रूस-यूक्रेन युद्ध: पुतिन और चीन का ये रिश्ता क्या कहलाता है

व्लादिमीर पुतिन और वांग यी

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    • Author, स्टीफ़न मैकडोनेल
    • पदनाम, बीबीसी चीन संवाददाता, बीजिंग
बीबीसी हिंदी
  • 24 फ़रवरी 2022 को व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ विशेष सैन्य अभियान की घोषणा की.
  • इस युद्ध को आज 364 दिन हो चुके हैं.
  • रूस यूक्रेन के नेटो में शामिल होने का विरोध करता है. उसका कहना है कि ऐसा हुआ तो नेटो के नेतृत्व वाले देशों के सैन्य ठिकाने उसकी सरहदों के पास पहुंच जाएंगे.
  • रूसी हमले का पश्चिमी मुल्कों ने जमकर विरोध किया और रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए.
  • रूस से यूक्रेन के पूर्वी और दक्षिणी हिस्से से शुरुआत की और लुहांस्क, दोनेत्स्क के कई इलाक़ों पर कब्ज़ा कर लिया. उसने इन्हें रूस का हिस्सा घोषित कर दिया.
  • संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी के अनुसार, युद्ध के कारण अब तक1.86 करोड़ लोग यूक्रेन छोड़ कर जा चुके हैं.
  • देश छोड़ने वालों में अधिकांश महिलाएं और बच्चे हैं. 18 साल से 60 की उम्र के लोगों को यूक्रेनी सरकार ने देश में रहकर युद्ध करने को कहा है.
  • फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, कनाडा जैसे कई मुल्क साफ़ तौर पर यूक्रेन की मदद के लिए आगे आए. वहीं बेलारूस ने रूस का साथ देने की बात की.
  • भारत रूस के मुद्दे पर तटस्थ रहा है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि ये युद्ध का दौर नहीं है और दोनों को बातचीत के ज़रिए मुद्दे को हल करना चाहिए.
  • वहीं चीन भी बातचीत के ज़रिए इस मुद्दे का समाधान निकालने पर ज़ोर देता रहा है.
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व्लादिमीर पुतिन और वांग यी

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रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन लंबी मेज़ पर बैठना पसंद करते हैं, कम से कम कुछ तस्वीरों में ये साफ़ दिखता है.

लेकिन इस सप्ताह जब चीन के विदेश मंत्रालय के आला नेता मॉस्को पहुंचे तो बातचीत के लिए पुतिन उनके क़रीब बैठे दिखे.

अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ पुतिन की मुलाक़ातों की तस्वीरों में आम तौर पर देखा जा सकता है कि पुतिन ख़ुद मेज़ की एक सिरे पर होते हैं जबकि अन्य नेता मेज़ की दूसरे छोर पर.

कई बार आपको ये संदेह भी होता है कि क्या दोनों एक दूसरे की बात सुन भी पा रहे होंगे.

इसी साल 15 फरवरी को पुतिन ने मॉस्को में जर्मनी के चांसलर ओलाफ़ शोल्त्ज़ से मुलाक़ात की थी. दोनों के बीच यूक्रेन की सुरक्षा के मुद्दे पर बात हुई थी. इस बैठक में दोनों एक लंबी मेज़ के दो छोरों पर बैठे दिखे थे.

पुतिन ओलाफ़ शोल्त्ज़

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नज़ारा बदला-बदला दिखा

इससे कुछ दिन पहले पुतिन ने मॉस्को में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से बात की थी.

उस वक्त तक रूस ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ अभियान नहीं छेड़ा था और फ्रांसीसी राष्ट्रपति के साथ नेटो और यूक्रेन के मुद्दे पर आपसी समझ बढ़ाने को लेकर चर्चा हो रही थी.

इस दौरान भी दोनों राष्ट्राध्यक्ष एक लंबी मेज़ के दोनों सिरों पर बैठे दिखे.

इन तस्वीरों में पुतिन अन्य नेताओं से काफी दूर बैठे दिखे थे. लेकिन चीनी विदेश नीति मामलों के आला नेता रूस पहुंचे तो नज़ारा बदला-बदला दिखा.

मुलाक़ात की तस्वीरों में देखा गया कि एक अंडाकार मेज़ पर दोनों नेताओं एक दूसरे के क़रीब, हाथ मिलाने की दूरी पर बैठे थे.

