चरमपंथी संगठन आईएस ख़ुरासान क्या है और उसने रूस पर हमला क्यों किया?

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- Author, फ़्रैंक गार्डनर
- पदनाम, बीबीसी रक्षा संवाददाता
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके प्रभाव वाले मीडिया की ओर से लगातार यह कोशिश की जा रही है कि शुक्रवार को मॉस्को के थिएटर पर होने वाले हमले की ज़िम्मेदारी यूक्रेन पर डाली जा सके.
लेकिन इस हमले की ज़िम्मेदारी चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) ख़ुरासान ने स्वीकार की है.
हमलावरों ने न केवल क्रॉकस हॉल में मौजूद लोगों पर बंदूक़ों से हमला किया बल्कि उन्होंने इमारत को भी आग लगा दी.
रूस की जांच समिति की ओर से जारी वीडियो में कॉन्सर्ट हॉल का न केवल छत गिरने का दृश्य दिखाया गया है बल्कि बीम भी गिरते देखे जा सकते हैं.
इस हमले में 137 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है.
चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान है क्या?

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अंग्रेज़ी में इस चरमपंथी संगठन को ‘आईएसके’ कहा जाता है जो कथित इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान का संक्षिप्त रूप है.
यह संगठन वास्तव में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवादी घोषित किए गए गुट कथित ‘इस्लामिक स्टेट’ का ही अंग है.
इसका पूरा ध्यान अफ़ग़ानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान पर केंद्रित है.
इस संगठन ने ख़ुद को ख़ुरासान का नाम दिया है क्योंकि जिन देशों में यह सक्रिय है वह क्षेत्र इस्लामी ख़िलाफ़त के इतिहास में इसी नाम से जाना जाता था.
कथित इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान पिछले नौ सालों से इस क्षेत्र में सक्रिय है लेकिन हाल के महीनों में यह मूल ‘इस्लामिक स्टेट’ की सबसे खतरनाक अनुषांगिक शाखा बनकर उभरी है जो अपनी निर्दयता और अत्याचार की वजह से जानी जाती है.
यह अतिवादी संगठन सीरिया और इराक में मौजूद अपने केंद्रीय नेतृत्व के साथ मिलकर इस्लामी दुनिया में कथित ख़िलाफ़त की व्यवस्था लाना चाहता है जहां वह अपनी मर्ज़ी के सख़्त इस्लामी क़ानून लागू कर सके.
अफ़ग़ानिस्तान में यह संगठन सत्तारूढ़ समूह तालिबान के ख़िलाफ़ जंग लड़ रहा है. तालिबान वैचारिक तौर पर इसका विरोध करते हैं.
क्या इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान ने पहले भी हमलों की ज़िम्मेदारी ली है?

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इस अतिवादी गिरोह ने अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना के लौटने के समय 2021 में काबुल एयरपोर्ट पर एक आत्मघाती धमाका किया था जिसमें 170 अफ़ग़ान नागरिक और 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे.
इस साल इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान ने काबुल में रूसी दूतावास को भी निशाना बनाया था जिसमें छह लोग मारे गए और कई घायल हो गए थे.
इस गिरोह की ओर से पहले अस्पतालों, बस अड्डों और पुलिस अधिकारियों को भी निशाना बनाया जाता रहा है.
इस साल जनवरी में इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान ने ईरान के राज्य किरमान में दो आत्मघाती धमाकों की भी ज़िम्मेदारी ली थी जिसमें लगभग 100 ईरानी नागरिक मारे गए थे..
मॉस्को थिएटर पर हमला करने वाले कौन थे?

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रूस के सरकारी मीडिया के अनुसार गिरफ़्तार किए गए चारों लोग ताजिक थे जिनका संबंध मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान से था जो कि पहले सोवियत यूनियन का हिस्सा हुआ करता था.
अदालत में पेशी के समय उन लोगों का हुलिया देखकर अंदाज़ा होता है कि तफ़्तीश के दौरान उनसे सख़्ती की गई है और उनके साथ मारपीट की गई है.
इस ढंग से की गई पूछताछ और उसके नतीजे में लिए गए स्वीकारोक्ति बयान अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार अदालतों में इस्तेमाल नहीं किए जाते. यह कहा जाता है कि लोग तकलीफ़ से बचने के लिए कुछ भी क़बूल कर लेते हैं जो कि अक्सर सच नहीं होता.
इस बारे में मिली जानकारी के अनुसार गिरफ़्तार किया गया एक शख़्स इसी महीने की शुरुआत में मॉस्को थिएटर के इर्द गिर जासूसी करते हुए भी नज़र आया था.
इसी दौरान अमेरिका की ओर से रूस को ख़बरदार किया गया था कि आतंकवादी गिरोह सार्वजनिक जगह को निशाना बना सकते हैं. रूसी सरकार की ओर से इस वार्निंग को ‘प्रॉपेगैंडा’ कह कर ख़ारिज कर दिया गया था.
इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान ने रूस में क्यों हमला किया?

