नज़रियाः आरक्षण का वादा, न निभाना आसान न तोड़ना

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- Author, सुजाता आनंदन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
महाराष्ट्र में मराठों ने अगस्त 2016 से अगस्त 2017 के दौरान मूक मोर्चाबंदी के साथ चुपचाप अपनी ताक़त का प्रदर्शन किया. एक साल तक वे आरक्षण को लेकर संवैधानिक समस्याओं के समाधान का इंतज़ार करते रहे ताकि सरकार के वादे के मुताबिक़ नौकरियों में उन्हें कोटा मिल सके.
लेकिन अब उनका धैर्य टूट गया है. वे हिंसा का सहारा लेने पर उतर गए हैं. बीती 1 अगस्त से वे सरकारी दफ़्तरों में धरना दे रहे हैं और 9 अगस्त को उन्होंने पूरे राज्य में नाकाबंदी की. मवेशियों, बैल-गाड़ियों, ट्रैक्टरों और समर्थकों के साथ सभी मुख्यमार्गों को जाम कर दिया.
सच तो ये है कि मराठों ने अपनी मांग को लेकर विरोध के दौरान मवेशियों और खेती के औज़ारों का प्रदर्शन इसलिए किया ताकि वो आरक्षण के वास्तविक कारणों को दिखा सकें. पूरे देश में किसानी की समस्याओं को लेकर गुजरात में पाटीदार, राजस्थान में गुर्जर और हरियाणा में जाट भी इसी तरह की मांगों को लेकर सड़कों पर आए हैं.
खेती से अब कमाई काफी कम हो गई है. जो कभी अपने गांवों में सामंत और ज़मींदार हुआ करते थे आज न केवल उनकी ज़मीनें कम हुई हैं बल्कि न्यूनतम समर्थन मूल्य देने में सरकार की नाकामी की वजह से पूरे देश में कई किसान दिवालिये और ग़रीब हो गए.
सामाजिक स्तर पर, कभी सामंत रहे ये लोग जिन पर हावी हुआ करते थे अब ख़ुद को उनसे पायदान में बहुत नीचे पाते हैं. ख़ासकर दलितों से जिन्होंने आरक्षण का लाभ उठाया और मुनीम, तहसीलदार और कलेक्टर की नौकरियां हासिल कीं और अब अपने गांवों में इन अगड़ी जातियों पर हावी हैं.

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आरक्षण की मांग का कारण
ये लोग कभी आरक्षण को ग़रीबों या सामाजिक रूप से पिछड़ों की चीज़ माना करते थे. लेकिन अब इसी कोटे को आर्थिक समृद्धि का एकमात्र ज़रिया माना जा रहा है.
जिस महाराष्ट्र में मराठों की आबादी क़रीब 35 फ़ीसदी है, वहां ये आज अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम क़ानून के ख़िलाफ़ भी तेज़ आवाज़ उठा रहे हैं. उनका आरोप है कि इस क़ानून के ज़रिए उन्हें झूठे मामलों में ग़ैर-ज़मानती धाराओं के तहत फंसाया जा रहा है.
हालांकि, सरकार अब तक दलितों और मराठों के बीच संभावित संघर्ष रोकने में कामयाब रही है लेकिन आंदोलन का ये दौर सरकार की तरफ से अलग अलग लोगों के कई अस्पष्ट बयानों पर तत्काल प्रतिक्रियाओं का नतीजा है.

राजनीतिक टाल-मटोल
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कुछ हफ़्ते पहले ये घोषणा की कि राज्य सरकार 72 हज़ार रिक्तियों पर भर्तियां करेगी. उन्होंने कहा कि इन नौकरियों में मराठों को 16 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा लेकिन बाद में इसे रोक लिया गया.
इसने न केवल दलितों को चौकन्ना कर दिया कि उनके कोटे को काट कर मराठों को संतुष्ट किया जाएगा बल्कि उन सोए मराठा क्षत्रपों को भी उकसा दिया और उन्होंने इसे सरकार की राजनीतिक टाल-मटोल करार दिया.
उनके संदेह की पुष्टि तब और प्रबल हो गई जब केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने एक स्पष्ट बयान दिया, "हम उन्हें आरक्षण दे सकते हैं. लेकिन नौकरियां कहां हैं?"
इतना ही काफ़ी नहीं था. मुख्यमंत्री फडणवीस जो शायद यह महसूस कर रहे थे कि ओबीसी के अपनी सरकार के ख़िलाफ़ खड़ा होने का जोखिम वो नहीं उठा सकते, उन्होंने ये आश्वासन दिया कि ओबीसी कोटा को नहीं छुआ जाएगा.

