खेल की दुनिया में 'जेंडर' पर कब-कब हुआ बवाल?

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पेरिस ओलंपिक में महज़ 46 सेकंड चलने वाला एक बॉक्सिंग मैच पूरी दुनिया में सुर्ख़ियां बटोर रहा है. पेरिस ओलंपिक का प्रचार जेंडर न्यूट्रल बताते हुए किया गया था. लेकिन अब इसी पर सवाल उठ रहे हैं.
दरअसल, 66 किलोग्राम भार वर्ग के राउंड ऑफ-16 का मैच इटली की एंजेला करीनी और अल्जीरिया की ईमान ख़लीफ़ के बीच खेला गया. इस मैच पर विवाद छिड़ गया.
एलन मस्क और लेखिका जेके रोलिंग समेत कई दिग्गजों ने इस पर अपनी राय रखी.
सोशल मीडिया पर लोग आरोप लगा रहे हैं कि ईमान में टेस्टोस्टेरोन का स्तर अधिक है. ये हार्मोन पुरुषों में पाया जाता है और इसलिए ईमान के महिला स्पर्धा में हिस्सा लेने पर विवाद हो रहा है.
ईमान को 2023 में भारत में हुई विश्व चैंपियनशिप में डिस्क्वालिफाई भी कर दिया गया था क्योंकि वो जेंडर टेस्ट में फेल हो गई थीं.
खेलों की दुनिया में जेंडर पर ये विवाद कोई नया नहीं है. पहले भी ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें भारतीयों के नाम भी शामिल रहे हैं. एक नज़र ऐसे ही कुछ मामलों पर-

लॉरेल हब्बार्ड

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न्यूज़ीलैंड की लॉरेल हब्बार्ड ओलंपिक में हिस्सा लेने वाली पहली ट्रांसजेंडर एथलीट हैं. योग्यता की शर्तों में बदलाव के बाद उन्हें टोक्यो 2020 के लिए विमेंस वेटलिफ्टिंग टीम में चुना गया था.
साल 2013 में ट्रांसजेंडर के तौर पर दुनिया के सामने आने से पहले वो पुरुषों के इवेंट्स में हिस्सा लेती रहीं.
इस विवादास्पद फैसले के बाद जहां आलोचकों ने कहा कि लॉरेल को अनुचित लाभ मिला है. तो वहीं कुछ ने इसका स्वागत किया.
इस फैसले के बाद न्यूज़ीलैंड ओलंपिक कमिटी ने हब्बार्ड का एक बयान जारी किया. जिसमें लॉरेल ने कहा, "मैं न्यूज़ीलैंड के लोगों से मिले समर्थन के लिए आभारी हूं."
साल 2015 में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमिटी (आईओसी) के नियमों में बदलाव हुआ, जिसके तहत ये प्रावधान किया गया कि अगर किसी एथलीट का टेस्टोस्टेरोन हार्मोन एक तय स्तर से कम है, तो ट्रांसजेंडर एथलीट महिलाओं की स्पर्धा में हिस्सा ले सकते हैं.
लॉरेल हब्बार्ड के शरीर में टेस्टोस्टेरोन बेशक एक स्तर से कम थे. लेकिन आलोचकों ने कहा कि ये बायोलॉजिकल महिला खिलाड़ियों के साथ अन्याय है.
रेने रिचर्ड्स

