मोदी सरकार का सामान्य वर्ग के ग़रीब लोगों को 10 फ़ीसदी आरक्षण देने का फ़ैसला

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भारत में चुनावी साल में एक बार फिर आरक्षण का मुद्दा गरमा गया है. मोदी सरकार से जुड़े एक करीबी सूत्र ने बीबीसी को बताया कि केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को सरकारी नौकरियों में दस फ़ीसदी आरक्षण देने का फ़ैसला किया है.
हालाँकि इस बारे में अभी तक सरकार की ओर से कोई वक्तव्य नहीं आया है. मगर मीडिया रिपोर्टों में बताया जा रहा है कि कैबिनेट ने आरक्षण के फ़ैसले को मंज़ूरी दे दी है.
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समाचार एजेंसी पीटीआई ने भी सूत्रों के हवाले से लिखा है कि कैबिनेट ने आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण को मंज़ूरी दी है. साथ ही ये भी बताया है कि ग़रीब सवर्णों के लिए ये कोटा आरक्षण की मौजूदा तय सीमा 50 फ़ीसदी से अलग होगा.
अभी देश में कुल 49.5 फ़ीसदी आरक्षण है. अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फ़ीसदी, अनुसूचित जातियों को 15 फ़ीसदी और अनुसूचित जनजाति को 7.5 फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था है.
बताया जा रहा है कि ग़रीब सवर्णों को प्रस्तावित 10 फ़ीसदी आरक्षण मौजूदा 50 फ़ीसदी की सीमा से अलग होगा.
इस मंज़ूरी के बाद आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों के लिए सरकारी नौकरियों में अलग से 10 फ़ीसदी कोटा होगा. हालाँकि सवर्णों को आरक्षण मिलने की राह इतनी आसान नहीं है और मोदी सरकार को इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा.
आगे क्या
सरकार को इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 को संशोधित करना होगा. यानी संशोधन विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा दोनों की मंज़ूरी आवश्यक होगी.
संविधान में संशोधन होने पर आर्थिक रूप से कमज़ोर अगड़ी जातियों को भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिल सकेगा.

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मोदी सरकार का ये फ़ैसला इस मायने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आने वाले कुछ महीनों के बाद ही लोकसभा के चुनाव होने हैं और नरेंद्र मोदी लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए जनता की अदालत में हाज़िर होंगे.
हाल ही में हुए तीन हिंदीभाषी राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने बीजेपी को हराया था.
किसने क्या कहा?

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प्रकाश आंबेडकर ने कहा, "जहाँ तक सुप्रीम कोर्ट का मामला है कि उसने साफ़ कहा है कि आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जा सकता है और आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता. इसलिए सुप्रीम कोर्ट में ये बिल्कुल टिकेगा नहीं. क्योंकि सरकार जानती है कि अगले पाँच साल के लिए वो आने वाली नहीं है, इसलिए जो आने वाले हैं उनके लिए कठिनाइयां पैदा कर रही है. इसलिए ऐसा मुद्दा लाए हैं, जिससे सुप्रीम कोर्ट और आम आदमी आमने-सामने आए."
केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने कहा कि ये फ़ैसला ज़रूरी था और इसका सियासत से लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा, "बीजेपी की लंबे समय से ये मांग थी और आज मोदी सरकार ने सबका साथ-सबका विकास की अवधारणा के तहत ऐतिहासिक फ़ैसला लिया है. सामान्य वर्ग के लोगों को आज उनका हक मिला है."
राज्य सभा सांसद और आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने ट्वीट कर कहा, "आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्ण जातियों के लिये मोदी सरकार ने 10% आरक्षण का स्वागत योग्य चुनावी जुमला छोड़ दिया है, ऐसे कई फ़ैसले राज्यों ने समय-समय पर लिए, लेकिन 50% से अधिक आरक्षण पर कोर्ट ने रोक लगा दी क्या ये फ़ैसला भी कोर्ट से रोक लगवाने के लिये एक नौटंकी है?"

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सरकार की मंशा पर सवाल तो उठाए हैं, लेकिन कहा कि सरकार को संसद सत्र आगे बढ़ाना चाहिए.
केजरीवाल ने ट्वीट किया, "सरकार को संसद सत्र आगे बढ़ाना चाहिए और तुरंत संविधान संशोधन लाना चाहिए. वरना ये महज एक चुनावी स्टंट साबित होगा."
राज्यसभा सासंद केटीएस तुलसी ने मोदी सरकार के इस फ़ैसले को 'लोगों को मूर्ख' बनाने का क़दम बताया. उन्होंने आशंका जताई कि अगर सरकार संशोधन विधेयक को संसद में लाई तो क्या ये पास हो पाएगा.
भाजपा नेता शहनवाज़ हुसैन ने कहा, "सवर्ण समाज में भी बहुत से ग़रीब हैं. उनका भी इस देश के संसाधनों पर हक है और प्रधानमंत्री ने उनका हक उन्हें देने का काम किया है."
लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ने कहा, "ग़रीबी की एक ही जाति होती है. हम लोग 15 फ़ीसदी की मांग कर रहे थे, लेकिन 10 फ़ीसदी दिया गया. हम इस फ़ैसले का स्वागत करते हैं."
पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा, "आर्थिक रूप से कमज़ोरों को 10 फ़ीसदी आरक्षण जुमले के अलावा कुछ और नहीं है. इसमें कई क़ानूनी पेचीदगियां हैं और संसद में पास कराने का समय नहीं है. सरकार पूरी तरह बेनकाब हो गई है."
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