रूस-यूक्रेन युद्ध: यूक्रेन को पश्चिमी देशों की मदद कब तक मिलती रहेगी?-दुनिया जहान

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रूस के हमले के बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की अंतरराष्ट्रीय समुदाय, ख़ास तौर पर पश्चिमी देशों से बार-बार हथियारों की सप्लाई के लिए गुहार लगाते रहे हैं.
पिछले साल मार्च में यूक्रेनी सेना ने रूसी सेना को राजधानी कीएव से बाहर खदेड़ दिया था. उसके बाद देश के पूर्व में रूस के कब्ज़े वाले महत्वपूर्ण ठिकानों में जंग लड़ने में भी यूक्रेन के मिसाइल सफल रहे.
लेकिन लगातार और कई मोर्चों पर युद्ध के कारण उनके सैनिक वाहन ख़त्म हो रहे थे और युद्ध में अपनी खोई ज़मीन वापिस पाने के लिए और रुसी सेना के मोर्चों को भेदने के लिए उसे गाड़ियों और टैंकों की ज़रूरत थी. और टैंकों के लिए पश्चिम देशों की ओर देख रहा था.
युद्ध शुरु होने के लगभग एक साल होने को हैं और पश्चिमी मुल्कों ने यूक्रेन के राष्ट्रपति की अपील मान ली है. जनवरी में अमेरिका और ब्रिटेन ने यूक्रेन को चैलेंजर 2 टैंक और जर्मनी ने अपने लेपर्ड टैंक देने का वादा किया.
जर्मनी ने तो अपने सहयोगी देशों से भी उनके पास मौजूद लेपर्ड टैंक यूक्रेन को देने की बात कही है.

पश्चिम के हथियार
रूस के ख़िलाफ़ लड़ाई में यूक्रेन को पश्चिमी देशों से मिल रहे आधुनिक टैंक, अब तक की सबसे महत्वपूर्ण सहायता है. लेकिन सवाल ये है कि इन दोनों मुल्कों के बीच हो रहे युद्ध को जल्द ही एक साल पूरा हो जाएगा, ऐसे में यूक्रेन कब तक विदेशी मदद के भरोसे युद्ध जारी रख पाएगा और कब तक उसे पश्चिमी देशों से समर्थन मिलता रहेगा?
इस पर लंदन के किंग्स कॉलेज में युद्ध शास्त्र के वरिष्ठ शोधकर्ता माइक मार्टिन का मानना है कि यूक्रेन इस यु्द्ध में जीत रहा है क्योंकि वो बहादुरी से लड़ रहा है और उसे हथियार और ख़ुफ़िया जानकारी पश्चिमी देशों से मिल रही है.
वो कहते हैं कि युद्ध की शुरुआत से यूक्रेन के सहयोगी उसे हर महीने दो अरब डॉलर की लागत के हथियार और दूसरी सैनिक सहायता दे रहे हैं. हालांकि उसे किस प्रकार के हथियार दिए जाएं इस पर लगातार बहस चलती रही है.
यूक्रेन को दी जा रही पश्चिमी देशों की सहायता को लेकर माइक कहते हैं, "पश्चिमी देश बिना सोचेसमझे यह सहायता नहीं दे रहे. उन देशों और यूक्रेन की सेना के बीच लगातार बातचीत चल रही है."
हालांकि पश्चिमी देशों का यूक्रेन को समर्थन देना कोई नई बात नहीं है. लगभग दशक ङर पहले जब पुतिन ने पूर्वी यूक्रेन पर हमला किया था उस समय भी यूक्रेन को पश्चिमी देशों का समर्थन मिला था.
माइक कहते हैं कि, "जब 2014 में पूर्वी यूक्रेन में रूस ने पहली बार हस्तक्षेप किया था, तब से पश्चिमी देश ख़ास तौर पर अमेरिका और ब्रिटेन यूक्रेन को कुछ ख़ास क़िस्म की हथियार और उसके सैनिकों को अपने देशों में प्रशिक्षण दे रहे हैं."
