खेल संघ से लड़ाई में खिलाड़ी 'पटखनी' क्यों खा जाते हैं?

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- Author, सौरभ दुग्गल
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय कुश्ती संघ में सुधार की मांग को लेकर प्रदर्शन करने वाले कुश्ती खिलाड़ियों की उम्मीदों को संघ के चुनावी नतीजों से गहरा धक्का लगा है.
यह विवाद जनवरी में दिल्ली की सड़कों पर ओलंपिक मेडल विजेता पहलवान बजरंग पुनिया और साक्षी मलिक के साथ वर्ल्ड चैंपियन मेडलिस्ट विनेश फोगाट के भारतीय कुश्ती संघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर लगाए संगीन आरोपों और प्रदर्शन से शुरू हुआ था.
बृजभूषण शरण सिंह भारतीय जनता पार्टी के बाहुबली सांसद के तौर पर भी जाने जाते हैं. महिला पहलवानों के यौन शोषण के अलावा संघ के अंदर पारदर्शिता के अभाव और जवाबदेही के मुद्दे ने इस पूरे मुद्दे को चर्चा में ला दिया. लेकिन हाल में संपन्न कुश्ती संघ के चुनावी नतीजों से स्पष्ट हुआ कि बृजभूषण शरण सिंह का दबदबा पूरी तरह से संघ पर कायम है. कुश्ती संघ की गवर्निंग बॉडी के 15 सदस्यों में 13 पर उनके समर्थक चुने गए हैं.
उनके निकट सहयोगी संजय सिंह पहले उत्तर प्रदेश कुश्ती संघ के अध्यक्ष हुआ करते थे. अध्यक्ष पद के चुनाव में उन्होंने कॉमनवेल्थ खेलों की गोल्ड मेडलिस्ट अनीता श्योराण को 40 के मुक़ाबले सात मतों से हराया. इस चुनाव से साफ़ है कि भारतीय कुश्ती संघ पर बृजभूषण शरण सिंह का वर्चस्व बना रहेगा.
यही वजह है कि ओलंपिक खेलों में मेडल जीतने वाली भारत की एकमात्र महिला पहलवान साक्षी मलिक ने नतीजों के बाद कुश्ती से संन्यास का एलान प्रेस कांफ्रेंस में किया. उनकी आंखों में आंसू थे, जो यह दर्शाने के लिए काफ़ी हैं कि व्यवस्था में बदलाव लाने की उनकी लड़ाई किसी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी.
खेल संघों की राजनीति

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इस चुनाव में खेल संघों की व्यवस्था के अंदर की खामियों को भी उजागर किया है. राज्य खेल संघों में नेशनल स्पोर्ट्स कोड लागू नहीं हैं. इसके चलते संघ के अंदर कामकाज को लेकर कोई पारदर्शी व्यवस्था नहीं है.
किसी भी ओलंपिक में (लंदन ओलंपिक, 2012) में हिस्सा लेने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान गीता फोगाट ने कहा, "यह भारतीय कुश्ती के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटना है कि साक्षी मलिक जैसी महान पहलवान को सक्रिय खेल से असमय ही संन्यास लेना पड़ा."
यह भारतीय कुश्ती के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटना है कि साक्षी मलिक जैसी महान पहलवान को सक्रिय खेल से असमय ही संन्यास लेना पड़ा.
नई दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल, 2010 में गोल्ड मेडल जीतने वाली इन पहलवान ने कहा, "जब कोई खिलाड़ी खेल की दुनिया में ख्याति प्राप्त करता है, तो यह पीढ़ियों को खेल को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है. अगर शीर्ष एथलीटों के साथ कुछ अप्रिय घटना होती है, तो यह युवाओं को खेल से दूर रहने के लिए हतोत्साहित करता है."
सिस्टम में खामी

