सुप्रीम कोर्ट का ईडब्ल्यूएस पर फ़ैसला क्या पैदा कर सकता है नई मुश्किलें?

भारत का सुप्रीम कोर्ट

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    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक ऐतिहासिक फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बहुमत से आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के आरक्षण को लेकर संविधान संशोधन को बरक़रार रखा.

इसके तहत अनारक्षित श्रेणियों के बीच के लोगों को शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने की शुरुआत केंद्र सरकार ने साल 2019 से की थी. साल 2019 में संसद ने संविधान के 103वें संशोधन को पारित करते हुए अनुच्छेद 15 और 16 में खंड जोड़े थे.

ये सरकार को समाज के उन आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए कोटा शुरू करने की इजाज़त देते थे जिन्होंने अन्य किसी आरक्षण का फ़ायदा नहीं उठाया था. सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से जो फ़ैसला दिया, वो इस संविधान संशोधन के ख़िलाफ़ चुनौती को ख़ारिज करता है.

इसमें ये तर्क दिया गया था कि यह संशोधन संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है. सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला आने के कुछ ही देर बाद महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस फ़ैसले के सराहना की.

उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से पिछड़े उन लोगों को ईडब्ल्यूएस आरक्षण प्रदान किया जाएगा, जो किसी भी जाति आरक्षण में शामिल नहीं हैं और महाराष्ट्र सरकार भी "राज्य में मराठा आरक्षण प्रदान करने पर काम कर रही है".

इस बयान के बाद ये चर्चा शुरू हुई कि क्या सुप्रीम कोर्ट के ईडब्लूएस आरक्षण को बरक़रार रखने के फ़ैसले से उन समुदायों के लिए आरक्षण की राह फिर एक बार खुल गई है जो पिछले कई सालों से आरक्षण पाने की मांग करते रहे हैं.

'मराठा और अन्य समुदायों के लिए आरक्षण की राह नहीं खुली'

मराठा आरक्षण आंदोलन
इमेज कैप्शन, तीन साल पहले मराठा समुदाय ने आरक्षण के लिए बड़ा आंदोलन किया था

जस्टिस एसएन अग्रवाल पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश हैं और हरियाणा पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष रह चुके हैं. 

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वे कहते हैं, "मराठा समुदाय में जो आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग हैं उन्हें ईडब्लूएस आरक्षण का फ़ायदा मिल सकेगा. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से मराठा समुदाय को पूरा आरक्षण मिलने की राह नहीं खुली है." 

जस्टिस अग्रवाल कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि आरक्षण का अनुपात 50 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं किया जा सकता. 

उन्होंने कहा, "अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण पहले से ही क़रीब 50 प्रतिशत है. जनरल कैटेगरी में जो कमज़ोर वर्ग हैं, जिनकी आमदनी सालाना आठ लाख रुपए से कम है या जिनके पास पाँच एकड़ से कम कृषि भूमि है उन्हें ईडब्लूएस आरक्षण का लाभ मिलेगा." 

डॉ. चंचल कुमार सिंह हिमाचल प्रदेश नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं और क़ानून पढ़ाते हैं. 

वे कहते हैं, "एक राजनीतिक स्तर पर ये कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने ईडब्लूएस आरक्षण को सही ठहराया है तो किसी समुदाय विशेष के लिए भी ऐसा आरक्षण उपलब्ध कराया जाए. ये मांग तो रहती है और आरक्षण मांगने वाले समुदायों को प्रोत्साहन मिलता है कि उन्हें भी आरक्षण दिया जाए."

मराठा आरक्षण

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लेकिन साथ ही डॉ. चंचल कुमार सिंह कहते हैं कि बहुत सारे न्यायिक फ़ैसलों में पिछड़ेपन को परिभाषित किया गया है चाहे वो सामाजिक पिछड़ापन हो या शैक्षिक. 

वे कहते हैं, "तो ये देखा जाता है कि क्या वो वर्ग या समुदाय उन मानदंडों को पूरा करता है. 

क्या किसी वर्ग या समुदाय का सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व है? "उन्होंने कहा, "मराठा आरक्षण की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया था और उसको ख़ारिज इसी आधार पर किया गया था कि सरकार मराठा आरक्षण देने से पहले अपनी रिपोर्ट में ये नहीं दिखा पाई कि ये वर्ग पिछड़ा है. उन्होंने इस तरह की कोई प्रक्रिया ही नहीं की थी जिससे ये साबित हो सके कि ये समुदाय पिछड़ा है. इसलिए उसे निरस्त कर दिया गया." 

गौरतलब है कि मई 2021 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से महाराष्ट्र सरकार के उस क़ानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिसमें मराठा समुदाय को आरक्षण का लाभ देते हुए राज्य में कोटा की 50 प्रतिशत के सीमा को लांघा गया था. 

ये फ़ैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि मराठा समुदाय के लिए एक अलग आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (क़ानून की उचित प्रक्रिया) का उल्लंघन करता है.

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंदिरा साहनी मामले के उस फ़ैसले पर फिर से विचार करने से इनकार कर दिया था, जिसमें आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय की गई थी.