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इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान की ओर से रूस पर हमला करने की कई वजहें हो सकती हैं.
इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान दुनिया के अधिकतर देशों को अपना दुश्मन मानती है. यह रूस, अमेरिका, यूरोप, यहूदी, ईसाई, शिया मुसलमान और मुस्लिम बहुल देशों के शासक भी उसकी दुश्मनों की लिस्ट में शामिल हैं जिन्हें वह ‘राफ़ज़ैन’ (साथ छोड़ने वाले) समझते हैं.
कथित ‘इस्लामिक स्टेट’ की रूस से दुश्मनी 1990-2000 के दशक में चेचन्या की राजधानी में रूसी फ़ौज की कार्रवाइयों के कारण भी हो सकती है.
हाल के दिनों में रूस ने सीरिया में होने वाले गृह युद्ध में राष्ट्रपति बशर अल-असद का साथ दिया था और रूसी वायुसेना ने वहां अनगिनत कार्रवाइयां भी की थीं. इन कार्रवाइयों में बड़ी संख्या में कथित ‘इस्लामिक स्टेट’ और अलक़ायदा के लड़ाके मारे गए थे.
अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान रूस को तालिबान का सहयोगी मानता है और 2022 में काबुल में रूसी दूतावास पर हमला भी उसी की एक कड़ी था.
अतिवादी संगठन ‘इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान’ रूस को एक ईसाई देश समझता है और इस गिरोह की ओर से मॉस्को पर होने वाले हमले के बाद पोस्ट किए गए वीडियो में ईसाइयों की हत्या की बात भी की गई थी.
रूस में ताजिक और मध्य एशियाई देशों के मज़दूरों को रूसी ख़ुफ़िया एजेंसी ‘एफ़एसबी’ की ओर से शक की निगाह से देखा जाता है क्योंकि उनके अनुसार ऐसा करना आतंकवादी हमलों को रोकने के लिए ज़रूरी है.
ऐसा भी हो सकता है कि रूस इस समय अपने पड़ोसी देश यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है और ऐसे में इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान को रूस एक आसान लक्ष्य लगा हो जहां हथियार भी आसानी से उपलब्ध थे.
वह सवाल जिनके जवाब हमारे पास नहीं

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मॉस्को के थिएटर पर होने वाले हमले के बाद ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिनके जवाब अब तक नहीं मिल सके हैं.
उदाहरण के तौर पर हमलावर क्रॉकस हॉल में लगभग एज घंटे क्यों बिना कारण घूमते रहे और वह किसी तरह की जल्दी में भी नज़र नहीं आए.
रूस एक ऐसा देश है जहां पुलिस, स्पेशल सर्विसेज़ और ‘एफ़एसबी’ के अधिकारी हमेशा सक्रिय रहते हैं. लेकिन फिर भी हमलावर ऐसा बर्ताव करते हुए नज़र आए जैसे कि उन्हें मालूम हो कि उन्हें कोई नहीं रोकेगा.
हमलावरों के पास शक्तिशाली और आधुनिक ऑटोमैटिक हथियार थे. उन्होंने यह हथियार कहां से लाए और वह यह हथियार थिएटर में बिना किसी चेकिंग के ले जाने में कैसे कामयाब हुए?
यहां एक और बात सोचने वाली है कि दूसरे कथित जिहादियों की तरह इन हमलावरों ने आत्मघाती जैकेट नहीं पहनी हुई थी.
रूसी एजेंसियां अपनी धरती पर पिछले 20 वर्षों में होने वाले सबसे बड़े हमले को तो न रोक पाईं लेकिन उन ही एजेंसियों ने आरोपियों को तुरंत गिरफ़्तार भी कर लिया और अदालत में भी पेश कर दिया.
यह सभी सवाल देखते हुए कुछ विश्लेषक यह अनुमान लगाते हुए नज़र आते हैं कि यह हमला क्रेमलिन की ओर से ही रचाया गया कोई ‘फ़ॉल्स फ़्लैग ऑपरेशन’ हो सकता है जिसका मक़सद यूक्रेन में युद्ध जारी रखने के लिए समर्थन जुटाना हो.
हालांकि इन अनुमानों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है और अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी भी इस बात की पुष्टि करती हुई नज़र आती है कि यह हमला अतिवादी संगठन इस्लामिक स्टेट की ही कारस्तानी है.
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