क्या कम हो सकती है यूक्रेन को मिलने वाली पश्चिमी देशों की मदद

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- Author, जेम्स लैंडल
- पदनाम, पोलैंड में बीबीसी के राजनयिक संवाददाता
यूक्रेन रूस से कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहा है. जिस तरह युद्ध के मैदान में जीत बहुत मुश्किल से मिलती है, उसी तरह इन दिनों कूटनीतिक लाभ भी मिल रहे हैं.
पिछले साल रूसी हमले के बाद से ही पश्चिमी देशों का यूक्रेन को मजबूत समर्थन बना हुआ है. लेकिन अब यूक्रेन समर्थक गठबंधन में फूट पड़ने लगी है.
यूक्रेन के पुराने सहयोगी अमेरिका ने 110 अरब डॉलर की और आर्थिक और सैन्य सहायता मंजूर की है. वहीं सप्ताहांत में कांग्रेस ने सरकार के यूक्रेन को छह अरब डॉलर की अतिरिक्त मदद के प्रस्ताव को रद्द कर दिया.
कुछ रिपब्लिकन नेताओं की राय है कि यूक्रेन को दी जा रही मदद को रोका जाना चाहिए.
अन्य कुछ अन्य लोगों को मानना है कि यह केवल तभी दी जाए जब राष्ट्रपति जो बाइडन अमेरिकी सीमा की सुरक्षा पर अधिक खर्च करें.
बाइडन ने यूक्रेन को अतिरिक्त 24 अरब डॉलर की सहायता का आश्वासन दिया है. यह अमेरिका की आतंरिक लड़ाई की वजह से खटाई में पड़ता दिख रहा है.
वहीं दूसरी ओर यूक्रेन अटलांटिक के रूप में अपना एक दूसरा सहयोगी खो सकता है.
स्लोवाकिया में चुनाव

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स्लोवाकिया के चुनाव में रॉबर्ट फिको की स्मर पार्टी ने अधिकांश सीटों पर जीत दर्ज की है.
हालांकि उन्हें अभी भी एक गठबंधन बनाने की जरूरत है. पूर्व प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको को रूस समर्थक और यूक्रेन विरोधी के रूप में देखा जाता है. उन्होंने यूक्रेन को दी जा रही सैन्य मदद बंद करने के चुनावी वादे पर अपना अभियान चलाया था.
उन्होंने कहा था, "स्लोवाकिया में लोगों को यूक्रेन से भी बड़ी समस्याएं हैं." अब यह कह सकते हैं कि हंगरी के विक्टर ओर्बन के साथ यूरोपीय यूनियन के दो देश यूक्रेन के समर्थन के ईयू के सामूहिक प्रयास को वीटो करने के लिए तैयार हैं.
वहीं यूक्रेन के पड़ोसी पोलैंड में भी जल्द ही चुनाव होने वाले हैं. पड़ोसी पोलैंड में भी जल्द ही चुनाव होने वाले हैं.
वहां भी यूक्रेन को समर्थन देने पर संदेह जताया जा रहा है. वहां सत्तारूढ़ लॉ एंड जस्टिस पार्टी ने यूक्रेन से सस्ते अनाज के आयात पर रोक लगाने का वादा किया है. पोलैंड के किसान इस आयात का विरोध कर रहे हैं.
राष्ट्रपति आंद्रेज डूडा ने यूक्रेन की तुलना एक ऐसे डूबते हुए आदमी से की है, जो अपने बचाने वाले को ही नीचे खींच रहा है. वहां के प्रधानमंत्री माट्यूज मोराविएकी ने कहा कि पोलैंड अब यूक्रेन को कोई हथियार नहीं ट्रांसफर कर रहा है. हालांकि बाद में वो अपने बयान से पलट गए.
इसलिए लग रहा है कि चुनावी राजनीति अब यूक्रेन के समर्थन में दखल देने लगी है. इसी तरह अन्य मुद्दे भी हैं, चाहे वह महंगाई का संकट हो या जलवायु आपातकाल.
संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन

