महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण के ख़िलाफ़ ओबीसी की लामबंदी का असर क्या होगा?

मराठा आरक्षण

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इमेज कैप्शन, महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मुद्दा चुनावी नतीजों पर प्रभावी असर डाल सकता है
    • Author, मयूरेश कोण्णूर
    • पदनाम, बीबीसी मराठी

मराठा समुदाय को आरक्षण देने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा का एक विशेष सत्र बुलाया.

मराठा समुदाय के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को देखते हुए उसे 10 फ़ीसदी आरक्षण दिया गया है.

इस समुदाय की आबादी प्रदेश में सबसे अधिक है. सरकार के इस क़दम के बाद भी मराठा आरक्षण को लेकर जारी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है.

मराठा आरक्षण आंदोलन से भड़की चिंगारी अलग-अलग समुदायों के बीच विभाजन रेखा बन गई है. यह विभाजन गाँव-गाँव तक फैल गया है.

महाराष्ट् में पिछले छह महीनों में मराठा समुदाय के ख़िलाफ़ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की लड़ाई देखी जा रही है.

मराठा समुदाय ओबीसी के कोटे से आरक्षण की मांग कर रहा है. हालांकि पहले अलग आरक्षण की मांग की गई थी.

मराठा समुदाय के लिए आरक्षण पहले 2014 फिर 2018 में दिया गया. लेकिन यह आरक्षण अदालत में टिक नहीं पाया. इसके बाद मराठा को ओबीसी आरक्षण में शामिल करने की मांग होने लगी.

मनोज जरांगे के नेतृत्व में मराठा समुदाय ने अपने समुदाय के लिए कुनबी जाति के प्रमाण पत्र की मांग की.

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मराठों को कुनबी जाति के रूप में मान्यता देने की मांग इसलिए की गई क्योंकि यह जाति ओबीसी में आती है.

जाति रजिस्ट्री की जांच कर कुनबी प्रमाणपत्र देने के सरकारी प्रयास से ओबीसी समुदाय में असंतोष फैल गया.

महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाक़े में बड़ी संख्या में मराठा और ओबीसी समुदाय एक साथ रहते हैं.

वहाँ भी इस संघर्ष का असर देखा जा रहा है. इस ध्रुवीकरण का असर आगामी चुनावों में पड़ने की संभावना है.

दोनों समाजों में यह विभाजन कितनी गहरा है, यह पता लगाने के लिए हमने गाँवों का दौरा किया.

गाँवों में हालात का जायजा लेने के लिए हमने बीड और अहमदनगर ज़िले का दौरा किया.

हमने गाँवों में ग्रामीणों से बातचीत कर यह समझने की कोशिश की कि उनके मन में क्या चल रहा है.

बीड ज़िले के काशेवाड़ी गांव के निवासी अशोक सनप कहते हैं, "अगर पहले एकजुटता या एकता की भावना थी, अब यह अलग है. लोगों का नज़रिया बदल गया है. पहले हम चाय पर मिलते थे, हम एक साथ खाते-पीते थे. कठिन समय में हम एक-दूसरे का समर्थन करते थे और एक-दूसरे की ख़ुशियों का जश्न मनाते थे. यह सब प्रभावित हुआ है.''

अशोक अपने गांव के उप सरपंच हैं. इस इलाक़े में आबादी मिलीजुली है. कुछ गांवों में मराठा आबादी अधिक है तो कुछ में ओबीसी की आबादी अधिक है.

"दो-तीन महीने पहले हुए चुनाव का उदाहरण लेते हैं. शिरूर तालुका में ग्राम पंचायत का चुनाव हुआ. ओबीसी और मराठा के रूप में दो समूह उभरे. चुनाव के दिन तक, यह साफ़ नहीं था. जब परिणाम घोषित किए गए तो ओबीसी का एक उम्मीदवार सरपंच बन गया.''