पिछले साल फ़रवरी में जब रूस ने आधिकारिक तौर पर यूक्रेन के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया तब कई देशों ने यूक्रेन के लिए सैनिक सहायता बढ़ा दी थी. लेकिन उस वक़्त लग रहा था कि ये लड़ाई ज़्यादा समय नहीं चल पाएगी, ऐसा लग रहा था कि यूक्रेन जल्द हार जाएगा और हफ़्ते भर में रूस उस पर कब्ज़ा कर लेगा.
अमेरिका और ब्रिटेन की सहायता को लेकर माइक मार्टिन कहते हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन सोच रहे थे कि अगर यूक्रेन को पर्याप्त हथियार मिले तभी वो जंग जीत सकता है. इसी वजह से अमेरिका और ब्रिटेन यूक्रेन को सहायता देने में सबसे आगे रहे हैं.
वो बताते हैं कि जैसे-जैसे लड़ाई चलती गई, यूक्रेन को दिए जाने वाले हथियारों का स्वरूप बदलता गया. लड़ाई की शुरुआत में ही रूस ने कीएव पर कब्ज़ा करने के लिए बड़ा काफ़िला भेजा था लेकिन रास्ते की दलदली ज़मीन में वो फंसने लगा. उसे खदेड़ने के लिए यूक्रेन को ख़ास हथियारों की ज़रूरत थी.
माइक मार्टिन कहते हैं, "उन्हें बख़्तरबंद गाडियों और टैंकों को भेद सकने वाले एडवांस्ड हथियारों की आवश्यकता थी. जैसे हीट सेंसिंग हथियार जैवलिन मिसाइल जिसका इस्तेमाल अमेरिका और ब्रिटेन की सेना करती है."
अमेरिका और ब्रिटेन ने यूक्रेन को पांच हज़ार से ज़्यादा जैवलिन मिसाइल भेजे. इनकी मदद से यूक्रेनी सेना ने रूस के कई बख़्तरबंद काफ़िलों को ध्वस्त किया.
इसके बाद रूस ने अपनी रणनीति बदल कर यूक्रेन के पूर्व और दक्षिण के बड़े इलाक़ों पर कब्ज़ा करने की कोशिश शुरू कर दी. अब यूक्रेन की सेना की ज़रूरत फिर बदल गई. रूसी सेना के इस नए दांव के लिए यूक्रेन को अब रूसी मोर्चों के पीछे तक पहुंच सकने वाली मिसाइलें मिलने लगीं ताकि वो रूसी सेना की क्षमता को कमज़ोर कर सके.

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यूक्रेन की हथियारों की ज़रूरतों को लेकर माइक मार्टिन कहते हैं, "रूस के कब्ज़े वाले इलाक़ों में भीतर तक के ठिकानों पर हमले के लिए यूक्रेन और अधिक दूरी तक यानी 300 किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइलें चाहता था. लेकिन पश्चिमी देशों ने ऐसी मिसाइल सिस्टम इसलिए नहीं दी क्योंकि इससे युद्ध और भड़क सकता था."
रूसी कब्ज़े से अपनी ज़मीन छुड़वाने के लिए यूक्रेन को अब बख़्तरबंद गाड़ियों और टैंकों की ज़रूरत थी लेकिन पश्चिमी देश इसे देने से इसलिए हिचकिचा रहे थे क्योंकि इन हथियारों का इस्तेमाल रक्षात्मक ही नहीं बल्कि आक्रमक तरीक़े से भी हो सकता है.
युद्ध के लगभग 10 महीनों बाद जनवरी में पश्चिमी देशों ने आख़िरकार यूक्रेन को टैंक देने का फ़ैसला कर लिया. लेकिन इनका इस्तेमाल कैसे किया जाएगा इससे युद्ध का अगला चरण तय होगा.
माइक मार्टिन कहते हैं कि इन हथियारों के अलावा सबसे बड़ी मदद यूक्रेन को ख़ुफ़िया जानकारी का शक्ल में मिल रही है. लेकिन यूक्रेन को ये मदद कब तक मिलती रहेगी ?
दुनिया की सबसे बड़ी सेना
अमेरिका अब तक यूक्रेन को पच्चीस अरब डॉलर की मदद दे चुका है. न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी की वरिष्ठ शोधकर्ता करिचा निचे के मुताबिक़ अफ़गानिस्तान और इसराइल को दी गई सहायता के मुक़ाबले ये काफ़ी कम है लेकिन अब अमेरिका में कई सांसद इस पर सवाल उठा रहे हैं.