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रेने रिचर्ड्स प्रेफेशनल टेनिस टूर्नामेंट में हिस्सा लेने वाली अमेरिका की पहली महिला ट्रांसजेंडर थीं. उन्होंने ऐसा कर साल 1977 के यूएस ओपन में इतिहास रच दिया.
रेने का जन्म पुरुष के रूप में हुआ था. उनका नाम रिचर्ड रस्किन्ड था. टेनिस शुरुआती जीवन से ही उनकी ज़िंदगी का हिस्सा रहा.
येल यूनिवर्सिटी में वो पुरुष टेनिस टीम की कप्तान थीं. वो अमेरिकी नौसेना में डॉक्टर के तौर पर सेवाएं दे चुकी हैं और इस दौरान उन्होंने ऑल नेवी टेनिस चैंपियनशिप भी जीती.
रिचर्ड्स ने यूएस ओपन में पुरुष के तौर पर कई बार हिस्सा लिया. रेने शादीशुदा थीं और एक बच्चे की पिता थीं. लेकिन अपने ही भीतर दो पर्सनैलिटी के बीच हो रही लड़ाई से जूझ रही थीं.
साल 1975 में 40 साल की उम्र में रेने ने जेंडर चेंज करवाया. फिर अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक नई ज़िंदगी की शुरुआत की.
उन्होंने ला जोला टेनिस टूर्नामेंट जीता. इसके बाद 1976 में एक पत्रकार ने इस बात से पर्दा उठाया कि वो अतीत में पुरुष के तौर पर प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं.
तब उनके जेंडर को लेकर खूब बवाल हुआ. आलोचकों ने कहा कि रेने का महिलाओं की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना गलत है. क्योंकि उनका शरीर बाकी महिलाओं के मुकाबले अधिक मज़बूत है.
यूएस ओपन के 95 साल के इतिहास में तब पहली बार क्रोमोसोम (जेंडर) टेस्ट की शुरुआत हुई.
रेने ने कहा, "मेरी यूएस ओपन खेलने की कोई मंशा नहीं थी. लेकिन जब खेलने की मंज़ूरी नहीं मिली तो सब बदल गया. आप मुझे नहीं बता सकते कि मैं खेल सकती हूं या नहीं. मैं एक महिला हूं और अगर मैं एक महिला के तौर पर यूएस ओपन खेलना चाहती हूं, तो खेलूंगी."
जब रेने को उनके एक दोस्त ने न्यूजर्सी के साउथ ऑरेंज ओपन में खेलने के लिए बुलाया तब 20 महिलाओं ने इसका विरोध करते हुए इवेंट का बहिष्कार किया.
रेचल मकिनॉन

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कनाडा की ये ट्रांसजेंडर महिला खिलाड़ी भी खूब विवादों में रही. महिलाओं के साथ प्रतिस्पर्धा में इनके हिस्सा लेने का विरोध हुआ.
साइकलिंग से जुड़े एक टूर्नामेंट में तीसरे स्थान पर आई खिलाड़ी जेन-वैगनर-असाली ने प्रतियोगिता को 'अनुचित' बताया था. उन्होंने साइकिलिंग की अंतरराष्ट्रीय नियामक संस्था से अपने नियमों में बदलाव की मांग की. रेचल ने साइकलिंग की विश्व चैंपियनशिप जीती थीं.
आलोचकों ने कहा कि बायोलॉजिकल तौर पर पुरुष के शरीर वाली ट्रांस महिलाओं का बायोलॉजिकल महिलाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करना अनुचित है.
इस पर रेचल ने कहा था कि आलोचकों की ये बात अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमिटी के चार्टर के मुताबिक सही नहीं है. जिसमें कहा गया है, "स्पोर्ट्स खेलना एक मानव अधिकार है."
रेचल मकिनॉन ने जिस कैटेगरी में हिस्सा लिया था. उसी में हिस्सा लेने वाली पूर्व ब्रिटिश मासटर्स चैंपियन विक्टोरिया हुड ने बीबीसी स्पोर्ट्स से कहा कि अन्य राइडर्स ने विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के मौके को 'त्याग' दिया क्योंकि वे रेचल मकिनॉन से प्रतिस्पर्धा नहीं करना चाहतीं.
विक्टोरिया ने कहा, "विज्ञान स्पष्ट कहता है. ट्रांस महिलाओं के पास एडवांटेज होता है."
वो कहती हैं, "आज किसी ऐसे शख्स ने विश्व रिकॉर्ड तोड़ा है जो पुरुष के तौर पर पैदा हुआ था. जिसे अब महिला कहा जाता है. उसके और एक महिला के तौर पर पैदा हुई खिलाड़ी के बीच अंतर बढ़ जाता है."

