ईमान ख़लीफ़: ज़िंदगी की मुश्किलों को नॉकआउट कर गोल्ड मेडल जीतने वाली मुक्केबाज़

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अल्जीरिया की 25 साल की मुक्केबाज़ ईमान ख़लीफ़ ने शुक्रवार को पेरिस ओलंपिक में चीन की विश्व चैंपियन यांग ल्यू को हराकर महिला बॉक्सिंग का गोल्ड मेडल जीत लिया.
पेरिस में मुक्केबाज़ी मुक़ाबले में ख़लीफ़ के हिस्सा लेने के साथ जेंडर विवाद गहरा गया और इस पर प्रतियोगिता के दौरान जमकर बहस भी हुई.
ख़लीफ़ इंटरनेशनल बॉक्सिंग एसोसिएशन के 'जेंडर एलीजिबिलिटी टेस्ट' में फेल हो चुकी थीं. ओलंपिक में उनकी जीत वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप से उन्हें निकाले जाने के बाद ठीक एक साल बाद मिली है.
ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने के बाद ख़लीफ़ ने कहा, "यह मेरा सपना है, मैं बहुत खुश हूं. ये जीत शानदार है. विश्वास नहीं होता, मैं अपने प्रदर्शन से बहुत खुश हूं. ये मेरी आठ साल की मेहनत का नतीजा है. रात-दिन एक करने के बाद मैंने जीत हासिल की है. अल्जीरिया के लोगों का धन्यवाद."
मुक़ाबले का नतीजा पता चलने के बाद जब ख़लीफ़ की प्रतिद्वंद्वी यांग ल्यू ने उनका हाथ ऊपर किया तो ये तस्वीर ख़लीफ़ के शुरूआती मैच से अलग थी.
शुरूआत के एक मैच में इटली की बॉक्सर एंजेला करिनी ने 46 सेकेंड की फ़ाइट में ही मुक़ाबला छोड़ दिया था. इस मैच के पहले तीस सेकंड के भीतर चेहरे पर पड़े एक पंच के कुछ देर करिनी ने ये कहते हुए मैच छोड़ दिया कि उन्हें अपनी जान भी बचानी है. बाद में ख़लीफ़ पर पुरुष होने के आरोप लगाए गए थे.

जीत का स्वाद बढ़ गया
जीत के बार ईमान ख़लीफ़ ने संवाददाताओं से कहा, "मुझ पर हुए उन हमलों की वजह से मेरी जीत का स्वाद बढ़ गया है. ओलंपिक में हम एथलीटों की तरह व्यवहार करने के लिए आए हैं. मुझे उम्मीद है कि मुझे भविष्य में इस तरह के हमलों का सामना नहीं करना होगा.''
जब ये युवा मुक्केबाज़ रिंग में उतरीं तो वहां अल्जीरिया के समर्थकों की भीड़ थी. उनके समर्थक हरे, सफेद और लाल रंग के झंडे लहरा रहे थे.
पेरिस ओलंपिक का रास्ता ख़लीफ़ के लिए न तो आसान था और न ही वहां तक वो कम वक्त में पहुंची हैं.
पश्चिमी अल्जीरिया के एक गांव में पैदा हुई ख़लीफ़ को अब तक की अपनी जिंदगी में पूर्वाग्रह, दबंगई और संसाधनों की कमियों का सामना करना पड़ा है.
लेकिन खलीफ़ पहली बार ओलंपिक में हिस्सा नहीं ले रही थीं. उन्होंने 2020 मे टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा लिया था. हालांकि उस वक्त उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.
इस साल पेरिस ओलंपिक में उन्होंने अपने पिछले तीन मुक़ाबलों में से हर राउंड में जीत हासिल कर शानदार प्रदर्शन किया और गोल्ड पदक हासिल किया.
वो मुक्केबाज़ी में गोल्ड मेडल जीतने वाली अल्जीरिया की पहली महिला हैं.
कैसे हुई बॉक्सिंग की शुरुआत
अपने बचपन और किशोरावस्था के दौरान, ईमान ख़लीफ़ एक ऐसे रुढ़िवादी गांव में पली-बढ़ीं जहां खेलों को पुरुषों का विशेषाधिकार माना जाता है. लेकिन वहां वो फु़टबॉल खेलने के अपने कौशल के लिए जानी गईं.
बच्चों के लिए काम करने वाले संयुक्त राष्ट्र के संगठन यूनिसेफ़ के मुताबिक़ (ख़लीफ़ यूनिसेफ़ की ब्रांड अंबेसडर हैं) ख़लीफ़ के आसपास के बच्चे उनसे लड़ते थे क्योंकि उन्हें उनसे चुनौती महसूस होती थी.
ख़लीफ़ कहती हैं कि जिंदगी का ये दौर उनके लिए काफी कठिन था, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. वो कहती हैं कि इसने उन्हें बॉक्सिंग की प्रैक्टिस के लिए प्रेरित किया और वो मुक्केबाज़ी को बचाव के तरीके के रूप में देखने लगीं.
लेकिन मुक्केबाज़ी भी उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण था. सहारा रेगिस्तान में काम करने वाले उनके पिता लड़कियों के मुक्केबाज़ी के सख्त ख़िलाफ़ थे.
लेकिन इसके बावजूद अपने स्कूल के शिक्षकों की प्रेरणा से उन्होंने बॉक्सिंग की ट्रेनिंग लेने का फै़सला किया. ख़लीफ़ उस वक़्त सिर्फ़ 16 साल की थीं.