करिचा निचे कहती हैं, "आर्थिक सहायता और सैनिक सहायता में फ़र्क करना मुश्किल होता है. अब कई सांसद पूछ रहे हैं कि क्या अफ़ग़ानिस्तान के बाद अब अमेरिका एक नई अनिश्चितकाल तक चलने वाली लड़ाई में पैर रख रहा है?"
"दूसरा सवाल ये उठाया जा रहा है कि अमेरिका की घरेलू ज़रूरतों पर ये पैसे क्यों खर्च नहीं हो रहे. सवाल ये कि क्या अमेरिका अपनी प्राथमिकता से भटक रहा है. क्या हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के प्रतिद्वंदियों को दी जाने वाली प्राथमिकता को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है?''
हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में प्रतिद्वंदी से मतलब चीन से है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि अगर चीन ताइवान पर बिना उकसाए कोई हमला करता हैं तो अमेरिका ताइवान की सहायता के लिए हस्तक्षेप करेगा.
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करिचा निचे का मानना हैं कि यूक्रेन की सहायता के ज़रिए अमेरिका चीन को संदेश देना चाहता है कि उसकी प्रतिबद्धता पक्की है और वो किसी भी देश की ज़मीन हड़पे जाने का पुरज़ोर विरोध करेगा.
लेकिन पिछले कुछ महीनों में यूक्रेन को हथियार देने की वजह से अमेरिका के सैन्य संसाधनों में कमी आई है. इस वजह से ये सवाल उठ रहा है कि ज़रूरत पड़ने पर क्या अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सेना से लोहा लेने की क्षमता बनाए रख पाएगा?
करिचा कहती हैं, "पिछले कुछ दिनों में ख़ास तौर पर गोला बारूद के रिज़र्व में गिरावट आई है. जितना गोला बारूद अमेरिका एक महीने में बनाता है उतना यूक्रेन दो-तीन दिनों में इस्तेमाल कर रहा है. रक्षा विभाग के कई विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि कहीं यूक्रेन की सहायता का असर अमेरिका की सैन्य क्षमता पर न पड़े, विशेष रूप से हिंद और प्रशांत महासागर क्षेत्र की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए."
सर्वेक्षणों के मुताबिक़ ये मुद्दा अमेरिकी जनता की जे़हन में भी है और 2024 के राष्ट्रपति चुनाव का अहम मुद्दा हो सकता है. ये भी हो सकता है कि इसका असर यूक्रेन को मिलने वाली सहायता पर पड़े.
अमेरिका में 2024 में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों को लेकर करिचा निचे चिंतित हैं. वो कहती हैं, "अगर ट्रंप या उनके जैसा कोई नेता चुनाव जीत जाए तो यूक्रेन को मिल रही सहायता खटाई में पड़ सकती है. यूरोप और यूक्रेन भी इसे लेकर चिंतित हैं. इस कारण यूक्रेन जल्द ही बड़े स्तर पर हमला करने की कोशिश करेगा ताकि 2023 यानी अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव के पहले ही युद्ध ख़त्म हो जाए."
युद्ध के कारण यूक्रेन के यूरोपीय सहयोगी देश भी मंहगाई की मार झेल रहे हैं, और वहां की आम जनता इसे परेशान है. कई पड़ोसी देश भी लाखों यूक्रेनी शरणार्थियों का बोझ उठा रहे हैं. सभी चाहते हैं कि युद्ध जल्द ख़त्म हो.

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यूरोपीय सहयोगी
चैटम हाऊस में रूसी मामलों की वरिष्ठ शोधकर्ता समांथा डीबैनडर्न कहती हैं कि पहले यूरोप के कई सहयोगी देश यूक्रेन को सैनिक सहायता देने से हिचकिचा रहे थे क्योंकि उन्हें लगता था कि यूक्रेन अपना बचाव नहीं कर पाएगा और उनकी मदद बेकार जाएगी. लेकिन प्रतिरोध के बाद यूक्रेन के हालात बदल गए हैं.
