नेटो शिखर सम्मेलन: यूक्रेन पर एक सुर में बात करने की जोड़-तोड़

कात्या एडलर

बीबीसी यूरोप संवाददाता

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नेटो का हाई प्रोफ़ाइल सालाना शिखर सम्मेलन शुरू ही होने वाला है. लेकिन बैठक से पहले ही सदस्य देशों में तनाव बढ़ता दिख रहा है.

उधर, इस सम्मेलन को मॉस्को मैं बैठे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिलचस्पी से देख रहे हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक, जर्मन चांसलर ओलाफ़ शॉल्त्स और नेटो के कई अन्य नेता इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं.

नेटो गठबंधन में मौजूद 31 सदस्य देशों के राजदूत भी लिथुआनिया में जुटेंगे.

देखना ये है कि नेटो के देश यूक्रेन-रूस युद्ध पर सार्वजनिक तौर पर क्या रवैया अपनाते हैं.

इतना हो-हल्ला क्यों?

बीते हफ़्ते यूक्रेन पर रूस के हमले को 500 दिन पूरे हो गए. इस दौरान रूस ने कई यूक्रेन के इलाकों पर कब्ज़ा किया.

आम नागरिकों पर हमला किया और बच्चों का अपहरण तक किया.

हालांकि यूरोप और अमेरिका यूक्रेन का पूरी तरह से साथ दे रहे हैं.

'कील इंस्टीट्यूट फ़ॉर ग्लोबल इकॉनमी के मुताबिक इस साल मई के अंत तक यूक्रेन में मानवीय, वित्तीय और सैन्य सहायता के लिए 165 अरब डॉलर खर्च किए जा चुके हैं.

यूरोपीय देशों के लिए यह एक नाज़ुक और एक मुश्किल क़दम रहा है. लेकिन सबसे ज़्यादा मुश्किल ये नेटो सैन्य गठबंधन के लिए रहा है जिसमें रूस का पुराना दुश्मन अमेरिका भी शामिल है.

सबसे मुश्किल सवाल ये है कि कैसे पश्चिमी देश ये संदेश साफ़ तौर पर दें कि रूस का यूक्रेन या यूरोप में कहीं भी संप्रभु क्षेत्र पर कब्ज़ा करना उन्हें बिल्कुल नामंजूर हैं.

साथ ही इस बात का भी ख़याल रखना होगा कि ये संदेश देते वक़्त परमाणु हथियारों वाले रूस के साथ सीधे संघर्ष की नौबत न आए.

क्या सोच रहा है अमेरिका

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अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है. ''मुझे नहीं लगता कि नेटो देशों में इस बात पर सहमति है कि इस समय युद्ध के बीचों-बीच यूक्रेन को नेटो में शामिल किया जाए.''.

उन्होंने आगे कहा कि यूक्रेन के शामिल होने का मतलब होगा, ''अगर युद्ध चल रहा है, तो हम सभी जंग में शामिल हैं. अगर ऐसा होता है तो इसका मतलब ये होगा कि हम रूस के साथ जंग लड़ रहे हैं.''

रूस के आक्रमण के 500 दिन बाद, नेटो के लिए सभी पक्षों के साथ संतुलन बनाना आसान नहीं हो रहा है.

यूक्रेन ने साफ़ कर दिया है कि उसे नेटो की मेज़ पर बाक़ी सदस्यों के साथ समान दर्जा चाहिए. जिसमें सभी सुरक्षा गारंटी हो और ये सब उसको अभी चाहिए.

यूक्रेन ये समझता है कि जंग के बीचों बीच नेटो किसी नए देश को अपना सदस्य नहीं बना सकता.

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की के मुताबिक वो कम से कम ये चाहते हैं कि उन्हें ''एक स्पष्ट संकेत मिले कि यूक्रेन गठबंधन का हिस्सा होगा.”

उन्हें ऐसा संदेश नहीं चाहिए जिसमें ‘दरवाज़े खुले हैं’ जैसे जुमले हों.

इससे कुछ भी कम होने पर उन्होंने इस शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं होने की धमकी दी है.

उनके इस बयान से जर्मनी और अमेरिका कुछ नाराज़ तो हुए हैं. जेलेंस्की अगर नहीं आते हैं तो पश्चिमी देशों की यूक्रेन के साथ एकता दिखाने की ये पूरी कवायद बेअसर हो जाएगी.

यूक्रेन को मिलेगा कैसा ऑफ़र?

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यहां दिक्कत ये है कि 2008 में ही रूस के आक्रमण से बहुत पहले, नेटो ने यूक्रेन को कहा था कि वो नेटो गठबंधन में शामिल हो सकता है.