कैसे मिलेगा आरक्षण?
तो भला मराठों के लिए आरक्षण आएगा कहां से? संविधान के मुताबिक आरक्षण का कोटा 52 फ़ीसदी से अधिक नहीं हो सकता.
देश के अधिकतर राज्यों की तरह ही महाराष्ट्र में भी ये अपने अधिकतम स्तर पर है और 2014 में तब की पृथ्वीराज चव्हाण के नेतृत्व वाली कांग्रेस-एनसीपी सरकार के संवैधानिक रूप से अवहनीय (नहीं टिक सकने वाले) 16 फ़ीसदी मराठा आरक्षण की मांग को माने जाने को लेकर वो पहले से ही नाराज़ हैं. इसमें कोई शक नहीं कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2015 में इसे ख़ारिज कर दिया था.
इसलिए मराठा अब ज़ोर दे रहे हैं कि उन्हें आरक्षण का लाभ दिए जाने के लिए संविधान में संशोधन हो.

तमिलनाडु की तरह प्रावधान की मांग
मराठा इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि तमिलनाडु में तो तय सीमा से अधिक 69 फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान है. लेकिन तमिलनाडु एक अपवाद है क्योंकि वहां की राजनीति हमेशा से ही अगड़ी जाति विरोधी रही है.
द्रविड़ राजनीति पिछड़े समुदायों पर केंद्रित है और दोनों ही मुख्यधाराओं की पार्टियों के मतदाता समान ही हैं. अगड़ी जाति का तमिलनाडु की राजनीति में कोई स्थान नहीं है.
जबकि महाराष्ट्र और देश के अन्य राज्यों में यह वास्तविकता नहीं है. इसके अलावा महाराष्ट्र का दलित समुदाय आक्रामक हैं. वो अपने कोटे में किसी प्रकार की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करेंगे और दोनों मुख्य राजनीतिक पार्टी इनमें से किसी एक को भी अपने से अलग करने का जोखिम नहीं उठा सकती.

आफत का पिटारा
ये एक तरह से पैंडोरा बॉक्स यानी परेशानियों के पिटारे की तरह है जिसे केंद्र सरकार नहीं खोलना चाहेगी. फिलहाल, उन सभी राज्यों में भाजपा की सरकार है जहां कृषि समुदाय कोटा की मांग कर रहे हैं.
किसी एक राज्य से उठी आरक्षण की मांग को मानने की स्थिति में आरक्षण की मांग दूसरे राज्यों से भी उठने लगेगी. लिहाज़ा एकमात्र तरीक़ा यह है कि आंदोलनकारी समुदाय को शांत करें या उनसे समय मांगें.
मराठा समुदाय की मंशा शांत होने की नहीं दिख रही और सरकार को लग रहा है कि 2019 में तो उसका कार्यकाल ख़त्म ही होने वाला है. ये केवल मराठों की बात नहीं है बल्कि धांगड़ (चरवाहा) और अन्य खानाबदोश जनजाति भी हैं जिनसे 2014 में भाजपा ने आरक्षण देने के चुनावी वादे किए थे.
दुर्भाग्यवश, यह वो वादा है जो सरकार न तो पूरा कर सकती है और न ही इसे तोड़ सकती है- अगर वो इसे पूरा करती है तो भी लानत और नहीं किया इस पर भी उसे कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ेगा.
पिछली यूपीए सरकार के साथ जुड़े तेलंगाना के मुद्दे की तरह, आरक्षण से जुड़े आंदोलन को बर्दाश्त करना तो मुश्किल है लेकिन इसके अलावा चारा ही क्या है.
(सुजाता आनंदन वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं. वो 'हिंदू हृदय सम्राटः हाउ द शिव सेना चेंज़्ड मुंबई फॉर एवर' और 'महाराष्ट्र मैक्सिमसः द स्टेट, इट्स पीपल ऐंड पॉलिटिक्स' की लेखिका है. लेख में व्यक्त नज़रिया लेखक का अपना दृष्टिकोण है, बीबीसी का नहीं)
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