरक्षा के लिए कटिबद्ध मानता है.”
मगर अमेरिका की इस कटिबद्धता को लेकर अब देश की कई सांसद सवाल उठा रहे हैं.
नताशा लिंडस्टेड का मानना है कि रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसद रूस को अमेरिका के लिए ख़तरा नहीं मानते. इसकी वजह पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप की विचारधारा का प्रभाव भी है.
राष्ट्रपति ट्रंप रूस के साथ नज़दीकी संबंधों के हिमायती रहे हैं. लेकिन अमेरिकी संसद में दोनों दलों के बीच इस मुद्दे पर ऐसा विभाजन पहले कभी नहीं दिखा था.
"मुझे लगता है कि यूक्रेन की सहायता को मंज़ूरी मिल जाएगी मगर कई शर्तों के साथ. "
अमेरिका के अलावा 40 अन्य देश यूक्रेन को सैनिक सहायता दे रहे हैं.
ग़ज़ा युद्ध से यूक्रेन चिंतित
नताशा लिंडस्टेड कहती हैं, “यूक्रेन को ब्रिटेन की ओर से काफ़ी सैनिक सहायता मिल रही है. इसके अलावा जर्मनी और कई अन्य यूरोपिय देश भी उसकी मदद कर रहे हैं. लेकिन कुछ देश अब हाथ पीछे खींचते नज़र आ रहे हैं. वहीं राजनीतिक बदलाव भी आ रहा है."
"मिसाल के तौर पर स्लोवाकिया में नई सरकार बनी है जो रूस समर्थक है. बुल्गारिया और मोलडोवा जैसे देशों में जनता यूक्रेन को सहायता घटाने के पक्ष में लगती है. हाल में पोलैंड ने यूक्रेन की सरकार के साथ मतभेद के चलते सैनिक सहायता में देर कर दी.”
मीडिया के साथ बात करते हुए यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने कहा कि इसराइल और हमास के बीच गज़ा में जारी संघर्ष के कारण विश्व का ध्यान यूक्रेन से हट गया है.
नताशा लिंडस्टेट भी इस से सहमत हैं. अमेरिका चाहे तो वो इसराइल और यूक्रेन की एक साथ मदद कर सकता है. लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है.
नताशा का कहना है कि यूक्रेन को प्रिसीजन गाइडेड मिसाइल और बमों की सप्लाई करना मुश्किल हो सकता है. क्योंकि आने वाले समय में यूक्रेन की ज़रूरतें और बढ़ेंगी.
यह आधुनिक हथियार बहुत मंहगे होते हैं और इसके इस्तेमाल के लिए यूक्रेनी सेना को ट्रेनिंग देनी पड़ेगी, साथ ही इसकी सप्लाई जारी रखने के लिए अमेरिका को कड़ी प्रतिबद्धता दिखानी होगी.
नताशा लिंडस्टेड मानती हैं कि पश्चिमी देश यूक्रेन के साथ खड़े रहना चाहते हैं लेकिन यह युद्ध उनके अनुमान से अधिक लंबा खिंच रहा है और संभवत: दशकों तक भी जारी रह सकता है.
अब आगे क्या?
अमेरिका की जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी में राजनीति और प्रशासन के प्रोफ़ेसर मार्क काट्ज़ कहते हैं कि समस्या का हल तब निकलता है जब दोनों पक्ष उसमें अपना हित देखते हों लेकिन फ़िलहाल रूस और यूक्रेन को इसमें अपना हित नज़र नहीं आ रहा है.
“मुझे लगता है यूक्रेन में जनता का एक बड़ा तबका युद्ध को जारी रखने के पक्ष में है क्योंकि उसे डर है कि रूस के साथ समझौता करने के लिए उसे बड़ी रियायतें देनी पड़ेंगी और रूस ताकत दोबारा जुटा कर हमला करेगा.”
तो समस्या का समाधान निकालने या रूस और यूक्रेन के बीच समीकरण बदलने के लिए क्या होना चाहिए?
मार्क काट्ज ने कहा, "एक परिवर्तन यह आ सकता है कि व्लादिमीर पुतिन सत्ता से बाहर किए जा सकते हैं. रूस के इतिहास में हमने देखा है कि एक तानाशाह को हटा कर दूसरा तानाशाह जब सत्ता में आता है तो वो पिछले तानाशाह की नीतियों को बदल देता है.''
"मगर इसकी कोई गारंटी नहीं है. यह युद्ध रूस के लिए महंगा साबित हुआ है. अगर कोई नया नेता सत्ता में आता है तो वह युद्ध को समाप्त करके नुकसान कम करने की कोशिश करेगा.”
इस साल यूरोपीय संघ के आयोग की प्रमुख अर्सला वैनडर लिएन ने अचानक कीएव का दौरा किया और कुछ ही दिन बाद आयोग ने यूक्रेन को यूरोपीय संघ में शामिल करने के लिए औपचारिक वार्ता शुरू करने की सिफ़ारिश कर दी.
मार्क काट्ज़ ने बताया कि यूरोपीय संघ का सदस्य बनने में यूक्रेन को कई साल लगेंगे. 2014 में रूस ने यूक्रेन के यूरोपीय संघ के साथ एसोशिएन के समझौते पर भी आपत्ति जताई थी.
यूक्रेन नेटो में शामिल हो पाएगा?
अब यूक्रेन को यूरोपीय संघ की सदस्यता देने पर बात हो रही है. यानी पुतिन की यूक्रेन नीति बुरी तरह विफल हो रही है. दूर जाने के बजाय यूक्रेन अब यूरोपीय संघ के और करीब आ गया है. उनके अनुसार यह एक सकारात्मक बदलाव है.
यूक्रेन ने नेटो की सदस्यता के लिए भी आवेदन कर रखा है. लेकिन युद्ध के जारी रहते यूक्रेन को नेटो की सदस्यता मिलना मुश्किल है. क्योंकि इससे नेटो के सदस्य देशों और रूस के बीच संघर्ष की संभावना बढ़ जाएगी.
मार्क काट्ज़ कहते हैं कि रूस चाहेगा कि युद्ध चलता रहे क्योंकि युद्ध के समाप्त होते ही यूक्रेन नेटो का सदस्य बन जाएगा जोकि रूस नहीं चाहता.
इसमें कोई शक़ नहीं कि यह लंबा खिंच रहा है और ख़त्म होने के करीब नहीं दिखता. लड़ाई कई जगहों पर जारी है लेकिन किसी भी सेना को ख़ास कामयाबी नहीं मिल रही है.
सर्दियों के शुरू होते ही स्थिति और मुश्किल हो जाएगी.
यूक्रेन के सहयोगी देशों में उसे समर्थन को लेकर असमंजस बन सकता है. वहीं रूस भी नए सहयोगी जुटा रहा है. ऐसे में बकौल यूक्रेनी सेना प्रमुख, यह युद्ध टैंकों से नहीं बल्कि टेक्नॉलॉजी से जीता जाएगा.
जिसके पास युद्ध की बेहतर टेक्नॉलॉजी होगी, उसकी जीत होगी.
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