उत्तर प्रदेश: जीबी पंत शोध संस्थान में नियुक्ति: पिछड़ा वर्ग से 'कोई योग्य उम्मीदवार नहीं मिला'- क्या है पूरा मामला?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान शोध संस्थान में हुई भर्तियों में अन्य पिछड़ा वर्ग की आरक्षित सीटों के लिए 'योग्य उम्मीदवार' ना मिलने पर विवाद हो गया है.
संस्थान में हाल ही में शिक्षकों की भर्ती हुई है. लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग की सीटों पर संस्थान को 'कोई योग्य उम्मीदवार' नहीं मिला और जगह खाली रह गई.
इस मामले पर सवाल उठाने वाले आलोचकों ने आरोप लगाया है कि संस्थान ने जानबूझकर पिछड़ा वर्ग की सीटों को खाली छोड़ा है ताकि इस वर्ग के 'उम्मीदवारों का हक़ मारा जा सके.'
वहीं संस्थान के प्रबंधन ने सवालों को ख़ारिज करते हुए कहा है कि उनका 'ऐसा कोई इरादा नहीं' था. वास्तविकता ये है कि इस वर्ग से इन भर्तियों के लिए जो उम्मीदवार आए थे वो संस्थान के 'मापदंडों पर खरे नहीं' उतरे.
गोविंद बल्लभ पंत शोध संस्थान, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का हिस्सा है और सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में अपने शोध और अध्ययनों के लिए जाना जाता है.
ये स्वायत्त संस्थान केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के साझा प्रयासों से स्थापित हुआ था और साल 2005 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने के बाद उसका हिस्सा हो गया था.

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हालिया भर्ती में हुई कथित गड़बड़ी की शिकायत के बाद राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने संस्थान को नोटिस जारी करके पिछली भर्तियों का ब्यौरा भी मांगा है.
टाटा इंस्टीट्यूट से क़ानून की पढ़ाई कर रहे मयंक यादव और दिल्ली यूनिवर्सिटी से क़ानून की पढ़ाई कर रहे विवेक राज ने असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और एसोसिएट प्रोफ़सर के पदों पर हुई भर्ती में गड़बड़ी की शिकायत पिछ़ड़ा वर्ग आयोग से की थी.
ओबीसी वर्ग का हक़ मारने की कोशिश?
बीबीसी से बात करते हुए मयंक यादव ने कहा, "जीबी पंत में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, एसोसिएट प्रोफ़ेसर और प्रोफ़ेसर के पदों पर भर्ती निकली थी. संस्थान ने अनारक्षित वर्ग के दो लोग असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर रखे हैं, इसी वर्ग में एक एसोसिएट प्रोफ़ेसर भी रखा है और प्रोफ़ेसर की पद के लिए कोई योग्य उम्मीदवार नहीं मिला है. संस्थान को किसी भी पद पर पिछड़ा वर्ग का कोई योग्य उम्मीदवार नहीं मिला है. हमें लगता है कि इस भर्ती में गड़बड़ी हुई है और इसकी ही शिकायत हमने आयोग से की है."
उन्होंने आरोप लगाया, "इसमें एक मुद्दा ये भी था कि साक्षात्कार से पहले ही संस्थान ने आरक्षण वर्गों में उम्मीदवारों को बांट दिया था. जैसे अनारक्षित वर्ग में सिर्फ अनारक्षित वर्ग के ही उम्मीदवार बुलाए गए, आरक्षण वर्ग के उम्मीदवारों को इसमें नहीं बुलाया गया. एक तरह से संस्थान ने पहले ही 40 फ़ीसदी आरक्षण सवर्ण वर्ग को दे दिया."
मयंक कहते हैं, "अनारक्षित सीटों पर तो सभी सवर्ण रख लिए गए लेकिन पिछड़ा वर्ग की सीटें ये कहकर खाली छोड़ दी गईं कि कोई भी योग्य उम्मीदवार नहीं मिला. ये एक तरह से संविधान के तहत मिले आरक्षण के हक़ को मारना है."

वहीं संस्थान के निदेशक बद्री नारायण सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं कि एक बेवजह का विवाद खड़ा किया जा रहा है और संस्थान को घेरने की कोशिश की जा रही है.
मापदंडों पर खरे नहीं उतरे उम्मीदवार- संस्थान
बद्री नारायण कहते हैं, "ये एक शोध संस्थान है, यहां किसी को भर्ती करने के कुछ तय मापदंड हैं. चयन समिति तय करती है कि किसे रखा जाएगा. विषय विशेषज्ञों की चयन समिति ने चीज़ें तय की हैं. योग्य उम्मीदवार सिर्फ पिछड़ा वर्ग में ही नहीं मिले हैं बल्कि प्रोफ़ेसर की पोस्ट के लिए किसी भी वर्ग से योग्य उम्मीदवार नहीं मिला है."
प्रोफ़ेसर बद्री नारायण कहते हैं, "प्रोफ़ेसर के पद के लिए हमारे पास सात पोस्ट थीं और पांच ही लोग इंटरव्यू देने के लिए आए थे. इन पांच में से भी कोई भी योग्य नहीं पाया गया. अनारक्षित वर्ग का भी कोई उम्मीदवार योग्य नहीं था. हमारी चयन समिति को ये उम्मीदवार योग्य नहीं लगे. जो लोग सवाल उठा रहे हैं उन्हें समझना चाहिए की ये एक शोध संस्थान है और यहां सिर्फ़ न्यूनतम योग्यता के आधार पर लोग नहीं रखे जाते हैं. चयन समिति कई अन्य विशेषताएं भी देखती है."

