भारत-रूस: सस्ते तेल के सौदे में आख़िर क्या पेच है?

नरेंद्र मोदी और पुतिन

इमेज स्रोत, EPA

    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

फ़रवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था. अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए. उससे निपटने के लिए रूस ने भारत समते दुनिया के कई देशों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से कम क़ीमत पर कच्चा तेल बेचने की पेशकश की.

भारत ने रूस का ऑफ़र स्वीकार किया. भारत ने इसे अपने राष्ट्रीय हित में लिया गया फ़ैसला क़रार देते हुए अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों की नाराज़गी भी मोल ली.

लेकिन भारत का यही फ़ैसला अब चिंता का भी कारण बन सकता है.

समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि अधिक से अधिक कच्चा तेल ख़रीदने के कारण भारत का व्यापार घाटा बढ़ता जा रहा है. इसका एक प्रभाव यह पड़ रहा है कि रुपये में विदेशी व्यापार करने की मोदी सरकार की योजना में कोई ख़ास प्रगति नहीं हो पा रही है.

लेकिन यह तो हुई शुद्ध वित्तीय भाषा. समस्या यह है कि इसे आसान भाषा में कैसे समझा जाए?

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में रूसी और मध्य एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह इसे समझाते हैं.

उनके मुताबिक़, मौजूदा स्थिति समझने के लिए हमें पहले यह समझना होगा कि भारत और रूस में पहले व्यापार कैसे होता था.

भारत अपने रक्षा उपकरणों के लिए सबसे ज़्यादा रूस पर निर्भर है, लेकिन इस व्यापार का तरीक़ा यह होता था कि भारत जितने पैसे का हथियार ख़रीदता था उसी मात्रा में भारत अपनी चीज़ों को रूस निर्यात करता था. इसलिए पैसों का कोई वास्तविक लेन-देन नहीं होता था.

लेकिन 2022 फ़रवरी के बाद रूस से कच्चा तेल ख़रीदने के बाद स्थिति बदल गई है.

तेल का टैंकर

इमेज स्रोत, Getty Images

रूस से तेल का आयात

प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह कहते हैं, "रूस से अब तक भारत क़रीब एक प्रतिशत कच्चे तेल का आयात करता था. अब कच्चे तेल का आयात 20 फ़ीसद से भी ज़्यादा चला गया है."

भारत रूस से क़रीब रोज़ाना 12 लाख बैरल कच्चा तेल ख़रीद रहा है. कच्चे तेल के अलावा भारत रूस से खाने का तेल और फ़र्टिलाइज़र भी आयात कर रहा है.

आयात तो बढ़ ही रहा है, लेकिन दूसरी चिंता यह है कि भारत के निर्यात में कमी आ रही है. एक आंकड़े के मुताबिक़ आयात क़रीब 400 फ़ीसद बढ़ गया है और निर्यात क़रीब 14 फ़ीसद कम हो गया है.

भारत और रूस ने स्थानीय मुद्रा (रुपया और रूबल) में व्यापार करने का फ़ैसला किया था.

भारतीय रिज़र्व बैंक ने जुलाई 2022 में ही इसकी घोषणा की थी और आरबीआई ने रूसी बैंकों को भारत में वोस्ट्रो अकाउंट खोलने की अनुमति भी दे दी थी.

भारतीय रुपया

इमेज स्रोत, Getty Images

रूसी बैंकों में भारतीय रुपए का ढेर

वोस्ट्रो अकाउंट खुलने से भारत के साथ व्यापार करने वाले देशों को आयात या निर्यात करने पर डॉलर की जगह रुपये में भुगतान करने की सुविधा मिलती है. भारत में वोस्ट्रो अकाउंट खुल तो गए, लेकिन अब तक रूस के साथ रुपये में ज़्यादा लेन-देन नहीं हो पा रहा है क्योंकि भारत का आयात ज़्यादा होने के कारण रूस में भारतीय रुपया जमा होता जा रहा है.

रूस के बैंक नहीं चाहते कि उनके यहां रुपये का ढेर जमा होता रहे.

प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह के अनुसार, भारत अब तक क़रीब 30 अरब डॉलर का कच्चा तेल ख़रीद चुका है और रूस के बैंकों में वो पैसे पड़े हैं.

