ईरानी राष्ट्रपति का चीन दौरा: भारत और दुनिया के लिए क्या हैं इसके मायने

शी जिनपिंग और रईसी

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    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ईरान के राष्ट्रपति इब्राहीम रईसी तीन दिनों की चीन यात्रा पर मंगलवार को राजधानी बीजिंग पहुंच रहे हैं.

रईसी अगस्त 2021 में ईरान के राष्ट्रपति बने थे और उसके बाद से वो बहुत ही विदेश यात्रा पर गए हैं. हालंकि सितंबर 2022 में समरकंद में हुए शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक के दौरान रईसी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात हुई थी.

लेकिन रईसी पहली बार चीन की यात्रा कर रहे हैं. ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अली ख़ामेनेई ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी.

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट अख़बार के एक लेख के अनुसार ईरान के न्यूक्लियर समझौते पर दोनों देशों के बीच अहम बातचीत होगी. ईरान के परमाणु डील के मुख्य वार्ताकार अली बागेरी कानी राष्ट्रपति के साथ चीन की यात्रा में शामिल हैं.

इसके अलावा दोनों देशों के बीच व्यापार और सामरिक रिश्तों को बढ़ाने पर बल दिया जाएगा.

ईरान के तेल का चीन बहुत बड़ा ख़रीदार है और चीन करोड़ो डॉलर का निवेश ईरान में कर रहा है.

अली ख़ामेनेई

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दोनों देशों ने 2021 में 25 वर्षों के लिए एक व्यापक रणनीतिक और आर्थिक सहयोग योजना पर समझौता किया था जिसके तहत चीन ईरान में क़रीब 400 अरब डॉलर का निवेश करेगा. बदले में ईरान वैश्विक दरों के मुक़ाबले कम क़ीमत पर चीन को तेल, गैस और पेट्रो-केमिकल उत्पाद मुहैया कराएगा.

सिंगापुर स्थित चीनी पत्रकार सन शी कहते हैं कि यह दोनों देशों के बीच दोस्ती को और मज़बूत करेगा और भविष्य में सामरिक सहयोग का रास्ता हमवार करेगा. उनके अनुसा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए यह बहुत अच्छा होगा लेकिन पश्चिमी देश ईरान और चीन की इस निकटता को देखकर निश्चित ही ख़ुश नहीं होंगे.

रईसी की चीन यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब दोनों ही देशों के अमेरिका से बहुत ही ख़राब संबंध हैं.

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अमेरिका पर निशाना

पुतिन और रईसी

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अपनी यात्रा से पहले चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र पीपुल्स डेली में राष्ट्रपति रईसी का एक लेख छपा है जिसमें उन्होंने विदेशी शक्तियों के हस्तक्षेप और वर्चस्व को संयुक्त रूप से चुनौती देने की बात की है.

रईसी ने लिखा है, ईरान और चीन का मानना है कि अन्यायपूर्ण प्रतिबंध लगाने जैसा एक-पक्षीय और हिंसक रास्ता दुनिया में संकट और असुरक्षा का मुख्य कारण है. चीन और ईरान दोनों एकमत हैं कि दुनिया में सच्चा बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय न्याय और एक न्यायपूर्ण अंतरराष्टच्रीय ऑर्डर को हासिल करने के लिए सभी देशों को मिलकर काम करना चाहिए.

रईसी ने अमेरिका का नाम नहीं लिया लेकिन उनके लेख से साफ़ है कि उनका इशारा अमेरिका की तरफ़ था.

इसलिए रईसी की चीन यात्रा को आर्थिक समझौतों से ज़्यादा सामरिक महत्व के नज़रिये से देखा जा रहा है.

सन शी कहते हैं कि पश्चिमी देश और ख़ासकर अमेरिका लंबे समय से ईरान पर प्रतिबंध लगाकर उसे पूरी तरह से अलग-थलग करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इसमें वो सफल नहीं हो पा रहे हैं. चीन अगर ईरान के साथ आ जाता है तो इससे ईरान को अंतरराष्ट्रीय जगत के साथ संवाद करने में बहुत मदद मिलेगी.

