भारतीय हॉकी टीम पर नई रंगत, लगातार दूसरा ओलंपिक पदक जीतने की इस वजह से लगाई जा रही है आस

एफ़आईएच प्रो लीग के एक मैच में भारतीय खिलाड़ी

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    • Author, मनोज चतुर्वेदी
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

भारतीय पुरुष हॉकी टीम के एफ़आईएच प्रो लीग के पहले चरण के आठ मैचों में प्रदर्शन को देखकर यह लगने लगा है कि उसमें पेरिस ओलंपिक में पदक जीतने वाला क्लास आ गया है.

इसलिए इस टीम से टोक्यो ओलंपिक जैसी उम्मीदें लगाई जा सकती हैं. टोक्यो में भारत ने 41 साल बाद हॉकी का ओलंपिक पदक जीता था.

भारत ने प्रो लीग के पहले चरण में खेले आठ मैचों में से तीन जीते, चार ड्रा खेले और एक में हार मिली.

ड्रा खेले चार में से दो मैचों के पेनल्टी शूटआउट को अपने पक्ष में किया. इस तरह भारतीय टीम 15 अंक के साथ विश्व की नंबर एक टीम नीदरलैंड (26 अंक) और ऑस्ट्रेलिया (20 अंक) के बाद तीसरे स्थान पर है.

बराबरी से खेलने का जज्बा

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दुनिया की दिग्गज टीमों, खासतौर से ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेलते समय हमारी टीम कभी अपना बेस्ट देती नहीं दिखती थी.

यही वजह है कि भारत को कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे फ़ाइनल मैच में बुरी तरह से शिकस्त मिली. लेकिन प्रो लीग के मैचों के दौरान भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया ही नहीं नीदरलैंड जैसी टीम को भी बराबरी से टक्कर देती दिखी.

भारतीय टीम पहले कई बार ऐसी टीमों के ख़िलाफ़ रक्षात्मक खेलकर या तो अपने ऊपर दवाब बना लेती थी या फिर हमलावर रुख अपनाने के चक्कर में डिफ़ेंस कमजोर पड़ जाने पर अपने ऊपर एक-दो गोल खाकर मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर पड़ जाती थी. लेकिन कोच क्रेग फुलटोन की ओर से तैयार टीम में लड़ने का माद्दा दिखने लगा है.

नीदरलैंड के ख़िलाफ़ पहले मैच में भारतीय टीम खेल समाप्ति से दो मिनट पहले तक 1-2 से पिछड़ी हुई थी. लेकिन भारतीय टीम ने आख़िरी समय में हमलावर रुख अपनाकर पेनल्टी कॉर्नर हासिल किया और हरमनप्रीत के गोल से बराबरी पाकर मैच को पेनल्टी शूटआउट में खींच दिया और फिर इसे 4-2 से अपने पक्ष में किया.

मनप्रीत ने बनाया टीम में संतुलन

भारतीय हॉकी टीम के खिलाड़ी

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मनप्रीत सिंह को भारतीय टीम में कई भूमिका निभाने वाला खिलाड़ी माना जा सकता है. वह कौशल के मामले में तो धनी हैं ही. अनुभव के साथ दिमाग़ के बेहतर इस्तेमाल ने उन्हें बेजोड़ खिलाड़ी बना दिया है. वह डिफ़ेंस या फिर अटैक किसी भी भूमिका में इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

फुलटोन ने शुरुआत में भारतीय डिफेंस में मजबूती लाने के लिए उनका डिफेंस में इस्तेमाल शुरू किया था. लेकिन इन मैचों के दौरान वह सेंट्रल अटैकिंग हाफ़ के रूप में खेलते दिखे हैं.

उनके इस भूमिका में आने से भारतीय हमलों में एक अलग ही पैनापन दिखने लगा है.

भारत ने आख़िरी मैच आयरलैंड के ख़िलाफ़ खेला. वह अपने हमलावर रूप से भारत पर दबाव बनाने में सफल भी हो गई.

इस स्थिति में मनप्रीत ने खेल की लय के विपरीत शानदार प्रयास करते हुए भारत को पेनल्टी कॉर्नर दिलाकर बढ़त दिला दी और खेल को पलट दिया.

खिलाड़ियों की दोहरी भूमिका से फ़ायदा

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फुलटोन ने कोशिश की है कि खिलाड़ी कम से कम दो पोजिशन पर खेलने में सक्षम रहें. टीम को इसका फ़ायदा यह मिलता है कि एक योजना नहीं चलने पर दूसरी को अपनाने में आसानी होती है.

हमें याद है कि 2012 के लंदन ओलंपिक के दौरान एक फारवर्ड को हाफ़ लाइन में खिलाने की बात की गई, तो उसने खेलने से मना कर दिया था. उनका कहना था कि वो इस भूमिका में अपने को सक्षम नहीं पाते हैं.

