कर्नाटक: सिद्धारमैया के आरक्षण वाले विधेयक में ऐसा क्या था कि हुआ हंगामा

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इमेज कैप्शन, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा है कि अगली कैबिनेट बैठक में इस बिल पर विचार करने के बाद अंतिम फ़ैसला लिया जाएगा
    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए

कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने स्थानीय लोगों को आरक्षण देने वाले प्रस्तावित विधेयक को फिलहाल रोक दिया है. इस विधेयक पर अगली कैबिनेट बैठक में विचार किया जाएगा.

विधेयक को लेकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को अपनी कैबिनेट, इंडस्ट्री और आईटी मंत्री की ओर से भी विरोध का सामना करना पड़ा.

इसके बाद सीएम सिद्धारमैया ने कहा, "बिल अभी तैयार किया जा रहा है. अगली कैबिनेट बैठक में इस पर विचार करने के बाद अंतिम फ़ैसला लिया जाएगा."

श्रम मंत्री संतोष लाड ने बीबीसी हिंदी से कहा, "ये बिल वापस नहीं लिया गया है. बस इसके कुछ पहलुओं पर फिर से विचार किया जाएगा."

आख़िर इस प्रस्तावित विधेयक में था क्या और इसका विरोध क्यों हुआ? इस रिपोर्ट में यही समझने की कोशिश करते हैं.

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विधेयक में क्या था

बेंगलुरु शहर

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इमेज कैप्शन, कर्नाटक के बेंगलुरु शहर को भारत की सिलिकॉन वैली के नाम से जाना जाता है, ये फ़ाइल फ़ोटो बेंगलुरु के इंफ़ोसिस कैंपस की है

कर्नाटक स्टेट एम्पलॉयमेंट ऑफ़ लोकल कैंडिडेट्स इन इंडस्ट्रीज़, फ़ैक्ट्रीज़ एंड अदर इस्टैबलिशमेंट्स बिल, 2024 में उद्योग, फ़ैक्ट्रियों और अन्य प्रतिष्ठानों में प्रबंधन के स्तर पर स्थानीय लोगों के लिए 50 फ़ीसदी आरक्षण का प्रस्ताव रखा गया है. इसके अलावा इस बिल में कहा गया है कि सुपरवाइजर, मैनेजर, टेक्निकल, ऑपरेशन, प्रशासनिक और उच्च पदों पर स्थानीय लोगों के लिए रिज़र्व रखा जाना चाहिए.

ग़ैर प्रबंधन श्रेणी की नौकरियों के लिए प्रस्तावित बिल में कहा गया है कि क्लर्क, अकुशल और अर्धकुशल स्टाफ़, आईटी कर्मचारी, कॉन्ट्रैक्ट वाले और कैजुअल वर्कर्स वाली 75 फ़ीसदी नौकरियां स्थानीय लोगों को दी जानी चाहिए.

विधेयक में ये प्रावधान भी किया गया है कि प्राइवेट सेक्टर की ग्रुप-सी और ग्रुप-डी वाली नौकरियां कन्नड़ लोगों को दी जानी चाहिए.

बिल में स्थानीय व्यक्ति की परिभाषा भी दी गई है. कर्नाटक में जन्म लेने वाला, राज्य में 15 साल से रह रहा, कन्नड़ भाषा लिख, बोल और पढ़ सकने सक्षम व्यक्ति स्थानीय माना जाएगा. इसके लिए एक परीक्षा भी ली जाएगी जिसका संचालन एक नोडल एजेंसी करेगी. ये टेस्ट सिर्फ़ उन लोगों को देना होगा, जिन्होंने 10वीं क्लास तक कन्नड़ की पढ़ाई ना की हो.

अगर पर्याप्त स्थानीय उम्मीदवार ना हों, तब इंडस्ट्री सरकार से रियायत की गुहार कर सकती है. जांच के बाद सरकार आदेश दे सकती है.

इस रियायत के बाद भी प्रबंधन संबंधित नौकरियों में 25 फ़ीसदी और गैर-प्रबंधन से संबंधित नौकरियों में 50 फ़ीसदी आरक्षण अनिवार्य रहेगा.

अगर इसका उल्लंघन हुआ तो 10 से 25 हज़ार रुपये तक का जुर्माना लग सकता है.

अगर कंपनियों को सही उम्मीदवार नहीं मिलते हैं तो सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर स्थानीय उम्मीदवारों को तीन साल के अंदर ट्रेनिंग दी जाए.

विधेयक का इंडस्ट्री ने किया विरोध

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कर्नाटक सरकार के इस विधेयक का कई अहम हस्तियों ने विरोध किया है.

उद्योगपति किरन मज़ूमदार शॉ ने कहा कि तकनीक के क्षेत्र में जो ऊंचा स्थान इंडस्ट्री ने पाया है, उस पर इसका असर नहीं पड़ना चाहिए.