''इसका मतलब है कि जाति के आधार पर वोटों का साफ़-साफ़ विभाजन हुआ. ओबीसी ने ओबीसी उम्मीदवार को एकतरफ़ा वोट दिया. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. ग़रीब ग्रामीण हो या अमीर ग्रामीण, दोनों अपने अच्छे-बुरे समय में एक साथ रहते थे, लेकिन राजनीति की वजह से वे अब अलग हो रहे हैं.''

मराठा आरक्षण की मांग नई नहीं है. हालांकि, मनोज जरांगे के आंदोलन के बाद, मराठा समुदाय ने जाति प्रमाण पत्र देकर ख़ुद को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने की मांग तेज़ कर दी है. ओबीसी समुदाय ने इसका विरोध किया क्योंकि उन्हें लगा कि इससे उनका आरक्षण प्रभावित होगा. इसके ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन हुआ. राजनीतिक माहौल तनावपूर्ण हो गया. अब यह ज़मीनी स्तर तक पहुँच गया है.

काशेवाड़ी के रामदास सनप कहते हैं, "हमारे जैसे युवाओं को लगता है कि भले ही हमें अभी हाल ही में ओबीसी श्रेणी में शामिल किया गया है, इसके बाद भी हमें आरक्षण का लाभ ठीक से नहीं मिलता है.''

''इसके अलावा हमें ऐसा लगता है कि ओबीसी श्रेणी में शामिल होने के बाद मराठा समुदाय, एक बड़ा समुदाय होने की वजह से अब हमसे प्रतिस्पर्धा करेगा. इस श्रेणी में 450 जातियां हैं और अब मराठा समुदाय को शामिल करने के साथ ही प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है. इससे मन व्यथित है और मन में डर पैदा हो रहा है.''

गाँवों में पैदा हुई विभाजन रेखा

चिंचाला गांव के लोग
इमेज कैप्शन, चिंचाला गांव के लोग

राजनीतिक उथल-पुथल का असर गाँवों के जीवन पर पड़ेगा इसका अनुमान किसी ने नहीं लगाया था.

इस बात का भी अनुमान नहीं लगाया गया था कि इसका असर लोगों के रोजमर्रा के जीवन पर पड़ेगा. लेकिन ऐसा हुआ है. एक कलह पैदा हुई है. यह फॉल्ट लाइन गाँवों के स्तर तक पहुंच गई है.

मराठा समुदाय से आने वाले नवनाथ जाधव से हमारी मुलाक़ात अहमदनगर के माही जलगाँव में हुई.

वो कहते हैं, "माहौल तो प्रभावित होगा ही. अगर मैं आपकी टेबल पर एक सीट मांगूंगा तो आपको परेशानी होगी. अगर हम किसी के अधिकार के हिस्से को कम करेंगे तो नाराज़गी होगी ही. अगर हम उनकी जगह पर होते तो हमें भी बुरा लगता.''

इससे रोज़मर्रा का व्यवहार प्रभावित होता हो रहा है. लोग एक-दूसरे को देखते हैं, लेकिन बातचीत से बचते हैं. जाति आधारित गुटबाज़ी हावी है. इस तरह की शिकायतें गांव के हर कोने में सुनी जा सकती हैं.

राजेंद्र शेंडकर माही जलगांव में पशु चिकित्सक हैं. वह अपने काम के सिलसिले में आसपास के इलाक़े या इस गांव की परिधि में आने वाले दूसरे गाँवों में जाते हैं. उनको लगता है कि कई सालों में बना सामाजिक सद्भाव ख़तरे में है.

वो कहते हैं, "सामाजिक समारोहों में पहले जो लगातार बातचीत हुआ करती थी, वह अब तनावपूर्ण हो गई है. सामाजिक सद्भाव बिगड़ गया है. जो लोग पहले एक-दूसरे के साथ नहीं थे, वे अब जाति के नाम पर एक हो रहे हैं. इस हालत में मराठा समुदाय अपने आंतरिक मतभेदों को किनारे रखकर एक साथ आ रहा है.''