अब उन्हें लगता है कि यूक्रेन रूस को आगे बढ़ने से रोक पा रहा है और भविष्य में यूरोप की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है. नेटो के सदस्य और यूक्रेन के पड़ोसी पोलैंड और दूसरे बाल्कन देश सबसे पहले उसकी सहायता के लिए आगे आए.
पड़ोसी देशों की भागीदारी को लेकर समांथा डीबैनडर्न कहती हैं, "उन्होंने ख़तरे के स्वरूप को जल्द भांप लिया. वे समझ गए कि ख़तरा केवल यूक्रेन को नहीं है बल्कि ख़तरा उनके अस्तित्व के लिए भी है."
"नेटो से मिले जैवलिन मिसाइल को इस्टोनिया ने यूक्रेन के हवाले कर दिया था. क्योंकि उनका मानना है कि यूक्रेन रूस के ख़िलाफ़ उनकी ही लड़ाई लड़ रहा है ताकी उसे अपनी धरती पर ये लड़ाई ना लड़नी पड़े. पोलैंड ने भी रूस में बने अपने पुराने T-72 टैंक और दूसरे हथियार यूक्रेन को दे दिए."
इस बीच पश्चिमी यूरोप का फ़्रांस कोई निर्णायक रवैया नहीं अपना रहा था क्योंकि इस युद्ध को लेकर फ़्रांस इसे अपने अस्तित्व पर सीधे ख़तरे के रूप में नहीं देख रहा था. फ्रांस ने रूसी हमलों की निंदा तो की लेकिन हथियार देने से पीछे हट गया. दरअसल फ़्रांस का मानना था कि हथियार की सहायता से लड़ाई और भड़केगी.
जर्मनी भी रूस के साथ अपने संबंध और ऐतिहासिक कारणों की वजह से मुख़र तौर पर सहायता करने में हिचकिचा रहा था. इसके बावजूद पिछले एक साल में जर्मनी की नीति में भी नाटकीय बदलाव आया. जनवरी की शुरूआत में ही जर्मनी के विदेश मंत्री ने यूक्रेन की यात्रा के बाद आवश्यक हथियार देने का आश्वासन दिया.
यूक्रेन को सबसे ज़्यादा सैन्य सहायता अमेरिका ने दी और उसके बाद ब्रिटेन ने भी ऐसा ही किया. पिछले साल अमेरिका ने ढाई अरब डॉलर की सैनिक सहायता दी और इतनी ही सहायता 2023 में देने का वादा भी किया है.
लड़ाई में यूक्रेन की सफलता के पीछे अमेरिका की बड़ी भूमिका रही हैं. लेकिन अगर अमेरिका ने हाथ पीछे खींच लिए तो क्या यह सहायता यूरोप के माध्यम से जारी रहेगी?
इसपर समांथा डीबैनडर्न का कहना है कि, "अगर अमरीका सैनिक सहायता देना बंद भी कर देता है तो पोलैंड, चेक गणराज्य और दूसरे बाल्कन देश से जितना बन पड़ेगा वो मदद जारी रखेंगे. मुमकिन है कि जर्मनी और फ़्रांस अपना हाथ थोड़ा पीछे खींच लें लेकिन ब्रिटेन सहायता देना जारी रखेगा."
ऐसे में अगर अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों से यूक्रेन की दी जाने वाली सहायता यदि कम हो जाए तो पुतिन की क्या रणनीति होगी?
समांथा कहती हैं, "अगर पश्चिम यूक्रेन को हथियार देना बंद कर दे तो यूक्रेन ज़्यादा समय तक नहीं लड़ पाएगा. ऐसे में फिर राजधानी कीएव पर कब्ज़े के लिए हमला होगा और बहुत जल्द उस पर रूस कब्ज़ा पा सकता है."
यूक्रेन की आम जनता भी इस बात से चिंतित हैं, इसलिए यूक्रेन की सरकार और नेताओं के साथ-साथ आम लोग भी पश्चिमी देशों से मदद की गुहार लगा रहे हैं.

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बातें नहीं हथियार चाहिए
क्राईसिस ग्रूप एक स्वतंत्र गुट है. ये दुनिया में युद्ध के खिलाफ़ काम करता है. सायमन श्लेगल इसी ग्रुप के सदस्य हैं. वो यूक्रेन में रह रहें है और युद्ध पर नज़र बनाए हुए हैं.