प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह कहते हैं, "रूस उस भारतीय पैसे को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता है क्योंकि उस पर प्रतिबंध लगा है. इसलिए रूस के पास जमा रुपए का मूल्य घटता जा रहा है. रूबल की क़ीमत भी डॉलर की तुलना में कम होती जा रही है."

रूस में दशकों से रह रहे वरिष्ठ पत्रकार विनय शुक्ला कहते हैं कि रूस के बैंक सेकेंडरी प्रतिबंध से डरे हुए हैं.

एक और कारण का ज़िक्र करते हुए विनय शुक्ला कहते हैं कि रूस में लोगों की पसंद बदल रही है और भारतीय व्यापारी रूसी लोगों की पसंद की चीज़ें बनाने और निर्यात करने में सक्षम नहीं हैं.

विनय शुक्ला के अनुसार, भारत का निर्यात कम होने की एक वजह यह भी है कि बहुत सारी चीज़ें जो अब तक भारत से आती थीं या आ सकती थीं, वो चीज़ें रूस अब चीन से आयात कर रहा है.

मोदी पुतिन

इमेज स्रोत, Getty Images

इस पर ख़ामोशी क्यों

भारत रूस से सस्ते दामों में कच्चा तेल ख़रीद रहा है और भारत में उस कच्चे तेल को रिफ़ाइन करके उसे पश्चिमी देशों को बेच रहा है.

प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह के अनुसार, चूंकि इससे फ़िलहाल भारत को डॉलर की कमाई हो रही है इसलिए इस पर भारत में कोई चिंता ज़ाहिर नहीं कर रहा है. लेकिन वो यह भी कहते हैं कि यह लंबे समय तक नहीं चलेगा.

भारत के बैंक पहले अपने ऑफ़शोर शाख़ा से पैसे निकालकर रूस को दे देते थे. सिंगापुर में भारतीय बैंकों का खाता था, लेकिन अमेरिका ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया कि वो रूस के साथ व्यापार नहीं कर सकता है. फ़िलहाल हॉन्ग कॉन्ग बैंक खुला है लेकिन प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह के अनुसार यह लंबे समय तक नहीं चलेगा.

वो कहते हैं, "लंबे समय में यह भारत के लिए चिंताजनक होगा और यह अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचाएगा."

भारत और रूस के अधिकारियों ने पिछले महीने इस विषय पर बैठक की थी लेकिन कोई ख़ास नतीजा नहीं निकला.

तेल टैंकर

इमेज स्रोत, Getty Images

दिरहम में भुगतान

प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह के अनुसार, फ़िलहाल इसका कोई समाधान दोनों देशों को समझ में नहीं आ रहा है.

रिलायंस कंपनी रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात कर रही है और वो संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की मुद्रा दिरहम में रूस को भुगतान कर रही है, लेकिन प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह के अनुसार यह भी लंबे समय तक नहीं चलेगा.

वो कहते हैं कि जिस तरह रूस के बैंकों में रुपया जमा होता जा रहा है उसी तरह दिरहम भी अगर जमा होता रहेगा तो रूसी बैंक आख़िर उनका क्या करेंगे?

मोदी पुतिन और जिनपिंग

इमेज स्रोत, Getty Images

समाधान क्या है

प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह कहते हैं कि ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीक़ा) देशों के बीच न्यू डिवेलपमेंट बैंक बना था जिनमें ब्रिक्स के देश स्थानीय मुद्रा में व्यापार कर सकते हैं.

लेकिन चीन अपने बैंकों पर सख़्त नियम लागू कर रहा है और चीन की अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी है कि उसकी मदद के बग़ैर इसका सफल होना संभव नहीं है.

भारत और रूस के बीच व्यापार संतुलन बना रहता था, लेकिन आज की तारीख़ में यह संभव नहीं है क्योंकि भारत अपना निर्यात नहीं बढ़ा पा रहा है और आयात वो कम नहीं कर सकता है.

पत्रकार विनय शुक्ला कहते हैं कि बुधवार को ही रूस के सेंट्रल बैंक ने यह घोषणा की है कि उसने स्थानीय मुद्रा में अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने के लिए एक नए विभाग का गठन किया है. उनके अनुसार इस फ़ैसले से चीज़ें बेहतर होने की उम्मीद है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)