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वहीं मयंक यादव इंटरव्यू प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "इस तरह के इंटरव्यू का लाइव प्रसारण होना चाहिए ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि किसी तरह का भेदभाव नहीं हुआ है. जिस तरह से ये भर्ती हुई है वो एक मज़ाक है, ये मज़ाक आगे ना हो, इसके लिए ही हम लड़ रहे हैं. योग्य उम्मीदवार न मिलने की जो नीति बना रखी है ये बंद होनी चाहिए. ये नीति पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों का हक मारने के लिए ही बनाई गई है."

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विशेष भर्ती अभियान
सोशल मीडिया पर सवाल उठने और विवाद बढ़ने के बाद अब संस्थान ने रिक्त पदों को भरने के लिए विशेष अभियान चलाया है.
प्रोफ़ेसर बद्री नारायण कहते हैं, "अब हमने नया विज्ञापन निकाला है और उसे प्रचारित किया है ताकि अन्य पिछड़ा वर्ग और ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग) के लिए रिक्त पदों के लिए अधिक से अधिक आवेदन आ सकें और योग्य उम्मीदवारों की भर्ती की जा सके."
सोशल मीडिया पर की जा रही टिप्पणियां में प्रोफ़ेसर बद्री नारायण की जाति पर भी निशाना साधा जा रहा है. आलोचना कर रहे लोग सवाल कर रहे हैं कि प्रोफ़ेसर बद्री नारायण स्वयं 'तिवारी' हैं और सवर्ण वर्ग से हैं और उन्होंने जानबूझकर पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों की अनदेखी की.
इस आलोचना को खारिज करते हुए बद्री नारायण कहते हैं, "मैंने कभी अपने नाम के साथ अपनी जाति नहीं लगाई. मैं एक संस्थान का प्रमुख हूं इसलिए बहुत कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि विवाद हो सकता है लेकिन मैं इतना जरूर कहूंगा कि एक बेवजह के विवाद में मुझे और संस्थान को घसीटा जा रहा है."
बद्री नारायण कहते हैं, "हमारी ऐसी कोई नीयत नहीं थी कि किसी उम्मीदवार को उसकी पहचान के आधार पर खारिज किया जाए. हमने अपने मापदंडों पर उम्मीदवारों को परखा है. यदि ऐसा नहीं होता कि प्रोफ़ेसर के पद खाली नहीं रहते. हमारे संस्थान की ख़ास जरूरते हैं जिनके लिए हमें जब-जब योग्य उम्मीदवार मिलते हैं हम उनकी भर्ती करते हैं."
सवाल और भी हैं...
रिसर्च स्कॉलर सुनील यादव कहते हैं कि ओबीसी उम्मीदवारों को नॉट फॉर सूटेबल (योग्य नहीं) घोषित करना इस वर्ग के उम्मीदवारों को बहिष्कृत करना है. सुनील यादव कहते हैं, "ओबीसी सीट को नॉट फ़ॉर सूटेबल करना ओबीसी की प्रतिभा पर सवाल खड़ा करना है, यह काम जीबी पन्त ही नहीं इससे पहले बीएचयू के हिंदी विभाग में भी हुआ. यह घनघोर अनियमितता का मामला है. इसे मैं ओबीसी छात्रों को अकादमिक बहिष्कृत करने की चाल के रूप में देखता हूं. ओबीसी आयोग को इस पर कड़ा रुख अपनाने की जरूरत है नहीं तो इस तरह की अकादमिक धांधली चलती रहेगी."
इस पूरे प्रकरण पर नजर रख रहे पंकज कुमार सोनी कहते हैं कि यदि संस्थान की कुछ ख़ास जरूरतें थी तो मूल भर्ती विज्ञापन में ये स्पष्ट किया जाना चाहिए था जिस तरह अब निकाले गए भर्ती विज्ञापन में किया गया है.
पंकज कहते हैं, "संस्थान को पारदर्शिता के लिए योग्यता संबंधी रोस्टर को अपनी वेबसाइट पर प्रदर्शित करना चाहिए ताकि कोई भी देख सके. संस्थान को पिछली भर्तियों की जानकारी भी सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि अभी जो सवाल उठ रहे हैं उनका जवाब दिया जा सके. जो हुआ है उसके बाद संस्थान को ज़िम्मेदारी से जवाब तो देना ही होगा क्योंकि इससे पूरी भर्ती प्रक्रिया सवालों में आ गई है."
पंकज सवाल करते हैं कि संस्थान ने भर्ती के लिए जो विशेष ड्राइव शुरू की है उसमें पर्सन विद डिसएबिलिटी (विकलांग श्रेणी) को क्यों शामिल नहीं किया गया है?
भर्ती प्रक्रिया पर उठे सवालों ने संस्थान की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं. पेशे से असिस्टेंट प्रोफ़ेसर पंकज कहते हैं, 'शक दूर करने के लिए संस्थान को ये जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए की पिछली भर्तियों में आरक्षण कैसे लागू किया गया. जब तक ऐसा नहीं होता, संस्थान की प्रक्रिया पर सवाल उठते रहेंगे.'
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