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ख़राब आर्थिक हालात के बावजूद कम नहीं हुआ जज़्बा
खेल की ट्रेनिंग लेना उनके लिए आसान नहीं था. उन्हें हर सप्ताह अपने घर से क़रीब 10 किलोमीटर दूर नज़दीकी शहर जाना हाता था जिसके लिए बस सस्ता साधन था.
लेकिन, यूनिसेफ़ के अनुसार न तो ख़लीफ़ के पास और न ही उनकी मां के पास बस का किराया होता था.
ख़लीफ़ सड़कों पर लोहे के टुकड़े उठाकर पैसों के लिए उन्हें बेचा करती थीं. वहीं उनकी मां कुसकुस (सूजी से बना हुआ व्यंजन) बेचती थीं.
पेरिस ओलंपिक से पहले ख़लीफ़ ने एक अल्जीरी को दिए इंटरव्यू में कहा था कि सबसे कठिन चीज़ ट्रेनिंग के लिए की जाने की व्यवस्था करना और आर्थिक दिक्कतें थीं.
उन्होंने कहा, "मुझे ट्रेनिंग जारी रखने के लिए हर तरह का काम करना पड़ा."
लेकिन कोई भी मुसीबत उनके रास्ते का रोड़ा नहीं बन पाई.
ट्रेनिंग के बाद ईमान ख़लीफ़ के खेल में निखार आया. 2018 में 19 साल की उम्र में नई दिल्ली में विश्व चैंपियनशिप में वो 17वीं पोज़िशन पर रहीं. फिर उन्होंने रूस में 2019 विश्व चैंपियनशिप में अल्जीरिया का प्रतिनिधित्व किया. यहां वो पहले दौर में ही बाहर हो गईं, वो 33वें स्थान पर रहीं.
2020 में उन्होंने टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई किया, जहां उन्होंने लाइटवेट स्पर्धा में अपने देश का प्रतिनिधित्व किया. वो क्वार्टर फ़ाइनल तक पहुंची लेकिन आगे नहीं बढ़ सकीं.
2022 में वो अपने करियर में धीरे-धीरे आगे बढ़ती रहीं और आईबी विमेन बॉक्सिंग चैंपियनशिप के फ़ाइनल में पहुंचने वाली पहली अल्जीरियाई मुक्केबाज़ बन गईं. यहां वो आयरलैंड की एमी ब्रॉडहर्स्ट से हार गईं.
2023 में अयोग्य घोषित
ख़लीफ़ की लैंगिक पहचान से जुड़ा विवाद 2023 में शुरू हुआ था जब उन्हें भारत में हुई विश्व महिला चैंपियनशिप के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था.
इंटरनेशनल बॉक्सिंग एसोसिएसन (आईबीए) इस नतीजे पर पहुंची थी कि परीक्षणों में ख़लीफ़ योग्यता के पैमानों पर खरी नहीं उतर सकीं.
रूस के उमर क्रेमलेव के नेतृत्व वाली आईबीए को 2019 के बाद से अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने मान्यता नहीं दी है. इसके लिए आईओसी ने प्रबंधन से जुड़े कारण बताये हैं.
हालांकि, आईबीए ने पिछले साल हुए उन परीक्षणों के नतीजे सार्वजनिक नहीं किए थे लेकिन आईओसी का कहना था कि ‘उनमें टेस्टोस्टोरोन का स्तर अधिक पाया गया था.’
इसके बाद की गई टिप्पणी में आईबीए के अध्यक्ष उमर क्रेमलेव ने संकेत दिए थे कि ख़लीफ़ और ताइवान की एथलीट लिन यू-तिंग में महिलाओं में पाये जाने वाले एक्सएक्स क्रोमोसोम नहीं है, बल्कि एक्सवाई क्रोमोसोम हैं. लिन यू-तिंग को भी भारत में हुई चैंपियनशिप के लिए अयोग्य घोषित किया गया था.
हालांकि, आईबीए ने कभी भी सबूत पेश नहीं किए थे और अब ये कहा है कि "उसका विवरण गोपनीय है", लेकिन यह दर्शाता है कि इससे दोनों एथलीटों को अन्य दावेदारों पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिला था.
2023 में आईबीए के निर्णय पर मुक्केबाज़ इमान ख़लीफ़ हैरान रह गईं थीं.
हालांकि, उस वक़्त अल्जीरियाई मीडिया से बात करते हुए ख़लीफ़ ने कहा था, "मुझे अक्सर मेरे रंगरूप की वजह से परेशान किया जाता था, मैंने इसका प्रतिरोध किया और हर चीज़ के बावजूद, बॉक्सिंग करना जारी रखा. आज वो तर्क कामयाब हो गए हैं और मैं इन्हें लेकर हैरान हूं."