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इमैनुएल मैक्रों और व्लादिमीर पुतिन

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रूस चीन संबंध

हो सकता है कि पहले से ही बैठकों के लिए इस्तेमाल की जा रही उसी मेज़ पर बैठने के तरीक़े को बदल कर ये नज़दीकी हासिल की गई हो, जैसे कि चीनी नेता के साथ पुतिन उसी अंडाकार टेबल के बीच की तरफ बैठे न कि किसी सिरे की तरफ.

लेकिन जब चीनी नेता वांग यी के साथ पुतिन की बैठक का वीडियो सामने आया तो ऐसा लगा कि ये जानबूझ कर उठाया गया एक सांकेतिक कदम था जिसके ज़रिए ये दिखाने की कोशिश की गई कि अपने अहम दोस्त के प्रतिनिधि के क़रीब बैठने में पुतिन सहज महसूस करते हैं.

हालांकि हमेशा से ऐसा नहीं था. कई दशक पहले सोवियत संघ के साथ चीन के रिश्ते तनावपूर्ण थे.

ये शीत युद्ध का दौर था और दोनों के बीच मामला परमाणु हमले के ख़तरे की हद तक पहुंच गया था, जिसके बाद चीन ने अपने नागरिकों को बचाने के लिए राजधानी में छिपने के लिए ख़ास सुरंगों का एक पूरा नेटवर्क तैयार किया था.

लेकिन ये बात अब पुरानी हो चुकी है. मौजूदा दौर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग रूस को एक ऐसे मुल्क के रूप में देखते हैं जो अमेरिकी प्रभाव के ख़िलाफ़ लड़ने वाले मुल्कों की पहली कतार में खड़ा है. उसके लिए रूस उत्तर कोरिया की तरह एक ऐसा मुल्क है जो दुनिया की नज़र में अलग-थलग पड़ चुका है लेकिन उसके लिए भू-रणनीतिक तौर पर बेहद अहम साबित हो सकता है.

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व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग

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स्थिति नाज़ुक धागे पर चलने जैसी

बीते साल जब रूसी राष्ट्रपति पुतिन बीजिंग विंटर ओलंपिक्स की ओपनिंग समारोह में शिरकत करने चीन पहुंचे थे, उस दौरान चीनी सरकार ने दावा किया कि रूस के साथ उसके रिश्ते 'सीमाओं से बंधे नहीं हैं.'

इस घटना के कुछ दिन बाद ही रूस ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ 'विशेष सैन्य अभियान' छेड़ दिया था.

इसे लेकर कई हलकों से ये सवाल उठे कि क्या शी जिनपिंग को यूक्रेन पर रूसी हमले के बारे में पहले से चेतावनी दी गई थी क्योंकि जब विंटर ओलंपिक के दौरान दोनों राष्ट्राध्यक्षों की बात हुई उस वक्त रूस यूक्रेन से सटी अपनी सीमा पर सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा था और ज़ाहिर तौर पर उनके दिमाग़ में हमले के अलावा कोई और बात नहीं होगी.

यूक्रेन के मसले पर रूस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने को लेकर चीन पहले ही बेहद नाज़ुक मोड़ पर खड़ा है.

हो सकता है कि शी जिनपिंग को लगता हो कि वो इस राह पर मज़बूती के साथ आगे बढ़ रहे हैं लेकिन कई लोगों का मानना है कि उनकी इस राह के किनारे अब उधड़ने लगे हैं और चीन के लिए यूक्रेन मामले पर तटस्थ रहने के अपने दावे पर मज़बूती से खड़ा रहना मुश्किल होता जा रहा है.

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'शांति और स्थिरता'

पुतिन के साथ बैठक के बाद वांग यी ने दावा किया कि चीन और रूस मिलकर 'शांति और स्थिरता' को बढ़ावा दे रहे हैं.

लेकिन वहीं दुनिया के दूसरे हिस्सों में युद्ध के एक साल पूरे होने के कुछ दिन पहले उनके रूस का दौरा करने और 'शांति और स्थिरता' को बढ़ावा देने का दावा करने को हास्यास्पद माना जा रहा है.

ऐसा नहीं है कि चीन को इस बात का अंदाज़ा नहीं है, उसे पता है कि इस दौरे से उसकी छवि को नुक़सान पहुंचेगा. लेकिन इसके बावजूद उसने फ़ैसला किया कि इस वक्त उसके लिए अपने मित्र पुतिन को नैतिक समर्थन देना अधिक ज़रूरी है.