इन मैचों के दौरान खिलाड़ियों को दोहरी भूमिकाओं में आजमाकर उनकी क्षमता को नया रूप दिया गया है. गुरजंत सिंह आमतौर पर फारवर्ड के तौर पर खेलते हैं. पर लीग के कुछ मैचों में उन्हें राइट हाफ़ बैक के तौर खेलते देखा गया. गुरजंत कहते हैं कि कोच ने सभी खिलाड़ियों को कम से कम दो भूमिकाओं के लिए तैयार किया है.

असल में फुलटोन का मानना है कि कई बार कोई खिलाड़ी चोटिल हो जाता है या किसी खास दिन वह क्लिक नहीं कर पाता है, तो टीम में उस भूमिका के लिए दूसरा खिलाड़ी तैयार रहना चाहिए.

यही वजह है कि मनप्रीत और हार्दिक सिंह जैसे खिलाड़ी हमलों को बनाने में अहम भूमिका तो निभाते ही हैं और ज़रूरत पड़ने पर बचाव में भी मुस्तैद नज़र आते हैं.

भारत को एक और श्रीजेश की ज़रूरत

पीआर श्रीजेश

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भारतीय गोलकीपर पीआर श्रीजेश भले ही उम्र के ऐसे पड़ाव पर हैं, जहां आमतौर पर खिलाड़ी संन्यास लेने के बारे में सोचने लगते हैं. लेकिन वह अभी भी अपनी दिलेरी की वजह से भारत के नंबर एक गोलकीपर बने हुए हैं.

प्रो लीग के मैचों के दौरान नीदरलैंड पर भारतीय जीत में उनकी ही शूटआउट में दिखाई दिलेरी का ही कमाल है. यह सही है कि भारत के दूसरे गोलकीपर कृष्ण पाठक भी अच्छे हैं पर श्रीजेश वाली क्षमता नहीं रखते हैं. इसलिए भारत को एक और श्रीजेश की ज़रूरत है.

भारत के बेहतर प्रदर्शन में हरमनप्रीत सिंह ने पेनल्टी कॉर्नरों को गोल में बदलने में दक्षता दिखाई है. ज़रूरत पड़ने पर अमित रोहिदास भी गोल जमाते दिखते हैं. पर वह हरमनप्रीत वाली क्षमता नहीं रखते हैं. भारत को ओलंपिक में पोडियम पर चढ़ने के लिए इन दोनों क्षेत्रों में और मेहनत करने की ज़रूरत है.

लेने होंगे सबक

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ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ पहले मैच में ब्लैक गोवर्स ने पहले दो मिनट में ही दो गोल जमाकर भारत पर दवाब बना दिया. पर भारतीय टीम ने दवाब में बिखरने के बजाय एकजुटता दिखाई और हाफ टाइम तक चार गोल जमाकर 4-2 की बढ़त से मैच में अपने को जीत की तरफ़ बढ़ा दिया था.

भारतीय दबदबा इस मैच में तीसरे क्वार्टर में भी दिखा. लेकिन भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया के पूरी तरह से हमलावर होने पर डिफ़ेंस में व्यस्त हो गई. इस कारण भारत के हमलों में एकाएक कमी आने का ऑस्ट्रेलिया ने फ़ायदा उठाया और आख़िरी आठ मिनट के खेल में तीन गोल जमाकर अपनी हार को जीत में बदल दिया.

यह कहा जाता है कि अटैक ही सर्वश्रेष्ठ बचाव है. भारतीय टीम यदि इस मैच में हमलों के सिलसिले को बनाए रखती तो ऑस्ट्रेलिया को हमलों में पूरा जोर लगाने का मौका नहीं मिलता, क्योंकि उन्हें डिफेंस पर भी ध्यान देना होता.

ओलंपिक के लिए बेहतर संभावनाएं

भारतीय हॉकी टीम के खिलाड़ी

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पेरिस ओलंपिक में भारत को ऑस्ट्रेलिया, बेल्ज़ियम, अर्ज़ेंटीना, न्यूजीलैंड और आयरलैंड के साथ ग्रुप बी में रखा गया है. प्रत्येक ग्रुप की टॉप चार टीमें क्वार्टर फाइनल में स्थान बनाएंगी. भारत को क्वार्टर फ़ाइनल में पहुंचने में शायद ही कोई दिक़्क़त हो. पर असली परीक्षा क्वार्टर फ़ाइनल में ही होनी है.

भारत अपने ग्रुप की टीमों में से आयरलैंड को दोनों मैचों में हरा चुका है और ऑस्ट्रेलिया से एक मैच ड्रा खेल चुका है. भारत ओलंपिक से पहले अपने ग्रुप की बेल्ज़ियम और अर्जेंटीना से भी खेल चुका होगा. पर इतना ज़रूर है कि भारतीय टीम इस समय जिस दबदबे के साथ खेल रही है, उसी तरह से खेलती रही तो लगातार दूसरे ओलंपिक में पदक के साथ ज़रूर भारत लौट सकती है.

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