आष्ठी में काशेवाड़ी के पास चिंचाला नाम का एक गांव है. यह मुख्य तौर पर मराठा बहुल गाँव है. हम वहां लोगों से बातचीत करने जाते हैं. तेज़ गति वाली आर्थिक प्रक्रियाओं में बदलती गतिशीलता इस समाज में भी साफ़ नज़र आती है. यहाँ भी हमें यह व्यापक भावना देखने को मिलती है कि तेज़ी से बदलती आर्थिक प्रक्रिया में हम पीछे छूट गए हैं.

इस गांव के निवासी अशोक पोकले इस बात से असहमत हैं कि इससे गांव के विभिन्न समुदाय के लोगों में मतभेद पैदा हो रहा है. उनका मानना ​​है कि यह राजनीति का एक हिस्सा है.

वो कहते हैं, "जातियों के बीच गुटबाजी ज़मीनी स्तर पर नहीं है. यह जाति के बारे में नहीं है. मराठा समुदाय पहले से ही परेशान है. वे ग़ुस्से में हैं. उन्हें ओबीसी समुदाय का भी समर्थन मिल रहा है. अराजकता या व्यवधान पैदा करना नेताओं की रणनीति है. वे यह नाम और प्रतिष्ठा पाने के लिए कर रहे हैं.''

लेकिन ऐसा केवल राजनीति में नहीं है. हालांकि वे कह रहे हैं कि यह उनके मन में नहीं है, यह सच नहीं है. मुद्दे का ज़िक्र करते समय वो 'हमारी स्थिति' और 'उनकी स्थिति' जैसे शब्दों का प्रयोग कर सब कुछ समझा देते हैं.

वहीं आश्चर्य जताते हुए दिगंबर पोकले कहते हैं, "अगर हर कोई रोटी का एक टुकड़ा खा ले तो क्या होगा? परेशानी क्या है?"

अनिश्चितता की व्याख्या करते हुए वो कहते हैं, "हम, जिन्हें ऊंची जाति बताते हैं, खेती-बाड़ी के काम में हैं और जिन्हें निचली जाति का माना जाता है, वे कामकाज़ी वर्ग की श्रेणी में आते हैं. उन्हें नौकरियां मिल गई हैं. वे अब एक से दो लाख रुपये की तनख्वाह कमा रहे हैं. अगर पर्याप्त बारिश होगी तो किसान फसल काटेंगे और यदि नहीं हुई तो सूखा पड़ेगा.''

मराठा बनाम ओबीसी

महाराष्ट्र में एकजुट होता ओबीसी समुदाय
इमेज कैप्शन, महाराष्ट्र में एकजुट होता ओबीसी समुदाय

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण ही केवल एक मुद्दा नहीं है. कई सालों से दूसरे जातीय समूह भी आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

लेकिन आज मराठा आरक्षण ही प्रमुख मुद्दा बना हुआ है. आरक्षण की आक्रामक मांग ने अन्य मांगों को जन्म दिया है, जो पिछले कई सालों से मौजूद थीं.

लेकिन इसके परिणामस्वरूप महाराष्ट्र में एक नया जाति आधारित संघर्ष शुरू हो गया है. क्या यह सच है? क्या यह तनाव नया-नया पैदा हुआ है?

प्रसिद्ध विचारक और लेखक डॉक्टर रावसाहब कस्बे के मुताबिक़ जाति आधारित सामाजिक संघर्ष महाराष्ट्र के लिए कोई नई बात नहीं है. उनके मुताबिक यह एक निष्क्रिय जातीय संघर्ष है, जो विभिन्न समुदायों के मन में पनप रहा है.

हाल के सालों में आरक्षण से विशिष्ट समुदायों को मिले फ़ायदे से आपसी द्वेष पैदा हुआ है.

यही वजह है कि गहराता हुआ यह संघर्ष अब सड़कों पर नज़र आ रहा है. इसलिए, यह मौजूदा संघर्ष महाराष्ट्र में सालों से मौजूद गहरे तक फैले तनाव की अभिव्यक्ति मात्र है.