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यह भी देखा गया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के एजेंडे के शीर्ष पर भी यूक्रेन नहीं था.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद में दिए भाषण ने पहले जैसी चर्चा नहीं बटोरी. राजनयिकों ने नोट किया कि यूक्रेनी प्रतिनिधिमंडल की चमक भी फींकी पड़ी है, जबकि ग्लोबल साउथ के नेता अपने एजेंडे पर जोर दे रहे हैं.
यह सब वही है जिसकी रूस के रणनीतिकारों को लंबे समय से उम्मीद थी.
राजनयिकों का मानना है कि व्लादिमीर पुतिन पश्चिम का तबतक इंतजार करना चाहते हैं और लड़ाई जारी रखना चाहते हैं जब तक कि यूक्रेन को मिलने वाला अंतरराष्ट्रीय समर्थन कम न होने लगे और वो राजनीतिक समाधान की खोज न कर लें.
पश्चिमी देशों के नेताओं का जोर इस बात पर कि उनमें अपने रास्ते पर बने रहने और रूस की उम्मीदों से अधिक रणनीतिक धैर्य दिखाने की क्षमता है.
ब्रिटेन के विदेश मंत्री जेम्स क्लेवरली ने सप्ताह में संसद की मैगज़ीन को बताया था कि युद्ध के साथ अंतरराष्ट्रीय थकान एक बड़ी बात थी. यह कुछ ऐसा था जिससे हमें निपटना था. यह स्वीकार करते हुए कि यह दुनिया भर के देशों पर दबाव डाल रहा था.
उनका कहना था कि अगर यूक्रेन के लिए पश्चिमी देशों का समर्थन कम हो गया, तो वे दबाव, चाहें आर्थिक हों या राजनीतिक बदतर हो जाएंगे. यह बहुत कठिन और दर्दनाक है. लेकिन अगर हम लड़खड़ाते हैं तो यह और अधिक कठिन और दर्दनाक होगा.
इस धारणा को तोड़ने के लिए यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों ने सोमवार को यूक्रेन का दौरा किया था. इन लोगों ने समर्थन को दोहराने और दिखाने के लिए पहली बार सामूहिक रूप से बैठक की थी.
यूरोपीय संघ की चिंता क्या है?

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यूरोपीय संघ के विदेश नीति प्रमुख जोसेप बोरेल ने बीबीसी को बताया कि ईयू अपना सैन्य समर्थन जारी रखेगा. उसने अब तक पांच अरब पाउंड की मदद की है.
उन्होंने कहा कि एक बात तो साफ है कि यूरोपीय लोगों के लिए यूक्रेन पर रूस का हमला हमारे अस्तित्व के लिए खतरा है. हमें उसी के मुताबिक प्रतिक्रिया देनी होगी. हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि वो भविष्य की सहायता को रोकने के कांग्रेस के फैसले से चिंतित थे.
इसके जवाब में राजनयिक जो तर्क दे रहे हैं, वह यह है कि युद्ध के मैदान में यूक्रेन का भाग्य अधर में लटका हुआ है. उनका कहना है कि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देश इस तर्क को स्वीकार करने लगे हैं.
यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा ने पत्रकारों से कहा, "यूक्रेन में जो कुछ दांव पर लगा है, वह यूक्रेन से कहीं अधिक बड़ा है. यह दुनिया की स्थिरता और पूर्वानुमान के बारे में है."
यूक्रेन एक लंबा खेल खेल रहा है. सरकार में शामिल प्रमुख लोगों ने लंबे समय से अनुमान लगाया है कि पश्चिमी देशों का समर्थन समय बीतने के साथ-साथ कम हो सकता है.
वे जानते हैं कि पश्चिमी देशों की एकता की असली परीक्षा बाद में दो महत्वपूर्ण मौकों पर हो सकती है. इनमें सबसे पहला यह है कि अगर डोनाल्ड ट्रंप अगले साल फिर राष्ट्रपति चुने जाते हैं. वे अमेरिकी मदद में कटौती करते हैं तो यूक्रेन को एक बड़ा फैसला यह लेना होगा कि वह लड़ाई कब तक जारी रख सकता है.
दूसरा यह कि यदि युद्ध का किसी तरह से अंत हो जाता है, तो सहयोगियों को उन समझौतों के साथ एकजुट होने में मुश्किल हो सकती है. जिसकी किसी राजनीतिक समाधान तक पहुंचने के लिए जरूरत पड़ सकती है.
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