ईरान में भारत के राजदूत रह चुके पूर्व राजनयिक केपी फ़ेबियन के अनुसार अमेरिका के प्रतिबंधों और ईरान के परमाणु डील को रद्द करने के बाद ईरान अपने लिए आर्थिक और राजनियक जगह तलाश रहा है और ऐसे में राष्ट्रपति रईसी की चीन यात्रा बहुत अहम है.

उनके अनुसार रईसी जब शी जिनपिंग से मिलेंगे तो वो ईरान के परमाणु डील को बहाल करने के लिए उनसे ज़रूर मदद मांगेंगे. साल 2015 में ईरान ने जर्मनी, चीन, अमरीका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस क साथ एक समझौता किया था, जिसके तहत ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाने के बदले ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रमों पर नियंत्रण लगाना था. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ने 2018 में अमेरिका को इससे अलग कर लिया था उसके बाद से यह समझौता रद्द हो गया था.

राजदूत फ़ेबियन के अनुसार चीन और रूस तो एक दूसरे के क़रीब हैं हीं अब ईरान भी दोनों के क़रीब होते जा रहा है.

जबीन जैकब के अनुसार अमेरिका के ख़िलाफ़ चीन और ईरान के हित बहुत से मामलों में एकसमान हैं.

युक्रेन युद्ध में ईरान रूस के साथ खड़ा है और अमेरिका का आरोप है कि ईरान रूस को ड्रोन सप्लाई कर रहा है सिसका इस्तेमाल रूस युक्रेन पर हमले करने में कर रहा है. जबीन जैकब के अनुसार ईरान अब एक सैन्य प्लेयर भी बन गया है और ऐसे में अमेरिका की चिंता बढ़ना लाज़िमी है.

चीनी मामलों के विशेषज्ञ और फ़िलहाल शिव नादर यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे प्रोफ़ेसर जबीन टी जैकब के अनुसार ईरान में हिजाब के मुद्दे पर जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं उनमें अमेरिका और ज़्यादातर पश्चिमी देश प्रदर्शनकारियों के साथ हैं जबकि चीन ईरान सरकार के साथ है. उनके अनुसार प्रदर्शनकारियों पर क़ाबू पाने के लिए इंटरनेट ब्लॉक करने और प्रदर्शनकारियों पर नज़र रखने के लिए ईरान जिस तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है उसे चीन ने वह मुहैया कराया है.

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खाड़ी में चीन की बढ़ती सक्रियता

सऊदी के प्रिंस और शी जिनपिंग

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जबीन जैकब के अनुसार चीन खाड़ी में ईरान और बाक़ी अरब देशों के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है और इस एतबार से भी रईसी की चीन यात्रा बहुत अहम है.

दिसंबर, 2022 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सऊदी अरब गए थे तब ईरान ने कहा था कि चीन उनके क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी के साथ रिश्ते बढ़ा रहा है.

चीन और सऊदी अरब ने एक साझा बयान जारी किया था जिसमें दोनों पक्षों ने आर्थिक और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की बात के साथ ही ईरान के विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम के शांतिपूर्ण निपटारे को लेकर साथ काम करने की बात कही थी. इसके अलावा साझा बयान में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तीन छोटे जज़ीरों को लेकर जारी विवाद में यूऐई का पक्ष लिया गया था. इससे ईरान काफ़ी नाराज़ हुआ था.

सन शी कहते हैं कि चीन ने इसी कारण ईरानी राष्ट्रपति को चीन आने का न्यौता दिया क्योंकि चीन सऊदी अरब या ईरान किसी को भी नाराज़ नहीं करना चाहता है.

जबीन जैकब के अनुसार चीन उसके बाद से ही ईरान को समझाने की कोशिश कर रहा था और रईसी का दौरा बताता है कि चीन बहुत हद तक ईरान को समझाने में सफल हो गया है.