मराठा आरक्षण आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले प्रवीण गायकवाड़ कहते हैं कि मराठों और ओबीसी के बीच संघर्ष का मौजूदा स्वरूप, जो अब गांव-गांव में सामने आ रहा है, यह उस समय नहीं था, जब मराठा आरक्षण की मांग शुरू हुई थी.

लेकिन हाल के राजनीतिक घटनाक्रम के साथ ही संघर्ष की प्रकृति भी बदल गई है. वह आरक्षण के मामले के जानकार हैं. वो शुरू से ही मराठा आरक्षण आंदोलन का हिस्सा रहे हैं.

गायकवाड कहते हैं, "2014 से पहले, ओबीसी समुदाय के ख़िलाफ़ कोई शत्रुता नहीं थी. मराठा क्रांति मोर्चा के दौरान, ऐसी शत्रुता को दिखाने का प्रयास किया गया था. हालांकि, तब यह कहने के लिए आगे आए कि यह एक शांतिपूर्ण आंदोलन है.''

''इसके परिणामस्वरूप, जवाबी आंदोलन बहुत सफल नहीं हुआ था. लेकिन गौर करेंगे तो पाएंगे कि इस बार रैलियों में मराठा समुदाय और ओबीसी समुदाय के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं.''

वो कहते हैं, "दोस्त बँट गए हैं. आरक्षण के कारण पैदा हुआ विभाजन केवल गाँवों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हर घर तक पहुंच गया है. इसके परिणामस्वरूप दुश्मनी फैली है. लोगों में हमारे अधिकारों और हमारे विशेषाधिकारों पर किसी के अतिक्रमण किए जाने की भावना विकसित हुई है. इस भावना का परिणाम निश्चिततौर पर चुनाव में नजर आएगा. वह कुछ ऐसा होगा, जो पहले कभी नहीं देखा गया है."

क्या जातीय समूह चुनाव में एक दूसरे के ख़िलाफ़ काम करेंगे?

 मनोज जरांगे
इमेज कैप्शन, मराठा आरक्षण के लिए आंदोलन करने वाले मनोज जरांगे (गमछा लिए हुए)

इन संघर्षों और हालिया घटनाओं से पैदा हुए आक्रोश का चुनाव नतीजों पर कितना असर होगा, इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता है.

जनसंख्या के नज़रिए से सबसे बड़ा होने के कारण मराठा समुदाय की राजनीतिक आकांक्षाएं महत्वपूर्ण हैं. हालांकि, मराठा मतदाताओं को लुभाने के लिए मराठा आरक्षण का इस्तेमाल राजनीतिक दलों की एक आम रणनीति रही है. हर दूसरे राजनीतिक दल ने इसका उपयोग करने की कोशिश की है. क्या इस बार भी ऐसा ही होगा?

प्रवीण गायकवाड़ ने बताया कि पृथ्वीराज चव्हाण ने मुख्यमंत्री रहते हुए नारायण राणे समिति का गठन कर मराठों को 16 फ़ीसदी आरक्षण दिया था.

बाद में देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने लेकिन मराठा आरक्षण मुद्दे का राजनीतिक परिदृश्य पर कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा. फडणवीस के कार्यकाल में आरक्षण देने के बाद भी, जब मराठा क्रांति मोर्चा पूरी तरह से सक्रिय था. बाद के चुनावों में बीजेपी के सीटों की संख्या में कमी आई.''

''उस समय दिया गया आरक्षण भी कोर्ट में टिका हुआ था. इसके बावजूद, चुनाव में बीजेपी के सीटों की संख्या कम हो गई. बीजेपी और शिव सेना वह चुनाव एक साथ लड़ रहे थे, इसके बाद भी बीजेपी के सीटों की संख्या कम हो गई. उसके विधायकों की संख्या 123 से घटकर 106 पर आ गई. इससे पता चलता है कि राजनीति पर मराठा आरक्षण के प्रभाव की भविष्यवाणी करना मुश्किल है."