वो कहते हैं कि आम जनता यहां पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मिल रही मदद का स्वागत कर रही है. वो कहते हैं, "जर्मनी से मिलने वाले लेपर्ड टैंक की ख़ुशी में कई लोग तेंदुए जैसी प्रिंट के कपड़े पहनकर सड़कों पर निकल रहे हैं. अमेरिकी मिसाइलों की मदद से रूसी ठिकानों को निशाना बनाते यूक्रेनी सेना के वीडियो को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया जा रहा है."
सायमन श्लेगल लंबी दूरी तक मार करने वाली अमेरिकी हिमार्स मिसाइल के ज़रिए कई रूसी हथियार भंडार ध्वस्त करने को लेकर ध्यान खींचते हैं.
वो बताते है कि रूस के ख़िलाफ़ बड़े विस्फोट इस युद्ध में आया नाटकीय मोड़ था. शब्दों से इतर हथियार की सप्लाई से जो समर्थन मिला है उसे यूक्रेनी जनता ने दिल से सराहा है.
लेकिन अब यूक्रेन को मानवीय सहायता की भी उतनी ही ज़रूरत है और इसमें भी अमेरिका आगे रहा है. अब तक अमेरिका ने यूक्रेन को दस अरब डॉलर की मानवीय सहायता भी दी है और कई अन्य देशों ने भी अपना योगदान दिया है.
सायमन कहते हैं, "यहां कैश की बड़ी ज़रूरत है. घरों की, गैस, बिजली और पानी के दाम भी काफ़ी बढ़ गए हैं. युद्ध से बेघर हुए कई लोगों को कहीं रहने, बसर करने के लिए कैश चाहिए क्योंकि यूक्रेन के कई बाजारों में कैश के बदले ही उन्हें गैस या कोई ईंधन मिल सकता है. इसलिए कई अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठन विस्थापित लोगों को सहायता के लिए सीधे कैश दे रहे हैं."

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लेकिन यूक्रेन कब तक इस लड़ाई को झेल सकता है? कब तक यूक्रेन के राष्ट्रपति सहयोगी देशों से मदद हासिल कर सकते हैं और क्या लोगों को ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने ज़रुरत से अधिक संसाधन मांग लिए हैं?
इस पर सायमन का मानना है कि जनता ऐसा नहीं सोचती. वो कहते हैं, "जनता को लगता है कि अधिक सहायता मांगी जानी चाहिए. जनता को यह चिंता है कि कहीं ज़ेलेंस्की रूस के प्रति अपना रुख़ नरम ना करें क्योंकि उन्होंने चुनाव शांति के मुद्दे पर लड़ा था. अगर वो ऐसा करते हैं तो उनके प्रति जनता का समर्थन ख़त्म हो जाएगा."
यूक्रेन को पश्चिमी देशों से सहायता कब तक मिलती रहेगी?
कई सहयोगी देशों ने यूक्रेन को पुराने सोवियत काल के हथियार और नए आधुनिक हथियार देने की प्रतिबद्धता दिखाई थी लेकिन अब वे दूसरी प्राथमिकताओं के साथ इसे संतुलित करना चाह रहे हैं.
अव्वल तो उन्हें युद्ध की वजह से बढ़ी मंहगाई को लेकर जनता की ज़रूरतों के बारे में सोचना है. इसके साथ ही पूर्व में चीन के आक्रामक तेवर से भी निबटने की तैयारी करनी है.
लेकिन समांथा डीबैनडर्न इस सवाल की ओर ध्यान खींचती है कि सहयोगी देशों की इच्छा शक्ति से ज़्यादा यूक्रेनी सेना कब तक जंग के मैदान मे डटी रह सकती है?
समांथा कहती हैं कि यूक्रेनी सेना रूसी सेना के मुक़ाबले काफ़ी छोटी है और काफ़ी कुछ इस पर भी निर्भर करता है कि वो और कितना लड़ सकती है और जानोमाल का कितना नुक़सान झेल सकती है. इस पर भी काफ़ी कुछ निर्भर करता है कि सेना का हौसला कब तक बरकरार रहेगा.
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