कई समुदाय मांगते हैं आरक्षण

आरक्षण आंदोलन

पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग राज्यों में कई समुदाय समय-समय पर आरक्षण की मांग करते रहे हैं. 

अतीत में कई मौक़ों पर इस मांग ने हिंसक प्रदर्शनों की शक्ल भी अख़्तियार की है. 

गुर्जर समुदाय 1931 की जाति जनगणना के अनुसार राजस्थान की आबादी का लगभग सात प्रतिशत हिस्सा है.

वो 2005 से शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण और एक अलग पिछड़ी श्रेणी में रोजगार की मांग कर रहे हैं.

उनकी मांग है कि ये आरक्षण मौजूदा अन्य पिछड़ा वर्ग में दिए गए 21 प्रतिशत आरक्षण के अलावा हो.

इसके लिए वे कई बार विरोध प्रदर्शन भी कर चुके हैं. 

इसी तरह की मांग हरियाणा में जाट समुदाय की भी रही है, जो राज्य की आबादी का क़रीब 29 प्रतिशत हैं और एक प्रभावशाली समुदाय है. 

साल 2016 में 30 से अधिक लोग मारे गए थे और दर्जनों घायल हुए थे, जब आरक्षण के मुद्दे पर हुए जाट आंदोलन ने राज्य में एक हिंसक रूप ले लिया था. 

इस हिंसा में सार्वजनिक संपत्ति का भी बहुत नुकसान हुआ था. 

गुजरात में ऐसे ही आरक्षण की मांग पाटीदार समुदाय की भी रही है जिन्हें ऐतिहासिक रूप से संपन्न माना जाता रहा है. 

आरक्षण की मांग करते हुए पाटीदार समुदाय का तर्क था कि बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बेरोज़गारी की वजह से उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए. 

पाटीदार समुदाय का ये भी मानना था कि जहाँ आरक्षण की मदद से ओबीसी श्रेणी में आने वाले युवा लगातार अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधर कर पा रहे हैं, वहीं पाटीदार समुदाय आरक्षण के अभाव में पीड़ित हो रहा है. 

जुलाई 2015 में पाटीदार समुदाय के लोगों ने अन्य पिछड़ा वर्ग का दर्जा पाने की मांग करते हुए गुजरात में सार्वजनिक प्रदर्शन किए और कई बार इन प्रदर्शनों में हिंसा भी हुई.

ईडब्लूएस आरक्षण पर फै़सले को कैसे देखा जाए?

आरक्षण पर अदालत का फ़ैसला

अब ये आशंका जताई जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट के ईडब्लूएस आरक्षण को बरक़रार रखने के फै़सले से फिर एक बार वो सभी समुदाय प्रदर्शन करने लगेंगे, जो कई सालों से आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि ईडब्लूएस श्रेणी में आरक्षण और ओबीसी श्रेणी में आरक्षण दो अलग बातें हैं, जिन्हें एक नज़र से नहीं देखा जा सकता. 

जस्टिस एस एन अग्रवाल कहते हैं, "ये बिल्कुल ठीक फै़सला है. अनुसूचित जातियों में भी अमीर लोग भरे पड़े हैं. जो लोग आईएएस हैं, या मंत्री हैं. वहीं सामान्य श्रेणी में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो आर्थिक तौर पर बहुत कमज़ोर हैं और उन्हें किसी भी आरक्षण का लाभ नहीं मिल पता. ईडब्लूएस कोटा के तहत अब उन्हें फ़ायदा मिल सकेगा.” 

वे कहते हैं, "मेरा मानना है कि आरक्षण देना का आधार आर्थिक ही होना चाहिए ताकि ग़रीब लोगों को इसका फ़ायदा मिल सके. जो ग़रीब लोग हैं उन्हें आरक्षण का फ़ायदा मिलना चाहिए ताकि अमीर लोग उनका हक़ न मार सकें."

आरक्षण

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जस्टिस अग्रवाल के मुताबिक़ ईडब्लूएस के तहत 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना सही है क्योंकि "अगर ऐसा न हो तो जनरल केटेगरी के आर्थिक रूप से कमज़ोर लोग कहाँ जाएंगे".

वे कहते है, "आरक्षण के लिए आर्थिक मानदंड अपनाना बिल्कुल सही है. क्योंकि इसमें जनरल केटेगरी के ग़रीब लोगों को फ़ायदा मिलेगा." 

डॉ. चंचल कुमार सिंह का भी मानना है कि ईडब्लूएस कोटा को बरक़रार रखने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक अच्छा फै़सला है.

वे कहते हैं, "जब सिस्टम काम करता है तो कमज़ोर वर्ग हमेशा पैदा होता रहता है. कुछ लोग आगे बढ़ते हैं, कुछ लोग कमज़ोर हो जाते हैं. पिछले 30 साल में आर्थिक पिछड़ापन ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है. कुछ लोग हाशिए पर चले गए. जो वैश्वीकरण और आर्थिक विकास हुआ उसका फ़ायदा मुट्ठीभर लोगों को मिला. तो बहुत लोग पीछे रह गए."

वे कहते हैं कि ऐसी स्थिति में, "इस तरह की सकारात्मक कार्रवाई की ज़रूरत तो पड़ती रहेगी और आरक्षण सकारात्मक कार्रवाई का ही एक ज़रिया है."

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