वो बताते हैं, "मराठा समुदाय, अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों में बिखरा हुआ है. इस वजह से एकजुटता दिखाना चुनौतीपूर्ण हो गया है. मराठा समुदाय के नेता कांग्रेस, एनसीपी, बीजेपी, शिव सेना, एमएनएस और यहां तक ​​कि वंचित बहुजन विकास अघाड़ी में भी मौजूद हैं. यह समुदाय सभी राजनीतिक गुटों में अपनी ताक़त दिखाने के लिए पर्याप्त रूप से संगठित नहीं है."

दूसरी ओर, ऐसा लगता है कि ओबीसी समुदाय ने ऐतिहासिक रूप से ख़ुद को राजनीतिक रूप से संगठित कर लिया है. आरक्षण के लिए जारी संघर्ष ने उनकी एकता को मज़बूत किया है. ख़ासकर मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के बाद, महाराष्ट्र और उत्तर भारत की राजनीति में ओबीसी समुदाय प्रमुखता से दिखाई देने लगा.

आरक्षण के लिए मौजूदा संघर्ष तेज हो गया है. इससे ओबीसी समुदाय में एकजुटता बढ़ी है. उनकी यह एकता आरक्षण की उनकी मांगों पर ज़ोर देने और चुनाव परिणामों को प्रभावित करने के लिए महत्वपूर्ण है.

इसलिए, वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ इशारा करता है कि अगर ओबीसी समुदाय की ओर से एक साथ आने का ऐसा ठोस प्रयास जारी रहा, तो इसका चुनाव परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा.

अन्य जातियों और समुदायों की मांगें

एसटी आरक्षण के लिए प्रदर्शन करते धनगर समुदाय के लोग
इमेज कैप्शन, एसटी आरक्षण के लिए प्रदर्शन करते धनगर समुदाय के लोग

आरक्षण की लड़ाई महाराष्ट्र में केवल मराठा और ओबीसी समुदाय के बीच नहीं है. अन्य समुदाय भी आरक्षण की वकालत करते हैं. उन्हें भी विभिन्न स्तरों पर राजनीतिक समर्थन हासिल है.

जहाँ आर्थिक मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, वहीं संख्या बल की तुलना में राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की चाहत भी है. धनगर समुदाय अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आरक्षण की मांग कर रहा है. अभी राज्य में उसे घुमंतू जनजातियों की श्रेणी में आरक्षण के लिए रखा गया है.

हमने जिस इलाक़े की यात्रा की, वहाँ धनगर समुदाय काफ़ी संख्या में है. उनके वोट स्थानीय राजनीति पर भी प्रभाव डालते हैं. चूंकि मराठा आंदोलन लगातार मज़बूत होता जा रहा है, इसलिए धनगर आरक्षण का मुद्दा भी तेज़ आवाज़ के साथ ज़ोर पकड़ रहा है. धनगर बहुल गांवों में उनके हित की वकालत करते बड़े-बड़े होर्डिंग नज़र आते हैं.

माही जलगाँव की धनगर बस्ती के निवासी नवनाथ शिंदे कहते हैं, "मराठा समुदाय बड़ा है, इसमें कोई संदेह नहीं है. धनगर समुदाय भी महत्वपूर्ण है. आज आर्थिक ताक़त मराठों के हाथ में है. महाराष्ट्र के पास जो भी आर्थिक संसाधन हैं, उससे मराठा समुदाय को लाभ मिलता है. उससे धनगर समुदाय को कोई ख़ास लाभ नहीं मिलता."

उन्हें लगता है कि यदि बहुसंख्यक समुदायों को भी आरक्षण मिल गया तो वे आरक्षण का लाभ खो देंगे. गाँव-गाँव में इन समुदायों का आंदोलन चल रहा है. इसका मतलब है कि विभिन्न समुदायों के बीच प्रतियोगिता है. लेकिन क्या घुमंतू जनजातियों के आरक्षण से उन्हें आरक्षण मिल पाना संभव है?