कर्नाटक के पूर्व एडवोकेट जनरल अशोक हरनाहैली और पूर्व सरकारी वकील बीटी वेंकटेश ने भी सिद्धारमैया सरकार के इस विधेयक पर सवाल उठाए हैं.

क़ानून के जानकारों ने इस विधेयक को असंवैधानिक बताया है.

ब्रांड एक्सपर्ट हरीश बिजूर ने बीबीसी हिंदी से कहा, "जिस बेंगलुरु ब्रांड को हम देखते आए हैं, उसके लिए ये झटके की तरह है. कन्नड़ को बोलने और ज़्यादा लोगों की ओर से इस्तेमाल करने की ज़रूरत है. लेकिन ये सब अचानक नहीं किया जा सकता. इसके लिए मीडियम से लेकर 10 साल तक की योजना के साथ आना चाहिए."

इंडस्ट्री की ओर से की जाने वाली आलोचना के कई पहलू सामने आए हैं.

इसमें सबसे अहम ये है कि जिस इकोसिस्टम के तहत बेंगलुरु इंडिया की सिलिकॉन वैली बन पाया, वो बर्बाद ना हो.

किरन मज़ूमदार इंडस्ट्री की इकलौती उद्यमी रहीं, जिन्होंने खुलकर सोशल मीडिया पर इसका विरोध किया है.

वो बोलीं, "टेक्नॉलजी हब के लिए हमें काबिल लोग चाहिए. नौकरियों में स्थानीय लोगों को जगह देने के लक्ष्य से इस क्षेत्र में हमारे नेतृत्व पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए. अच्छे स्किल वाली भर्तियों को इस पॉलिसी से अलग रखना चाहिए."

नैसकॉम ने भी इस विधेयक पर निराशा जताते हुए चिंता ज़ाहिर की है.

नैसकॉम ने कहा, "वैश्विक स्तर पर काबिल लोगों की भारी कमी है. बड़ी तादाद होने के बावजूद कर्नाटक इससे अलग नहीं है. तकनीक क्षेत्र जीडीपी में 25 फ़ीसदी की हिस्सेदारी रखता है और ये राज्य को आगे बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाता है. यहां की प्रति व्यक्ति आय देश के औसत से ज़्यादा है. इस तरह का बिल परेशान करने वाला है, जिससे न सिर्फ़ इंडस्ट्री की ग्रोथ पर असर होगा और ये राज्य की वैश्विक छवि को भी नुकसान पहुंचाएगा."

नैसकॉम ने राज्य सरकार से इस बिल को वापस लेने को कहा है.

'गंभीर समस्या'

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इमेज कैप्शन, विश्लेषकों का कहना है कि दूसरे राज्यों से बेरोज़गार बेंगलुरु में छोटे उद्योगों में सहायक का काम करने के लिए भी आ रहे हैं.

इंफोसिस के पूर्व सीएफओ वी बालाकृष्णन ने बीबीसी हिंदी से कहा, "कर्नाटक और देश में रोज़गार की गंभीर समस्या है. हम नौकरियां पैदा नहीं कर रहे हैं. सरकार के पास आसान रास्ता ये है कि वो आरक्षण ले आए ताकि स्थानीय लोगों को काम मिल सके. सरकार बेरोज़गारी की बड़ी समस्या से निपटने की बजाय छोटा रास्ता अपना रही है."

उन्होंने कहा, "बेंगलुरु में आईटी सेक्टर में काम करने वाले 40 फ़ीसदी लोग दूसरे राज्य से हैं. यहां का इकोसिस्टम अच्छा है, इसी कारण इंडस्ट्री काबिल लोगों को आकर्षित कर पाई है. अगर आप इसे बर्बाद कर देंगे तो इसे दोबारा खड़ा करना मुश्किल है."

सीके पद्मनाभ कर्नाटक स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं.

उनका कहना है, "हम स्थानीय लोगों को 70 फ़ीसदी नौकरी देने के लिए तैयार हैं. पर ये लोग हैं कहां? हमारे लोग आठ घंटे के लिए काम करने नहीं आते हैं. कुछ कारणों से ये सारे लोग सर्विस सेक्टर में जाना चाहते हैं."

पद्मनाभ ने कहा कि दूसरे राज्यों से बेरोज़गार बेंगलुरु में छोटे उद्योगों में सहायक का काम करने के लिए भी आ रहे हैं. ये कुछ ऐसा है कि भारतीय विदेश जाकर कड़ी मेहनत करते हैं.