उम्मीद इस बात की है कि नेटो को इस बार यूक्रेन को कुछ और ठोस ऑफ़र देना होगा.

कई प्रमुख नेटो देशों के बड़े राजनयिकों ने नाम ना ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी से बात की है.

उनका कहना है कि नेटो के सदस्य देश यूक्रेन को अपने ''परिवार'' में शामिल करने के लिए एकजुट हैं. लेकिन वो इसकी बारीकी पर एक राय नहीं रखते.

यूक्रेन को नेटो में शामिल करने को लेकर सबसे बड़ी चिंता

शिखर सम्मेलन लिथुआनिया की राजधानी विलनीयस में आयोजित किया जा रहा है. ये रूस से सटे हुए तीन छोटे बाल्टिक देशों में से एक है जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में सोवियत संघ ने अपने कब्ज़े में ले लिया था.

लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया के लोग यूक्रेन के दर्द को महसूस कर सकते हैं. ये तीनों देश और पोलैंड चाहते हैं कि यूक्रेन को तुरंत नेटो में शामिल किए जाए.

इनका तर्क है कि इससे नेटो रूस को युद्धविराम के लिए मना सकता है. लेकिन नेटो के किसी भी फ़ैसले के लिए सदस्य देशों के बीच आम सहमति की ज़रूरत है. जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन इसे लेकर ज़्यादा सतर्क हैं.

सबसे पहले, औपचारिक शर्तों की वजह से गठबंधन आम तौर पर चाहेगा कि शामिल होने वाले देश को कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी.

एक राजयनिक ने बीबीसी को बताया, ''यूक्रेन नेटो का सदस्य बनने का हक़दार है लेकिन हमारी चिंताएं अब भी वही हैं जो 2008 में थीं.''

उन्होंने आगे कहा ''हम यूक्रेन के भीतर सुधार, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ाई और सैन्य बलों पर उचित नियंत्रण के लिए उठाए गए क़दमों को देखना चाहेंगे.''

उन्हें ये भी उम्मीद है कि यूक्रेन ने रूसी सेना में फैले भ्रष्टाचार से एक स्पष्ट सबक सीखा होगा. यूक्रेन के नेतृत्व को अहसास होगा कि रूस की सेना ने अरबों निगल लिए हैं.

कुछ नेटो देशों को इस बात की भी चिंता है कि अगर रूस के साथ युद्धविराम की सूरत में यूक्रेन को नेटो में शामिल करने का कोई वादा किया जाता है तो रूस इस जंग को और लंबी खींच देगा.

'सब्र करिए, ये हॉलीवुड फ़िल्म नहीं'

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तो यूक्रेन को इस शिखर सम्मेलन से क्या उम्मीद रखनी चाहिए

पहला है सामरिक धैर्य. पूर्व नेटो और विदेश संबंधों पर यूरोपीय परिषद में रक्षा विशेषज्ञ कैमिल ग्रांड मानते हैं कि पश्चिमी देशों की ओर से एक साफ़ वादा किया जाए कि वह लंबे वक्त तक यूक्रेन के साथ होंगे.

और ये कि रूस को ये संदेश बिलकुल ना जाए कि लंबे वक्त तक ये सब जारी रहा तो पश्चिमी देश खुद धैर्य खो देंगे और कदम पीछे खींच लेंगे.

राजनयिकों के साथ बातचीत के दौरान हमें ये देखकर आश्चर्य हुआ कि रूस के खिलाफ़ यूक्रेन के जवाबी हमले की धीमी गति को लेकर ये देश कितने बेफ़िक्र थे.

ये तमाम लोग ब्रिटेन के विदेश सचिव के जैसी सोच रखते हैं जिनका मानना है ''यह कोई हॉलीवुड फ़िल्म नहीं है''.

एक राजदूत ने बीबीसी को बताया, ''रूस के पास हमले की तैयारी के लिए बहुत लंबा समय था. अब हम उम्मीद करें कि यूक्रेन तीन या चार सप्ताह में नाटकीय सफलता हासिल कर लें? यह बिल्कुल अवास्तविक सोच है.''

एक और राजनयिक ने टिप्पणी की कि ''यूक्रेन लोगों की जान का सम्मान करते हुए आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है.''

उन्होंने इसकी तुलना रूस के मीट-ग्राइंडर ( कीमा बनाने की मशीन) रवैये से की, जो अपने सैनिकों को आगे बढ़ कर बड़ी संख्या में लड़ने को कह रहा है.

वह कहते हैं, ''क्या निजी तौर पर ये सवाल करते हैं कि यूक्रेन तक कितनी तेज़ी से युद्ध सामग्री पहुंचती है? बिल्कुल! हम ये सवाल उठाते हैं.”