प्रतिमा परदेशी एक आरक्षण की जानकार और लेखक हैं. वो कहती हैं, "पहले जब ये कार्यक्रम बनाए गए थे और एसटी श्रेणी बनाई गई थी, तो देश भर के मानवविज्ञानी सूची बनाने के लिए एक साथ आए थे. सूची तैयार करते समय, निश्चित रूप से मानदंड तैयार किए गए थे. उनमें से कोई भी मानदंड उन लोगों के लिए उपयुक्त नहीं है, जो हैं आज हमें सूची में शामिल करने के लिए कह रहे हैं.''

''जो लोग आज एसटी आरक्षण की मांग कर रहे हैं, वे कुछ साल पहले तक एससी वर्ग में सूचीबद्ध करने की मांग कर रहे थे. इससे पहले उनकी मांग थी कि उन्हें ओबीसी में डाला जाए.''

''इसका मतलब यह है कि अगर हमें कोई चीज़ यहाँ नहीं मिल रही है, तो हम दूसरे का पता लगाएंगे और उसे हासिल करेंगे. कभी-कभी मुझे यह आश्चर्य होता है कि कहीं यह सबसे अधिक पीड़ित लोगों को और अधिक दबाने का प्रयास तो नहीं है.''

जातीय गौरव के ज़रिए राजनीतिक ताक़त

मंडल बनाम कमंडल के नेता
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राजनीतिक परिदृश्य में जातिगत संघर्ष पहले की तुलना में बढ़ रहा है. इसका चरम प्रभाव ग्रामीण स्तर पर पहले से ही दिखाई दे रहा है.

ऐसा केवल महाराष्ट्र में ही नहीं है, जहां जातियों की विभाजन रेखा व्यापक होती जा रही है, भारत में हर जगह यह परिदृश्य एक जैसा ही है.

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल जाति आधारित जनगणना की मांग कर रहे हैं. वे इसी जनगणना के आधार पर आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं. वे इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना रहे हैं.

डॉ. रावसाहब कस्बे कहते हैं, "आज भारत की राजनीति में अगर हम ध्यान से देखें, तो राहुल गांधी लगातार जाति-आधारित जनगणना की मांग करते हैं. इसके पीछे कारण यह है कि आज़ादी के बाद के 75 साल बाद भी इस देश में ऐसे समुदाय हैं, जिन्हें सत्ता से लाभ नहीं मिला है. इसका मतलब है आरक्षण की वजह से कुछ छोटे समुदायों को पर्याप्त अवसर मिला है जबकि बड़े समुदाय उपेक्षित रहे हैं.''

''जब हम कहते हैं कि यह देश विविधतापूर्ण है, तो यह समझना आवश्यक है कि हमारे देश में समय के साथ विभिन्न जातियों से नए वर्ग उभरे हैं. ये नए वर्ग अपनी जाति से उभरते हैं और राजनीतिक सत्ता की आकांक्षा रखते हैं. इस राजनीतिक सत्ता के लिए, वे अपने समुदाय को मज़बूत करते हैं और सत्ता में रहने वाले किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल के साथ बातचीत करने का प्रयास करते हैं.''

जातिगत पहचान को यह मानते हुए तेज़ किया गया है कि खोए हुए अवसरों को पाने का तरीक़ा आरक्षण है. यह ध्रुवीकरण तब हुआ है, जब जाति समूहों ने ख़ुद को राजनीतिक दलों में संगठित किया है. गांवों के स्तर पर यह प्रक्रिया और तेज़ी से हो रही है.

ऐसा जब हुआ तो देश में जातीय राजनीति का जवाब धार्मिक भावना से देने की कोशिश की गई. 90 के दशक में मंडल-कमंडल का मुद्दा कैसे सामने आया, यह सब जानते हैं.

मंडल-कमंडल राजनीति की वह ऐतिहासिक फॉल्ट लाइन एक बार फिर चौड़ी होने जा रही है.

अगर इस चुनाव में यह और भी बड़ी और गहरी हो जाती है, तो चुनाव के बाद रोजमर्रा के जीवन में इसके परिणामों से कैसे बचा जा सकता है?

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