वो राज्य जिसने किया सर्वाधिक आरक्षण का प्रावधान लेकिन अब क्यों हो रहा है हंगामा

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर से आने वाली ठंडी हवाओं के बीच आरक्षण के मुद्दे पर छत्तीसगढ़ की राजनीति, उत्तर से दक्षिण तक गरमाई हुई है.
आदिवासी इलाकों में आरक्षण के मुद्दे पर हर दिन प्रदर्शन हो रहे हैं. कहीं चक्का जाम किया जा रहा है, कहीं धरना दिया जा रहा है तोकहीं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का पुतला दहन हो रहा है.
मंगलवार को भी पूरे राज्य में राष्ट्रीय राजमार्ग को जगह-जगह जाम कर दिया गया. कुछ जगहों पर रेल यातायात भी रोकने की कोशिश हुई.
असल में छत्तीसगढ़ में आरक्षण को लेकर अजीब-सी स्थिति पैदा हो गई है. यह देश का अकेला ऐसा राज्य है, जहां पिछले दो महीने से लोक सेवाओं और शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण का नियम और रोस्टर ही लागू नहीं है.
सूचना के अधिकार में पूछे गए एक सवाल के जवाब में भी राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग ने कहा है कि हाईकोर्ट द्वारा आरक्षण की व्यवस्था को असंवैधानिक बताये जाने के बाद से राज्य में आरक्षण से संबंधित नियम और रोस्टर सक्रिय नहीं है.
कैसे हुई ऐसी हालत

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राज्य सरकार ने तीन साल पहले पूरे देश में सर्वाधिक 82 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू की थी. लेकिन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इसपर रोक लगा दी.
इसके बाद इस साल 19 सितंबर को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा पुरानी आरक्षण व्यवस्था को भी ‘असंवैधानिक’ बता कर रद्द कर दियागया.
आरक्षण लागू नहीं होने से राज्य के इंजीनियरिंग, पॉलीटेक्निक, बीएड, हार्टीकल्चर, एग्रीकल्चर समेत कई पाठ्यक्रमों में काउंसिलिंगऔर प्रवेश का काम अटक गया है.
राज्य में इंजीनियरिंग, पॉलीटेक्निक, एमसीए जैसे तकनीकि पाठ्यक्रम की तकरीबन 23 हज़ार, बीएड की 14 हज़ार सीट, डीएलएड कीतकरीबन 7 हज़ार, कृषि और उद्यानिकी की तकरीबन 2500 सीटें हैं.
राज्य लोक सेवा आयोग की भर्तियां और उनके परिणाम रोक दिए गए हैं. 12 हज़ार शिक्षकों की भर्ती समेत कई पदों की अधिसूचना रोक दी गई है.
लगभग एक हज़ार रिक्त पदों के लिए 6 नवंबर को होने वाली सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा स्थगित कर दी गई.
चपरासी के पद के लिए 2.5 लाख अभ्यर्थियों की परीक्षा का परिणाम टाल दिया गया है. कई प्रवेश परीक्षाएं स्थगित कर दी गई हैं.
आरक्षण के कारण चिकित्सा पाठ्यक्रम से जुड़े प्रवेश परीक्षाओं का मामला अदालत में पहुंच गया है.
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आगे की राह

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छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा ने बीबीसी से कहा,“छत्तीसगढ़ में आरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और मुझे उम्मीद है कि अगले सप्ताह या दस दिन में इस मामले की सुनवाई होगी.”
इधर राज्य सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए दिसंबर के पहले सप्ताह में आरक्षण के मुद्दे पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया है.
लेकिन विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि राज्य सरकार को एक अध्यादेश लाकर आरक्षण को लागू कर देना चाहिए.
हालांकि राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस स्थिति के लिए भारतीय जनता पार्टी को ही ज़िम्मेवार ठहरा रहे हैं.
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा, “ये उनके ही कर्मों का पाप है, जिसे सुधारने में हम लगे हैं.”