जैकब का मानना है कि सऊदी अरब की भी अमेरिका और पश्चिमी देशों में अब वो अहमियत नहीं है जो कुछ वर्ष पहले तक हुआ करती थी. इसलिए सऊदी अरब भी अपने रिश्तों में अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है लेकिन सवाल उठता है कि क्या चीन खाड़ी देशों में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन सकता है और अमेरिका को वहां से बाहर निकाल सकता है.

जैकब के अनुसार अमेरिकी की जगह लेना चीन के लिए इतना आसान नहीं है क्योंकि अमेरिका यहां से कई दशकों से मौजूद रहा है जबकि चीन की इस क्षेत्र में हाल ही में इंट्री हुई है.

इसके अलावा दूसरी समस्या यह है कि अमेरिका का मामला बिल्कुल साफ़ है कि वो ईरान के ख़िलाफ़ और सऊदी अरब के साथ खड़ा है. लेकिन चीन की समस्या यह है कि वो ना तो ईरान के ख़िलाफ़ है और ना ही सऊदी अरब के ख़िलाफ़ है. ऐसे में चीन के लिए खाड़ी के दोनों प्रमुख देशों से संबंधों में संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है.

राजदूत फ़ेबियन के अनुसार चीन और ईरान दोनों ही राजनियक चेस के अच्छे खिलाड़ी हैं. वो कहते हैं कि भारत से ईरान होते हुए चेस का खेल यूरोप पहुंचा लेकिन फ़िलहाल ईरान राजनयिक चेस का यह खेल सामरिक दृष्टि से बहुत सही तरीक़े से खेल रहा है.

जैकब के अनुसार महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन इसके लिए तैयार है. वो राजनीतिक, राजनयिक और सैन्य दृष्टि से खाड़ी देशों में एक अहम रोल अदा करने के लिए पूरी तरह तैयार दिखता है.

चीनी मामलों के जानकार और फ़िलहाल ताइवान की राजधानी ताइपे स्थित नेशनल ताइवान यूनिवर्सिटी में फ़ेलो अरविंद येलेरी कहते हैं कि चीन और रूस दोनों ईरान को ब्रिक्स में शामिल कराना चाहते हैं. उनके अनुसार चीन एशियाई और सेंट्रल एशियाई देशों के साथ मिलकर एक ब्लॉक बना सकता है जो इंडोपैसीफ़िक और पश्चिम दोनों क्षेत्रों में अमेरिका और पश्चिम देशों को चुनौती दे सकेगा.

भारत का रोल

पुतिन, मोदी और शी जिनपिंग

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ऐसे में सवाल उठता है कि ईरान और चीन की बढ़ती निकटता भारत के लिए क्या मायने रखती है.

अरविंद येलेरी के अनुसार भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक दोस्ती है और वो भी ईरान से तेल ख़रीदता है. अरविंद कहते हैं कि भारत संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है.

सन शी कहते हैं कि ईरान शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में शामिल होना चाहते है और भारत इस साल इस शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करेगा. सन के अनुसार ईरान एससीओ में शामिल होने के लिए चीन की मददा मांग सकता है.

लेकिन जबीन जैकब के अनुसार भारत के पास इस तरह की स्थिति से निपटने के लिए कोई तैयारी नहीं है. उनके अनुसार भारतीय विदेश सेवा में एक हज़ार अधिकारी भी नहीं हैं और ईरान या अरब देशों पर नज़र रखने के लिए ना पर्याप्त विशेषज्ञ हैं और ना ही कोई अच्छा थिंक टैंक.

राजदूत फ़ेबियन कहते हैं, "चीन, रूस और ईरान अगर साथ आते हैं और किसी तरह का कोई गुट या ब्लॉक बनाते हैं तो पाकिस्तान उसमें निश्चित तौर पर शामिल होगा और अगर आप मैप देखें तो आपको पता चल जाएगा कि अगर ऐसा हुआ तो यह भारत के लिए बुरी ख़बर होगी."

तो फिर भारत के लिए सबसे बेहतर क्या रास्ता होगा

राजदूत फ़ेबियन कहते हैं, "भारत को पाकिस्तान से और संभव हो तो चीन से संबंध बेहतर करना होगा. लेकिन यह आसान नहीं है."

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