दुती चंद

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भारतीय स्प्रिंटर दुती चंद ने अपना पहला नेशनल लेवल मेडल 2007 में जीता था. 2013 में उन्हें एशियन चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ मिला.
दुती का पहला इंटरनेशनल इवेंट जूनियर विश्व चैंपियनशिप था. इसमें भाग लेने के लिए वो तुर्की गई थीं. मेडल मिलने के बाद लोगों का उन्हें लेकर नज़रिया बदलने लगा. आलोचना करने वाले भी प्रोत्साहन देने लगे थे.
मगर दुती की सबसे बड़ी परीक्षा 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों में हुई. उनका नाम भारतीय दल से हटा दिया गया था.
भारतीय एथलेटिक्स फेडरेशन के अनुसार उनके शरीर में टेस्टोस्टेरोन की अधिक मात्रा पाई गई थी. इसके कारण उनके महिला खिलाड़ी के तौर पर हिस्सा लेने पर पाबंदी लग गई.
विरोध में दुती ने 2015 में कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट्स यानी कैस में अपील की. वो केस जीत गईं. दुती ने 2017 की एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में दो ब्रॉन्ज़ मेडल जीते.
2018 में जकार्ता एशियाई खेलों में सिल्वर मेडल हासिल किया. उन्होंने 2016 के रियो और 2020 टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा लिया, मगर जीत नहीं सकी थीं.
हालांकि दुती डोप टेस्ट में फेल हो गईं. वर्ल्ड एंटी डोपिंग एजेंसी (WADA) ने उनके दो टेस्ट किए थे. इनके सैंपल पॉजिटिव मिले. उन पर 3 जनवरी 2023 से 4 साल का बैन लगाया गया.
दुती चंद समलैंगिक रिश्ते को स्वीकार करने वाली पहली भारतीय एथलीट भी हैं.
कैस्टर सेमेन्या

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800 मीटर दौड़ में दो बार की ओलंपियन रहीं दक्षिण अफ़्रीकी धावक कैस्टर सेमेन्या को वर्ल्ड एथलेटिक्स (डब्लूए) ने शरीर में टेस्टोस्टेरोन की अधिक मात्रा होने की वजह से बैन कर दिया था.
वर्ल्ड एथलेटिक्स ट्रैक एंड फ़ील्ड स्पर्धाओं की गवर्निंग बॉडी है. इसे ही पहले इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ़ एथलेटिक्स यानी आईएएएफ़ के नाम से जाना जाता था.
सेमेन्या सुर्ख़ियों में उस वक्त आई जब साल 2009 में एथलेटिक्स की अंतरराष्ट्रीय संस्था आईएएएफ़ ने उनसे लिंग परीक्षण करवाने के लिए कहा था.
हालांकि, इस जाँच के नतीजे 10 साल तक सार्वजनिक नहीं किए गए और सेमेन्या आगे भी टूर्नामेंटों का हिस्सा बनीं. लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये दावा किया गया कि सेमेन्या में सामान्य से अधिक टेस्टोस्टेरोन स्तर पाया गया.
आईएएएफ़ की ओर से साल 2017 में कराए एक शोध में ये दावा किया गया कि टेस्टोस्टेरोन का बढ़ा स्तर महिला एथलीटों के प्रदर्शन को बेहतर करता है. सेमेन्या से कहा गया कि वह वर्ल्ड चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए टेस्टोस्टेरोन स्तर को दवा से घटाएं.
सेमेन्या ने आईएएएफ़ की ओर से टेस्टोस्टेरोन के ऊंचे स्तर को सामान्य करने के लिए दवा लेने वाले इस नियम को चुनौती दी थी. कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट में सेमेन्या ये मुक़दमा हार गईं.
लेकिन पिछले साल ही यूरोपीयन कोर्ट ऑफ़ ह्यूमन राइट्स में ये मामला सेमेन्या जीत गई थीं.
सेमेन्या की शारीरिक बनावट जन्म से ही ऐसी थी कि उनका शरीर अधिक टेस्टोस्टेरोन बना रहा था.
सेमेन्या ने साल 2009 में बीबीसी को बताया था कि उनके मुश्किल समय में उनके परिवार और दक्षिण अफ़्रीकी सरकार और जनता ने उनका साथ दिया.
शांति सुंदरराजन