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लैवरॉव से मुलाक़ात के दौरान वांग यी ने कहा, "मेरे मित्र मैं आपसे आपसी हितों के मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार हूं और उम्मीद करता हूं कि हमारे बीच नए समझौते होंगे."

वहीं रूसी विदेश मंत्री ने कहा था कि 'अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद उथल-पुथल वाले दौर में भी' दोनों मुल्क एक दूसरे के साथ खड़े हैं और एक दूसरे के हितों की रक्षा करने को प्रतिबद्ध हैं. उनका कहना कुछ ऐसा था जैसे ये उथल-पुथल काल्पनिक है और इसमें रूस की सरकार की कोई भूमिका नहीं है.

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चीन की भूमिका पर उठ रहे सवाल

इस सप्ताह की शुरुआत में चीन के विदेश मंत्री चिन गांग ने चेतावनी दी थी कि अगर कुछ देशों ने आग में घी डालने का काम बंद नहीं किया तो यूक्रेन संकट नियंत्रण से बाहर हो जाएगा.

चिन गांग का इशारा अमेरिका की तरफ था. उनका कहना था कि रूस के ख़िलाफ़ लड़ने में अमेरिका यूक्रेन को सैन्य सहायता मुहैया करता रहा है और उसने उसके लिए राहत पैकेज भी दिया है. लेकिन वहीं अमेरिका बार-बार चेतावनी देता रहा है कि चीन रूस को हथियार या गोलाबारूद न दे.

विशेषज्ञ अब ये सवाल करने लगे हैं कि यूक्रेन मुद्दे पर चीन शुरुआत से ही रूस के साथ खड़ा दिखा है लेकिन अगर पुतिन यूक्रेन के ख़िलाफ़ छेड़े गए इस अभियान में अपमानजनक हार का सामना करते हैं तो चीन के पास क्या विकल्प बचे रह जाएंगे?

अमेरिका में शोधकर्ताओं का कहना है कि चीन रूस को पहले ही डुअल-यूज़ इक्विपमेन्ट की सप्लाई कर रहा है. ये ऐसी तकनीक होती है जो दिखने में नागरिकों के इस्तेमाल की होती है लेकिन इसका इस्तेमाल फ़ाइटर जेट की रिपेयरिंग जैसे दूसरे कामों में भी हो सकता है.

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पुतिन का प्रस्तावित चीन दौरा

साथ ही चीन ने ये बात भी किसी से नहीं छिपाई है कि उसने रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदना बढ़ा दिया है.

यूक्रेन पर हमले के बाद रूस पर पश्चिमी मुल्कों ने कई पाबंदियां लगाई थीं जिसके बाद उसके तेल और गैस के निर्यात में कमी आई थी.

वांग यी के साथ मुलाक़ात के दौरान रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने ये पुष्टि की है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग मॉस्को के दौरे पर आएंगे. माना जा रहा है ये दौरा आने वाले महीनों में हो सकता है.

एक तरह से देखा जाए तो रूस वो कर रहा है जो चीन करना चाहता है. वो एक तरफ पश्चिमी मुल्कों के सैन्य संसाधनों को खोखला कर रहा है तो दूसरी तरफ सैन्य गठबंधन नेटो पर भी दबाव बना रहा है.

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लेकिन सवाल ये है कि अगर इसकी वजह से रूसी अर्थव्यवस्था ठप पड़ गई तो क्या इससे चीन को कोई फर्क पड़ेगा? इसके बाद रिकवरी के लिए रूस को अधिक से अधिक चीनी सामान की ही ज़रूरत पड़ेगी.

समस्या ये है कि रूस के ख़िलाफ़ पश्चिमी मुल्क काफी हद तक एकजुट हैं और रूस इस लड़ाई में जीतता नहीं दिखता, वहीं चीन एक ऐसे दबंग मुल्क के साथ खड़ा दिखता है जो यूरोप में एक लंबे चले ख़ूनी जंग का ज़िम्मेदार है.

चीन को तो इस बात को लेकर सतर्क रहना होगा कि वो इस मामले में ज़रूरत से अधिक पैर न डाले.

हालांकि दुनिया के दूसरे देश भी यही चाहेंगे कि एशिया की ये बड़ी अर्थव्यवस्था इस युद्ध में जिस हद तक घुस चुका है उतने में ही खुद को सीमित कर ले और इसमें और अधिक हिस्सेदारी न ले.

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