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2024 का विवाद
पिछले साल जो कुछ भी हुआ उसके बावजूद, ईमान ख़लीफ़ ने अपनी ट्रेनिंग जारी रखी और 2024 ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई किया.
पेरिस पहुंचने से पहले यूनिसेफ़ के साथ एक साक्षात्कार में ईमान ख़लीफ़ ने कहा, "जब मैंने शुरूआत की थी, मेरे पास कुछ भी नहीं था, आज सब कुछ है."
उन्होंने ये भी बताया कि शुरूआती सालों के उनके पिता उनका विरोध कर रहे थे, लेकिन अब वो उनका समर्थन करते हैं. ईमान ने कहा, "मेरे परिजन भी अब मेरा समर्थन कर रहे हैं, वो मेरे सबसे बड़े फ़ैन हैं."
लेकिन पेरिस ओलंपिक के अपने पहले मुक़ाबले में जब वो इतालवी मुक्केबाज़ एंजेला करिनी के सामने उतरीं तो फिर से नया विवाद खड़ा हो गया. मुक़ाबले के 46 सेकंड के बाद ही एंजेला ये कहते हुए खेल से बाहर हट गईं कि उन्हें अपनी जान भी बचानी है.
इस विवाद पर अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (ओआईए) ने एक बयान में कहा "ओलंपिक की बॉक्सिंग प्रतिस्पर्धा में शामिल हो रहे सभी एथलीट प्रतिस्पर्धा की योग्यता और पंजीकरण के नियमों पर खरे उतरते हैं. इसके अलावा सभी मेडिकल नियमों का भी पालन किया जाता है."
कई मौकों, पर आईओसी के प्रवक्ता मार्क एडम्स ने ये भी कहा कि ये ट्रांसजेंडर मामला नहीं हैं.
मार्क एडम्स ने कहा, "अल्जीरिया की मुक्केबाज़ महिला पैदा हुईं हैं, महिला की तरह ही उनका पंजीकरण हुआ है और पूरी ज़िंदगी वो महिला ही रही हैं. उन्होंने महिला होकर ही मुक्केबाज़ी की है और उनके पास पासपोर्ट भी महिला का ही है."

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गोल्ड मेडल तक का सफ़र
अल्जीरियाई मुक्केबाज़ ईमान ख़लीफ़ का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2022 में रजत पदक जीतना था, इसके बाद उनका पेरिस ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने का सफ़र शुरू हुआ.
माना जा रहा था कि फ़ाइनल में उन्हें कड़ा मुक़ाबला मिलेगा क्योंकि यांग ल्यू दुनिया की सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज़ों में शामिल हैं और अपने प्रतिद्वंद्वी को कड़ी टक्कर देने के लिए विख़्यात हैं. लेकिन शुक्रवार रात का मुक़ाबला भी ख़लीफ़ की एक और आसान जीत के साथ समाप्त हुआ.
हालांकि, ख़लीफ़ के ख़िलाफ़ रिंग में उतरने वाली कई मुक्केबाज़ उन्हें लेकर असहजता ज़ाहिर कर चुकी हैं, जिससे पर्दे के पीछे के असंतोष का पता चलता है.
करिनी ने मैच के तुरंत बाद अपनी निराशा और असंतोष ज़ाहिर करते हुए कहा था कि, जो हो रहा है ठीक नहीं है. हालांकि बाद में उन्होंने अपने बयान को लेकर ख़लीफ़ से माफ़ी भी मांगी.
इससे अगले मुक़ाबले से पहले ख़लीफ़ के ख़िलाफ़ हंगरी की प्रतिद्वंद्वी एना लूका हामोरी ने भी कहा था कि उनकी भागीदारी बॉक्सिंग के लिए ठीक नहीं हैं.
वहीं हंगरी की बॉक्सिंग एसोसिएशन ने कहा था कि वो ख़लीफ़ और लिन यू-तिंग की महिला बॉक्सिंग में भागीदारी का कड़ा विरोध करते हैं.
बाद में मुक़ाबला हारने के बाद हामोरी ने भी ख़लीफ़ को अगले मुक़ाबलों के लिए मुबारक़बाद दी थी.
सेमीफ़ाइनल से पहले थाइलैंड की उनकी प्रतिद्वंदी या थाईलैंड की बॉक्सिंग टीम ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी.
हालांकि मुक़ाबले के बाद उनकी प्रतिद्वंदी जेनजीन सुवानफ़ेंग ने कहा था, "वो महिला ही हैं, लेकिन बहुत मज़बूत हैं."
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