कर्नाटक के श्रम मंत्री के तर्क

संतोष लाड

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कर्नाटक के श्रम मंत्री संतोष लाड ने विधेयक लाने के फ़ैसले का स्वागत किया है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "ये नौकरियों में आरक्षण नहीं है. हम इस बारे में काफ़ी खुले विचार रखते हैं. ये सिर्फ़ एक प्रोग्राम पर सहमति है. हम ये नहीं कह रहे हैं कि 70 फ़ीसदी रोज़गार अनिवार्य है. हम कह रहे हैं कि अगर 70 फ़ीसदी देना संभव नहीं है तो 20 फ़ीसदी ही दीजिए. युवाओं में काफ़ी रोष है और बतौर श्रम मंत्री ये मेरा फर्ज़ है कि मैं उनके अधिकारों की रक्षा करूं. इसमें ग़लत क्या है?"

संतोष लाड ने कहा कि जब कोई बिज़नेसमैन राज्य में निवेश करता है तो वो ये नहीं कहता कि सिर्फ़ बिहार या तमिलनाडु के लोगों को ही नौकरी दी जाएगी. लेकिन ज़मीनी स्तर पर एचआर मैनेजर अपने ही राज्य के लोगों की भर्ती कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि राज्य में टैलेंट के अभाव का तर्क ठीक नहीं है.

संतोष लाड ने कहा, "क्या उद्योग से जुड़े लोगों ने राज्य सरकार से कहा है कि उन्हें कैसी स्किल वाले लोगों की ज़रूरत है. क्या ट्रेनिंग देना उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं है. यहां एक बड़ा नेचुरोपैथी इंस्टीट्यूट है. वहां कर्नाटक से सिर्फ़ 20 लोग नौकरी करते हैं. इसपर गौर कीजिए."

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क़ानून का रास्ता

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इमेज कैप्शन, ब्रैंड एक्सपर्ट हरीश बिजूर ने बीबीसी हिंदी को बताया कि बेंगलुरू देश भर से आए लोगों का मिश्रण है

कर्नाटक के पूर्व एडवोकेट जनरल अशोक हर्नाहल्ली ने बीबीसी हिंदी को बताया कि 2020 में ऐसा ही एक कानून हरियाणा सरकार भी लाई थी लेकिन उसे पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया था क्योंकि ये संविधान की आर्टिकल 19 का उल्लंघन था.

अशोक हर्नाहल्ली बताते हैं कि डॉक्टर प्रदीप जैन बनाम भारत सरकार केस में कहा गया था, "ये कहा जाता है कि सभी भारतीयों का डोमिसाइल एक ही है और वो है - भारत का डोमिसाइल. भारत के संविधान के अनुच्छेद 5 का हवाला देते हुए कहा गया था कि यदि इसका उपयोग वैध उद्देश्य के अलावा किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया जाता है, तो यह देश की एकता और अखंडता को तोड़ देगा."

पूर्व सरकारी वकील बीटी वैंकटेश का विचार है कि ये कानून पूरी तरह से असंवैधानिक है और जो लोग ऐसा कर रहे हैं उन्हें भी इसकी जानकारी है.

उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, "जो लोग ऐसा कर रहे हैं वो भी अच्छी तरह जानते हैं कि इसका उद्देश्य किसी के अहंकार का पोषण करना है. अगर ऐसा होता है तो भारत एक देश के रूप में काम नहीं कर सकता."

"राज्य सरकार ये नहीं कह सकती कि केवल कन्नड़ लोगों को ही काम पर रखा जा सकता है. इसकी जगह पर सरकार उद्योगों को वैश्विक मानदंड की तरह अधिक समावेशी प्रोफ़ाइल बनाने के लिए कह सकती है. ऐसे मानदंडों का पालन दुनिया के कई देशों में पालन किया जाता है. सरकार कह सकती है कि नौकरियों में समावेशिता ज़रूरी है."

ब्रैंड एक्सपर्ट हरीश बिजूर ने बीबीसी हिंदी को बताया कि बेंगलुरू देश भर से आए लोगों का मिश्रण है.

उन्होंने कहा, "यहां कई भाषाएं, कल्चर और खान-पान हैं. उस हिसाब से देखें तो हम मिनी इंडिया हैं. प्रस्तावित कानून ने निश्चित तौर पर बेंगलुरु के कामकाजी और पेशेवर इकोसिस्टम को झकझोर दिया है."

बिजूर की बात में दम है क्योंकि जब कोविड लॉकडाउन ख़त्म हुआ था तो शहर के बड़े बिल्डरों ने राजस्थान, उत्तर प्रदेश और देश के अन्य राज्यों से चार्टर्ड फ़्लाइट से मज़दूर बुलाए थे. ताकि रुके हुए बिल्डिंग प्रोजेक्ट पूरे किए जा सकें. इन सभी राज्यों के लोगों में वो हुनर था जो इन बिल्डरों को कर्नाटक में नहीं मिला था.

इसी बीच आंध्र प्रदेश के मंत्री नारा लोकेश ने तुरंत आईटी सेक्टर के लिए अपील करते हुए कहा है, "आंध्र प्रदेश आपके स्वागत के लिए तैयार है. प्लीज़ हमसे संपर्क करें."

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