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भारत की शांति सुंदरराजन ने 2006 के एशियाई खेलों में रजत पदक जीता था लेकिन जेंडर टेस्ट में फेल कर जाने की वजह उनसे पदक छीन लिया गया.
शांति सुंदरराजन ने साल 2006 के दोहा एशियाड में 800 मीटर दौड़ में रजत पदक जीता था. उनकी परेशानियों का दौर उस समय शुरू हुआ, जब वह जेंडर टेस्ट में फेल हो गईं.
इसके बाद एथलेटिक्स फ़ेडरेशन ऑफ इंडिया ने उन पर किसी भी इवेंट में भाग लेने का प्रतिबंध लगा दिया.
शांति में भी हाइपरएंड्रोनिज़म पाया गया था, जिसकी वजह से महिलाओं के शरीर में अत्याधिक टेस्टोस्टेरोन बनता है.
हालांकि, इसके 10 साल बाद शांति को तमिलनाडु सरकार ने नौकरी दी. उन्हें तमिलनाडु स्पोर्ट्स डेवलेपमेंट अथॉरिटी का स्थायी कोच नियुक्त किया गया.
ईमान ख़लीफ़

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ताज़ा मामला अल्जीरिया की बॉक्सर ईमान ख़लीफ़ से जुड़ा है. पेरिस में चल रहे ओलंपिक खेलों में गुरुवार को उनका मुकाबला इटली की बॉक्सर एंजेला करीनी के साथ हुआ.
46 सेकंड के इस मैच से एंजेला रोते हुए बाहर हुईं. फिर रेफरी ने ईमान को विजयी घोषित कर दिया. इसी हार पर विवाद हो गया है.
एंजेला के बाहर जाने से पहले ईमान के मुक्कों के कारण उनके सिर पर लगा हेडगियर अपनी जगह से हट गया था. जब ईमान को विजयी घोषित किया गया, तब एंजेला ने उनसे हाथ नहीं मिलाया. वो घुटनों के बल रिंग में बहुत देर तक रोती रहीं.
एंजेला ने कहा, "मुझे अपनी जान बचानी थी. मैं किसी को जज नहीं करती. मैं रिंग में नहीं डरती. मैंने इस मैच को खत्म कर दिया क्योंकि मैं इसे जारी रखने में सक्षम नहीं थी."
ईमान को पिछले साल भारत में हुई आईबीए वीमैन्स बॉक्सिंग चैंपियनशिप के फाइनल से ठीक पहले जेंडर टेस्ट में फेल होने के की वजह से बाहर कर दिया गया था.
उसी चैंपियनशिप में ताइवान की बॉक्सर यू-टिंग भी जेंडर टेस्ट में फेल हो गई थीं.
हालांकि दोनों को पेरिस ओलंपिक्स में प्रवेश मिल गया. दरअसल आईओसी ने दिल्ली में हुई विश्व चैंपियनशिप का आयोजन नहीं किया था.
दिल्ली में हुई चैंपियनशिप इंटरनेशनल बॉक्सिंग एसोसिएशन ने करवाई थी. लेकिन ओलंपिक खेलों का आयोजन आईओसी करवाता है.
ईमान ने अपने करियर में 50 मैच खेले हैं. इनमें से वो केवल 9 हारी हैं. उन्होंने बीबीसी स्पोर्ट्स के कहा, "मैं यहां गोल्ड के लिए आई हूं. मैं हर किसी से लड़ती हूं."
वहीं अल्जीरिया की ओलंपिक कमिटी ने ईमान की आलोचना किए जाने का विरोध किया है. आईओसी ने कहा कि सभी बॉक्सर प्रतियोगिता के नियमों और पात्रता के मुताबिक हिस्सा ले रहे हैं.
आईओसी के प्रवक्ता मार्क एडम्स ने मंगलवार को कहा "इन एथलीट्स ने बीते कई वर्षों में पहले भी कई बार प्रतिस्पर्धा की हैं. ये यहां अचानक नहीं आए. इन्होंने टोक्यो में भी प्रतिस्पर्धा की है."
लेकिन इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने कहा "यह बराबरी का मुकाबला नहीं था."
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