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राष्ट्रीय खेल संघ के चुनाव में, विभिन्न राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की इकाइयों के प्रतिनिधि अध्यक्ष और अन्य पदों के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं. हाल के डब्ल्यूएफआई चुनाव में, 25 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इकाइयों में से प्रत्येक के दो प्रतिनिधि इलेक्टोरल कॉलेज का हिस्सा थे, जिनमें से 47 ने अपना वोट डाला.
राष्ट्रीय खेल महासंघ राष्ट्रीय खेल संहिता के अधीन काम करते हैं, लेकिन यह संहिता राज्य खेल निकायों पर लागू नहीं होती है, जिससे संघ के अंदर कामकाजी व्यवस्था पर किसी का नियंत्रण नहीं होता है.
राष्ट्रीय खेल संहिता के अनुसार, अध्यक्ष या सचिव राष्ट्रीय महासंघ में 12 वर्षों से अधिक समय तक पद पर नहीं रह सकते हैं. हालांकि, कई राज्य इकाइयों में, एक ही पदाधिकारी दो दशक से अधिक समय से अपने अपने पदों पर बने हुए हैं.
चूंकि खेल भारत में राज्य का विषय है, इसलिए केंद्रीय खेल मंत्रालय का राज्य और ज़िला स्तर पर खेल निकायों पर नियंत्रण नहीं होता है.
देश के विभिन्न राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के खेल निकाय सामूहिक रूप से एकजुट होकर राष्ट्रीय खेल महासंघ (एनएसएफ) बनाते हैं.
गीता फोगाट ने कहा, "अगर हम सिस्टम को साफ़-सुथरा करना चाहते हैं तो राष्ट्रीय खेल संहिता राज्य और ज़िला संघों पर भी लागू होनी चाहिए. क्योंकि जो कोई भी राज्य इकाइयों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वही लोग राष्ट्रीय संघ की गवर्निंग काउंसिल का चुनाव करते हैं."
हॉकी टीम ने भी उठाया था विरोध का झंडा

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वैसे यह पूरा विवाद भारतीय खेल जगत में खिलाड़ियों द्वारा अपने ही राष्ट्रीय महासंघ को चुनौती देने की दुर्लभ घटना है.
राष्ट्रीय खेल महासंघ स्वायत्त निकाय हैं. अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में खिलाड़ियों की भागीदारी उनके माध्यम से होती है, ऐसे में महासंघ के ख़िलाफ़ जाने से खिलाड़ियों का खेल करियर ख़तरे में पड़ सकता है.
कुश्ती से पहले, भारतीय खिलाड़ियों का अपने राष्ट्रीय महासंघ के साथ टकराव का आखिरी उदाहरण 2010 में तब दिखा था जब भारतीय पुरुष टीम तत्कालीन हॉकी इंडिया के ख़िलाफ़ हड़ताल पर चली गई थी. हॉकी खिलाड़ियों ने भारतीय क्रिकेट के समान मैच फीस की मांग की थी और 'भुगतान नहीं, खेल नहीं' का रुख अपनाया था.
आख़िरकार, दबाव के आगे झुकते हुए, हॉकी इंडिया ने इस मुद्दे के समाधान के लिए एक समिति का गठन किया. इसमें भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीम के कप्तानों को शामिल किया गया. इस समिति ने खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय मैच अनुभव के आधार पर मैच फीस और अनुबंध राशि का प्रस्ताव रखा था.
इसके लगभग 13 साल बीत जाने के बाद भी, भारतीय हॉकी टीम को अभी तक वादे के मुताबिक तय की गई मैच फीस नहीं मिली है. इसके उलट हॉकी इंडिया के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले वरिष्ठ हॉकी खिलाड़ी राजपाल सिंह को हॉकी इंडिया ने टीम से बाहर का रास्ता दिखाया.
2011 में राजपाल सिंह के नेतृत्व में भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने पहली एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी जीती थी. इस उपलब्धि के बावजूद हॉकी इंडिया ने प्रत्येक विजेता टीम के सदस्य को 25,000 रुपये की मामूली राशि देने का प्रस्ताव रखा था, जिसे खिलाड़ियों ने अस्वीकार कर दिया. लेकिन इस लड़ाई में राजपाल सिंह को टीम से बाहर होना पड़ा था.
कितनी कठिन है खिलाड़ियों की खेल संघों से लड़ाई