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82 फ़ीसदी आरक्षण का फ़ैसला
भारतीय जनता पार्टी के कार्यकाल में रमन सिंह की सरकार ने 18 जनवरी 2012 को एक अधिसूचना जारी करते हुए आरक्षणअधिनियम 1994 की धारा 4 में संशोधन करते हुए, छत्तीसगढ़ गठन के समय से लागू आरक्षण का दायरा 50 फ़ीसदी से बढ़ा कर 58 फ़ीसदी कर दिया था.
रमन सिंह की सरकार ने अनुसूचित जनजाति को मिलने वाले 20 प्रतिशत आरक्षण को बढ़ा कर 32 प्रतिशत और अनुसूचित जाति कोमिलने वाला 16 प्रतिशत आरक्षण घटा कर 12 प्रतिशत कर दिया था.
अन्य पिछड़ा वर्ग को दिए जा रहे 14 प्रतिशत आरक्षण को यथावत रखा गया था.
आरक्षण की इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ कांग्रेस के कुछ नेताओं समेत अन्य लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की.
इसके बाद 2018 में आई भूपेश बघेल की सरकार ने 15 अगस्त 2019 को नई आरक्षण व्यवस्था लागू करने की घोषणा की.
इस नई व्यवस्था में अनुसूचित जाति के आरक्षण को 12 फीसदी से बढ़ा कर 13 फीसदी और अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया गया.
आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लोगों को 10 फीसदी आरक्षण को जोड़ने के बाद छत्तीसगढ़ मेंआरक्षण का दायरा 82 फ़ीसदी तक जा पहुंचा.
भूपेश बघेल की सरकार के इस फ़ैसले को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और हाईकोर्ट ने इस आरक्षण व्यवस्था पर रोक लगा दी.
यानी राज्य में 2012 में रमन सिंह सरकार द्वारा लाई गई आरक्षण व्यवस्था ही लागू रही.
लेकिन इस साल 19 सितंबर को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने, रमन सिंह सरकार द्वारा लागू आरक्षण व्यवस्था को बिना ठोस आधार के लागू करने और 50 फ़ीसदी आरक्षण के दायरे से अधिक आरक्षण देने को आधार बताते हुए, 2012 की आरक्षण की व्यवस्था को रद्द कर दिया.
संविधान विशेषज्ञ और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पूर्व महाधिवक्ता कनक तिवारी का कहना है कि अनुसूचित जाति के आरक्षण प्रतिशत कोकम करने और आदिवासियों का आरक्षण प्रतिशत बढ़ाए जाने का कोई युक्तियुक्त कारण नहीं दिया गया था.
इस तकनीकी आधार परहाईकोर्ट ने आरक्षण को खारिज़ कर दिया.
कनक तिवारी ने बीबीसी से कहा, “दरअसल जब आरक्षण का प्रतिशत तय हो जाता है तब एक रोस्टर पद्धति बनाई जाती है कि पहला पद किसको मिलेगा, दूसरा किसको मिलेगा, तीसरा किसको मिलेगा. अलग-अलग वर्गों के लिए उनका बंटवारा होता है. वह अभी फिलहाल नए प्रतिशत के हिसाब से लागू नहीं हो सकता क्योंकि वह प्रतिशत ही हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है.”
आरक्षण पर राजनीति

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छत्तीसगढ़ में 2012 से लागू आरक्षण की व्यवस्था, ऐसे समय में रद्द हुई है, जब राज्य के विधानसभा चुनाव में केवल एक साल का समयबचा है.
ऐसे में सरकार और विपक्ष, दोनों ही इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेवार ठहरा रहे हैं.
विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का आरोप है कि उनकी सरकार द्वारा लागू किए गए आरक्षण नियमों का कांग्रेस पार्टी शुरु से विरोधकरती रही है.
आदिवासियों को 32 फ़ीसदी आरक्षण देने के पक्ष में कांग्रेस नहीं हैं, इसलिए कांग्रेस के लोगों ने ही हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी थी.
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नारायण चंदेल ने बीबीसी से कहा,"भूपेश बघेल की सरकार ने हाईकोर्ट में आरक्षण के पक्ष में तर्क और तथ्य रखे ही नहीं. इसलिए 2012 से लागू आरक्षण को रद्द कर दिया गया."
"अब जबकि आरक्षण रद्द कर दिया गया है तो सरकार आदिवासियों का 32 फीसदी आरक्षण का अध्यादेश क्यों नहीं लाती? सितंबर में फैसला आ गया था. इतने दिन क्या कर रहे थे?"
छत्तीसगढ़ के पूर्व मंत्री और भाजपा के आदिवासी नेता केदार कश्यप ने एक प्रेस कांफ्रेंस में आरोप लगाया कि रमन सिंह सरकार द्वारालागू आदिवासी आरक्षण का विरोध करने वाले नेता केपी खांडे को भूपेश बघेल की सरकार ने अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्षबनाया.
वहीं भूपेश बघेल सरकार द्वारा लागू आरक्षण व्यवस्था के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले कुणाल शुक्ला को भीभूपेश सरकार ने शोधपीठ का अध्यक्ष बनाया.
हालांकि राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आरक्षण के मसले पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाये जाने का हवाला दे रहे हैं.
उनका आरोप है कि सत्ता में रहते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी आरक्षण नीति के समर्थन में ज़रुरी दस्तावेज़ अदालत में जमा नहीं किए, इसलिए आरक्षण रद्द हुआ.
लेकिन पार्टी के भीतर ही आरक्षण के मसले पर उनका विरोध हो रहा है.
पूर्व केंद्रीय मंत्री और बस्तर के आदिवासी नेता अरविंद नेताम इस मसले पर अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ खड़े हैं.
कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शुमार अरविंद नेताम, छत्तीसगढ़ में सर्व आदिवासी समाज के संरक्षक भी हैं. अरविंद नेताम सरकार पर आदिवासियों के साथ धोखाधड़ी का आरोप लगा रहे हैं.
अरविंद नेताम कहते हैं, “इस सरकार ने इन दो महीनों में आदिवासी हितों पर दो बड़े आघात किए हैं. पहला तो ये कि पंचायत एक्सटेंशनइन शेड्यूल एरिया क़ानून के लिए बनाए नियम में आदिवासियों को हाशिये पर डाल दिया गया और दूसरा ये कि राज्य में आरक्षण ख़त्म कर दिया गया. इसके बाद भी सरकार कहती है कि वह आदिवासियों के सथ खड़ी है. यह एक क्रूर मजाक है.”
छत्तीसगढ़ में आरक्षण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट और विधानसभा में क्या कुछ होता है, इस पर सबकी नज़रें टिकी हुई हैं.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि छत्तीसगढ़ में आरक्षण का दायरा क्या होगा?
क्या भूपेश बघेल की सरकार, 2012 में लागू भाजपा की रमन सिंह सरकार की आरक्षण नीति के साथ खड़ी होगी या अपनी सरकार द्वारा 2019 में लाई गई आरक्षण नीति के लिए कोई रास्ता निकालेगी?
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