स्पष्ट बोलने वाले एक और राजनयिक ने कहा, ''लेकिन यहां यह अहम है कि यूक्रेन के लोगों को यह नहीं लगना चाहिए कि हम उन पर कुछ थोप रहे हैं.' हम उन्हें ज़रूरी सैन्य मदद दे रहे हैं और रूस को ये जान लेना चाहिए कि ये मदद यूं ही जारी रहेगी.”

सुरक्षा का भरोसा

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विलनीयस शिखर सम्मेलन में महत्वपूर्ण बातचीत यूरोप के रक्षा उद्योग पर भी केंद्रित होगी.

यूक्रेन को मदद जारी रहे इसके लिए आवश्यक निवेश कहां से आएगा साथ ही यूरोपीय संघ और नेटो के सदस्य देशों के पास अपने देश की रक्षा के लिए भी पर्याप्त हथियार हों.

इन सभी सवालों पर चर्चा होनी है.साथ ही इस वक्त सवाल यूक्रेन की मदद में सामंजस्य बिठाने का भी है. इसे कुछ ऐसे समझिए.

हर नेटो देश यूक्रेन को अपनी सैन्य सहायता भेजता है. इससे होता ये है कि यूक्रेन को अलग अलग मॉडल के बख्तरबंद वाहनों और टैंक वगैरह मिलते है. लेकिन ये तरीका बिल्कुल दुरुस्त नहीं है.

ऐसे में यूक्रेनी सैनिकों को नए-नए हथियार चलाने के लिए वक्त लगता है जो युद्ध में आगे बढ़ने के लिहाज़ से ठीक नहीं है.

यूक्रेन के प्रति नरम रवैया

यूक्रेन के लिए तत्काल नेटो सदस्यता नहीं मिलने की सूरत में ब्रिटेन, अमेरिका, फ़्रांस और जर्मनी जैसे देश उसे सुरक्षा गारंटी देने के लिए गठबंधन बना रहे हैं.

अमेरिका इसे यूक्रेन के लिए "सुरक्षा आश्वासन" का नाम दे रहा है.

शिखर सम्मेलन के दौरान और इस समूह के बारे में बातें पता चल सकती हैं.

नेटो-यूक्रेन काउंसिल और ज़ेलेंस्की की मौजूदगी

सम्मेलन के दूसरे दिन, नेटो, नेटो-यूक्रेन काउंसिल का आयोजन होने वाला है.

इसमें अगर यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की हिस्सा नहीं लेते हैं तो ये थोड़ी अजीबोगरीब परिस्थिति होगी.

इस परिषद का मक़सद नेटो गठबंधन के साथ यूक्रेन के सहयोग को और बढ़ाना है ताकि नेटो देशों के संसाधनों तक उसे ज़्यादा पहुंच दी जा सके.

क्यों चिंतित हैं कुछ नेटो देश?

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यूक्रेन के लिए अपना सामान्य तौर पर ज़रूरी मेंबरशिप एक्शन प्लान (सदस्यता कार्य योजना) को छोड़ने की भी संभावना है.

इससे यूक्रेन को सदस्यता हासिल करने के लिए लंबी और चरणबद्ध तैयारी प्रक्रिया से छुट्टी मिल जाएगी जिसे अमूमन कोई भी उम्मीदवार देश पूरा करते हैं.

नेटो का कोई भी देश ये नहीं कह रहा है कि उसे यूक्रेन का समर्थन नहीं करना है. फ़िलहाल यूक्रेन के जवाबी हमले के लिए उनकी तिजोरी खुली है.

हालांकि, कुछ नेटो देश ख़ासकर इटली- इस बात से चिंतित है कि यूक्रेन को मदद देने वाले इस महंगे सौदे में देश की जनता की राय उनके ख़िलाफ़ ना हो जाए.

जंग ख़त्म होने पर नेटो गठबंधन को इस पर भी एकमत होना होगा कि रूस को लेकर उनका स्टैंड क्या रहेगा.

नेटो सदस्यों को लगता है कि रूस के साथ युद्धबंदी पर यूक्रेन की राय ही अहम होगी

लेकिन कूटनयिकों ने बीबीसी बताया कि एक समय ऐसा भी आ सकता है जब पश्चिम देश यूक्रेन को पीछे से ये कहें कि बस अब युद्ध विराम कर लो ताकि पैसे भी बचें और लोगों की जान भी.

हालांकि, वो ज़ोर देकर कहते हैं कि ऐसी कोई बातचीत फ़िलहाल नहीं होने वाली है.

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