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बीजिंग ओलंपिक में मेडल जीतने वाले विजेंदर सिंह ने कहा, "खिलाड़ियों का खेल संघों के ख़िलाफ़ लड़ना कोई आसान काम नहीं है क्योंकि किसी खिलाड़ी का करियर खेल संघों के हाथों में होता है. महासंघों की ताक़त को चुनौती देने के लिए साहस की आवश्यकता भी होती है."
विजेंदर सिंह कहते हैं, "भारत में ऐसे कई मामले हैं जहां खिलाड़ियों का करियर सिर्फ़ इसलिए बर्बाद कर दिया गया क्योंकि उन्होंने महासंघों के कामकाज पर सवाल उठाने की हिम्मत की. यह ग़लत व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का समय है."
टोक्यो ओलंपिक में मेडल जीतने वाले विजेता बजरंग पुनिया ने अपना 'पद्म श्री' पुरस्कार लौटाने का फ़ैसला लिया है.
विजेंदर सिंह कहते हैं, "देश के लिए पदक जीतना किसी खिलाड़ी के लिए सम्मान की बात है और यह वर्षों की कड़ी मेहनत और समर्पण के बाद मिलता है. बजरंग और साक्षी देश के खेल रत्न हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को खेल जगत में चमकने के लिए प्रेरित करते हैं.''
नवनिर्वाचित भारतीय कुश्ती संघ की 15 निर्वाचित सदस्यों में से, केवल दो ओलंपियन पहलवान हैं- पंजाब के करतार सिंह और दिल्ली के जय प्रकाश, दोनों भारतीय कुश्ती संघ में उपाध्यक्ष के तौर पर चुने गए हैं.
पहलवानों की लड़ाई से कुश्ती को कितना नुकसान

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एशियाई खेलों में दो बार गोल्ड मेडल जीत चुके करतार सिंह ने बताया, "इस साल कुश्ती को बहुत नुकसान हुआ है, खासकर आयु वर्ग के पहलवानों के लिए. डब्ल्यूएफआई के निलंबन के कारण, जूनियर राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं नहीं हो सकीं, जिससे युवा पहलवान अपने राष्ट्रीय पदकों के लिए नकद प्रोत्साहन और नौकरी के अवसरों से वंचित रहे."
करतार सिंह बृजभूषण शरण सिंह के मुखर विरोधी माने जाते रहे थे, कुछ महीने पहले उन्होंने चंडीगढ़ में उनके ख़िलाफ़ प्रेस कांफ्रेंस भी आयोजित की थी, लेकिन अब उन्हें संजय सिंह कैंप का हिस्सा माना जा रहा है.
पद्मश्री करतार सिंह ने कहा, "साक्षी मलिक का संन्यास लेना दुर्भाग्यपूर्ण है. लेकिन ये चुनाव खेल मंत्रालय के प्रावधानों के तहत ही कराए गए हैं. मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि कुश्ती से जुड़ा हर व्यक्ति इस खेल को मज़बूत करने के प्रयासों का हिस्सा हो."
क्या नेशनल स्पोर्ट्स कोड को राज्य इकाइयों पर लागू करना चाहिए?
इस सवाल के जवाब में करतार सिंह ने कहा, "पूर्व पहलवान के तौर पर मैं अधिक खेल हस्तियों को खेल प्रशासन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करता हूं. हालाँकि, उनके पास प्रशासनिक अनुभव भी होना चाहिए; अन्यथा, वे अपनी भूमिकाएँ प्रभावी ढंग से नहीं निभा सकेंगे. सुधार संभव है और सरकार को अधिक सक्षम व्यक्तियों को राज्य इकाइयों में लाने का रास्ता देखना चाहिए."
बृजभूषण शरण सिंह का विरोध करने वाले पहलवानों का लगातार समर्थन करने वाले मुक्केबाज़ विजेंदर सिंह ने कहा, "अगर हमारा लक्ष्य व्यवस्था में सुधार करना है, तो केंद्र सरकार या सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए. ज़िला और राज्य संघों में योग्य व्यक्तियों के शामिल होने के लिए दिशा-निर्देश स्थापित करना चाहिए. अंततः ये संघ ही हैं जो राष्ट्रीय खेल संघ का प्रबंधन करने के लिए टीम का चुनाव करते हैं.''
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